16/08/2026
NAZEER AKBARABADI (1735 - 16 August 1830)
جس کام کو جہاں میں تو آیا تھا اے نظیرؔ
خانہ خراب تجھ سے وہی کام رہ گیا
اردو ادب میں نظیر اکبرآبادی کا نام اُن شاعروں میں لیا جاتا ہے جنہوں نے شاعری کو محلوں اور درباروں سے نکال کر عام آدمی کی زندگی سے جوڑ دیا۔ نظیر کی پیدائش 1735 کے آس پاس دہلی میں ہوئی۔ اُن کے والد کا نام سید محمد فاروق تھا، جو عظیم آباد کے نواب کے مصاحبوں میں شمار کیے جاتے تھے۔ اُن کی والدہ نواب سلطان خاں کے خاندان سے تھیں۔ یہ وہ دور تھا جب مغل سلطنت زوال کی طرف بڑھ رہی تھی۔ نظیر کے بچپن میں ہی 1739ء میں نادر شاہ نے دہلی پر حملہ کیا اور بعد میں احمد شاہ ابدالی کے مسلسل حملوں نے دہلی کی حالت اور بدتر کر دی۔ اِنہی پُرآشوب حالات میں اُن کی والدہ دہلی چھوڑ کر آگرہ آ گئیں۔ یہی آگرہ آگے چل کر نظیر کی شخصیت، زندگی اور شاعری کا اصل مرکز بنا۔ نظیر نے باقاعدہ کسی بڑی درسگاہ میں تعلیم حاصل نہیں کی، لیکن اُس زمانے کے رواج کے مطابق عربی اور فارسی پڑھیں اور اپنی ذہین طبیعت سے کئی زبانوں پر دسترس حاصل کی۔ اردو اور فارسی کے علاوہ ہندی، پنجابی، سنسکرت، مارواڑی اور پوربی زبانوں سے بھی واقفیت رکھتے تھے۔ عوام میں اٹھنے بیٹھنے کی وجہ سے اُنہیں عام بول چال اور ہندوستانی زبان کے مختلف لہجوں پر بھی گہری پکڑ حاصل تھی۔ یہی وجہ ہے کہ اُن کی شاعری میں زندگی کی اصل آواز سنائی دیتی ہے۔
نظیر نے آگرہ میں بچوں کو پڑھانا اُن کا ذریعۂ معاش بنا۔ اُنہوں نے اپنا مکتب بھی چلایا۔ کچھ عرصے کے لیے متھرا گئے تو وہاں کے مرہٹہ قلعہ دار نے اُنہیں اپنا اُستاد مقرر کیا۔ آگرہ لوٹنے کے بعد محمد علی خاں کے بچوں کو پڑھایا۔ کہا جاتا ہے کہ اُن کی تدریسی صلاحیت اتنی اچھی تھی کہ بڑے گھرانوں کے بچے بھی اُن سے پڑھتے تھے۔نظیر صرف علم اور ادب کے آدمی نہیں تھے، بلکہ اُن کی شخصیت میں ایک قلندرانہ آزاد مزاجی بھی تھی۔ اُن کی شخصیت کا ایک اور اہم پہلو اُن کا صوفیانہ مزاج تھا۔ وہ تصوف سے گہرا لگاؤ رکھتے تھے اور اُن کی شاعری میں نعتیہ اور صوفیانہ رنگ بھی ملتا ہے۔ ساتھ ہی وہ مذہبی تنگ نظری سے دور انسانیت اور بھائی چارے کو اہمیت دیتے تھے۔ یہی وجہ ہے کہ اُنہوں نے عید اور شبِ برات کے ساتھ ساتھ ہولی اور دیوالی جیسے ہندوستانی تہواروں کو بھی اپنی شاعری کا موضوع بنایا۔ اُن کی نظموں میں مفلسی، بیماری، موسم، جانور، بازار، میلے، تہوار، کھیل، پتنگ، روٹی، کپڑا، دنیا کی ناپائیداری اور انسانی زندگی کے چھوٹے بڑے تمام تجربات دکھائی دیتے ہیں۔ اُنہوں نے معاشرے کے دبے کچلے اور عام طبقے کی زندگی کو بھی اُتنی ہی اہمیت دی جتنی کسی خاص یا اونچے طبقے کو۔
کہا جاتا ہے کہ نظیر نے تقریباً دو لاکھ اشعار کہے، لیکن اُن کا بڑا حصہ محفوظ نہ رہ سکا۔ اُنہوں نے اپنے کلام کو خود کسی مکمل شکل میں جمع نہیں کیا۔ بعد میں اُن کے شاگردوں اور عقیدت مندوں نے اُن کے کلام کو جمع کیا اور "کلیاتِ نظیر اکبرآبادی" کی شکل میں محفوظ کیا۔ نظیر کی شادی ادھیڑ عمر میں ظہورالنساء بیگم سے ہوئی۔ اُن کے دو بچے ہوئے جن میں بیٹے کا نام سید گلزار علی 'اسیر' تھا اور ایک بیٹی تھی۔ عمر کے آخری حصے میں اُنہوں نے گوشہ نشینی اختیار کر لی تھی۔ سنہ 1827ء میں اُنہیں فالج کا حملہ ہوا اور تقریباً 98 سال کی عمر میں 16 اگست 1830ء کو آگرہ میں اُن کا انتقال ہوا۔ اُن کی نمازِ جنازہ سنی اور امامیہ دونوں طریقوں سے پڑھی گئی۔ اُنہیں اُن کے اپنے مکان میں موجود نیم کے درخت کے نیچے سپردِ خاک کیا گیا۔
عیسیٰ کی قم سے حکم نہیں کم فقیر کا
ارنی پکارتا ہے سدا دم فقیر کا
خوبی بھری ہے جس میں دو عالم کی کوٹ کوٹ
اللہ نے کیا ہے وہ عالم فقیر کا
ہم کیوں نہ اپنے آپ کو رو لیویں جیتے جی
اے دوست کون پھر کرے ماتم فقیر کا
سب جھوٹ ہے کہ تم کو ہمارا ہو غم میاں
بابا کسے خدا کے سوا غم فقیر کا
مر جاویں ہم تو پر نہ خبر ہو یہ تم کو آہ
کیا جانے کب جہاں سے گیا دم فقیر کا
اب ہم پہ کیا گزرتی ہے اور کیا گزر گئی
کس سے کہیں وہ یار ہے محرم فقیر کا
جب جیتے جی کسی نے نہ پوچھا تو مہرباں
پھر بعد مرگ کس کو رہا غم فقیر کا
ہو کیوں نہ اس کو فقر کی باتوں میں دست گاہ
ہے بالکا نظیرؔ پراتم فقیر کا
×××××
जिस काम को जहाँ में तू आया था ऐ 'नज़ीर'
ख़ाना-ख़राब तुझ से वही काम रह गया
उर्दू अदब में नज़ीर अकबराबादी का नाम उन शायरों में लिया जाता है जिन्होंने शायरी को महलों और दरबारों से निकालकर आम आदमी की ज़िंदगी से जोड़ दिया। नज़ीर की पैदाइश 1735 के आसपास दिल्ली में हुई। उनके वालिद का नाम सैयद मुहम्मद फ़ारूक़ था, जो अज़ीमाबाद के नवाब के मुसाहिबों में शुमार किए जाते थे। उनकी वालिदा नवाब सुल्तान ख़ाँ के ख़ानदान से थीं। यह वह दौर था जब मुग़ल सल्तनत ज़वाल की तरफ़ बढ़ रही थी। नज़ीर के बचपन में ही 1739 ई. में नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया और बाद में अहमद शाह अब्दाली के लगातार हमलों ने दिल्ली की हालत और बदतर कर दी। इन्हीं पुरआशोब हालात में उनकी वालिदा दिल्ली छोड़कर आगरा आ गईं। यही आगरा आगे चलकर नज़ीर की शख़्सियत, ज़िंदगी और शायरी का असल मरकज़ बना। नज़ीर ने बाक़ायदा किसी बड़ी दर्सगाह में तालीम हासिल नहीं की, लेकिन उस ज़माने के रिवाज के मुताबिक़ अरबी और फ़ारसी पढ़ीं और अपनी ज़हीन तबीयत से कई ज़बानों पर दस्तरस हासिल की। उर्दू और फ़ारसी के अलावा हिंदी, पंजाबी, संस्कृत, मारवाड़ी और पूरबी ज़बानों से भी वाक़फ़ियत रखते थे। अवाम में उठने-बैठने की वजह से उन्हें आम बोलचाल और हिंदुस्तानी ज़बान के मुख़्तलिफ़ लहजों पर भी गहरी पकड़ हासिल थी। यही वजह है कि उनकी शायरी में ज़िंदगी की असल आवाज़ सुनाई देती है।
नज़ीर ने आगरा में बच्चों को पढ़ाना उनका ज़रिया-ए-मआश बना। उन्होंने अपना मकतब भी चलाया। कुछ अरसे के लिए मथुरा गए तो वहाँ के मरहट्टा क़िलेदार ने उन्हें अपना उस्ताद मुक़र्रर किया। आगरा लौटने के बाद मुहम्मद अली ख़ाँ के बच्चों को पढ़ाया। कहा जाता है कि उनकी तदरीसी सलाहियत इतनी अच्छी थी कि बड़े घरानों के बच्चे भी उनसे पढ़ते थे।
नज़ीर सिर्फ़ इल्म और अदब के आदमी नहीं थे, बल्कि उनकी शख़्सियत में एक क़लंदराना आज़ाद-मिज़ाजी भी थी। उनकी शख़्सियत का एक और अहम पहलू उनका सूफ़ियाना मिज़ाज था। वे तसव्वुफ़ से गहरा लगाव रखते थे और उनकी शायरी में नातिया और सूफ़ियाना रंग भी मिलता है। साथ ही वे मज़हबी तंगनज़री से दूर इंसानियत और भाईचारे को अहमियत देते थे। यही वजह है कि उन्होंने ईद और शबे-बरात के साथ-साथ होली और दीवाली जैसे हिंदुस्तानी त्योहारों को भी अपनी शायरी का मौज़ू बनाया। उनकी नज़्मों में मुफ़लिसी, बीमारी, मौसम, जानवर, बाज़ार, मेले, त्योहार, खेल, पतंग, रोटी, कपड़ा, दुनिया की नापायेदारी और इंसानी ज़िंदगी के छोटे-बड़े तमाम तजुर्बात दिखाई देते हैं। उन्होंने समाज के दबे-कुचले और आम तबक़े की ज़िंदगी को भी उतनी ही अहमियत दी जितनी किसी ख़ास या ऊँचे तबक़े को।
कहा जाता है कि नज़ीर ने लगभग दो लाख अशआर कहे,लेकिन उनका बड़ा हिस्सा महफ़ूज़ न रह सका। उन्होंने अपने कलाम को ख़ुद किसी मुकम्मल शक्ल में जमा नहीं किया। बाद में उनके शागिर्दों और अकीदतमंदों ने उनके कलाम को जमा किया और “कुल्लियाते-नज़ीर अकबराबादी” की शक्ल में महफ़ूज़ किया। नज़ीर की शादी अधेड़ उम्र में ज़ुहूरुन्निसा बेगम से हुई। उनके दो बच्चे हुए जिनमें बेटे का नाम सैयद गुलज़ार अली 'असीर' था और एक बेटी थी। उम्र के आख़िरी हिस्से में उन्होंने गोशानशीनी इख़्तियार कर ली थी। सन् 1827 ई. में उन्हें फ़ालिज़ का हमला हुआ और लगभग 98 वर्ष की उम्र में 16 अगस्त 1830 ई. को आगरा में उनका इंतक़ाल हुआ। उनकी नमाज़े-जनाज़ा सुन्नी और इमामिया दोनों तरीक़ों से पढ़ी गई। उन्हें उनके अपने मकान में मौजूद नीम के दरख़्त के नीचे सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
ईसा की क़ुम से हुक्म नहीं कम फ़क़ीर का
अरिनी पुकारता है सदा दम फ़क़ीर का
ख़ूबी भरी है जिस में दो-आलम की कोट कोट
अल्लाह ने किया है वो आलम फ़क़ीर का
सब झूट है कि तुम को हमारा हो ग़म मियाँ
बाबा किसे ख़ुदा के सिवा ग़म फ़क़ीर का
हम क्यूँ न अपने-आप को रो लेवें जीते-जी
ऐ दोस्त कौन फिर करे मातम फ़क़ीर का
मर जावें हम तो पर न ख़बर हो ये तुम को आह
क्या जाने कब जहाँ से गया दम फ़क़ीर का
अब हम पे क्या गुज़रती है और क्या गुज़र गई
किस से कहें वो यार है महरम फ़क़ीर का
जब जीते-जी किसी ने न पूछा तो मेहरबाँ
फिर बा'द-ए-मर्ग किस को रहा ग़म फ़क़ीर का
हो क्यूँ न उस को फ़क़्र की बातों में दस्त-गाह
है बालका 'नज़ीर' पुरातम फ़क़ीर का
#नज़ीर_अकबराबादी
Today 196th