Bazm-e-Adab Badaun

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ASSALAMUALEKUM,
BADAUN KI MASHOOR URDU TANZEEM BAZM E ADAB BADAUN TAQREEBAN 6 SAL SE URDU ADAB KI KHIDMAT KAR RAHI HAI ISME CHOTI BADI ALL INDIA MUSHAIRAY KI MEHFIL KA INAQAD KIYA JATA HAI AUR MUSALSAL JARI HAI,

तिरे हिसाब से दो दिन जो ईद हो जातीग़रीब लोगों की  मिट्टी  पलीद हो  जातीहसीब सोज़
21/03/2026

तिरे हिसाब से दो दिन जो ईद हो जाती
ग़रीब लोगों की मिट्टी पलीद हो जाती

हसीब सोज़

برّصغیر کے ممتاز شاعر جناب اختر ہوشیار پوری کسی تعارف کے محتاج نہیں ہیں۔ اختر ہوشیار پوری کے خاندان کا تعلق طب سے تھا لی...
18/03/2026

برّصغیر کے ممتاز شاعر جناب اختر ہوشیار پوری کسی تعارف کے محتاج نہیں ہیں۔ اختر ہوشیار پوری کے خاندان کا تعلق طب سے تھا لیکن اختر ہوشیار پوری نے اپنے خاندانی پیشہ طب سے انحراف کیا۔ شاعری اور علم و ادب کی طرف زیادہ توجہ کی۔اختر ہوشیار پوری نے ابتدائی تعلیم ہوشیار پور سے حاصل کی۔ 1935ء میں گورنمنٹ کالج ہوشیار پور سے ایف۔اے امتیازی نمبروں سے پاس کیا۔ اپنی آگے کی پڑھائی کے لئے وہ لاہور آ گئے اور 1937ء میں بی۔اے کا امتحان پاس کر لیا۔ زمانہ طالب علمی میں وہ پڑھائی کے ساتھ ساتھ غیر نصابی سر گرمیوں میں بھی بڑھ چڑھ کر حصہ لیتے تھے۔ اختر ہوشیار پوری سیاست میں بھی دلچسپی رکھتے تھے اور کالج کے زمانے میں انہوں نے مسلم فیڈریشن کی بنیاد رکھی۔ غزل کے ساتھ ساتھ اختر ہوشیار پوری نے ،حمد، نعت، سوز و سلام اور ہائیکو نگاری میں میں طبع آزمائی کی۔ اختر ہوشیار پوری کی شعری تصانیف کی تعداد 21 ہے۔ جن میں گیارہ غزلیہ مجموعے، چھے نعتیہ مجموعے، دو مجموعے ہائیکو کے، ایک نظم کا اور ایک سوزو سلام پر مبنی مجموعہ ہے۔ انہیں کئی انعامات اور اعزازات سے بھی نوازا گیا جس میں حکومت پاکستان کی جانب سے دیا گیا تمغہٓ امتیاز بھی شامل ہے۔ بزم ادب بدایوں آج انہیں یاد کرتے ہوئے خراج عقیدت پیش کرتی ہے۔۔۔۔

बर्रे-सग़ीर के मुमताज़ शाइर जनाब अख़्तर होशियारपुरी किसी तआरुफ़ के मोहताज नहीं हैं। अख़्तर होशियारपुरी के ख़ानदान का तअल्लुक़ तिब से था लेकिन अख़्तर होशियारपुरी ने अपने ख़ानदानी पेशे तिब से इंहिराफ़ किया। शाइरी और इल्म-ओ-अदब की तरफ़ ज़्यादा तवज्जोह की। अख़्तर होशियारपुरी ने इब्तिदाई तालीम होशियारपुर से हासिल की। 1935 में गवर्नमेंट कालेज होशियारपुर से एफ़-ए इम्तियाज़ी नम्बरों से पास किया। अपनी आगे के पढ़ाई के लिए वो लाहौर आ गए और 1937 में बी-ए का इम्तिहान पास कर लिया। ज़माना-ए-तालिब-ए-इल्मी में वो पढ़ाई के साथ ग़ैर निसाबी सरगर्मियों में हिस्सा लेते थे। वो सियासत में भी दिलचस्पी रखते थे और कॉलेज के ज़माने में ही उन्होंने मुस्लिम फ़ेडरेशन की बुनियाद रखी। ग़ज़ल के साथ साथ अख़्तर होशियारपुरी ने हम्द, नात, सोज़-ओ-सलाम और हाइकु-निगारी में तबअ-आज़माई की। अख़्तर होशियारपुरी की शेरी तसानीफ़ की तादाद 21 है जिनमें ग्यारह ग़ज़लिया मजमुए, छह नातिया मजमुए, दो मजमुए हाइकु के, एक नज़्म का और एक सोज़-ओ-सलाम पर मबनी मजमुए हैं। उन्हें कई इनामात और एज़ाज़ात से भी नवाज़ा गया जिसमें हुकूमत-ए-पाकिस्तान की जानिब से दिया गया तमग़ा-ए-इम्तियाज़ भी शामिल है। बज़्म-ए-अदब बदायूँ आज उन्हे याद करते हुए ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करती है....

نہ جانے لوگ ٹھہرتے ہیں وقت شام کہاں
ہمیں تو گھر میں بھی رکنے کا حوصلا نہ ہوا

न जाने लोग ठहरते हैं वक़्त-ए-शाम कहाँ
हमें तो घर में भी रुकने का हौसला न हुआ


#अख़्तर_होशियारपुरी
Today 19th

MUBARAK SHAMEEM (13 March 1918 -26 Sep 2007)میں مسافر ہوں رہ غم میں کڑی منزل کا ظلمتوں ! میرے مقدّر میں نہیں شب بسری تحر...
13/03/2026

MUBARAK SHAMEEM (13 March 1918 -26 Sep 2007)

میں مسافر ہوں رہ غم میں کڑی منزل کا
ظلمتوں ! میرے مقدّر میں نہیں شب بسری

تحریک آزادی سے ہی شاہجہانپور اردو ادب میں ایک تاریخی شہر کی حیثیت سے جانا جاتا ہے۔ اس کی ادبی فضا میں دل شاہجہانپوری، نسیم شاہجہانپوری جیسے بڑے بڑے نامور ادیب و شاعر پیدا ہوئے جنہوں نے اردو ادب کو ایک نیا مقام عتا کیا۔ اسی سر زمین سے نسبت رکھنے والے ایک اہم شاعر جناب مبارک شمیم بھی ہیں جو شاہجہانپور کے ادبی حلقوں میں بہت بڑا مقام رکھتے ہیں۔ مبارک شمیم کا پورا نام مبارک علی خان تھا جو 13 مارچ 1918ء کو شاہجہانپور میں مولوی عبد العلی خاں کے گھر پیدا ہوئے۔ اپنی ابتدائی تعلیم شاہجہاں پور میں پوری کی اور اس کے بعد انہوں نے 1947 میں لکھنؤ یونیورسٹی سے بی اے کیا۔ جہاں ان کے استادوں میں سید احتشام حسین اور آل احمد سرور تھے۔
لکھنؤ کی ادبی و تہذیبی فضا اور وہاں کی محفلوں میں وہ برابر شریک ہوتے تھے جہاں اسرار الحق مجاز، سلام مچھلی شہری اور کمال احمد صدیقی جیسے ممتاز شاعر سے ان کے دوستانہ مراسم ہوئے۔ اسی زمانے میں ان کی شعر گوئ کا آغاز ہوا۔ انہوں نے اسعد شاہجہاں پوری سے شرف تلمذ حاصل کیا۔ ان کی شاعری میں قدیم وجدید کا خوبصورت سنگم دیکھنے کو ملتا ہے اور فکر میں عصر حاضر کی تہذیبی ، سیاسی اور سماجی معاشرتی کی عکاسی دیکھنے کو ملتی ہے۔ وہ کافی عرصے تک صحافت سے بھی جڑے رہے اور شاہجہاں پور سے ایک ہفتہ وار اخبار "الاؤ" کے نام سے نکالتے رہے مگر کچھ وجہ سے وہ بند کرنا پڑا۔کچھ عرصے بعد اپنے ذاتی مسائل میں الجھ کر وہ تقریباً 15 سال شعر گوئی سے لاتعلق رہے لیکن ساٹھ اور ستر کے درمیان وہ دوبارہ شعر و ادب کی طرف مائل ہو گئے۔ آزادی کے بعد مبارک شمیم صاحب کو کانگریس میں رہ کر مظلوموں کی حمایت کے لئے آواز بلند کرنے کے سبب تین مرتبہ جیل بھی جانا پڑا۔
ان کے اب تک چار شعری مجموعے نقش نوا، سوادِ جاں، آب و ہوا اور پتجھڑ کے پھول شائع ہوئے۔ اس کے علاوہ دو نثری کتابیں ''سخنوران شاہجہاں پور“ جو شاہجہاں پور کے ساڑھے تین سو سالہ ادبی منظر نامے پر محیط ہے اور دوسری کتاب به عنوان ”غیر مسلم شعرائے شاہجہاں پور" دیوناگری رسم الخط میں شائع ہو چکی ہے. مشہور ادیب و محقق مرحوم ڈاکٹر قمر رئیس (وائس چیرمین اُردو اکادمی دہلی ) ان کے چھوٹے بھائی تھے۔ 2007ء میں شاہجہاں پور کے معروف شاعر جناب وسیم منائی صاحب ان کی سوانح حیات 'مبارک شمیم- شخصیت اور فن' کو شائع کر چکے ہیں۔ 26 ستمبر 2007 میں ان کا لمبی بیماری کے بعد انتقال ہو گیا۔ بزم ادب بدایوں انہیں یاد کرتے ہوئے خراج عقیدت پیش کرتی ہے۔۔۔۔۔۔

اپنے ہاتھوں کی لکیریں نہ مٹا رہنے دے
جو لکھا ہے وہی قسمت میں لکھا رہنے دے

سچ اگر پوچھ تو زندہ ہوں انہیں کی خاطر
تشنگی مجھ کو سرابوں میں گھرا رہنے دے

آہ اے عشرت رفتہ نکل آئے آنسو
میں نہ کہتا تھا کہ اتنا نہ ہنسا رہنے دے

اس کو دھندلا نہ سکے گا کبھی لمحوں کا غبار
میری ہستی کا ورق یونہی کھلا رہنے دے

شرط یہ ہے کہ رہے ساتھ وہ منزل منزل
ورنہ زحمت نہ کرے باد صبا رہنے دے

یوں بھی احساس الم شب میں سوا ہوتا ہے
اے شب ماہ مری حد میں نہ آ رہنے دے

زندگی میرے لیے درد کا صحرا ہے شمیمؔ
میرے ماضی مجھے اب یاد نہ آ رہنے دے

××××

मैं मुसाफ़िर हूँ रह-ए-ग़म में कड़ी मंज़िल का
ज़ुल्मतों! मेरे मुक़द्दर में नहीं शब-बसरी

तहरीक-ए-आज़ादी से ही शाहजहांपुर उर्दू अदब में एक तारीख़ी शहर की हैसियत से जाना जाता है। इसकी अदबी फ़िज़ा में दिल शाहजहाँपुरी, नसीम शाहजहाँपुरी जैसे बड़े बड़े नामवर अदीब-ओ- शाइर पैदा हुए जिन्होंने उर्दू अदब को एक नया मुक़ाम अता किया। इसी सरज़मीन से निस्बत रखने वाले एक अहम नाम शाइर जनाब मुबारक शमीम भी हैं जो शाहजहाँपुर के अदबी हल्को में बहुत बड़ा मुक़ाम रखते हैं। मुबारक शमीम का पूरा नाम मुबारक अली ख़ान था जो 13 मार्च 1918 को शाहजहाँपुर में मौलवी अब्दुल अली ख़ाँ के घर पैदा हुए। अपनी इब्तिदाई तालीम शाहजहाँपुर में पूरी की और उसके बाद 1947 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से बी-ए किया। जहां उनके उस्तादों में सय्यद एहतिशाम हुसैन और आले अहमद सुरूर थे।
लखनऊ की अदबी-ओ तहज़ीबी फ़िज़ा, और वहाँ की महफ़िलों में वो बराबर शरीक होते रहे, जहां असरारउल हक़ मजाज़, सलाम मछलीशहरी और कमाल अहमद सिद्दीक़ी जैसे मुमताज़ शाइर से उनके दोस्ताना मरासिम हुए। इसी ज़माने में उनकी शेर-गोई का आग़ाज़ हुआ। उन्होंने असद शाहजहाँपुरी से शर्फ़-ए-तलम्मुज़ हासिल किया। उनकी शाइरी में क़दीम-ओ-जदीद का ख़ूबसुरत संगम देखने को मिलता है और फ़िक्र में अस्र-ए-हाज़िर की तहज़ीबी, सियासी और समाजी मुआशरती की अक्कासी देखने को मिलती है। वो काफ़ी अरसे तक सहाफ़त से भी जुड़े रहे और शाहजहाँपुर से एक हफ़्तवार अख़बार "अलाव" के नाम से निकालते रहे मगर कुछ वजह से वो बन्द करना पड़ा। कुछ अरसे बाद अपने ज़ाती मसाइल में उलझकर वो तक़रीबन 15 साल शेर-गोई से ला'तअल्लुक़ रहे लेकिन साठ और सत्तर के दरमियान वो दोबारा शेर-ओ-अदब की तरफ़ माइल हो गए। आज़ादी के बाद मुबारक शमीम साहब को कांग्रेस में रह कर मज़लूमों की हिमायत के लिए आवाज़ बुलन्द करने के सबब तीन मर्तबा जेल भी जाना पड़ा।
उनके अब तक चार शेरी मजमुए नक़्श-ए-नवा, सवाद-ए-जाँ, आब-ओ-हवा और पतझड़ के फूल शाए हुए। इसके अलावा दो नस्री किताबें "सुख़नवरान-ए-शाहजहाँपुर" जो शाहजहाँपुर के साढ़े तीन सौ साला अदबी मंज़रनामे पर मुहीत है और दूसरी किताब ब-उन्वान "ग़ैर मुस्लिम शोअराए शाहजहाँपुर" देवनागरी रसमुल-ख़त में शाए हो चुकी हैं। मशहूर अदीब-ओ-मुहक़्किक़ मरहूम डॉक्टर क़मर रईस(वाइस चेयरमैन उर्दू अकादमी दिल्ली) उनके छोटे भाई थे। 2007 में शाहजहाँपुर के मआरूफ़ शाइर जनाब वसीम मीनाई साहब उनकी सवानेह हयात 'मुबारक शमीम- शख़्सियत और फ़न' को शाए कर चुके हैं। 26 सितंबर 2007 में उनका लंबी बीमारी के बाद इंतक़ाल हो गया। बज़्म-ए-अदब बदायूँ उन्हें याद करते हुए ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करती है....

अपने हाथों की लकीरें न मिटा रहने दे
जो लिखा है वही क़िस्मत में लिखा रहने दे

सच अगर पूछ तो ज़िंदा हूँ उन्हीं की ख़ातिर
तिश्नगी मुझ को सराबों में घिरा रहने दे

आह ऐ इशरत-ए-रफ़्ता निकल आए आँसू
मैं न कहता था कि इतना न हँसा रहने दे

उस को धुँदला न सकेगा कभी लम्हों का ग़ुबार
मेरी हस्ती का वरक़ यूँही खुला रहने दे

शर्त ये है कि रहे साथ वो मंज़िल मंज़िल
वर्ना ज़हमत न करे बाद-ए-सबा रहने दे

यूँ भी एहसास-ए-अलम शब में सिवा होता है
ऐ शब-ए-माह मिरी हद में न आ रहने दे

ज़िंदगी मेरे लिए दर्द का सहरा है 'शमीम'
मेरे माज़ी मुझे अब याद न आ रहने दे


#मुबारक_शमीम
Today 108th

बदायूँ शहर की अदबी शख़्सियात में कई अहम नाम शामिल हैं जिन्होंने उर्दू अदब के हवाले से आलमी शोहरत हासिल की है, इसी बदायूँ ...
12/03/2026

बदायूँ शहर की अदबी शख़्सियात में कई अहम नाम शामिल हैं जिन्होंने उर्दू अदब के हवाले से आलमी शोहरत हासिल की है, इसी बदायूँ शहर की एक मुमताज़ शाइरा, मुसन्निफ़ और अदीब मोहतरमा अदा जाफ़री बदायूँनी भी हैं। अदा जाफ़री बदायूँनी बीसवीं सदी की मशहूर-ओ-मारूफ़ शख़्सियत में शुमार रखती हैं। उन्होंने शाइरी और नस्र-निगारी में नुमायाँ मुक़ाम हासिल किया। उन्हें बचपन से ही शाइरी का शौक़ था। महज़ दस साल की उम्र में अपने शेरी सफ़र का आग़ाज़ करके उन्होंने अपनी पहली नज़्म "पुकार'' अख़्तर शीरानी के रिसाला 'रूमान' में शाए की थी। अपने इब्तिदाई दौर में अख़्तर शीरानी और जाफ़र अली ख़ान 'असर लखनवी' से इस्लाह-ए-सुख़न ली और अपना तख़ल्लुस 'अदा बदायूँनी' से शेर कहे। शादी के बाद 1947 में अपने शौहर नूर-उल हसन जाफ़री के वाइस अपना तख़ल्लुस 'अदा जाफ़री' कर लिया। उनकी शाइरी में औरत के जज़्बात, अहसास, दर्द और फ़ितरी मसाइल के असरात नज़र आते हैं। अपने सात दहाईयों के अदबी सफ़र में उन्होंने छ: शेरी मजमुए शाए किये। 1968 में उन्हें आदम जी अदबी अवार्ड से नवाजा गया था। बज़्म-ए-अदब बदायूँ आज उन्हें याद करते हुए ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करती है....

بدایوں شہر کی ادبی شخصیات میں کئی اہم نام شامل ہیں جنہوں نے اردو ادب کے حوالے سے عالمی شہرت حاصل کی۔ اسی بدایوں شہر کی ایک ممتاز شاعرہ، مصنف اور ادیب محترمہ ادا جعفری بدایونی بھی ہیں۔ ادا جعفری بیسویں صدی کی مشہور و معروف شخصیات میں شمار رکھتی ہیں۔ انھوں نے شاعری اور نثر نگاری دونوں میں نمایاں مقام حاصل کیا۔ انھیں بچپن سے ہی شاعری کا شوق تھا۔ محض دس سال کی عمر میں اپنے شعری سفر کا آغاز کرکے انہوں نے اپنی پہلی نظم 'پکار' اختر شیرانی کے رسالہ 'رومان' میں شائع کی۔ اپنے ابتدائی دور میں اختر شیرانی اور جعفر علی خاں اثر لکھنوی سے اصلاح سخن لی اور اپنے تخلص ' ادا بدایونی' سے شعر کہے۔ شادی کے بعد 1947 میں اپنے شوہر نورالحسن جعفری کے باعث اپنا تخلص ادا جعفری کر لیا۔ ان کی شاعری میں عورت کے جذبات، احساس، درد اور فطری مسائل کے اثرات نظر آتے ہیں۔ اپنے سات دہائیوں کے ادبی سفر میں انہوں نے 6 شعری مجموعہ شائع کئے۔ 1968 میں انہیں آدم جی ادبی ایوارڈ سے نوازا گیا۔ بزم ادب بدایوں آج انھیں یاد کرتے ہوئے خراج عقیدت پیش کرتی ہے۔۔۔۔

मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ
तुम मुझ से पूछते हो मिरा हौसला है क्या

میں آندھیوں کے پاس تلاش صبا میں ہوں
تم مجھ سے پوچھتے ہو مرا حوصلہ ہے کیا



#अदा_जाफ़री
Today 11th

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