काव्य धारा

काव्य धारा यह एक ऐसा मंच है जहाँ शब्द बहते हैं…
कभी भाव बनकर, कभी याद बनकर, कभी खामोशी की आवाज़ बनकर।

29/08/2026

ख़बर छुपाई जाती है,
अफ़वाह उड़ाई जाती है,
सच को पर्दे के पीछे रखकर
झूठ की बारात सजाई जाती है!
जो बात हुई ही नहीं कभी,
उसका भी हल्ला होता है,
जिसने कुछ देखा तक नहीं,
वही सबसे बड़ा गवाह होता है!

28/08/2026

राखी का धागा नहीं… रिश्ता है!

कलाई पर जो बंधता है,
वो धागा नहीं होता…
बहन के हाथों में छुपा,
भाई का आधा संसार होता है।

एक छोटी-सी राखी में,
कितना बड़ा इतिहास होता है,
बहन की आँखों में बचपन,
और भाई में पूरा परिवार होता है।

वो बचपन भी क्या बचपन था—
जब लड़ते थे हम दोनों,
कभी खिलौने पर झगड़ा,
कभी मिठाई के टुकड़े पर रोना!

माँ कहती—
“बस करो तुम दोनों!”
हम कहते—
“पहले इसे समझाओ!”

और आज वही बहन
जब दूर शहर में रहती है,
तो घर का हर कोना
उसकी आवाज़ कहता है।

“भैया… राखी कब बंधवाने आओगे?”

बस इतना सुनते ही
आँखें थोड़ी नम हो जाती हैं,
क्योंकि कुछ रिश्ते
दूर होकर भी
दिल के सबसे पास हो जाते हैं।

बहना ने कभी दौलत नहीं माँगी,
न महलों की चाहत रखी,
बस भाई की कलाई पर राखी बाँधकर
इतनी-सी मोहब्बत रखी—

“भैया… दुनिया चाहे जितनी बड़ी हो जाए,
मेरे लिए तुम वही रहना,
जो बचपन में मेरी चोटी खींचकर
भाग जाया करते थे!”

और भाई भी कहता है—

बहना!
तेरी राखी की कीमत
सोने-चाँदी से मत तौलना,
ये वो धागा है
जिसे बाँधकर
एक बहन कहती है—

“मेरे भाई,
तू गिरना… तो मैं संभालूँगी,
तू रूठना… तो मैं मनाऊँगी,
दुनिया अगर तुझे अकेला छोड़ दे,
तो मैं आखिरी साँस तक
तेरे साथ खड़ी रहूँगी!”

राखी सिर्फ त्योहार नहीं,
ये संस्कारों की पहचान है,
बहन की दुआ है इसमें,
भाई की आन-बान है!

ये धागा कमजोर नहीं—
इसमें माँ की ममता है,
पिता का आशीर्वाद है,
बचपन की हँसी है,
और पूरे घर का प्यार है!

कभी-कभी बहन ब्याहकर
बहुत दूर चली जाती है…

मगर भाई की कलाई पर
बंधी राखी
हर साल चुपके से कह जाती है—

“भैया…
तुम्हारे घर से मेरी डोली भले गई थी,
पर मेरा बचपन
आज भी यहीं रहता है।”

इसलिए मत पूछो
राखी का धागा कितना मजबूत है—

रिश्ता सच्चा हो,
तो धागा भी तलवार बन जाता है!

बहन की दुआ साथ हो,
तो भाई हर तूफान से लड़ जाता है!

और जहाँ बहन की आँखों में
भाई के लिए प्यार होता है—

वहाँ हर दिन रक्षाबंधन है,
हर कलाई पर त्योहार है!

राखी का धागा नहीं…
ये जन्म-जन्म का विश्वास है!

बहन है तो घर में खुशियाँ हैं,
भाई है तो बहन को आस है—
यही तो रक्षाबंधन है…
यही रिश्तों की असली मिठास है!

06/08/2026

ज़िंदगी की दौड़"
**************

शरीर कहे, "बस थोड़ा ठहर जा,
" सपने कहें, "अभी सफ़र बाकी है।"
रोटी की खातिर निकला इंसाँ,
पर सुकून की तलाश अभी बाकी है।

सुबह की किरण संग घर से निकला,
शाम हुई तो खुद से दूर हुआ।
अपनों के चेहरे याद बहुत आए,
फिर भी हर आँसू मजबूर हुआ।
जेबें भरने की चाह में अक्सर,
खुशियों का मौसम छूट गया।
मुट्ठी में सिक्के तो आ बैठे,
पर बचपन का आँगन छूट गया।

थोड़ा आराम, थोड़ा अरमान,
दोनों का हक़ बराबर है।
दौलत से घर बन सकता है,
घर को घर बनाता प्यार है।

महलों में भी नींद नहीं है,
झोपड़ियों में चैन मिला।
जिसने बाँट दिए दो मीठे बोल,
उसको सच्चा धन मिला।
दुनिया जितनी चाहे दौड़े,
मैं इतना ही कहना चाहूँ।
रिश्तों की धड़कन मत खोना,
बस इतना सा गाना गाऊँ।

कमाओ मगर इतना भी नहीं,
कि अपनों का वक्त ही बिक जाए।
जीओ मगर ऐसे ऐ दोस्त,
कि जाने के बाद भी नाम मुस्कुराए।

आराम भी ज़रूरी है,
मेहनत भी ज़रूरी है।
लेकिन सबसे बढ़कर,
इंसानियत ज़रूरी है।

यही दौलत है, यही शोहरत है,
जो दिलों में बस जाए, वही असली ज़िंदगी है।

04/08/2026

अकेले थे आज... तुम बहुत याद आए"
********. ********. ***

अकेले थे आज... तुम बहुत याद आए।
हवा चुप थी मगर, तेरे किस्से गुनगुनाए।
अकेले थे आज... तुम बहुत याद आए।

धूप ने जब मेरे कंधे पर थककर सिर रख दिया,
छाँव बनकर तेरा एहसास चुपके से आ गया।
मैंने ख़ामोशी से पूछा, "कौन है?"
हवा मुस्कुराकर बोली— "जिसे भूलने चले थे,
वही फिर याद आए।"
अकेले थे आज... तुम बहुत याद आए।

चाय की प्याली आधी ठंडी रह गई,
बातें सारी दिल में ही बह गईं।
एक कुर्सी सामने खाली थी,
लग रहा था अभी तुम आकर कहोगे
— "इतने चुप क्यों हो?"
मैंने मुस्कुराकर आँखें झुका लीं,
मगर पलकों के पीछे सारे मौसम भीग गए।
अकेले थे आज... तुम बहुत याद आए।

तुम कोई आदत नहीं थे, जो छूट जाते।
तुम कोई मौसम नहीं थे, जो बदल जाते।
तुम तो वो खुशबू थे,
जो किताब बंद होने पर भी पन्नों में रहती है।
तुम वो दुआ थे,
जो होंठ चुप होने पर भी रूह में चलती है।
इसलिए... जब भी दिल थोड़ा-सा खाली होता है,
सबसे पहले तुम्हारा नाम दस्तक देता है।
अकेले थे आज... तुम बहुत याद आए।

मिलना ज़रूरी नहीं,
यादें भी साथ चलती हैं।
कुछ रिश्ते हाथों से नहीं,
धड़कनों से पलते हैं।
आज भी भीड़ के बीच मैं तन्हा नहीं था...
क्योंकि मेरी तन्हाई में भी तुम साथ चले आए।
अकेले थे आज...
तुम बहुत याद आए।
बहुत... बहुत याद आए।

04/08/2026

ज़िंदगी का नाम सफ़र है
*******************

ज़िंदगी कोई सीधी राह नहीं,
यह तो मौसम की बदलती चाह नहीं।
कभी धूप बनकर तपाती है हमें,
कभी छाँव बनकर गले लगाती है हमें।
जो गिरकर भी मुस्कुराना सीख गया,
वही ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिख गया।
जो आँसू पीकर भी दीपक बन जले,
वही अँधेरों में सूरज बन निकले।
मत पूछो कितनी ठोकरें मिलीं राहों में,
मैंने मंज़िलें बोई हैं अपनी आहों में।
हर हार ने मुझको थोड़ा और तराशा,
हर दर्द ने जीवन का अर्थ समझाया।
ज़िंदगी किताब नहीं,
जिसका हर पन्ना पढ़ लिया जाए।
ज़िंदगी तो वह गीत है,
जिसे हर साँस के साथ गाया जाए।
कुछ लोग महलों में रहकर भी अकेले हैं,
कुछ टूटी झोपड़ियों में भी मेले हैं।
ख़ुशी दौलत की मोहताज कब रही,
वो तो सच्चे दिल की चौखट पर पली।
चलो ऐसा जिएँ कि नाम से पहले इंसान आए,
मंज़िल से पहले हर मुसाफ़िर मुस्कुराए।
जब आख़िरी सफ़र की घड़ी सामने खड़ी हो,
तो अफ़सोस नहीं, बस एक सुकून बड़ा हो—
कि मैंने ज़िंदगी नहीं काटी,
ज़िंदगी को पूरे दिल से जिया है।
हर साँस को ईश्वर का प्रसाद समझा,
हर पल को प्रेम से पिया है।
यही ज़िंदगी की सबसे बड़ी जीत है,
जो बाँट दे उजाला वही सच्ची प्रीत है।
नाम मिट जाते हैं, दौलत बिखर जाती है,
लेकिन अच्छी ज़िंदगी…
सदियों तक लोगों के दिलों में गूँज जाती है।

04/08/2026

ज़िम्मेदारी ज़िंदगी
******************

कंधों पर जब ज़िम्मेदारी का सूरज उग जाता है,
तब इंसान उम्र से पहले ही बड़ा हो जाता है।
जिसे खिलौनों से खेलना था,
वह हालातों से खेलता है।
जिसे सपनों में उड़ना था,
वह अपनों के लिए हर रोज़ पिघलता है।
ज़िम्मेदारी कोई बोझ नहीं,
यह तो विश्वास का दूसरा नाम है।
जिसे यह मिल जाए,
समझो उसी के हिस्से सबसे बड़ा सम्मान है।
रोटी कमानी पड़ती है,
आँसू छुपाने पड़ते हैं।
घर की हँसी बचाने को,
अपने ग़म मुस्काने पड़ते हैं।
माँ की आँखों का सपना,
पिता के माथे का पसीना,
बच्चों की मासूम उम्मीदें—
यही तो बनती हैं जीने का नगीना।
ज़िंदगी ने पूछा मुझसे—
"थक गए हो क्या?"
मैंने हँसकर इतना ही कहा—
"अभी तो कई रिश्तों का सहारा बनना बाकी है।"
जो सिर्फ़ अपने लिए जीते हैं,
उनकी कहानी वहीं रुक जाती है।
जो दूसरों की ज़िम्मेदारी उठाते हैं,
उनकी मिसाल पीढ़ियों तक सुनाई जाती है।
इसलिए जब भी ज़िम्मेदारियाँ बढ़ें,
तो सिर झुकाना मत।
क्योंकि भगवान उसी पेड़ पर
सबसे ज़्यादा फल लगाता है,
जो सबसे मज़बूती से खड़ा रहता है।
याद रखना—
ज़िम्मेदारी इंसान को झुकाती नहीं,
उसका कद ऊँचा कर देती है।
और ज़िंदगी...
ज़िंदगी उसी की सबसे सुंदर कविता बनती है,
जो अपने हिस्से का फ़र्ज़
मुस्कुराकर निभा देता है।

04/08/2026

पीठ पर रखा आसमान
*******************

किसी ने पूछा—
"तुम इतने शांत कैसे रहते हो?"
मैं मुस्कुरा दिया...
क्योंकि शोर तो वह करता है,
जिसके कंधे खाली होते हैं।
जिसकी पीठ पर पूरा आसमान टिका हो,
वह शिकायत नहीं करता।
घर की चौखट से लेकर
सपनों की दहलीज़ तक,
कुछ लोग हर रोज़
ख़ुद को थोड़ा-थोड़ा खर्च करते हैं।
वे टूटते नहीं,
बस अपनी दरारों में
रोशनी छिपा लेते हैं।
वे रोते नहीं,
बस तकिए को इतना समझदार बना देते हैं
कि वह किसी से कुछ कहता नहीं।
किसी की माँ की दवा,
किसी बच्चे की किताब,
किसी बूढ़े पिता की लाठी,
किसी बहन की विदाई...
इन सबके बीच
एक आदमी धीरे-धीरे
अपने हिस्से की उम्र
दूसरों के नाम लिखता रहता है।
दुनिया उसे अक्सर
साधारण कहकर आगे बढ़ जाती है,
लेकिन इतिहास जानता है—
सभ्यताएँ तलवारों से नहीं,
ऐसे ही गुमनाम कंधों पर टिकी होती हैं।
इसलिए
यदि कभी रास्ते में
कोई मुस्कुराता हुआ इंसान मिले,
तो उसके चेहरे से पहले
उसके कंधों को देखना...
हो सकता है,
वह अकेला ही
कई ज़िंदगियों का आसमान उठाए चल रहा हो।

"मैं लौट तो आया हूँ..."**************मैं लौट तो आया हूँ,पर घर अब तक नहीं पहुँचा हूँ।जिस दिन तुम्हारी चिता जलाई,उस दिन से...
28/07/2026

"मैं लौट तो आया हूँ..."
**************

मैं लौट तो आया हूँ,
पर घर अब तक नहीं पहुँचा हूँ।
जिस दिन तुम्हारी चिता जलाई,
उस दिन से मैं भीतर ही भीतर
राख में बदलता जा रहा हूँ।
लोग कहते हैं—
"वह चली गई..."
पर कोई उनसे पूछे,
जो चला गया हो,
वह बोलता कहाँ है?
मैंने काँपते हाथों से
जब अग्नि की पहली लकड़ी रखी,
ऐसा लगा जैसे
अपने ही हृदय को
आग के हवाले कर रहा हूँ।
धुएँ का एक बादल उठा,
और आसमान की ओर चला गया।
सबने कहा—
"उसकी आत्मा मुक्त हो गई।"
पर मेरी आत्मा?
वह तो उसी धुएँ के साथ
आज तक लौटकर नहीं आई।
अब घर का हर कोना
तुम्हारा नाम लेकर पुकारता है।
तकिया आज भी
तुम्हारी खुशबू ढूँढ़ता है,
और मैं...
मैं हर रात
तुम्हारी आवाज़ सुनने का अभिनय करता हूँ।
कितना अजीब है न...
जिसे सात फेरों में
जीवन भर साथ निभाने का वचन दिया था,
उसे एक दिन
चार कंधों पर विदा भी
मुझे ही करना पड़ा।
हे ईश्वर!
इतनी कठोर परीक्षा
किस अपराध की थी?
यदि बिछड़ना ही लिखा था,
तो मिलाया ही क्यों था?
यदि मौन ही देना था,
तो उसकी हँसी से
मेरा संसार बसाया ही क्यों था?
आज भी जब
साँझ ढलती है,
मैं दरवाज़े की ओर देख लेता हूँ...
फिर मुस्कुरा देता हूँ,
क्योंकि अब समझ गया हूँ—
कुछ लोग लौटकर नहीं आते,
लेकिन उनकी यादें
हर रोज़ घर लौट आती हैं।
मैं जी रहा हूँ...
सिर्फ़ इसलिए नहीं कि साँसें चल रही हैं,
मैं जी रहा हूँ इसलिए
कि कहीं ऊपर बैठी तुम
मेरी हार देखना नहीं चाहोगी।
लेकिन सुनो...
जिस दिन मेरी अंतिम यात्रा निकलेगी,
मैं किसी से कुछ नहीं माँगूँगा।
बस ईश्वर से इतना कहूँगा—
"इस बार उसे पहले मत बुलाना...
बहुत इंतज़ार कर लिया है मैंने,
अबकी बार...
उसे मेरे साथ ही चलने देना।"

28/07/2026

रास्ते वही हैं, शहर वही है, लोग भी वही हैं,
पर अब इन सबके बीच मैं पहले जैसा नहीं हूँ।
वो चाय की वही दुकान आज भी वहीं खड़ी है,
पर उसकी भाप में अब वो पुरानी बात नहीं है।
लोग हँसते हैं, भीड़ चलती है अपने ही अंदाज़ में,
पर मेरी नज़र अब किसी चेहरे में ठहरती नहीं है।
गलियों में वही बच्चों की शोर-शराबा गूंजता है,
पर उस शोर में अब अपना-सा कुछ सुनाई नहीं देता।
बेंच पर बैठे वो बुज़ुर्ग अब भी दुनिया देखते हैं,
पर उनकी बातें अब दिल को छूकर नहीं जातीं।
रास्ते वही हैं, पर कदमों की रफ़्तार बदल गई है,
जैसे किसी अनकहे दर्द ने चाल को धीमा कर दिया हो।
जहाँ पहले बेवजह भी घूम लेना अच्छा लगता था,
अब हर मोड़ पर कोई सोच भारी सा खड़ा हो।
शहर वही है, पर शामों का रंग थोड़ा फीका लगता है,
लाइटें जलती हैं फिर भी कुछ अधूरा सा रहता है।
वो बारिश भी अब पहले जैसी खुशी नहीं देती,
बस भीगते हुए भी मन कहीं और ही भटकता रहता है।
लोग वही हैं, पर अपनेपन की गर्माहट कम लगती है,
हर मुस्कान अब एक सवाल सा पीछे छोड़ जाती है।
बातें होती हैं, मुलाकातें भी रोज़ चलती रहती हैं,
पर कहीं भीतर एक दूरी सी चुपचाप बढ़ती जाती है।
शायद बदलाव शहर में नहीं, मेरे अंदर आया है,
किसी याद ने चुपचाप दिल को अपना बना लिया है।
अब मैं उसी दुनिया में रहकर भी अलग सा हूँ,
जैसे कोई अपना ही साया मुझसे थोड़ा दूर हो गया है।
रास्ते वही हैं, शहर वही है, लोग भी वही हैं,
पर अब मैं उन सबमें भी खुद को ढूँढता रहता हूँ…

28/07/2026

मेरा प्यार
मेरा प्यार कोई कहानी नहीं, जो किताबों में लिखी जाए,
वो तो एक एहसास है, जो बिना बोले ही समझ में आ जाए।
ना उसका कोई चेहरा तय है, ना कोई नाम जरूरी है,
फिर भी वो हर धड़कन में मौजूद, पूरी तरह ज़रूरी है।
कभी वो सुबह की हल्की ठंड में सांस बनकर आता है,
कभी किसी अधूरी नींद में मीठा सा सपना बन जाता है।
कभी काम की भागदौड़ में अचानक रुकने की वजह बनता है,
और कभी थकान के बीच में भी मुस्कुराने की वजह बनता है।
मेरा प्यार वो नहीं जो दिखाने से बढ़ता है,
वो तो जितना छुपाओ, उतना ही अंदर गहराता है।
जैसे कोई जड़ें हों जो बाहर नज़र नहीं आतीं,
पर पूरी ज़िंदगी को मजबूती से थामे रखती हैं।
कभी वो किसी की आवाज़ में सुनाई देता है,
कभी किसी की चुप्पी में समझ आ जाता है।
और अजीब बात ये है कि उसे ढूँढना नहीं पड़ता,
वो खुद ही हर मोड़ पर मिल जाता है।
आज के समय में जहाँ सब जल्दी में हैं,
मेरा प्यार थोड़ा ठहराव है, थोड़ा इंतज़ार है।
वो न भीड़ में खोता है, न अकेलेपन में टूटता है,
बस हर हाल में धीरे-धीरे जिंदा रहता है।
ना उसमें कोई बड़ा दावा है, ना कोई शोर है,
वो बस एक सच्चाई है… जो दिल के बहुत करीब है।
और सच कहूँ तो मेरा प्यार कोई चीज़ नहीं,
वो मैं खुद हूँ… जब मैं सबसे ज्यादा सच्चा होता हूँ।

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824231

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