28/08/2026
राखी का धागा नहीं… रिश्ता है!
कलाई पर जो बंधता है,
वो धागा नहीं होता…
बहन के हाथों में छुपा,
भाई का आधा संसार होता है।
एक छोटी-सी राखी में,
कितना बड़ा इतिहास होता है,
बहन की आँखों में बचपन,
और भाई में पूरा परिवार होता है।
वो बचपन भी क्या बचपन था—
जब लड़ते थे हम दोनों,
कभी खिलौने पर झगड़ा,
कभी मिठाई के टुकड़े पर रोना!
माँ कहती—
“बस करो तुम दोनों!”
हम कहते—
“पहले इसे समझाओ!”
और आज वही बहन
जब दूर शहर में रहती है,
तो घर का हर कोना
उसकी आवाज़ कहता है।
“भैया… राखी कब बंधवाने आओगे?”
बस इतना सुनते ही
आँखें थोड़ी नम हो जाती हैं,
क्योंकि कुछ रिश्ते
दूर होकर भी
दिल के सबसे पास हो जाते हैं।
बहना ने कभी दौलत नहीं माँगी,
न महलों की चाहत रखी,
बस भाई की कलाई पर राखी बाँधकर
इतनी-सी मोहब्बत रखी—
“भैया… दुनिया चाहे जितनी बड़ी हो जाए,
मेरे लिए तुम वही रहना,
जो बचपन में मेरी चोटी खींचकर
भाग जाया करते थे!”
और भाई भी कहता है—
बहना!
तेरी राखी की कीमत
सोने-चाँदी से मत तौलना,
ये वो धागा है
जिसे बाँधकर
एक बहन कहती है—
“मेरे भाई,
तू गिरना… तो मैं संभालूँगी,
तू रूठना… तो मैं मनाऊँगी,
दुनिया अगर तुझे अकेला छोड़ दे,
तो मैं आखिरी साँस तक
तेरे साथ खड़ी रहूँगी!”
राखी सिर्फ त्योहार नहीं,
ये संस्कारों की पहचान है,
बहन की दुआ है इसमें,
भाई की आन-बान है!
ये धागा कमजोर नहीं—
इसमें माँ की ममता है,
पिता का आशीर्वाद है,
बचपन की हँसी है,
और पूरे घर का प्यार है!
कभी-कभी बहन ब्याहकर
बहुत दूर चली जाती है…
मगर भाई की कलाई पर
बंधी राखी
हर साल चुपके से कह जाती है—
“भैया…
तुम्हारे घर से मेरी डोली भले गई थी,
पर मेरा बचपन
आज भी यहीं रहता है।”
इसलिए मत पूछो
राखी का धागा कितना मजबूत है—
रिश्ता सच्चा हो,
तो धागा भी तलवार बन जाता है!
बहन की दुआ साथ हो,
तो भाई हर तूफान से लड़ जाता है!
और जहाँ बहन की आँखों में
भाई के लिए प्यार होता है—
वहाँ हर दिन रक्षाबंधन है,
हर कलाई पर त्योहार है!
राखी का धागा नहीं…
ये जन्म-जन्म का विश्वास है!
बहन है तो घर में खुशियाँ हैं,
भाई है तो बहन को आस है—
यही तो रक्षाबंधन है…
यही रिश्तों की असली मिठास है!