Music : My Heart Beat

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17/08/2024

ये रातें ये मौसम नदी का किनारा ये चंचल हवा 💞

चिट्ठी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गये🥀
22/08/2022

चिट्ठी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गये🥀

संगीतकार रवि का सर्वोत्तम परिष्कृत और 'साहित्यिक संगीत हमें बी. आर. चोपड़ा की फिल्मों में मिलता है। एन. दत्ता के बाद बी....
22/11/2021

संगीतकार रवि का सर्वोत्तम परिष्कृत और 'साहित्यिक संगीत हमें बी. आर. चोपड़ा की फिल्मों में मिलता है। एन. दत्ता के बाद बी. आर. चोपड़ा ने अपनी फिल्मों के सशक्त संगीत पक्ष की प्रतिष्ठा को कायम रखने के लिए रवि को ही चुना। बी. आर. चोपड़ा की सभी फिल्मों में साहिर ही गीतकार रहे, इसलिए शाब्दिक सौंदर्य लिए अर्थपरक रचनाएं बी.आर. फिल्म्स (और बाद में उनके भाई यश चोपड़ा की यशराज फिल्म्स) की विशेषता रही हैं। ऐसे गीतों के लिए रवि ने अधिकांशतः पहाड़ी और भूपाली के सुरों का प्रयोग कर शाब्दिक सौंदर्य को नर्म, कोमल लय में ढालकर अमर बना दिया। 'गुमराह' (1963) के 'इन हवाओं में इन फिजाओं में (आशा, महेन्द्र) और भूपाली पर आधारित 'ये हवा ये फिजा ये हवा' (महेंद्र) के हवा में तरंगत होते सुर प्रवाह इसका जीवत उदाहरण है। वैसे 'गुमराह' का चिरंजीवी गीत है महेंद्र कपूर द्वारा बेहद खूबसूरती से गाया सम्भवतः काफी व भीमपलासी की छाया लिए 'चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों।

'वो आफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा' जैसे अभिभूत करने वाले शब्दों को रवि ने बेहद भावप्रवण ढंग से सुरों में बांधा है। इस गीत के लिए रवि ने 31 धुनें तैयार की थीं। महेंद्र कपूर का चयन बी. आर. चोपड़ा द्वारा 'धर्मपुत्र' की कव्वाली को लेकर रफी से हुए मनमुटाव के बाद किया गया। चोपड़ा इस कदम को लेकर कभी पछताए नहीं। इसी फिल्म का 'आप आए तो खयाले दिले नाशाद आया' भी महेंद्र कपूर के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में शुमार है।

वैसे रवि का संगीत एक निश्चित ढांचे का संगीत था उनकी कम्पोजीशन्स की नोटेशन्स एक खास स्वरक्रम के इर्द-गिर्द ही घूमती थीं उनका संगीत उस दौर का प्रतीक है।

जब भारतीय प्रजातंत्र की परिभाषा में एक स्थायित्व आने लगा था, राजनीतिक चेतना के संगीत में कम और व्यक्तिगत अजनबीपन तथा असंतोष के क्षेत्र में अधिक प्रकट हो रहा था। यहां प्रतिकार कम था, स्वीकार्य न भी हो तो तीव्र प्रतिवाद द्वारा बदलाव की बात भी कम ही थीं। राव भी उस निश्चित संरचना के भीतर बहुत खूबसूरत लगते थे संरचना को तोड़ने या अधिक प्रयोगात्मक होने की उन्होंने कोशिश कम ही की।

बहरहाल, महेन्द्र कपूर को चोटी का गायक बनाने में सर्वाधिक योगदान बी.आर. चोपड़ा, साहिर और रवि का ही रहा है। बी. आर. चोपड़ा की 'वक्त' (1965) और 'हमराज' (1967) के बेहद लोकप्रिय रहने के पीछे उसके संगीत का भी बड़ा योगदान था। 'वक्त' में पहाड़ी शैली की धुनों का बड़ा मोहक इस्तेमाल था कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी (आशा) की खनक, हम जब सिमट के आपकी बाहों में खो गए' (आशा, महेंद्र) को वादियों के बीच बहती शैली या 'दिन है बहार के' (आशा, महेंद्र) की लयपूर्ण धुन हो या ट्रम्पेट और गिटार के बेहतरीन ऑर्केस्ट्रेशन के साथ बनाए गए आशा के सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक आगे भी जाने न तू' की अद्भुत शैली हो आशा के 'चेहरे पे खुशी छा जाती है के रिद्य और बीट्स तो बेमिसाल हैं हो। इस गीत के फ़िल्मांकन के समय ठंड के कारण लोकेशन पर बैटरी फेल हो गई। गाना बजा ही नहीं। पर पहाड़ों की ठंड का मुकाबला करने के लिए रवि की पहाड़ी संगीत समझ मौजूद थी और उन्होंने इस गीत की लय व गति के टाइमिंग को मन ही मन सोचकर ही इस गीत की शूटिंग को क्रमवार सम्पन्न करा दिया। फिल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय सदाबहार गीत ऐ मेरी जोहरा जबीं तुझे मालूम नहीं के लिए वे मन्ना डे को लाए और इस कव्वालीनुमा गोत को आज भी मस्तो से याद किया जाता है। भैरवी कम्पोज वक्त' का रफ़ी के स्वर में शीर्षक गीत 'वक्त के दिन और रात' (रफी) सालाना बिनाका का 12वें नम्बर का गीत बना था।

हमराज' (1967) का पहाड़ी भूपाली का मिश्रण लिए 'नीले गगन के तले धरती का प्यार पले प्रकृति की अभ्यर्थना का शायद सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी उदार है और महेंद्र कपूर को इस गीत पर सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। न मुंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो में रवि ने महेंद्र कपूर से अभूतपर्व ऊंची पट्टी पर गवाया और किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है' में राग पीलू की छाया के साथ एक आकर्षक रूमानी धुन का सृजन करने में सफल रहे। इन सबसे बढ़कर 'तुम अगर साथ देने का वादा करो' में शब्दों की खूबसूरती तो अद्भुत है ही, रवि के लाजवाब धुन का सृजन और महेंद्र कपूर की तन्मयतापूर्ण गायको इस गीत को अमर रचना बनाती है। 'हमराज' महेंद्र कपूर की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ही कही जाएगी। इस फ़िल्म के एक नृत्य दृश्य में पृष्ठभूमि से संगीत का एक बड़ा मोहक टुकड़ा बजता है। इसी टुकड़े को विस्तृत करके आगे रवि ने 'धुंध' (1973) फिल्म में संसार की हर शै का बस इतना फ़साना है (महेंद्र कपूर) गीत की धुन बनाई थी। आदमी और इंसान' (1969 जिसे बी.आर. फिल्म्स के बैनर तले यश - चोपड़ा ने निर्देशित किया था) के लिए पुनः पहाड़ी पर बनाए गए 'नीले पर्वतों की धारा (आशा, महेन्द्र) और तालियों की संगत वाला भांगड़ा शैली का 'यारा दिलदारा मेरा दिल करता' (महेंद्र, बलवीर, जोगिन्दर, साथी) जैसे गीतों का उल्लास या जिन्दगी इतफाक है (आशा) की तालबद्धता आकर्षित करती है।

बी. आर. चोपड़ा ने पुनः अपनी फ़िल्म 'निकाह' (1982) में रवि के साथ अत्यन्त मकबूल संगीत प्रस्तुत किया पाकिस्तानी अभिनेत्री और गायिका सलमा आगा के अलग से पाकिस्तानी शैली के अंदाज में पुराने मुस्लिम सोशल्स की याद दिलाते 'दिल के अरमां आंसुओं में वह गए', 'दिल की ये आरजू थी कोई दिलरूबा मिले' (महेंद्र, सलमा आगा) और 'बीते हुए लम्हों की कसक' (महेंद्र) के साथ गुलाम अली की मशहूर हसरत मोहानी लिखित गजल 'चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है भी अपने मूल रूप में शामिल थी, पर सम्भवतः सबसे सुंदर रचना तो रवि को ही स्वरबद्ध और गुंजित प्रभाव से समाचित करती 'फिजाँ भी है, जवां जवां (सलमा) को ही माना जाना चाहिए।

बी.आर. फिल्म्स की आज की आवाज' (1984 ) के रवि की चिरपरिचित शैली में दिल ही दिल में ले लिया दिल मेहरवानी आपकी' (महेंद्र कपूर) और मेरा छोटा सा घर' (महेंद्र कपूर) और अवाम' (1987) का कैसी मुरली बजाई घनश्याम (आशा) भी लोकप्रिय रहे थे।

सबसे बड़ी संगीत गुरु माननीया भारतरत्न, स्वर-कोकिला, अद्भुत पार्श्वगायिका सुश्री लता मंगेशकर जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभ...
28/09/2021

सबसे बड़ी संगीत गुरु माननीया भारतरत्न, स्वर-कोकिला, अद्भुत पार्श्वगायिका सुश्री लता मंगेशकर जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं🌹🙏🌹

12/09/2021
🥀शिव और रंजनी के युग्म से बने राग शिवरंजनी की उत्पत्ति के बारे में मान्यता है कि जब शिव अपना तांडव कर रहे थे, तो उन्हें ...
18/07/2021

🥀शिव और रंजनी के युग्म से बने राग शिवरंजनी की उत्पत्ति के बारे में मान्यता है कि जब शिव अपना तांडव कर रहे थे, तो उन्हें शांत करने के लिए साधु- संतों ने यह राग गाया था। शास्त्रीय संगीत में यह राग शांत रस में दुख, विरह और गहरे प्रेम को प्रकट करता है तथा आत्मिक अनुभूति देने वाला माना जाता है। फिल्मों में शिवरंजनी का प्रयोग शंकर जयकिशन ने बहुत खूबसूरती से किया है। राज कपूर की फिल्म 'आह' का तो पूरा पाश्र्व साउंड ट्रैक ही शिवरंजनी में है तथा वर्षों बाद 'मेरा नाम जोकर' में लिए गए गीत 'जाने कहाँ गए वो दिन' की धुन हमें 'आह' और 'जिस देश में गंगा बहती है' दोनों के पाश्र्व संगीत में मिलती है।

शिवरंजनी पर आधारित सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीत संभवतः 'जाने कहां गए वो दिन' को ही माना जाएगा। मुकेश ने तो इस गीत में वायलिन के दर्दीले नौट्स के साथ मानों अपनी आत्मा ही उड़ेल दी है। अपने हर कंसर्ट में मुकेश इस गीत को अवश्य गाते थे। शिवरंजनी के प्रति शंकर जयकिशन का आग्रह तो उनकी पहली फिल्म 'बरसात' (1949) के गीत 'प्रेम नगर में बसने वालों से ही शुरू हो गया था राज कपूर की ही 'संगम' (1964) का सिम्फनी शैली का युगल गीत 'ओ मेरे सनम दो जिस्म मगर एक जान हैं हम' (लता, मुकेश), फिल्म 'प्रोफेसर' का 'आवाज देकर हमें तुम बुलाओ" (लता, रफ़ी) में झप ताल के साथ और पियानों के खूबसूरत प्रयोग के साथ दादरा ताल में फिल्म 'ब्रह्मचारी' का 'दिल के झरोखे में तुझ को बिठाकर' राग शिवरंजनी में ही शंकर जयकिशन की अनमोल कृतियां हैं। 'ब्रह्मचारी' के इस अनूठे सदाबहार गीत को बिना सांस रोके गाने की सलाह शम्मी कपूर ने दी थी और इस गीत के पियानो वादकों में स्वयं शंकर भी शामिल थे। इस गीत से बिल्कुल अलग थी फिल्म 'सूरज' की 1966 के बिनाका गीतमाला में पहले पायदान पर आई सुभावनी शिवरंजनी 'बहारो फूल बरसाओ'।

भैरवी, यमन और पहाड़ी के मुकाबले हिन्दी फिल्म संगीत में शिवरंजनी आधारित कम ही गीत बने हैं। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने भी शिवरंजनी का इस्तेमाल अपने कुछ गीतों में किया 'संत ज्ञानेश्वर' का गीत 'खबर मोरी ना लीनी रे बहुत दिन बीते (लता), भावना प्रधान 'अनजाना' (1969) का 'रिमझिम के गीत सावन गाए हाय भीगी भीगी रातों में', कशिश भरा 'प्यार झुकता नहीं (1985) का लोकप्रिय गीत 'तुमसे मिलकर न जाने क्यों और भी कुछ याद आता है' (शब्बीर कुमार) ऐसे उदाहरण हैं। शिवरंजनी जैसे संजीदा राग में भी ढोलक का अपना रिद्मिक प्रभाव लक्ष्मी-प्यारे ही दे सकते थे जैसा उन्होंने 'वो दिन याद करो' के शीर्षक गीत 'यार जिन्हें तुम भूल गए हो, वो दिन याद करो (लता / रफी) में बखूबी प्रदर्शित किया। शिवरंजनी में ऊंची पट्टी के गाने कम ही हैं, क्योंकि इस राग की मूल प्रवृत्ति से मध्यम नोट्स के गीत ही अधिक तादात्म्य स्थापित करते हैं परन्तु शिवरंजनी में ही लक्ष्मी-प्यारे ने एक दूजे के लिए' (1981) फिल्म में इस परंपरा को तोड़ते हुए 'तेरे मेरे बीच में कैसा है यह बंधन अनजाना' (लता, एस. पी. बालसुब्रमण्यम) जैसा अपेक्षाकृत ऊंची पट्टी का बेहद लोकप्रिय गीत सृजित किया।

शिवरंजनी का दर्द समेटे संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी बेहद कोमल सुरों और पियानों के साथ 'कुंआरी' (1961) में प्यार के पल छिन बीते हुए दिन, हम तो न भूले तुम भूल गए' (लता/तलत) में और 'पिया मिलन की आस' (1961) के शीर्षक गीत में आए पर मिश्र शिवरंजनी आधारित जिस गीत ने एस. एन. त्रिपाठी को आम जनता के बीच लोकप्रिय बनाकर सालाना बिनाका का चोटी का गीत बनाया, वह था 'जनम जनम के फेरे' (1957) का 'जरा सामने तो आओ छलिये' (लता, रफी)। यह इतना आश्चर्यजनक तथ्य था कि संगीतकारों ने इसे फ़्लूक हिट करार दे दिया, पर त्रिपाठी की घर-घर गूंजने वाली मेलोडी
इन तमाम आलोचनाओं पर भारी पड़ी।

शिवरंजनी आधारित बेहतरीन गीतों में वॉयलिन का दर्दीला प्रयोग अक्सर किया गया है। जैसे सोनिक ओमी द्वारा संगीतबद्ध रफ्तार' (1974 मुकेश, आशा) का 'संसार है इक नदिया, सुख दुख दो किनारे हैं।' कल्याणजी आनंदजी द्वारा शिवरंजनी का प्रयोग हमें 'जंजीर' (1973) के 'बना के क्यों बिगाड़ा रे, बिगाड़ा रे नसीवा' (लता) और 'मुकदर के सिकंदर' (1978) के 'ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना' (किशोर / आशा) में मिलता है। 'ओ साथी रे' को पुरुष और महिला दोनों श्रेणियों में फिल्म फेयर पुरुस्कार के लिए नामांकित किया गया था।

आम तौर पर फिल्मों में शिवरंजनी आधारित गीत कहरवा ताल पर ही सृजित किए गए हैं, पर अगर अपवादों पर जाएं तो दादरा ताल पर आधारित रवि द्वारा स्वरबद्ध फिल्म 'घूंघट' (1960) का 'लागे ना मोरा जिया' (लता) शिवरंजनी की एक यादगार अभिव्यक्ति है। शिवरंजनी के लोकप्रिय उदाहरणों में राहुल देव बर्मन द्वारा संगीतबद्ध फिल्म 'महबूबा' (1976) के 'मेरे नैना सावन भादो फिर भी मेरा मन प्यासा' (लता/किशोर) और खुशबू' (1975) के बागेश्वरी के साथ शिवरंजनी का पुट लिए दो नैनों में आंसू भरे हैं निंदिया कैसे समाए' भी शामिल हैं।

शत्रुघन सिन्हा पर फिल्माया शायद सबसे खूबसूरत गीत है राग शिवरंजनी पर ही आधारित बी. आर. इशारा की 'मिलाप' (1972) का बृजभूषण द्वारा संगीतबद्ध और मुकेश का अपेक्षाकृत ऊंची पट्टी पर गाया 'कई सदियों कई जन्मों से तेरे प्यार को तरसे मेरा मन शिवरंजनी आधारित फ़िल्मी गीतों के अन्य उदाहरणों में बी, बलसारा द्वारा संगीतबद्ध 'विद्यापति' (1964) के 'मेरे नैना सावन भादो तोरी रह-रह याद सताए', सुधीर फड़के द्वारा संगीतबद्ध 'भाभी की चूड़ियां' (1961) का 'मेरी लाज रखो गिरधारी', 'सम्बंध' (1969) में ओ.पी. नैयर द्वारा अ कम्पोज किया गया 'अकेली हूं मैं पिया आ (आशा) को याद किया जा सकता है।

शिवरंजनी (साथ में सोहनी की छाया लिए) आधारित सबसे मशहूर गीतों में हेमंत कुमार द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म 'बीस साल बाद' (1967) के रहस्यमय गीत 'कहीं दीप जले कहीं दिल' (लता) को हम कभी नहीं भुला सकते। दरअसल इस गीत से सम्बंधित एक रोचक तथ्य यह भी है कि इन दिनों लता काफी बीमार हो गई थीं और बीमारी से उठने के बाद उन्हें लगने लगा था कि उनकी आवाज पहले जैसी नहीं रहीं पर हेमंत ने बिना बताए उनके एक रिहर्सल को ही रेकॉर्ड कर लिया और उसी को रेकॉर्डिंग मानकर लता को सुनाकर उन्हें विश्वास दिला दिया कि उनकी आवाज अब भी लता की आवाज है। यह भी कम ही लोग जानते हैं कि इस गीत को हेमंत पहले गीता दत्त से गवाना चाहते थे, पर उनके घर पर रिहर्सल में जरा मिलना नजर पहचान के वह आवश्यक नाजुक लहजा' जब गीता नहीं ला पाई तो हेमंत ने उनसे माफी मांग लता को बुलवा लिया।

हिन्दी फ़िल्म संगीत के बाद के दशकों में भी शिवरंजनी का प्रयोग यदा-कदा होता रहा है। पर ऐसे कई गीतों में जैसे 'बेटा' (1991) का 'धक धक करने लगा में ऑर्केस्ट्रेशन इतना हावी रहा है कि शिवरंजनी का कोमल प्रभाव दब जाता है --- पंकज राग: गीत-संगीत के अध्येता, शोध पुस्तक 'धुनों की यात्रा के लेखक

05/08/2020

आज रात किशोर कुमार जी की याद में fb live 2
AT 11:00 PM

बीते दिनों की सुनहरी यादें; आज से 20 साल पहले जब भातखंडे संगीत महाविद्यालय बिलासपुर में सुगम संगीत 🎤 गायन की औपचारिक शिक...
31/07/2020

बीते दिनों की सुनहरी यादें; आज से 20 साल पहले जब भातखंडे संगीत महाविद्यालय बिलासपुर में सुगम संगीत 🎤 गायन की औपचारिक शिक्षा (गीतांजलि जूनियर डिप्लोमा कोर्स) प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किये थे 🎵🎸🎙️🎧🎻📯

27/07/2020

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