14/04/2026
जलियांवाला बाग हत्याकांड :जहाँ 'निजी वफादारी' देश और मानवता से बड़ी हो गई थी।
जब रोलेट एक्ट (बिना दलील, बिना वकील, बिना अपील का कानून) के खिलाफ गुस्सा उबल रहा था, तब जनरल डायर ने अपनी क्रूरता दिखाने का फैसला किया। अमृतसर के उस मैदान के इकलौते संकरे रास्ते को अपने सैनिकों से घेर लिया। बिना किसी चेतावनी के, बिना किसी बचाव के मौके के, 'फायर' का आदेश दे दिया । अप्रैल 13, 1919. बैसाखी का पवित्र दिन।अगले 10 मिनट भारतीय इतिहास के सबसे काले अध्याय में बदलने वाले थे।
इस नरसंहार में जनरल डायर के आदेश पर निहत्थी भीड़ पर 10 मिनट तक गोलियां बरसाई गई थीं।कुल 1650 राउंड गोलियां, तब तक चलीं जब तक कि गोला-बारूद खत्म नहीं हो गया।
अपनी जान बचाने के लिए सैकड़ों लोग उस कुएं में कूद गए, जो आज भी उस बर्बरता का गवाह है।
आज भी उन दीवारों पर गोलियों के निशान मौजूद हैं, जो ब्रिटिश हुकूमत की बुज़दिली और मासूमों की बेबसी बयाँ करते हैं।
अंग्रेज सरकारी आंकड़ों के अनुसार 379 लोग मारे गए थे, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य अनौपचारिक रिपोर्टों के अनुसार, मरने वालों की वास्तविक संख्या 1,000 से अधिक थी और 2,000 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। यह सिर्फ एक हत्याकांड नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद का वो क्रूर चेहरा था जिसने भारत की आज़ादी की लौ को मशाल बना दिया।
इस नरसंहार का सबसे विचलित करने वाला पहलू यह नहीं था कि आदेश एक अंग्रेज ने दिया था, बल्कि यह था कि गोलियां चलाने वाली बंदूकें भारतीयों के ही हाथों में थीं।
मुख्य दोषी ब्रिगेडियर-जनरल रेजिनल्ड डायर (Reginald Dyer) था, जिसने निहत्थी भीड़ पर सीधे हमले का हुक्म दिया। उसके साथ पंजाब का तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'डायर (Michael O'Dwyer) खड़ा था, जिसने बाद में इस कत्लेआम को "सही कदम" बताया।
जनरल डायर के साथ जो सैनिक उस दिन बाग में घुसे थे, उनमें से अधिकांश भारतीय थे। इनमें मुख्य रूप से:
65वीं बलूच रेजिमेंट के सैनिक
9वीं गोरखा राइफल्स के जवान
ये सैनिक भारतीय थे, शहीद होने वाले भारतीय थे, लेकिन बीच में खड़ी थी गुलामी की वो जंजीर और अनुशासन का वो अंधा चश्मा जिसने उन्हें अपने ही भाइयों, बहनों और मासूम बच्चों पर ट्रिगर दबाने को मजबूर कर दिया।
यह घटना हमारी एक ऐतिहासिक कमजोरी को भी दर्शाती है। मुट्ठी भर अंग्रेजों के एक इशारे पर हजारों अपनों का खून बहा देना, हमारे राष्ट्रीय चरित्र की उस कमी को उजागर करता है जहाँ 'निजी वफादारी' देश और मानवता से बड़ी हो गई थी। अगर उन भारतीय सैनिकों ने सामूहिक रूप से उस वक्त अपनी बंदूकें नीचे झुका दी होतीं, तो इतिहास आज कुछ और ही होता।