04/12/2025
आजकल विचित्र समय है—
कर्मभूमि के कुछ प्रहरी ऐसे दीख पड़ते हैं
जिन्हें कर्तव्य की पुकार
दूर से सुनाई भर दे जाए
तो वे मानो किसी मौन-व्रत भंग की भाँति
व्याकुल हो उठते हैं।
ये हैं हमारे सम्मानित BLO महाशय,
जिन्हें शासन की गोद ने
इतना मधुर विश्राम प्रदान किया है कि
कर्तव्य का क्षणिक स्पर्श भी
उन्हें तपस्वियों की परीक्षा सा प्रतीत होता है।
सुविधाओं का आलिंगन जब अत्यधिक कस जाए,
तो श्रम की हल्की-सी लहर भी
प्रलय का आभास देने लगती है।
उधर निजी क्षेत्र के जन—
जो अनिश्चितता के अरण्य में
प्रतिदिन अपने भाग्य से संघर्ष करते हैं,
जहाँ श्रम अनन्त है
और विश्राम दुर्लभ।
वे प्रातः से सन्ध्या तक
लक्ष्यों के रथ को
धधकते मार्गों पर खींचते हैं,
बिना इस आस के कि
कभी इस यात्रा का अंतिम पड़ाव मिलेगा।
पर यहाँ प्रशासनिक द्वारों के रक्षक
एक मास की अतिरिक्त चेष्टा से ही
इतने विमूढ़ हो उठते हैं
मानो समय ने उनके सुख-सिंहासन हिला दिए हों।
कर्तव्य उन्हें नहीं अखरता—
बस आराम की निरंतरता में
इतनी लय बैठ चुकी है
कि श्रम अब संगीत नहीं,
कर्कशता प्रतीत होता है।
यही तो विडंबना है—
जहाँ निजी क्षेत्र का कर्मी
दैनिक ज्वारभाटों से जूझते हुए भी
शांत रहा करता है,
वहीं हमारे ये महाशय
अल्पकालिक उत्तरदायित्व को भी
अनावश्यक तूफ़ान मान बैठते हैं।
सत्य सरल है पर चुभने वाला—
कर्तव्य का भार वही सँभाल पाता है
जिसके कंधों में बल हो;
और आराम के उपासक
अक्सर हल्की-सी जिम्मेदारी में भी
कंपित हो उठते हैं।