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"काले बादल"कभी - कभी यूं भी होता है किखूब ज़ोर से उमड़ - उमड़ के लहराकर काले बादल आते हैं और तेज़ हवाएं चलती हैंकड़क - क...
22/07/2022

"काले बादल"

कभी - कभी यूं भी होता है कि
खूब ज़ोर से उमड़ - उमड़ के लहराकर
काले बादल आते हैं और तेज़ हवाएं चलती हैं
कड़क - कड़क के बिजली भी
रूह ठिठोरे देती है
लगता है कि जैसे आंधी होगी, तूफ़ान होगा
पर फिर होता कुछ भी नहीं

कभी - कभी ऐसा तब भी होता है
जब कोई अनचाही बात दिल में घर कर जाती है
काले बादल मन को घेरे रहते हैं
तेज़ हवाएं सीने में लहराती हैं
और ख़ून उबालें लेता है
लगता है कि जैसे फूट पड़ेगा आंखों से सब
पर फिर होता कुछ भी नहीं

क्या बादल पानी भूल गए थे?
या बात चुभी और खतम हुई?

पता करो भाई पता करो!

जो थोड़ी बारिश हो जाए
और थोड़े आसूं छलक पड़ें
तो शाम सुहानी हो जाए
और मन को राहत मिल पाए।

- कातिब

Ranchi, 2022Snippets from the shoot.Ranchi ki shaan -
18/05/2022

Ranchi, 2022

Snippets from the shoot.

Ranchi ki shaan -

"प्रतीक्षा"अपने जीवनकाल में हम सभी रोज़ ही, किसी ना किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति की प्रतीक्षा करते हैं। जैसे सुबह मे...
13/04/2022

"प्रतीक्षा"

अपने जीवनकाल में हम सभी रोज़ ही, किसी ना किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति की प्रतीक्षा करते हैं। जैसे सुबह में स्कूल की बस के आने की, दूध वाले के दूध दे जाने की, कुकर के पकती डाल में सीटी के आने की, वज़न कम हो जाने की, परीक्षा का रिजल्ट आने की, प्रमोशन मिल जाने की, अपने प्रेमी के मिलने आने से पहले की और प्रसव के दौरान बच्चे के पैदा होने की।

यह चंद कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं जो हम सभी ने कभी न कभी देखी हैं या इनसे गुज़रे हैं। कुछ इनमें से सुखद होती हैं तो कुछ दुखद। मगर इन्हीं में से कुछ ऐसी भी हैं, जिनमें सुख या दुख का होना या ना होना आप मेहसूस नहीं कर पाते।

जैसे जब आपका कोई परिजन किसी बीमारी या स्तिथि के कारण, ऑपरेशन थिएटर में होता है तो ऐसे समय में आपका कुछ अच्छा या बुरा मेहसूस ना कर पाना स्वाभाविक है। मन में हज़ार तरह की बातों का आना स्वाभाविक है। आपका हस्ते-हस्ते रोना या रोते-रोते हसना स्वाभाविक है। क्योंकि, बात भले ही जिंदगी या मौत की ना हो लेकिन उस प्रतीक्षा की घड़ी में, आपके दिल और दिमाग का सुन्न पड़ जाना स्वाभाविक है।

बात यह है की जो होना है सो तो होकर ही रहेगा। मगर उसके होने या ना होने से पहले, जो प्रतीक्षा का समय होता है, उसमें मालूम होता है की आपकी स्वाभाविकता कितनी स्वाभाविक है।

और किसी भी हस्पताल के प्रतीक्षालय में आप अगर जाकर देखेंगे तो यह ज़रूर जान जायेंगे की, किसी की भी प्रतीक्षा कर पाना आपके इंसान होने की उतनी ही महत्व्यपूर्ण कला है, जितनी की आपका साँस लेना।

- कातिब

"हस्पताल-ख़स्ता हाल"बीते शनिवारजो आया बुख़ारतो दवा कराने हम गएपहुँचे हस्पतालदेखा जो हालप्राण-पखेरू उड़ गएना डॉक्टर साहब का ...
15/03/2022

"हस्पताल-ख़स्ता हाल"
बीते शनिवार
जो आया बुख़ार
तो दवा कराने हम गए

पहुँचे हस्पताल
देखा जो हाल
प्राण-पखेरू उड़ गए

ना डॉक्टर साहब का अता-पता
ना साफ-सफाई की चिंता
पान की पीक से रंगी दीवारें
ना मास्क की कोई परवाह

पहले हमनें पर्चा बनवाया
फिर लाइन में जाके लगगये
वहाँ पहले से जितने खड़े थे
उनमें से 2-4 गिर गए

कंपाउंडर की चौड़ बड़ी और
नर्सों का बजा है डंका
दो ही मरे हैं अबतक और
कइयों की लगी है लंका

डॉक् साहब ने आकर सीधे
ऐसे सुई चुभा दी
कोई कराहे दर्द से तो
किसी ने आवाज़ दबा दी

ज्यों ही मेरा नंबर आया
त्यों पसीने छूटे
हाथ-पैर फूले और
बुख़ार में पसीने छूटे

दवाई मिली, घर आये
आँख बंद आराम किया
सबकी ख़ातिर दुआ भी माँगी
जिनका हस्पताल ने बुरा हाल किआ।

- कातिब

07/06/2021

"छूटा"
- कातिब

दफ़्तर छूटा
दुनिया छूटी
छूटा बाहर जाना

घर मे रहकर
जाना हमनें
कितना बदल गया ज़माना

सीखा योगा
झाड़ू खटका
और खाना बनाना

मास्क और
सैनिटाइजर है
सबको अवश्य लगाना

बदली है अगर दुनिया तो
हम भी तो बदले हैं,
चार दिवारी में रहकर ही
सारा काम करते हैं

लौटेंगे एक रोज़ कभी
जब हाथ मिलाना लाज़िम होगा,
घर से बाहर निकलने में
ना जान का खतरा शामिल होगा

तबतक दूरी ही अच्छी है
एक ये ही दोस्त सच्ची है

लेकिन,

दफ़्तर छूटा
दुनिया छूटी
छूटा बाहर जाना

घर मे रहकर
जाना हमनें
कितना बदल गया ज़माना।

"अगर मुर्दे बोल पाते तो"वो बतातेउनकी आँखों ने जो मंज़र देखा थाबेबसी और लाचारी का जो समंदर देखा थादेखा था उन्होंनेमाँ, बाप...
28/05/2021

"अगर मुर्दे बोल पाते तो"

वो बताते
उनकी आँखों ने जो मंज़र देखा था
बेबसी और लाचारी का जो समंदर देखा था

देखा था उन्होंने
माँ, बाप, बच्चों
को तड़पते हुए
देखा था उन्होंने
घरवालों को बिलखते हुए

वो बताते हमें
की सच्चाई क्या थी
क्यों जीने की उनकी
गुँजाइश ना थी
क्यों हस्पतालों में उनको
जगह ना मिली
क्या थी लाचारी
जो ज़िन्दगी ले गई

वो बताते
कि इस लापरवाही की
सज़ा मौत है
अमीरी और गरीबी में
फरक बहोत है
घर से निकलने की
हमें ज़रूरत नहीं है
क्योंकि इस बीमारी से लड़ने की
यहाँ सहूलत नहीं है

वो बताते हमें
के ये आँकड़े झूटे हैं
इंसानियत से हम
क्यों रूठे हैं
हस्पताल के अंदर हो या बाहर
ये हौसलें लोगो के
आखिर क्यों टूटे हैं

अगर मुर्दे बोल पाते तो
वो बताते हमें।

- कातिब

ये इंसानियत की हार है। ना ज़िन्दगी से दोस्ती, ना मौत ही से प्यार हैचारों तरफ है बह रही, ये आँसुओं की धार हैना शिकवा तुमसे...
22/05/2021

ये इंसानियत की हार है।

ना ज़िन्दगी से दोस्ती, ना मौत ही से प्यार है
चारों तरफ है बह रही, ये आँसुओं की धार है

ना शिकवा तुमसे कोई अब, तुम भी ना गिला करो
ये मुश्किलों का दौर है, मिलके प्यार से रहो

ना चीख़ सुन सके हैं वो, ना मौत का हिसाब है
कब तलक बचेगा क़ातिल, ये लाशों की पुकार है

ना बुझ सके कोई चिराग, ना शोक का समा रहे
जो भी बन पड़े मियाँ, आओ साथ में करें

ना तलाश है उम्मीद की, ना हौसलों की बात है
सच कहूँ अगर मैं तो, ये इंसानियत की हार है।

- कातिब

                                         #2021
09/05/2021

#2021

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