14/06/2025
🙏 कृपया रामायण समय निकालकर अवश्य पढ़े। 14/06/2025
🌷श्रीरामचरितमानस चोपाइ नित्य पाठ
⭐सियावर राम जय जय राम
🕉️मेरे प्रभु राम जय जय राम
🙏करो कल्याण जय जय राम
🌞मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी
🌹रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।
🕉️कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।
🙏दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।
🌹श्री राम जय राम जय जय राम।
🕉️श्री राम जय राम जय जय राम।
🌷सियावर श्रीरामचन्द्र की जय।
🌞राधावर श्रीकृष्ण भगवान की जय
🌷गोंरावर भोलेनाथ की जय।
🌹पवनसुत हनुमान की जय।
🕉️श्री राम दरबार की जय।
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💖💖 दो०- मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ । जगदाधार सेष किमि उठे चले खिसिआइ ॥ ५४ ॥
मेघनादके समान सौ करोड़ ( अगणित ) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं। परन्तु जगत्के आधार श्रीशेषजी (लक्ष्मणजी) उनसे कैसे उठते ? तब वे लजाकर चले गये ॥ ५४ ॥
लङ्काकाण्ड * ८०९
🕉️ सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू ।। सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही।।.
[ शिवजी कहते हैं] हे गिरिजे! सुनो, प्रलयकालमें] जिन (शेषनाग) के क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर [ जीव ] जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राममें कौन जीत सकता है ? ॥ १ ॥
🌷 यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई।। संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी।।
इस लीलाको वही जान सकता है जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो। सन्ध्या होनेपर दोनों ओरकी सेनाएँ लौट पड़ीं; सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ सँभालने लगे ॥ २ ॥
🌹 ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर । लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर ।। तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना।।
व्यापक, ब्रह्म, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके ईश्वर और करुणाकी खान श्रीरामचन्द्रजीने पूछा- लक्ष्मण कहाँ हैं? तबतक हनुमान् उन्हें ले आये। छोटे भाईको [ इस दशामें] देखकर प्रभुने बहुत ही दुःख माना ॥ ३ ॥
💖 जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना।। धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता ।।
जाम्बवान्ने कहा- लंकामें सुषेण वैद्य रहता है, उसे ले आनेके लिये किसको भेजा जाय ? हनुमान्जी छोटा रूप धरकर गये और सुषेणको उसके घरसमेत तुरंत ही उठा लाये ॥ ४ ॥
🌞 दो० - राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन । कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ॥ ५५ ॥
सुषेणने आकर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंमें सिर नवाया। उसने पर्वत और औषधका नाम बताया, [ और कहा कि ] हे पवनपुत्र ! ओषधि लेने जाओ ॥ ५५ ॥
🕉️ राम चरन सरसिज उर राखी । चला प्रभंजनसुत बल भाषी ।। उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा ।।
श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें रखकर पवनपुत्र हनुमान्जी अपना बल बखानकर (अर्थात् मैं अभी लिये आता हूँ, ऐसा कहकर) चले। उधर एक गुप्तचरने रावणको इस रहस्यकी खबर दी। तब रावण कालनेमिके घर आया ॥ १ ॥
🌷 दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना ।। देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा।।
८१० * रामचरितमानस *
रावणने उसको सारा मर्म (हाल) बतलाया। कालनेमिने सुना और बार-बार सिर पीटा (खेद प्रकट किया) । [ उसने कहा- ] तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है ? ॥ २ ॥
🌹 भजि रघुपति करु हित आपना । छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना।। नील कंज तनु सुंदर स्यामा । हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ।।
श्रीरघुनाथजीका भजन करके तुम अपना कल्याण करो। हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रोंको आनन्द देनेवाले नीलकमलके समान सुन्दर श्याम शरीरको अपने हृदयमें रक्खो ॥ ३ ॥
💖 मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू।। काल ब्याल कर भच्छक जोई । सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई।
मैं-तू (भेद-भाव) और ममतारूपी मूढ़ताको त्याग दो। महामोह (अज्ञान) रूपी रात्रिमें सो रहे हो, सो जाग उठो। जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, कहीं स्वप्नमें भी वह रणमें जीता जा सकता है ? ॥ ४ ॥
🌞 दो० - सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार । राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार ॥ ५६ ॥
उसकी ये बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ। तब कालनेमिने मनमें विचार किया कि [ इसके हाथसे मरनेकी अपेक्षा श्रीरामजीके दूतके हाथसे ही मरूँ तो अच्छा है। यह दुष्ट तो पापसमूहमें रत है ॥ ५६ ॥
🕉️ अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया। मारुतसुत देखा सुभ आश्रम । मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम ।।
वह मन-ही-मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्गमें माया रची। तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बनाया। हनुमान्जीने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाय ॥ १ ॥
🌷 राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा।। जाइ पवनसुत नायउ माथा । लाग सो कहै राम गुन गाथा ।।
राक्षस वहाँ कपट [ से मुनि का वेष बनाये विराजमान था। वह मूर्ख अपनी मायासे मायापतिके दूतको मोहित करना चाहता था। मारुतिने उसके पास जाकर मस्तक नवाया। वह श्रीरामजीके गुणोंकी कथा कहने लगा ॥ २ ॥
🌹 होत महा रन रावन रामहिं । जितिहहिं राम न संसय या महिं ।। इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई। ग्यानदृष्टि बल मोहि अधिकाई।।
लङ्काकाण्ड * ८११
[ वह बोला- ] रावण और राममें महान् युद्ध हो रहा है। रामजी जीतेंगे इसमें सन्देह नहीं है। हे भाई ! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टिका बहुत बड़ा बल है ॥ ३ ॥
💖 मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल ।। सर मज्जन करि आतुर आवहु । दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु।।
हनुमान्जीने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमान्जीने कहा- थोड़े जलसे मैं तृप्त नहीं होनेका। तब वह बोला- तालाबमें स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हें दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो ॥ ४ ॥
🌞 दो०- सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान । मारी सो धरि दिब्य तनु चली गगन चढ़ि जान ।। ५७ ।।
तालाबमें प्रवेश करते ही एक मगरीने अकुलाकर उसी समय हनुमान्जीका पैर पकड़ लिया। हनुमान्जीने उसे मार डाला। तब वह दिव्य देह धारण करके विमानपर चढ़कर आकाशको चली ॥ ५७ ॥
🕉️ कपि तव दरस भइउँ निष्पापा । मिटा तात मुनिबर कर सापा ।। मुनि न होइ यह निसिचर घोरा । मानहु सत्य बचन कपि मोरा ।।
[ उसने कहा- ] हे वानर ! मैं तुम्हारे दर्शनसे पापरहित हो गयी। हे तात ! श्रेष्ठ मुनिका शाप मिट गया। हे कपि ! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है। मेरा वचन सत्य मानो ॥ १ ॥
🌷 अस कहि गई अपछरा जबहीं । निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं ।। कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू ।।
ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गयी, त्यों ही हनुमान्जी निशाचरके पास गये। हनुमान्जीने कहा- हे मुनि ! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये। पीछे आप मुझे मन्त्र दीजियेगा ॥ २ ॥
🌹 सिर लंगूर लपेटि पछारा । निज तनु प्रगटेसि मरती बारा।। राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ।।
हनुमान्जीने उसके सिरको पूँछमें लपेटकर उसे पछाड़ दिया। मरते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया। उसने राम-राम कहकर प्राण छोड़े। यह (उसके मुँहसे राम-नामका उच्चारण) सुनकर हनुमान्जी मनमें हर्षित होकर चले ॥ ३ ॥
💖 देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा।। गहि गिरि निसि नभधावत भयऊ । अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ ।।
उन्होंने पर्वतको देखा, पर औषध न पहचान सके। तब हनुमान्जीने एकदमसे पर्वतको ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमान्जी रातहीमें आकाशमार्गसे दौड़ चले और अयोध्यापुरीके ऊपर पहुँच गये ॥ ४ ॥
८१२ * रामचरितमानस *
🌞 दो० - देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि । बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥ ५८ ॥
भरतजीने आकाशमें अत्यन्त विशाल स्वरूप देखा, तब मनमें अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कानतक धनुषको खींचकर बिना फलका एक बाण मारा ॥ ५८ ॥
🕉️ परेउ मुरुछि महि लागत सायक । सुमिरत राम राम रघुनायक। सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए।।
बाण लगते ही हनुमान्जी 'राम, राम, रघुपति' का उच्चारण करते हुए मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। प्रिय वचन (रामनाम) सुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावलीसे हनुमान्जीके पास आये ॥ १ ॥
🌷 बिकल बिलोकि कीस उरलावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा।। मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी।।
हनुमान्जीको व्याकुल देखकर उन्होंने हृदयसे लगा लिया। बहुत तरहसे जगाया, पर वे जागते न थे ! तब भरतजीका मुख उदास हो गया। वे मनमें बड़े दुखी हुए और नेत्रोंमें [ विषादके आँसुओंका] जल भरकर ये वचन बोले - ॥ २ ॥
🌹 जेहिं हे बिधि राम बिमुख मोहिकीन्हा । तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा॥ जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया।
जिस विधाताने मुझे श्रीरामसे विमुख किया, उसीने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और शरीरसे श्रीरामजीके चरणकमलोंमें मेरा निष्कपट प्रेम हो, ॥ ३ ॥
💖 तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला।। सुनत बचन उठि बैठ कपीसा । कहि जय जयति कोसलाधीसा।।
और यदि श्रीरघुनाथजी मुझपर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ासे रहित हो जाय ! यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमान्जी 'कोसलपति श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे ॥ ४ ॥
🌞 सो०- लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल । प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक ॥ ५९ ॥
भरतजीने वानर (हनुमान्जी) को हृदयसे लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [ आनन्द तथा प्रेमके आँसुओंका जल भर आया। रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके भरतजीके हृदयमें प्रीति समाती न थी ॥ ५९ ॥
* लङ्काकाण्ड * ८१३
🕉️ तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी।। कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महँ पछिताने ।।
[ भरतजी बोले- ] हे तात ! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामजीकी कुशल कहो । वानर (हनुमानजी ने संक्षेपमें सब कथा कही। सुनकर भरतजी दुखी हुए और मनमें पछताने लगे ॥ १ ॥
🌷 अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ ।। जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा ।।
हा दैव ! मैं जगत्में क्यों जन्मा ? प्रभुके एक भी काम न आया। फिर कुअवसर (विपरीत समय) जानकर मनमें धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमान्जीसे बोले - ॥२॥
🌹 तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता।। चढ़ मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता।।
हे तात ! तुमको जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा। [ अतः ] तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपाके धाम श्रीरामजी हैं ॥ ३ ॥
💖 सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना।। राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी ।।
भरतजीकी यह बात सुनकर [ एक बार तो] हनुमान्जीके मनमें अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा ? [किन्तु] फिर श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावका विचार करके वे भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले - ॥४॥
🌞 दो० - तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत ।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥ ६० क ॥
हे नाथ ! हे प्रभो ! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हनुमान्जी चले ॥ ६० (क) ॥
🕉️ भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥ ६० ख ॥
भरतजीके बाहुबल, शील (सुन्दर स्वभाव), गुण और प्रभुके चरणोंमें अपार प्रेमकी मन-ही-मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमान्जी चले जा रहे हैं ॥ ६० (ख) ॥
🌷 उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी ।। अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायउ।।
८१४ रामचरितमानस
वहाँ लक्ष्मणजीको देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्योंके अनुसार (समान) वचन बोले- आधी रात बीत चुकी, हनुमान् नहीं आये। यह कहकर श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥
🌹 सकहून दुखित देखि मोहि काऊ । बंधू सदा तव मृदुल सुभाऊ ।। मम हित लागि तजेह पितु माता । सहेह बिपिन हिम आतप बाता।।
[ और बोले- हे भाई ! तुम मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदासे ही कोमल था। मेरे हितके लिये तुमने माता-पिताको भी छोड़ दिया और वनमें जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया ॥ २ ॥
💖 सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई॥ जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥
हे भाई ! वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचन सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मैं जानता कि वनमें भाईका विछोह होगा तो मैं पिताका वचन [ जिसका मानना मेरे लिये परम कर्तव्य था] उसे भी न मानता ॥ ३ ॥
🌞 सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।। अस बिचारि जियँ जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ।।
पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार - ये जगत्में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदयमें ऐसा विचारकर हे तात ! जागो ॥ ४ ॥
🕉️ जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ।। अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।
जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यन्त दीन हो जाते हैं, हे भाई ! यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रक्खे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा ॥ ५॥
🌷 जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।॥
स्त्रीके लिये प्यारे भाईको खोकर, मैं कौन-सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा ? मैं जगत्में बदनामी भले ही सह लेता (कि राममें कुछ भी वीरता नहीं है जो स्त्रीको खो बैठे )। स्त्रीकी हानिसे [इस हानिको देखते] कोई विशेष क्षति नहीं थी ॥ ६ ॥
🌹 अब अपलोकु सोकु सुत तोरा । सहिहि निठुर कठोर उर मोरा।। निज जननी के एक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।
🌹🌹🌹🌷🌷🌷🕉️🕉️🕉️🌷🌷🌷🌷🌹🌹🌹
🌹🌹🌹बालो राम राम 🌷🌷🌷
🌹(1) बोलो राम, बोलो राम, बोलो राम, राम राम ।
श्री राम, श्री राम, श्री राम, राम राम ।।
जय जय राम, जय जय राम, जय जय राम राम।
जय राम, जय राम, जय जय राम राम राम राम जय जय राम पतित पावन नाम भज ले राम राम भजते राम राम भजते राम राम भजते राम राम अहम् नमामि राम म सत्यं शिवं सुन्दरम सत्य शिव सुन्दरम् - सत्य शिव सुन्दरम
🌷(2) हरे रामा रामा राम, सीता राम राम राम हरे रामा राम, राम,
सीता राम राम राम सीताराम, राम राम, सीता राम, राम राम
सीता राम राम राम, राजा राम राम सीता राम,
राम राम, राधे शाम शाम हरे रामा रामा राम, सीता राम राम
🕉️(3) श्री राम जय राम, जय जय राम श्री राम जय राम, जय जय राम।
🌞(4) हरे रामा हरे रामा, रामा रामा हरे हरे हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे
💖(5) गोविन्द जय जय, गोपाल जय जय गोविन्द जय जय, गोपाल जय जय राधा रमण श्री गोपाल जय जय
🌹(6) गोविन्द बोलो, गोपाल बोलो राधा रमण हरि गोविन्द बोलो।
🕉️(7) मंगल भवन, अमंगल हरी । द्रबहु जु दशरथ अजर बिहारी ।।
दीन दयाल वृद्ध संवारि हरहु नाथ मोहे संकट भारी ।।
मंगल भवन अमंगल भारी । उमा सहित जाहि जपत पुरारि ।।
अब प्रभु कृपा करहु इह भान्ति । सब तजि, भजहुं दिन राती ।।
मंगल भवन अमंगल हारि। द्रबहु जु दशरथ अजर बिहारी ।।
🌞(8) नमो नमः श्री राम तुम को नमो नमः नमो नमः गुरु देव, तुम को नमो नमः
🙏🙏 नम्र याचना :- 🙏🙏
🌷 मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुवीर । अस विचारि रघुवंश मणि, हरहु विषम भव पीर ।। 1 ।।
🌹 बार बार वर माँगहु - हरिषि देहु श्री रंग । पद सरोज अनपायनी, भक्ति सदा सत्संग ।। 2 ।।
🌷अर्थ न धर्म, का काम रुचि, गति न चहों निर्वाण । जन्म जन्म रति राम पद, यह वरदान न आन ।। ३।।
🌹स्वामी मोहि न विसारियो, लाख लोग मिलि जाहि । हम से तुम को बहुत हैं, तुम से हम को नाहि ।। 4 ।।
🌷 नांहि विद्या नंहि वाहुवल, नंहि खर्चन को दाम । मोह से पतित अपंग की, तुम पत राखहु राम ।। 5।।
🌹 श्रवण सुयश सुनि आयह, प्रभु भजन भवपीर । त्राहि त्रहि आरति हरण, शरण सुखद रघुवीर ।। 6 ।।
🌷 कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमि दाम । तिमिहि रघुनाथा निरन्तर, प्रिय लागहु मोहि राम ।। 7 ।।
🌹 मैं अपराधी जन्म का, नत शिख भरा विकास । तुम दात दुख भंजना, मेरी सुनहु पुकार ।। 8 ।।
🌷 क्या मुख ले विनती करूँ, लाज लगत है मोहि । तुम देखत अबगुन कीए, कैसे भावु तोहि ।।9।।
🌹 सब पर दया करो भगवान, सब का ....
सबका भला करो भगवान, सब पर दया करो भगवान, सब पर कृपा करो भगवान, सब का सब विधि कल्याण हो , धर्म की जय, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद भावना हो, विश्व का कल्याण हो।
⭐सियावर राम जय जय राम
🕉️मेरे प्रभु राम जय जय राम
🙏करो कल्याण जय जय राम
🌞मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी
🌹रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।
🕉️कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।
🙏दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।
🌹श्री राम जय राम जय जय राम।
🕉️श्री राम जय राम जय जय राम
🌹सियावर श्रीरामचन्द्र की जय
🌞राधावर श्री कृष्ण भगवान की जय
🌷गोंरावर भोलेनाथ की जय
🌹पवनसुत हनुमान की जय
🕉️श्री राम दरबार की जय
🌷सब भक्तन की जय
🌞सब सन्तन की जय
🌹गऊ माता की जय
🌷गंगा माता की जय
🌹भारत माता की जय
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