Poonam's Creation

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26/12/2025

प्रेम की पराकाष्ठा
प्रेम की पराकाष्ठा वह अवस्था है
जहाँ मन सामने वाले में
केवल अच्छाई देखता है—
न दोष दिखते हैं,
न वे व्यवहार जो हमारे स्वभाव से मेल नहीं खाते।
और सच कहूँ तो
दिखते तो वे भी हैं,
पर प्रेम की तीव्रता इतनी प्रखर होती है
कि हम उन्हें
देखना ही नहीं चाहते।
यह स्थिति तब तक बनी रहती है
जब तक हमारे प्रेम के प्रत्युत्तर में
हमें भी प्रेम जैसा ही व्यवहार मिलता रहता है।
यहीं एक सूक्ष्म भ्रम जन्म लेता है—
अक्सर जो हमें मिलता है
वह प्रेम नहीं,
केवल एक अच्छा आचरण होता है।
पर हम यह सोचकर
कि “यह मेरी कितनी परवाह करता है,
मेरे लिए कितना करता है”
उस व्यवहार को ही प्रेम का नाम दे देते हैं।
हम प्रेम में इतने डूबे होते हैं
कि बदले में मिले उस आचरण को ही
अपने प्रेम-सुख का प्रमाण मान लेते हैं।
पर समय बड़ा निर्दयी सत्य सामने लाता है।
यदि प्रेम के बदले
वास्तव में विशुद्ध प्रेम हो—
तो समय क्या,
समय के पिता भी
उस रिश्ते का कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
लेकिन जहाँ केवल आचरण-आधारित प्रेम हो,
वह धीरे-धीरे
granted होने लगता है।
वह सोच में बदल जाता है—
“ठीक है, करता है…
प्रेम ही तो है।”
और उधर—
जो व्यक्ति प्रेम की पराकाष्ठा की चोटी पर बैठा होता है,
वह ऐसे व्यवहार से
सीधे ऊँचाई से गिरता है,
और भीतर तक चोट खा जाता है।
यह नहीं कि प्रेम करने वाले को
यह सब समझ नहीं आता।
वह जानता है
कि उसका प्रेम
अब सामने वाले के लिए
केवल एक साधारण भाव भर रह गया है।
फिर भी वह कहता है—
“मैं तो करती ही रहूँगी,
वह करे या न करे।”
पर हर चोट के निशान के साथ
एक अनुभूति गहराती जाती है—
कि प्रेम में
आचरण स्वीकार मत करो,
प्रेम के बदले प्रेम ही स्वीकार करो।
तभी आगे बढ़ो।
और मैं उन सभी से कहना चाहूँगी
जो केवल प्रेम-स्वरूप आचरण करते हैं—
शुरुआत में ही इनकार कर देना।
कह देना—
“मैं तुम्हें वैसा प्रेम नहीं दे पाऊँगा।”
पर किसी को यह पछतावा
कभी मत होने देना
कि उसने
गलत इंसान से
सच्चा प्रेम कर लिया।
:-पूनम गुप्ता

26/12/2025

झूठ ज़रूर खरगोश बनकर आगे भाग सकता है,
पर सच कछुए की तरह धीरे-धीरे चलता है।
और सदियों से यही देखा गया है
कि अंततः जीत कछुए की ही होती है।
सच और झूठ पर तर्क-वितर्क हो सकते हैं,
सबूत और गवाह खड़े किए जा सकते हैं।
काग़ज़ों पर सच-झूठ को
जैसा चाहें वैसा पेश किया जा सकता है।
इंसान खुद को सही साबित करने के लिए
कभी मजबूरी गिनाता है,
कभी हालातों की दुहाई देता है,
और कभी इतने झूठ जोड़ देता है
कि झूठ भी सच लगने लगे।
पर एक जगह ऐसी है
जहाँ कोई तर्क नहीं चलता—
वहाँ सिर्फ़ अंतरात्मा होती है।
और वहीं इंसान
अपने आप से नज़रें नहीं मिला पाता।
दुनिया से झूठ बोला जा सकता है,
पर अपनी अंतरात्मा से नहीं।
और जो वहाँ भी झूठ बोल दे,
शायद वह मनुष्यता के योग्य नहीं रहता।
कितनी भी मजबूरियाँ गिना लो,
कितना भी झूठ को सच बना लो—
अगर सच बोलने का साहस नहीं,
तो क्या वह इंसान
जानवर से भी बदतर नहीं हो जाता?
मान लिया कि उस समय के लिए
झूठ जीत गया,
मान लिया कि ताक़त और चालाकी ने
सच को दबा दिया—
पर क्या उससे सच बदल जाता है?
नहीं।
सच तो सच ही रहता है।
आज बहुतों को देखा
खुद को लाचार बताते हुए,
आज देखा कि
कितनी आसानी से
सच को झूठ के नीचे दबाया जा सकता है।
और तभी मन में
भगवान से एक प्रार्थना उठी—
हे भगवान,
जिस इंसान ने
अपने झूठ के सहारे
सच को दबाया है,
कभी उसे भी
उसी दोराहे पर खड़ा करना।
जहाँ उसे
अपने ही सच को
सैकड़ों झूठों के बीच
दबते हुए देखना पड़े,
जहाँ वह समझ सके
कि सच का मरना
कितना पीड़ादायक होता है।
यह दंड नहीं हो प्रभु,
बस अनुभव हो—
ताकि वह जान सके
कि झूठ चाहे जीत जाए,
पर सच को मिटाया नहीं जा सकता।
पूनम गुप्ता

26/10/2022

दिनाँक-25-10-2022
मौन सा रिश्ता

किससे कहे ,किसको बताय वो अपनी मन् की पीड़ा को ,
कौन है उसके पास उसको उसकी तरह सुनने को,
चुनी उसने राह काटो वाली, कोई नहीं उसके पथ मे फूल बिछाने को
कौन है उसके पास उसको उसकी तरह सुनने को,
लोग जुड़े ,दोस्त हुए ,कुछ हमराही भी ,पर कोई नहीं अंत तक चलने को

कौन है उसके पास उसको उसकी तरह सुनने को,
हा है कुछ कमी उसमे भी सच झूठ का भेद नहीं पर कौन है ऐसे अपनाने को
कौन है उसके पास उसको उसकी तरह सुनने को,
पहचाने एक बार सभी को बारी बारी ,सबसे कहे ,सबको बताय वो अपनी मन् की पीड़ा को
देखे ,समझे
कौन है उसके पास उसको उसकी तरह सुनने को,
मौन से इस रिश्ते मे खुद को मैने उससे जोड़ा ,वो समझे तो समझ जाये मेरे उस प्रेम को
मै हूँ, उसके पास उसको उसकी तरह सुनने को
पूनम गुप्ता

08/10/2022

तुम मुझे कभी
कानों से मत सुनना
तुम मुझे सुन ना अन्तर मन
से,
जब भी मैं ना बता
पाऊँ तुमकोअपनी पीड़ा ,
फिर भी तुम समझना मेरे चेहरे से ,
तुम मुझे कभी आँखो से मत देखना
तुम मुझे देखना अपने हृदय की उन गहराई से जिनमे प्रेम है
तुम मुझे महसूस न करना ,अपने प्रत्यक्ष खड़ा पाकर ,
तुम मुझे महसूस करना मुझे गले लगा कर
तुम मुझे कभी कुछ न बोलना होंठो से
तुम बोलना मेरे पास चुप बैठ कर
पूनम गुप्ता

02/09/2022

#खुद_की_तलाश
हम सबसे ज्यादा खुद से डरते हैं । हम अपने आप को कभी कहना ही नही चाहते कि हमें कुछ तो है जो सही नहीं लगता । हम सुकून और खुशी के बस बन के रहना चाहते है , पर हमें ख़ुद के साथ बैठने में भी डर का अनुभव होता है क्योंकि स्वयं के साथ हम झूठ नहीं बोल सकते । हम नही दे पाते स्वयं को झूठी तसल्ली , हम नही बता पाते खुद को अपनी ही तकलीफे, कहते है न सब कि कैसे खुद का सामना करेंगे जब आईने में खुद को देखते हुए स्वयं को देखना ,कैसे मिला पाएँगे उस नज़र से नज़र जो हमे आईने से ताड रही होगी, कैसे उसे बता पाएंगे कि वो मैं ही हूँ जो खुद के सच मे झूठ तलाश रही /रहा हूँ,पर जिस दिन हम स्वयं के साथ अपना दर्द बाटना सीख जायेंगे , हम स्वयं से जीत जायेंगे , और उस दिन हमारे अकेलेपन में हम अपने साथ होंगे । शायद खुद से जीत जाना हमारी सबसे बड़ी जीत होगी
पूनम गुप्ता

01/06/2022

कभी कभी समझ नहीं आता रिश्ते में कितना सामंजस्य बिठाना हैं , कितनी समझदारी दिखानी हैं ? उनके समय , उनकी सुविधा के अनुसार बात करे , उन्हें समझें या कि वो हमारी इस समझदारी , इस व्यवहार का फायदा उठा रहे हैं ? और अपनी सुविधा के अनुसार हमे वक्त दे रहे हैं ? उनके अनुरूप व्यवहार करें तो लगता हैं कही छले तो नही जा रहें और अगर उनके अनुसार ना करें तो ग्लानि से मन भर जाता हैं ।समझ से परे सारी चीजें हो जाती है ,पर क्या सचमुच् किसी से रिस्ता निभाना इतना मुश्किल भरा होता है ,सच मे जिसके लिए सब कुछ कर गुजरने के लिए हमेशा खड़े रहे और एक पल मैं वही हमारे लिए मुसीबत बन जाता है ,बिल्कुल भी ये गणित समझ नही आता ,मेरे दिल में हमेशा से रहा है जंहा सच मे रिश्ता होता है वँहा ऐसी कोई उधेड़बुन नही होनी चाहिए खुद से गलती हुई मांफी मांग लो ,किसी से हुई गलती मांफ कर दो , रिश्ता और वादा बहुत सावधानी से निभाना चाहिए क्योकी जब कोई रिश्ता या वादा टूटता है तो कोई आवाज नही आती ,पर अंदर सब खतम हो जाता है ,ये भी है गर रिश्ते में कुछ गलती हुई है समय जरूर ले उन पहलुओं को समझने का की कारण क्या था ,पर उसके बीच किसी चीज को आने न दे फिर चाहे सम्मान या आत्म सम्मान ही क्यो न हो क्योकि जब उस रिश्ते को शुरू किया जाता है तब कुछ नही आता रहता है तो सिर्फ केवल प्यार
पूनम गुप्ता

14/05/2022

दिनाँक 11/05/2022
बहुत आसान सी है जिंदगी ,सीधा सा फंडा है इसका कुछ नही लाये ओर न ही कुछ लेकर जाना है ,पर पता नही क्यो हम इसे इतना कॉम्प्लिकेटेड बना देते है ,सब कुछ है पर पता नही किस बात से खुद को दबा दबा से महसूस करते है ,प्यार ,दोस्ती नाते में खुद को इतना उलझा लेते है कि बस लगता है अब कुछ नही बचा ,जो चीजे आसानी से मिले उसकी कद्र नही ,और जो न मिले उसके पीछे बस हाथ धोकर पड़े रहते है ,ये नही हुआ वो नही हुआ जबकि इसका कारण भी हम खुद होते है साधारण सी चीज को इतना बड़ा बना लेते है जो चीजे सॉरी ,से खत्म हो सकती है पर हम अपने ईगो को स्वाभिमान का नाम देखर खुद ही खुद को परेशान करते है इसने ऐसा किया उसने वैसा किया ,ठीक है ना हो गया किसी से कुछ भी, तो क्या पत्थर की लकीर बन गया जो मिट नही सकता , गलती हुई तो समझ लो या समझा लो ,एक क्षण मे सब बदल जाता ,जिंदगी एक पल में यूं हाथो से निकल जाती है फिर केवल पछतावा रह जाता है, अपनो को खोने के बाद रखे आपका ईगो वाला स्वाभिमान,वो गाना है ना े_झूठ_मत_बोलो_खुदा_के_पास_जाना_है_ना_हाथी_है_ना_घोड़ा_है_वँहा_तो_पैदलजाना_है #
पूनम गुप्ता

10/05/2022

दिनाँक 10/05/2022
बहुत बार दिल मे ये खयाल उठता है कि हमारे संस्कार क्या है कैसे है ,सिर्फ तहजीब में लोगो से बात करना ,बड़े छोटो का सम्मान करना ये कहलाता है संस्कार ,कई बार हमारे माता पिता , बड़े, हमे कहते की हमने जो संस्कार दिए है उनका पालन करना बात करने का सलीका जो सिखाया उसे जीवन भर लेकर चलना ,या जब हमसे कोई भूल हो जाती है तो यो कहते है कि क्या यही संस्कार दिए है हमने तुम्हे ,यही सिखाया था हमने ,पर मेरे विचारों से अगर में संस्कार के बारे में पूछू तो मेरा मन कहता है संस्कार मतलब मर्यादा ,जो किसी के सीखाने से या बताने से नही आती ,ये केवल हम अपने बड़ो के व्यवहार से सीखते है कि हमारे बड़े कैसा करते है कैसे अपने सम्मान के लिए क्या कर गुजरते है पर अगर हमारे किसी ऐसे से कोई ऐसी गलती हो जाती है तो सीधे यही मन में आ जाता है क्या यही संस्कार दिए या क्या कमी रखी संस्कार देने में ,हमारे लोग भी हमारे द्वारा किसी विश्वासपात्र से उसी तरह विश्वास कर लिए है जैसे हम, तो अगर उस विश्वास पात्र से हमारे द्वारा सिखाये जाने वाले व्यक्ति को धोखा दिया तो कसूर किसका हमारे संस्कार की कमी या उस विश्वासघाती की जिसमे हमारे विश्वास को छला ,बल्कि हमारे संस्कार ही थे जो हमे उस जैसा बनने नही दिया तो कसूर संस्कार को नही कसूर हमारे गलत व्यक्ति पर भरोसा करने को देना चाहिए
पूनम गुप्ता

28/04/2022

दिनाँक:-02/12/2022
कोई भी रिश्ता अचानक एक दिन ऐसे ही नहीं खत्म हो जाता । टूटने से पहले हमारा मन बहुत बार यह जान लेता हैं कि रिश्ता कमज़ोर हो रहा हैं लेकिन हम बार बार खुद को भुलावे में रख समझते रहते हैं , उस रिश्ते को देते रहते हैं अपना भरकस प्रयास लेकिन यह प्रयास दोनों तरफ से होना ज़रूरी है , अगर एक तरफ से ही यह कोशिश की जाए तो ना बचता हैं वह रिश्ता और ना कोशिश करने वाले का आत्म सम्मान । अतः जब भी लगे की कोई हमारे साथ मजबूरी में हैं या बिना चाहत के हैं तब उसे प्रेमपूर्वक विदा कर देना चाहिए जिससे बना रहता हैं साथ बिताए पलों का मान और हमारा आत्म सम्मान उन बातों की आस जो प्रेमभाव में एक दूसरे से की जाती है,हम जब साथ अच्छे पल में जीते है तब न जाने कितने अच्छे अच्छे बातो से एक दूसरे को नियमो में बांध लेते है ,तुम्हारे बिना ये नही तुम्हारे बिना वो नही पर फिर जब रिश्ता खत्म होने की कगार में हो तब भी उन बातो को याद नही करते कि हमने आपस मे कुछ नियमो को जन्म दिया था ,नियम ये वो नियम नही होते कि तुम ऐसे तो हम वैसे ,नही बस चाहत में एक दूसरे की साथ का भरोसा बस केवल मात्र यही बात ,फिर ज़ब रिश्ता धीरे धीरे एक के कारण चले तो सच मे उस रिश्ते से उसे भी आजाद करे और खुद भी आजाद करे ,पर एक बार कोशिश जरूर करे कि रिश्ता में फिर वही दोनों पहलू बराबर हो जाये ,प्रेम बरकरार हो पाए ,क्योकि जिसे आजाद कर रहे है उसके बिना रहना भी तो आजाद होते हुए उसकी यादों के गुलाम बन कर रह जाएंगे
पूनम गुप्ता

28/04/2022

दिनाँक:- 09/01/2022
#मौजूदगी
हमेशा किसी के लिए मौजूद होना , किसी को पूरे मन से चाहना , कभी कभी उस व्यक्ति की नज़रो में हमारी कद्र कम कर देता है । हमारे प्रेम , हमारे समर्पण को वह हमारी कमजोरी मान लेता है । बदले में बिना कुछ चाहे किसी के लिए हर समय उपलब्ध होना शायद गलत होता है । समझ नहीं आता की गलती क्या है ? जिसकी बातें , जिसका होना हमारे लिए बहुत मायने रखता है , उसे हमारे होने न होने से शायद फर्क भी नहीं पड़ता । क्या किसी को " इतना महत्त्व देना गलत हैं ? जरूरत के हिसाब से उपयोग होना आपको खुद अपने
पूनम गुप्ता

28/04/2022

#दूरी
किसी के चले जाने से पहले हमे हो जाता हैं उसके जाने का पूर्वाभास , महसूस कर पाते है धीरे धीरे बढ़ती दूरी और मन छटपटाता रहता है की क्या करे की सब पहले जैसा हो जाए । लोग कहते है आपस में बात करने से रिश्ते ठीक होते है लेकिन यह तभी होता है जब दोनो ऐसा चाहे । जिसे जाना होता है वह बात करने पर झल्लाता है और हमे ही जिम्मेदार ठहराता है बढ़ती दूरी का , फिर एक दिन रिश्ता खत्म कर देता है यह कह कर की हमारी बाते हमारा उनके लिए फिक्र,अगर वो कुछ गलत कर रहे है उसके बारे में पूछ लिया ये सब वजह थी । अंत में हम सारी उम्र इस ग्लानि में जीते रहते है की काश हमने उसे समझा होता , जाने देते उसे गलत ,बनने देते जैसा वो चाह रहा ,तब थोड़ा संयम रखा होता । क्या उसे कभी महसूस होती होगी असली वजह , क्या उसे उसका अंतर्मन कचोटता होगा ? शायद नही क्योकि अगर ऐसा होता तो जरूर वो एक बार मुड़कर देखता या हमारी बातो में छिपी हमारी फिक्र प्यार को देख लेता ओर हमसे न दूर होता
पूनम गुप्ता

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