26/08/2026
#काव्य #प्राणायाम
*मंच पर काव्य-पाठ के दौरान कंठ पर दबाव कम करने के लिए नाभि से श्वास लेने का दैनिक अभ्यास आवश्यक*
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काव्य-पाठ के दौरान स्वर की गंभीरता और स्थायित्व गले के बल से नहीं, बल्कि नाभि-केंद्रित (डायाफ्रामिक) श्वास-नियंत्रण से आता है। मंच पर जब आप उच्च स्वर, तीव्र आवेग और लंबे छंदों का वाचन करते हैं, तो अक्सर अनजाने में सारा दबाव कंठ की सूक्ष्म मांँसपेशियों पर चला जाता है। इससे कुछ ही छंदों के बाद गला बैठने लगता है, साँस टूटने लगती है और पाठ का प्रवाह बाधित होता है। जब श्वास केवल छाती के ऊपरी हिस्से तक सीमित रहती है, तो फेफड़ों को वांछनीय पर्याप्त वायु-आधार नहीं मिलता, जिसके कारण ओज उत्पन्न करने के लिए गले पर अनावश्यक रूप से दबाव डालना पड़ता है। इस दबाव से बचने के लिए दैनिक रूप से डायाफ्रामिक श्वसन का अभ्यास करना चाहिए।
प्रतिदिन सुबह शांत बैठकर एक हाथ अपनी नाभि पर रखें। नाक से धीरे-धीरे गहरी श्वास भीतर खींचें और ध्यान दें कि सांँस भरते समय आपका पेट बाहर की ओर फैले, जबकि कंधे और छाती पूरी तरह स्थिर रहें। इसके बाद, पेट को धीरे-धीरे अंदर की ओर संकुचित करते हुए एक समान गति से 'स्स्स्' (ssss) या 'ॐ' नाद के साथ सांँस बाहर छोड़ें। यह अभ्यास आपकी श्वास-धारिता को दोगुना कर देगा। मंच पर पाठ करते समय छंद के प्रत्येक विराम और यति का उपयोग 'त्वरित श्वास' लेने के लिए करना चाहिए। किसी भी उच्च स्वर वाली पंक्ति को शुरू करने से पहले नाभि से वायु का एक स्थिर आधार बना लीजिए और आवाज़ को पेट के निचले हिस्से से सहारा देकर बाहर आने दीजिए।
जब कंठ केवल ध्वनि को दिशा देने का काम करता है और बल पेट की मांँसपेशियों से आता है, तो स्वर स्वाभाविक रूप से गूंँजदार और सहज बनता है। इस निरंतर अभ्यास से घंटों के तीव्र काव्य-पाठ के बाद भी आपका गला बिल्कुल सहज रहेगा और आपकी प्रस्तुति में वही ओज और प्रभाव बना रहेगा जिसकी अपेक्षा एक समर्थ मंच-कवि से की जाती है।
Yogendra Sharma 😊