Kavi Yogendra Sharma

Kavi Yogendra Sharma Hindi Poet
Best known for his work dedicated towards the great “Param Veer Chakra Yoddhas”
(3)

28/08/2026

शब्द-शिल्प की झंकृत लय           संगीत गीत की रागों में।जैसे भौंरों की सरगम के            सुर गुंजित हो बागों में।सागर क...
28/08/2026

शब्द-शिल्प की झंकृत लय
संगीत गीत की रागों में।
जैसे भौंरों की सरगम के
सुर गुंजित हो बागों में।
सागर की गहराई से अनु-
बंध लहर के नर्तन का,
धड़कन वही सुनो रिश्तों की
इन राखी के धागों में।
Yogendra Sharma 😊😊
😊😊😊😊😊

🎉 Facebook recognized me as a consistent post creator this week!
27/08/2026

🎉 Facebook recognized me as a consistent post creator this week!

27/08/2026

🇮🇳 ❤️

 #काव्य  #प्राणायाम *मंच पर काव्य-पाठ के दौरान कंठ पर दबाव कम करने के लिए नाभि से श्वास लेने का दैनिक अभ्यास आवश्यक*💐💐💐💐...
26/08/2026

#काव्य #प्राणायाम
*मंच पर काव्य-पाठ के दौरान कंठ पर दबाव कम करने के लिए नाभि से श्वास लेने का दैनिक अभ्यास आवश्यक*
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

काव्य-पाठ के दौरान स्वर की गंभीरता और स्थायित्व गले के बल से नहीं, बल्कि नाभि-केंद्रित (डायाफ्रामिक) श्वास-नियंत्रण से आता है। मंच पर जब आप उच्च स्वर, तीव्र आवेग और लंबे छंदों का वाचन करते हैं, तो अक्सर अनजाने में सारा दबाव कंठ की सूक्ष्म मांँसपेशियों पर चला जाता है। इससे कुछ ही छंदों के बाद गला बैठने लगता है, साँस टूटने लगती है और पाठ का प्रवाह बाधित होता है। जब श्वास केवल छाती के ऊपरी हिस्से तक सीमित रहती है, तो फेफड़ों को वांछनीय पर्याप्त वायु-आधार नहीं मिलता, जिसके कारण ओज उत्पन्न करने के लिए गले पर अनावश्यक रूप से दबाव डालना पड़ता है। इस दबाव से बचने के लिए दैनिक रूप से डायाफ्रामिक श्वसन का अभ्यास करना चाहिए।

प्रतिदिन सुबह शांत बैठकर एक हाथ अपनी नाभि पर रखें। नाक से धीरे-धीरे गहरी श्वास भीतर खींचें और ध्यान दें कि सांँस भरते समय आपका पेट बाहर की ओर फैले, जबकि कंधे और छाती पूरी तरह स्थिर रहें। इसके बाद, पेट को धीरे-धीरे अंदर की ओर संकुचित करते हुए एक समान गति से 'स्स्स्' (ssss) या 'ॐ' नाद के साथ सांँस बाहर छोड़ें। यह अभ्यास आपकी श्वास-धारिता को दोगुना कर देगा। मंच पर पाठ करते समय छंद के प्रत्येक विराम और यति का उपयोग 'त्वरित श्वास' लेने के लिए करना चाहिए। किसी भी उच्च स्वर वाली पंक्ति को शुरू करने से पहले नाभि से वायु का एक स्थिर आधार बना लीजिए और आवाज़ को पेट के निचले हिस्से से सहारा देकर बाहर आने दीजिए।

जब कंठ केवल ध्वनि को दिशा देने का काम करता है और बल पेट की मांँसपेशियों से आता है, तो स्वर स्वाभाविक रूप से गूंँजदार और सहज बनता है। इस निरंतर अभ्यास से घंटों के तीव्र काव्य-पाठ के बाद भी आपका गला बिल्कुल सहज रहेगा और आपकी प्रस्तुति में वही ओज और प्रभाव बना रहेगा जिसकी अपेक्षा एक समर्थ मंच-कवि से की जाती है।
Yogendra Sharma 😊

मुश्किलों की छातियों पर मुस्कुराना है मुझे। कालिमा की  सरहदों के पार जाना  है मुझे। ये हवा का एक झौंका क्या बुझाएगा, सुन...
25/08/2026

मुश्किलों की छातियों पर मुस्कुराना है मुझे।
कालिमा की सरहदों के पार जाना है मुझे।

ये हवा का एक झौंका क्या बुझाएगा, सुनो!
आँधियों के हौसलों को आज़माना है मुझे।

क्या कहा,तूफ़ान हो मुझको उड़ा दोगे,सुनो!
मुठ्ठियों में क़ैद हो तुम, यह बताना है मुझे।

द्वार सारे बंद हैं तो बंद रहने दो, सुनो!
तोड़कर दीवार, ख़ुद का पथ बनाना है मुझे।

हर परिंदा अब नए प्रतिमान साधेगा, सुनो!
व्योम थोड़ा-सा मगर ऊँचा उठाना है मुझे।

भारती के भाल पे बिंदी सजानी है, सुनो!
रोज अम्बर से सितारा तोड़ लाना है मुझे।
Kavi Yogendra Sharma 😊
Yogendra Sharma 😊

सेवाज्ञ संस्थानम् Kavi Mahesh Dube

24/08/2026

परिणति बदलने के लिए प्रयास संभव है, पर नियति को बदलना संभव नहीं।

Address

Bhilwara
311001

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Kavi Yogendra Sharma posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Establishment

Send a message to Kavi Yogendra Sharma:

Shortcuts

Share