14/12/2025
बदलती हुयी दुनिया
बेहिसाब बदल रही हैं
इस दौड़ में होकर शामिल
हमारी खुद की पहचान
बनती या खोती लग रही हैं
बदलाव का यह सैलाब
सिमटा सा नहीं लगता
बल्कि यह समेट रहा हैं सब को
अपनी चकाचौंध में
हम उलझ रहे हैं रोशनी के मोह में
एक अनसुलझे अंधियारे में
सत्यनिधि द्विवेदी अंशिल