18/03/2026
जिस प्रकार समुद्र का ही अंश होने के कारण लहर और समुद्र में जातीय एकता है अर्थात् जिस जाति की लहर - उसी जाति का समुद्र है, उसी प्रकार संसार का ही अंश होने के कारण शरीर की संसार से जातीय एकता है।
मनुष्य संसार को तो 'मैं' नहीं मानता, पर भूल से शरीर को 'मैं' मानता है।
जिस प्रकार समुद्र के बिना लहर का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, उसी प्रकार संसार के बिना शरीर का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। परंतु अहंकार से मोहित अंतःकरण वाला मनुष्य जब शरीर को ' मैं ' अर्थात अपना स्वरूप मान लेता है तब उसमें अनेक प्रकार की कामनाएं उत्पन्न होने लगती हैं।
नारायण 🙏