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14/09/2020

आज हिंदीदिवस के उपलक्ष्य में गत वर्ष की एक सुरूप रचना,,

सम्मानों के साथ खड़ी है,
सुदृढ़ संकल्प के साथ अड़ी है
भाषाओ में ये बड़ी है
हिंदी है जो साथ खड़ी है।

वक्ताओं की भाषा हिंदी,
सरल मृदुभाषी है हिंदी।
माथे की बिंदिया है हिंदी,
भारत की पहचान है हिंदी।

युगों युगों से चली आ रही,
पावन-गरिमामय हिंदी।
हम सबका सौभाग्य अनूठा,
पाया जिसने हिंदी को।

इतिहास रहा है गौरवशाली
सारयुक्त -अभिवादन वाली।
न केवल एक भाषा बोली,
शक्ति सामर्थ्य भाव प्रतिष्ठित।

भयभीत न हो क्षणमात्र तुम इनसे,
ध्वज पताका लेकर तुमको।
सत्य समर तक जाना है,
प्राणों की चिंता मत करना,
हिंदी हमे बचाना है-2

--आशुतोष शुक्ल

राष्ट्रप्रेम की भावना को साथ लेकर चलने वाले सदी के महान जननायक,काव्यशिरोमणि एवम कुशल नेतृत्वकर्ता माननीय पूर्व प्रधानमंत...
16/08/2020

राष्ट्रप्रेम की भावना को साथ लेकर चलने वाले सदी के महान जननायक,काव्यशिरोमणि एवम कुशल नेतृत्वकर्ता माननीय पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर मेरा एक भाव समर्पित है,

ललकार गयी ,सरकार गयी
अटल अडिग के साथ गयी।
रग रग में था जो देशप्रेम,
वो बात गयी ,वो रात गया।।

वो वीर गया,वो धीर गया
शमशीर गया,नभ चीर गया।
अम्बर का रणधीर गया,
जाने क्यों हमसे दूर गया।

मौत बन गयी डर बात बन गयी,
क्यो डरूँ मैं बन -ठन से ,
मौत के चुम्बन से,
ऐसी बाणी बोल गए
वीरो की इस धरती से।।

सागर में सित -सरोज जैसा,
राजनीति में राम के जैसा।
अजातशत्रु दिग्विजय
है अटल तू अडिग।।

तू चला गया,मुख मोड़ गया,
अपने लोगो को छोड़ गया।
माथे का वो मुकुट गया,
शिलाएं भी हिल गईं।।

घनघोर घटाएँ गरज उठी,
सागर की संसृति जाग उठी।
पवमानो वाली रात उठी,
अब प्रलय काल की बात उठी।।

आजादी के बाद गया
आजाद हुआ आबाद हुआ
संसार का सरताज हुआ,
मानो नभ में फैला प्रकाश हुआ।।

करुण कहानी अटल है तेरी,
तू दूर गया,तू दूर गया।
न जाने क्यों,मुख मोड़ गया
अपने लोगो को छोड़ गया।।

--- स्वलिखित

मेरी कलम से,,,
18/03/2019

मेरी कलम से,,,

23/11/2018

भूल जा उस बसन्त को,
जो कभी तेरे लिए थी
चीजे रंगीन थी
राते हसीन थी
सितारों की चादर
लेटा थ खुले आसमा में
आज न खुला आसमा
न ,चादर
बस बरसात के बादल
जो बरसते ही रहते है
--मेरी कलम से

21/11/2018

छल कपट की स्पर्धा में,
नेताओ ने मारी बाजी
फिर भी इनके समर्थन में
सारी दुनिया स्वार्थ में राजी,
हमको लूटा खूब लूटा,
मुगलो ने ,अंग्रेजो ने
फिर आयी बारी नेताओ की,
कुछ न छूटा ऐसा लूटा,
कितनो का तो जीवन छूटा,
नरभक्षी बन बैठे है ये,
इन्हें उखाड़ो जड़ से ,फेको
परिवर्तन की आंधी लाओ
अन्तस् की ज्वाला भड़काओ,
अब नभ में पावक दहकाओ,
त्राहि त्राहि मच जाएगी
जब भ्र्ष्टाचार की आंधी ,
हर कोने में आएगी,
घात करो ,प्रतिघात करो ,
इन भृष्टाचारी नेताओं से,
रहने का अधिकार नही ,
इन भृष्टाचारी नेताओं को,
लटका दो उनको चौराहे पर,
अब जीने का अधिकार नही
देश हमारा सबसे न्यारा ,
हमको है प्राणों से प्यारा
भृष्टाचारी नही रहेंगे,
खुशहाली से हम जियेंगे।।।
--मेरी कलम से

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