Ritesh Upadhyay

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Gita Chapter 1 Shlok 19 , effect of Shankh Dhwani in war
05/03/2023

Gita Chapter 1 Shlok 19 , effect of Shankh Dhwani in war

Yuddh se pehle iss liye bajate the shankh... Gita Shlok

24/12/2018

वो डरा के अच्छा बनाना चाह रहा था,
जहर दे दे के जिलाना चाह राह था।।

22/12/2018
20/12/2018

तेरे ग़म से जुदा क्या हुए,
हम हम न हुए,
तेरे दर से क्या निकले,
फिर दर बदर न हुए l

08/12/2018

मौसम सुहाना था, बहार थी वो पकने ही वाला था, कि कमबख्त आधी आ गई। आंधी पता नहीं तेज थी या कमजोर थी, पर टहनी उससे लड़ न पाई और टूट गयी। फल पकने से रहा। टहनी कमजोर थी या फल का वजन ज्यादा था या आधी तेज थी पता नहीं। जमीन पर पड़ते ही टहनी और फल अलग हो गए। जो एक हुआ करते थे फल, टहनी और पेड़ अब तीन हो चुके थे। तीनों दुखी थे पर दुख का अनुभव अलग अलग प्रकार का था। पेड़ का खामखा एक फल जो पकने वाला था टूट गया और टहनी भी चली गई। खैर फल, फूल, पत्तियां, घोसले टहनियां कितने तो टूटा करते थे आज एक और सही, उसका तो अस्तित्व बरकरार था। हाँ दर्द हुआ, दुख भी हुआ पर उसके लिए यह आम बात थी। दुख को उसी जगह रख कर वह नयी टहनियां और नए फल बनाने में व्यस्त हो गया। परंतु उसे पता था कि उस टहनी और फल की जगह कोई और नहीं ले सकता है। कुछ दिन बीते और उस टहनी की जगह पर एक गांठ बन गई। उस दिन पेड़ को एहसास हुआ कि उसके शरीर में कितनी सारी गांठें बनी हुई हैं। फिर भी पेड़ को अपने जिंदा होने और आंधी का सामना करने पर गुमान था। वही टूटा हुआ फल बारिश,धूप, दबाव सहता जा रहा था। वह चाह रहा था कि काश वह फिर से टहनी से जुड़ पाता और टहनी फिर पेड़ से जुड़ जाती। पर ऐसा कहां संभव था। इसी दुख और चिंता में वह धसता चला जा रहा था और उसका अस्तित्व अंधकार में चला गया। वह फल जो पक सकता था जमीन में नष्ट हो गया और सिर्फ उसका ठोस बीज बचा रह गया। लेकिन कुछ महीने बीते और कुदरत का चमत्कार हुआ और उसी बीज में से अंकुर फूट पड़ा। और देखते देखते एक पौधा तैयार हो गया। पौधे ने पेड़ के चरणों को स्पर्श किया। उसका स्पर्श पाकर पेड़ बहुत प्रसन्न हुआ उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। और तभी उसे अपने जन्म की कहानी याद आई, वह भी एक दिन अधपका टूटा हुआ फल था। उसका दुख दूर हो गया और उसकी सारी गांठें खुल गई। आज उसे सूर्य के प्रकाश के अलावा भी एक और प्रकाश प्राप्त हुआ। परंतु उस टहनी का क्या हुआ? उस टहनी का अस्तित्व खत्म हो गया। उसका महत्व तभी तक है जब तक वह पेड़ से जुड़ी हो या उससे फल जुड़ा हो। वह धरती में मिलकर उपज बन गई। उसी उपज से बीजों में नए अंकुर फूटते हैं। आखिर टहनी है तो एक माध्यम मात्र ही।

06/12/2018

पिजडे़ में बंद परिंदा हूँ,
मैं बीती बातों पे शर्मिंदा हूँ;
हाथ-पॉव सलामत हैं,
मैं थका हुआ कंधा हूँ।।

28/11/2018

मेरे नैना माने कहना
मन का बस मेरे रे,
क्रांति चाहे, चाहे कांति रे,
मन बसंती, नैना वसंती रे।।

भीगे नैना
सांसें गीली
सपने भीगे रे
क्रांति चाहे, चाहे कांति रे,
मन बसंती, नैना वसंती रे।।

प्यासे हैं दीदार
रूह भी प्यासी
टूटने को है दर-ओ-दीवार,
क्रांति चाहे, चाहे कांति रे,
मन बसंती, नैना वसंती रे।।

रोती रातों में
तनहा राहों में
जिस्म छूटने को तैयार
क्रांति चाहे, चाहे कांति रे,
मन बसंती, नैना वसंती रे।।

26/11/2018

मैंने ये कविता २६/११ में हुई आतंकवादी घटना पे लिखी है, मैं उस घटना में शहीद हुए महान व्यक्तियों को श्रधा-सुमन अर्पित करता हूँ| हम ऐसे देश में पैदा हुए हैं जिसने पूरी पृथ्वी को परिवार माना है| हजारों वर्ष की संसकृति है हमारी, इस पर जिसने बुरी नज़र डाली है, उसने मुँह की खायी है,
मैं अल्लाह, भगवान और गॉड को एक मानता हूँ, ऐसा सोच कर ये कविता लिखी है|

२६/११

नवंबर की वो हेमंत ऋतु,
दस बरस गुज़र गये,
अज़मल होती थी हेमंत जहां,
अज़मल तुम वहां क्यूं गये,

तुम दस ने दो सौ को मारा,
हजार हुए घायल,
कितने (NSG major) संदीप बुझा डाले,
अब एक और अरब तैयार हैं,
कहां गये तुम पागल,

शांति, सुरक्षा जिससे मिले वो इस्लाम,
जो हो ईश्वर की शरण है वो मुसलमान,
मैंने नही कुरान ने कहा,

न था इस्लाम, न थे तुम मुस्लिम
तुम बस ढोंगियों के कठपुतली थे,
कांधार दोहराने आये थे,
क्या कम पड़ गयी सेना तुम्हारी,
जो औरों को छुड़ाने आये थे,

है कौन हाफि़ज़ (कुरान जिसे याद हो)
जो कहे कुरान कहता है-
ऐ दरिंदों, मदारियों के बंदरों
मासूमों का खून बहा दो,
शहर को आग लगा दो,
ज़िदों की चिता जला दो,
घर खुदा का खाक में मिला दो,

अल्लाह के जि़हाद का मुज़ाहिद होना था,
तुम मुज़ाहिद के ज़िहादी बन गये,
"अल ज़िहाद-फी़-सबील अल्लाह" में से
अल्लाह को मिटा डाला,
शैतानों, तुमने अल्लाह की
नसलों को मार डाला,

चाँद ज्यादा देर
गर्दिशों में रहता नही,
सूरज अंधेरे से
डरता नही|

वीरों की जननी है भारत माँ
छुपे हुए कायरों की नही,
संदीप-हेमंत-तुकाराम की कमी
कभी न रही, न रहेगी,
जितने भी तुम थे, जितने भी तुम हो,
तुम अरब से आओ, खाड़ी से आओ,
या हिम पर चढ़ जाओ,
तुम जितनो को जितनी बार भेजोगे,
जि़न्दा एक भी नही जा पायेगा,
चंद मुट्ठी भर लोगों से
क्या हिन्दुस्तान हिल जायेगा?

25/11/2018

एक ही नाप के,
कपड़े सिले जा रहे हैं,
लोग ऐतराज भी कर रहे हैं,
और पहने भी जा रहे हैं।

ये कैसा लिबास है,
जो केवल तन ढक रहा है,
उतार कर फेक दो इसे,
जो रूह को कफ़न लग रहा है।

शहर में हमदर्द बहोत हैं,
दर्द बांटे जा रहे हैं,
उनकी तो आदत है,
आप क्यों लिये जा रहे हैं ?

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