09/08/2026
अनन्त भारद्वाज की कलम से
शीर्षक:-शून्य के उस पार
— द्वाज
रात के अंतिम पहर में
जब सो जाता है संसार,
तब मेरे भीतर उठता है
एक अनुत्तरित-सा सवाल—
क्या सचमुच कोई ईश्वर है?
क्या सचमुच कोई दरबार?
क्या कर्मों का कोई लेखा है,
क्या मृत्यु के उस पार
कोई और संसार?
कभी-कभी भय लगता है
इस प्रश्न को सोचकर—
कि यदि कुछ भी नहीं है
इस जीवन के बाद,
तो फिर यह जन्म किसलिए था?
यह चेतना किसलिए थी?
यह प्रेम, यह पीड़ा,
यह संघर्ष, यह अपराधबोध—
किसके लिए था?
यदि पुनर्जन्म नहीं,
यदि आत्मा का कोई पथ नहीं,
यदि स्वर्ग की कोई सीढ़ी नहीं,
यदि नरक का कोई सत्य नहीं—
तो फिर पाप से काँपता मन
पुण्य की ओर क्यों झुकता है?
किस भय से रुकता है हत्यारा?
किस आशा से सत्यवान चलता है?
किस अदृश्य न्याय की खातिर
मनुष्य अपने भीतर जलता है?
यदि मृत्यु अंतिम द्वार है
और उसके आगे कुछ भी नहीं—
न प्रकाश, न अंधकार,
न प्रश्न, न उत्तर,
न मिलना, न बिछुड़ना,
न कोई अपना, न कोई पराया,
केवल एक अनंत मौन—
तो फिर
मेरी प्रार्थनाएँ किसने सुनीं?
मेरी माँ ने जिस आकाश की ओर देखकर
मेरे लिए दुआ की थी,
क्या वह आकाश भी
केवल नीला भ्रम था?
जिस प्रेम को मैंने
आत्मा का नाम दिया,
क्या वह भी
रक्त और रसायन का खेल था?
जिस सत्य के लिए
मैंने अपने भीतर के
कई सुखों की हत्या की—
क्या वह सत्य भी
मृत्यु की राख में
बिना अर्थ जल जाएगा?
यह सोचकर
मनुष्य भीतर से टूटता है—
कि शायद मृत्यु के बाद
कोई न्याय नहीं होगा।
जिसने छल किया,
जिसने प्रेम किया—
दोनों एक ही अंधकार में।
जिसने घाव दिए,
जिसने घाव सहे—
दोनों एक ही राख में।
जिसने जीवन लूटा,
जिसने जीवन दिया—
दोनों के लिए
एक ही अंतिम सन्नाटा।
तब न्याय किसका नाम है?
पुण्य किसका काम है?
पाप किसका दाग है?
और मनुष्य—
आख़िर किसका नाम है?
समय की नदी में
राजाओं के महल बह गए,
साम्राज्यों के शिलालेख
मिट्टी में ढह गए।
कल तक जो “मैं” था,
कल कोई “था” हो जाएगा;
जिस नाम पर आज अभिमान है,
कल कोई उसे भूल जाएगा।
एक दिन
मेरी तस्वीर पर जमी धूल
मुझसे अधिक पुरानी होगी,
एक दिन
मेरी आवाज़ की स्मृति भी
समय की कब्र में सोई होगी।
फिर कौन कहेगा—
“यह मनुष्य कभी जिया था”?
यही विचार
मेरे भीतर सबसे गहरा डर है।
मृत्यु का नहीं—
भुला दिए जाने का।
क्योंकि मृत्यु तो
एक क्षण है,
पर विस्मृति—
अनंत काल का अंधकार।
फिर भी,
इस भय के बीच
एक सूक्ष्म-सी आवाज़ कहती है—
मान लो
ईश्वर नहीं है,
मान लो
स्वर्ग नहीं है,
मान लो
नरक नहीं है,
मान लो
पुनर्जन्म भी नहीं है—
तो क्या प्रेम करना छोड़ दोगे?
यदि कोई स्वर्ग नहीं—
तो किसी दुखी के लिए
धरती पर थोड़ी जगह स्वर्ग की बना दो।
यदि कोई नरक नहीं—
तो किसी मनुष्य के जीवन को
नरक मत बनाओ।
यदि कोई ईश्वर
कर्मों का हिसाब लेने नहीं आएगा—
तो अपने अंतःकरण में
एक दीपक जला लो।
और यदि मृत्यु सचमुच
सब कुछ छीन लेती है—
तो जाने से पहले
किसी की आँख से
एक आँसू छीन लो।
किसी टूटे हुए मन को
दो शब्द दे दो।
किसी भूखे को
आधी रोटी दे दो।
किसी अकेले के पास
कुछ देर बैठ जाओ।
क्योंकि शायद
मनुष्य की अमरता
उसके नाम में नहीं होती—
वह उन हृदयों में होती है
जिन्हें छूकर वह चला जाता है।
शायद पुनर्जन्म
देह बदलने का नाम नहीं,
किसी दूसरे मन में
अपनी करुणा छोड़ जाने का नाम है।
शायद स्वर्ग
बादलों के ऊपर नहीं,
किसी की आँख में
उतर आई शांति है।
शायद पुण्य
किसी अदृश्य किताब में
लिखी हुई संख्या नहीं—
बल्कि वह क्षण है
जब तुम्हारे कारण
किसी ने फिर से
मनुष्य पर विश्वास किया।
और फिर भी—
हे अज्ञात!
यदि तू कहीं है,
तो मेरे प्रश्नों से
मुझसे नाराज़ मत होना।
क्योंकि मैं तुझे नकारना नहीं चाहता,
मैं तो बस इतना जानना चाहता हूँ—
**जब मेरी अंतिम साँस
मेरे भीतर से निकल जाएगी,
जब मेरी धड़कन
समय से हार जाएगी,
जब मेरी आँखों का आख़िरी दीप
बुझ जाएगा—
क्या उस पार
कोई मुझे पुकारेगा?**
या फिर—
एक विराट शून्य होगा,
जिसमें मेरा कोई नाम नहीं होगा,
कोई स्मृति नहीं होगी,
कोई “मैं” नहीं होगा—
और तब
मेरे होने और न होने में
कोई अंतर नहीं होगा।
यही प्रश्न है
जो मुझे रातों में जगाता है।
यही भय है
जो मेरी आस्था को भी
और मेरी शंका को भी
एक साथ जन्म देता है।
और द्वाज
आज भी उसी दोराहे पर खड़ा है—
एक ओर
ईश्वर का अनंत प्रकाश,
दूसरी ओर
शून्य का अनंत अंधकार।
बीच में
एक छोटी-सी मनुष्य-ज़िंदगी—
कुछ साँसें,
कुछ सपने,
कुछ रिश्ते,
कुछ आँसू,
कुछ प्रेम,
और अंत में—
एक मुट्ठी राख।
फिर भी
जब तक साँस बाकी है,
मैं प्रेम करूँगा।
क्योंकि यदि ईश्वर है—
तो प्रेम ही मेरी प्रार्थना होगा।
और यदि ईश्वर नहीं है—
तो भी प्रेम ही
मेरे होने का
सबसे सुंदर प्रमाण होगा।
शायद यही मनुष्य की अंतिम विजय है—
शून्य सामने हो,
फिर भी वह प्रेम चुने।