गमवाला बादशाह 'द्वाज'

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गमवाला बादशाह 'द्वाज' कवि लेखक रचनाकार

09/08/2026

शीर्षक:-मैं जीत के रहूँगा

प्रलय-पवन प्रतिकूल हो, पथ में अगणित शूल हों,
दिग्भ्रमित हों दिशाएँ सारी, नभ में घन अनुकूल हों,
चरण लहूलुहान हों, फिर भी गति मेरी थमे नहीं,
मृत्यु सामने खड़ी रहे, जीवन-वीणा रुके नहीं—
मैं जीत के रहूँगा।

भाग्य भले ही रूठ जाए, काल भले उपहास करे,
नियति भले ही वज्र बनकर मुझ पर आघात करे,
मैं पुरुषार्थ की अग्नि से हर बंधन को गलाऊँगा,
अपने श्रम की रेखाओं से अपना भाग्य बनाऊँगा—
मैं जीत के रहूँगा।

अश्रु अगर नयन में होंगे, उनको मोती कर दूँगा,
पीड़ा यदि प्रचंड हुई तो उसको ज्योति कर दूँगा,
घावों की प्रत्येक रेखा मेरा इतिहास बनेगी,
मेरी ठोकर ही आगे चलकर मेरी आस बनेगी—
मैं जीत के रहूँगा।

जिन्होंने समझा क्षीण मुझे, वे मेरी शक्ति क्या जानें,
जो स्वयं न जले अग्नि में, वे ज्वाला की भाषा क्या जानें;
मैं मौन रहा तो यह मत समझो मुझमें स्वर शेष नहीं,
मेरे भीतर सोया हुआ कोई प्रचंड प्रहर शेष सही—
मैं जीत के रहूँगा।

तम चाहे युग-युग फैले, सूर्य नहीं मर सकता है,
सत्य भले ही मौन रहे, असत्य नहीं टिक सकता है,
एक अकेला दीपक भी अंधियारे से लड़ता है,
एक दृढ़ मनुष्य ही युग की दिशा बदल सकता है—
मैं जीत के रहूँगा।

हार अगर जीवन का केवल एक पड़ाव बने,
अश्रु अगर संघर्षों की अमिट पुकार बने,
तो गिरकर उठना ही मेरी साधना कहलाएगी,
मेरी प्रत्येक पराजय विजय की राह बनाएगी—
मैं जीत के रहूँगा।

जब अंतिम क्षण आएगा और श्वास क्षीण होगी,
जब जीवन की संध्या मेरी आँखों में दीन होगी,
तब भी अधरों पर मेरे केवल इतना गान रहेगा—
“मैं हारा नहीं, मेरा संघर्ष महान रहेगा।”
मैं जीत के रहूँगा।

क्योंकि विजय मुकुट नहीं,
जो केवल मस्तक पर धरे;
विजय वह ज्वाला है
जो मनुष्य को भीतर से गढ़े।
मैं अपने श्रम, साहस, सत्य और संकल्प से
जीवन का अंतिम निर्णय लिखूँगा—
मैं जीत के रहूँगा,
मैं जीत के रहूँगा,
जीवन का यह संग्राम मैं जीत के रहूँगा।

09/08/2026

शीर्षक:-अग्निबीज

राहों ने काँटे बोए,
पग-पग पत्थर आए,
जिनको अपना माना था,
वे भी दूर चले जाएँ।

नयनों में नीर रहा,
अधरों पर मौन रहा,
भीड़ भरे इस जग में
मन फिर भी एकाकी रहा।

पीड़ा को मैंने पीकर
जीवन का गीत रचा है,
तम ने जितना घेरा,
उतना दीप बचा है।

समय मुझे क्या तोड़ेगा,
मैं मिट्टी का ढेर नहीं;
राख तले दबा अंगारा हूँ,
बुझा हुआ अंधेर नहीं।

यदि भाग्य लिखे पतझर,
मैं वसंत लिखूँगा;
यदि जग दे विष का प्याला,
मैं अमृत पीकर जिऊँगा।

मैं गिरकर भी उठूँगा,
टूटकर भी सँवरूँगा—
जिसे अंत समझा जग ने,
उससे ही आरंभ करूँगा।

09/08/2026

अनन्त भारद्वाज की कलम से

शीर्षक:-शून्य के उस पार

— द्वाज

रात के अंतिम पहर में
जब सो जाता है संसार,
तब मेरे भीतर उठता है
एक अनुत्तरित-सा सवाल—

क्या सचमुच कोई ईश्वर है?
क्या सचमुच कोई दरबार?
क्या कर्मों का कोई लेखा है,
क्या मृत्यु के उस पार
कोई और संसार?

कभी-कभी भय लगता है
इस प्रश्न को सोचकर—
कि यदि कुछ भी नहीं है
इस जीवन के बाद,
तो फिर यह जन्म किसलिए था?
यह चेतना किसलिए थी?
यह प्रेम, यह पीड़ा,
यह संघर्ष, यह अपराधबोध—
किसके लिए था?

यदि पुनर्जन्म नहीं,
यदि आत्मा का कोई पथ नहीं,
यदि स्वर्ग की कोई सीढ़ी नहीं,
यदि नरक का कोई सत्य नहीं—
तो फिर पाप से काँपता मन
पुण्य की ओर क्यों झुकता है?

किस भय से रुकता है हत्यारा?
किस आशा से सत्यवान चलता है?
किस अदृश्य न्याय की खातिर
मनुष्य अपने भीतर जलता है?

यदि मृत्यु अंतिम द्वार है
और उसके आगे कुछ भी नहीं—
न प्रकाश, न अंधकार,
न प्रश्न, न उत्तर,
न मिलना, न बिछुड़ना,
न कोई अपना, न कोई पराया,
केवल एक अनंत मौन—

तो फिर
मेरी प्रार्थनाएँ किसने सुनीं?

मेरी माँ ने जिस आकाश की ओर देखकर
मेरे लिए दुआ की थी,
क्या वह आकाश भी
केवल नीला भ्रम था?

जिस प्रेम को मैंने
आत्मा का नाम दिया,
क्या वह भी
रक्त और रसायन का खेल था?

जिस सत्य के लिए
मैंने अपने भीतर के
कई सुखों की हत्या की—
क्या वह सत्य भी
मृत्यु की राख में
बिना अर्थ जल जाएगा?

यह सोचकर
मनुष्य भीतर से टूटता है—

कि शायद मृत्यु के बाद
कोई न्याय नहीं होगा।

जिसने छल किया,
जिसने प्रेम किया—
दोनों एक ही अंधकार में।

जिसने घाव दिए,
जिसने घाव सहे—
दोनों एक ही राख में।

जिसने जीवन लूटा,
जिसने जीवन दिया—
दोनों के लिए
एक ही अंतिम सन्नाटा।

तब न्याय किसका नाम है?
पुण्य किसका काम है?
पाप किसका दाग है?
और मनुष्य—
आख़िर किसका नाम है?

समय की नदी में
राजाओं के महल बह गए,
साम्राज्यों के शिलालेख
मिट्टी में ढह गए।

कल तक जो “मैं” था,
कल कोई “था” हो जाएगा;
जिस नाम पर आज अभिमान है,
कल कोई उसे भूल जाएगा।

एक दिन
मेरी तस्वीर पर जमी धूल
मुझसे अधिक पुरानी होगी,
एक दिन
मेरी आवाज़ की स्मृति भी
समय की कब्र में सोई होगी।

फिर कौन कहेगा—
“यह मनुष्य कभी जिया था”?

यही विचार
मेरे भीतर सबसे गहरा डर है।

मृत्यु का नहीं—

भुला दिए जाने का।

क्योंकि मृत्यु तो
एक क्षण है,
पर विस्मृति—
अनंत काल का अंधकार।

फिर भी,
इस भय के बीच
एक सूक्ष्म-सी आवाज़ कहती है—

मान लो
ईश्वर नहीं है,
मान लो
स्वर्ग नहीं है,
मान लो
नरक नहीं है,
मान लो
पुनर्जन्म भी नहीं है—

तो क्या प्रेम करना छोड़ दोगे?

यदि कोई स्वर्ग नहीं—
तो किसी दुखी के लिए
धरती पर थोड़ी जगह स्वर्ग की बना दो।

यदि कोई नरक नहीं—
तो किसी मनुष्य के जीवन को
नरक मत बनाओ।

यदि कोई ईश्वर
कर्मों का हिसाब लेने नहीं आएगा—
तो अपने अंतःकरण में
एक दीपक जला लो।

और यदि मृत्यु सचमुच
सब कुछ छीन लेती है—

तो जाने से पहले
किसी की आँख से
एक आँसू छीन लो।

किसी टूटे हुए मन को
दो शब्द दे दो।

किसी भूखे को
आधी रोटी दे दो।

किसी अकेले के पास
कुछ देर बैठ जाओ।

क्योंकि शायद
मनुष्य की अमरता
उसके नाम में नहीं होती—

वह उन हृदयों में होती है
जिन्हें छूकर वह चला जाता है।

शायद पुनर्जन्म
देह बदलने का नाम नहीं,
किसी दूसरे मन में
अपनी करुणा छोड़ जाने का नाम है।

शायद स्वर्ग
बादलों के ऊपर नहीं,
किसी की आँख में
उतर आई शांति है।

शायद पुण्य
किसी अदृश्य किताब में
लिखी हुई संख्या नहीं—
बल्कि वह क्षण है
जब तुम्हारे कारण
किसी ने फिर से
मनुष्य पर विश्वास किया।

और फिर भी—

हे अज्ञात!

यदि तू कहीं है,
तो मेरे प्रश्नों से
मुझसे नाराज़ मत होना।

क्योंकि मैं तुझे नकारना नहीं चाहता,
मैं तो बस इतना जानना चाहता हूँ—

**जब मेरी अंतिम साँस
मेरे भीतर से निकल जाएगी,
जब मेरी धड़कन
समय से हार जाएगी,
जब मेरी आँखों का आख़िरी दीप
बुझ जाएगा—

क्या उस पार
कोई मुझे पुकारेगा?**

या फिर—

एक विराट शून्य होगा,
जिसमें मेरा कोई नाम नहीं होगा,
कोई स्मृति नहीं होगी,
कोई “मैं” नहीं होगा—

और तब
मेरे होने और न होने में
कोई अंतर नहीं होगा।

यही प्रश्न है
जो मुझे रातों में जगाता है।

यही भय है
जो मेरी आस्था को भी
और मेरी शंका को भी
एक साथ जन्म देता है।

और द्वाज
आज भी उसी दोराहे पर खड़ा है—

एक ओर
ईश्वर का अनंत प्रकाश,

दूसरी ओर
शून्य का अनंत अंधकार।

बीच में
एक छोटी-सी मनुष्य-ज़िंदगी—

कुछ साँसें,
कुछ सपने,
कुछ रिश्ते,
कुछ आँसू,
कुछ प्रेम,
और अंत में—

एक मुट्ठी राख।

फिर भी
जब तक साँस बाकी है,
मैं प्रेम करूँगा।

क्योंकि यदि ईश्वर है—
तो प्रेम ही मेरी प्रार्थना होगा।

और यदि ईश्वर नहीं है—
तो भी प्रेम ही
मेरे होने का
सबसे सुंदर प्रमाण होगा।

शायद यही मनुष्य की अंतिम विजय है—
शून्य सामने हो,
फिर भी वह प्रेम चुने।

03/08/2026

अनंत भारद्वाज की कलम से
शीर्षक:-मृत्यु-महिमा

किसका रहा अखंड प्रभुत्व इस क्षणभंगुर संसार?
मृत्यु लिखे प्रत्येक प्राण पर अपना मौन अधिकार।

उदित हुआ जो भानु गगन में, अस्त उसे भी होना,
पूर्ण खिला जो पुष्प धरा पर, एक दिवस है खोना।

हिम-शिखरों का गर्व पिघलकर सिंधु-हृदय में जाता,
जीवन का प्रत्येक प्रवाह मृत्यु-समुद्र समाता।

काल न करता भेद किसी में, नृप हो अथवा दास,
एक श्वास के अंतर पर ही बसता समुचित विलास।

द्वाज कहे—मत मृत्यु-विपिन से व्यर्थ हृदय घबराओ,
यह तो केवल देह-वसन का मौन परिवर्तन जानो।

दीप बुझे तो ज्योति कहाँ क्या नभ से विलग हो जाती?
नश्वर पात्र बदल जाने से चेतन कब मर पाती?

शुष्क पर्ण जब वृक्ष त्यजें, नव पल्लव मुस्काते,
अंत नहीं प्रत्येक पतन में, नव प्रभात भी आते।

मृत्यु न तिमिर, न शोकमाला, न करुणा का अंत,
वह तो ईश्वर की वीणा का अगला मधुर प्रबंध।

जो जीवन भर सत्य-पथिक था, उसका क्या अवसान?
वह तो बनकर लोक-स्मृति में जीता युग-युग आन।

माटी का यह कंचन-मंदिर एक दिवस ढह जाना,
किन्तु चरित्र-सुगंधित उपवन कब पाया मुरझाना?

अश्रु तभी तक अश्रु रहेंगे, जब तक मोह अधीर,
ज्ञान जगे तो मृत्यु स्वयं ही बन जाती गंभीर।

जिसने जीवन दान किया हो, धर्म निभाया नित्य,
उसके चरणों में भी झुकता कालचक्र अनित्य।

आओ ऐसा कर्म करें हम, जब अंतिम क्षण आए,
मृत्यु स्वयं भी मौन खड़ी हो, शीश विनत कर जाए।

— द्वाज

03/08/2026

अनन्त भारद्वाज के कलम से

शीर्षक:-जीवन-गीत

किसका यह अभिनंदन क्षण है, किसका यह अवसान?
जीवन केवल धूल-पथिक का क्षणिक मधुर अभियान।

उषा अरुणिम आँचल धरती पर स्वर्णिम रेखा धरती,
साँझ उसी वैभव को अपने तम-अंचल में हरती।

पुष्प जहाँ मुस्कान बिखेरे, वहीं झरे अविलंब,
काल-कराल करों में कैसा टिक पाया है अंबुज?

निर्झर का कल-कल संगीत भी सागर में खो जाता,
दीप स्वयं जलकर ही जग को आलोकित कर पाता।

द्वाज कहे—मत बाँध समय को मृगतृष्णा के पाश,
श्वास-श्वास में मृत्यु छिपाए जीवन का मधुमास।

कंचन-मंडित राजमहल हों, या तृण-कुटिया-द्वार,
काल सभी के चरण चूमकर करता एक-सा व्यवहार।

रोदन भी उपहार समय का, हर्ष उसी का दान,
सुख-दुःख दोनों एक वृक्ष के दो नव-नव पल्लव जान।

मिट्टी का यह देह-दीपक पल-पल गलता जाता,
किन्तु अमर सद्कर्मों का सूरज कभी न ढल पाता।

जिसने केवल स्वयं जिया, वह तो जिया न मानो,
जो जग के दुःख हरने निकला, उसी को जीवन जानो।

जब अंतिम निःश्वास बजेगी मौन अनश्वर वीणा,
न धन जाएगा, न वैभव, न यश का क्षणिक नगीना।

साथ चलेगा केवल उतना जितना प्रेम कमाया,
जितना आँसू पोंछ सका, जितना दीप जलाया।

जीवन कोई प्राप्त विरासत भर नहीं, तप का सार,
जो स्वयं जलें, वही बनते युग के शाश्वत दीपाधार।

चलना ही उपासना इसकी, रुकना इसका क्षय,
क्षण-क्षण में अनंत छिपा है—यही जीवन का जय।

— द्वाज

03/08/2026

अनन्त भारद्वाज की कलम से

शीर्षक:-टोट्टे का विलाप

भूख यहाँ प्रतिदिन मानवता का करती मौन वध,
रोटी के अभाव में सूखता जीवन का प्रत्येक नद।

शैशव की कोमल पलकों पर स्वप्न हुए निष्प्राण,
सूनी आँखों में ठिठक गया भविष्य का विहान।

माँ की सूनी गोद पूछती—कहाँ गया वह अन्न?
जिसकी आशा में बीत गया जीवन का प्रत्येक क्षण।

सूखे अधरों की कंपन में मौन प्रार्थना रोती,
टूटी कुटिया की देहरी पर साँझ अकेली सोती।

द्वाज कहे—यह कैसा युग है, कैसी यह संतान?
स्वर्णभूमि की गोद में रोता अन्न-विहीन किसान।

जिसने अपने रक्त-बिंदुओं से धरती को सींचा,
भाग्य उसी ने जीवन भर केवल अभाव ही खींचा।

महलों के उत्सव हँसते हैं दीपों की मुस्कान लिए,
झोपड़ियों के प्राण तड़पते धुएँ का वरदान लिए।

जिस मिट्टी ने वेद रचे थे, गीता का गान किया,
उसी धरा पर भूख ने मानव का सम्मान लिया।

किससे कहें व्यथा अपनी, किसको दोष सुनाएँ?
जब आँसू भी सूख चुके हों, किसे वेदना गाएँ?

टोट्टा केवल धन का नहीं, अवसर का भी शाप,
प्रतिभा की चिताओं पर होता प्रतिदिन विलाप।

जिस दिन श्रम का मूल्य मिलेगा, टूटेगा यह जाल,
तब मुस्काएगा भारत फिर, मिट जाएगा अकाल।

तब न किसी माँ की आँखों में भूख का होगा नीर,
मानवता के चरण पखारेगा करुणा का गम्भीर नीर।

— द्वाज

03/08/2026

अनन्त भारद्वाज की कलम से

शीर्षक: अंतिम उजाला

मुट्ठी में जितनी धूप समेटो, उतनी अपनी मान,
कल की राहें किसने देखीं, किसको कल की पहचान।

हँसी बचा लो, प्रेम बचा लो, साँसों का सम्मान,
समय किसी का ऋणी न होता, यह जग का विधान।

द्वाज कहता है, फूल वही हैं जो पल भर मुस्काते,
सूखी डालों पर फिर वैसे रंग कहाँ खिल पाते।

जो कहना हो आज ही कह दो, मन में मत रख पीर,
बोल अनकहे अक्सर बन जाते जीवन की जंजीर।

मिलना भी एक मधुर ऋतु है, बिछड़न उसकी शाम,
यादों के दीपक जलते हैं, बुझ जाते सब नाम।

चलना है जब दूर सभी को, क्यों मन में अभिमान,
प्रेम ही ऐसी पूँजी है, जो करती अमर निशान।

कल की धूल हवाओं में होगी, आज महकते रहो,
जिसको अपना मान लिया है, उसके संग बहते रहो।

जब अंतिम पथ मौन बुलाए, न कोई प्रश्न बचे,
बस इतना हो—दिल की धरती पर प्रेम के पुष्प सजे।

— द्वाज

28/07/2026

✍️अनन्त भारद्वाज की कलम से

शीर्षक:-जो टूटा नहीं, वही सिरमौर हो गया

जो टूटा नहीं, वही सिरमौर हो गया,
हर वार सह के और भी हुंकार हो गया।

अंगार की लपट में जो हँसकर निखर गया,
वही स्वर्ण बनके जग का श्रृंगार हो गया।

तूफ़ान थक गए उसे झुकाने की ज़िद में,
वह वज्र-सा अडिग था, पहरेदार हो गया।

काँटों ने रोक लीं थीं हज़ारों ही राहें,
वह रक्त से उन्हें भी गुलज़ार कर गया।

जिसने कभी न भाग्य की चौखट पे शीश धरा,
वह कर्म की तपस्या का आधार हो गया।

जिसने अँधेरों से कभी समझौता न किया,
वह सूर्य बनके हर दिशा का द्वार हो गया।

चोटों ने जिसको तोड़ना चाहा उम्र भर,
हर घाव उसकी जीत का उद्घोष कर गया।

इतिहास झुक गया उसके अटल विश्वास पर,
समय स्वयं उसके चरणों का सत्कार कर गया।

मुकुट नहीं बनाते किसी को राजमहल,
चरित्र का प्रकाश ही दरबार कर गया।

'द्वाज' की कलम का बस इतना-सा है ऐलान—
जो सत्य पर अडिग रहा, वही सम्मान हो गया;
जो झुका नहीं अन्याय के आगे कभी भी,
जो टूटा नहीं, वही सिरमौर हो गया।

27/07/2026

“जीवन-मृत्यु का गूढ़ रहस्य”

जीवन एक प्रवाह निरंतर,
मृत्यु उसका विश्राम है,
आना-जाना इस जगत में
प्रकृति का ही काम है।

श्वासों की गिनती बंधी है,
कालचक्र के साथ में,
क्षणभंगुर यह देह हमारी
बंधी हुई हर बात में।

फूल खिले फिर मुरझाते हैं,
सूरज उगता ढलता है,
जो भी आया इस धरती पर
एक दिवस फिर चलता है।

मृत्यु नहीं अंत कहानी का,
नव आरंभ का द्वार है,
आत्मा अजर-अमर है नित
बस तन का ही व्यवहार है।

मोह-माया के बंधन सारे
मन को जकड़े रहते हैं,
सत्य जानकर भी मानव
मिथ्या में ही बहते हैं।

“द्वाज” कहे यह जीवन-मरण
एक गूढ़ सा ज्ञान है,
जो समझे इस रहस्य को
वही सच्चा विद्वान है।

न भय करो तुम मृत्यु से
न जीवन पर अभिमान करो,
संतुलन में जो जीता है
वही सच्चा इंसान बनो।

Address

बड़ौत
Baraut
250611

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