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Easying interface i am a hindi poet and writer. My writings are poems and short stories.

The creative hindi content of mine which includes hindi poems and short hindi stories is intellectual property which belongs to me as long as i sell it with proper legal procedure.

09/04/2026

चिड़िया

एक मासूम जानवर
सिर्फ अपने बच्चों की चिंता
सुबह से शाम मेहनत करती हुई
ये ही दुआ खाना रोज मिल जाए

आदमी ने बेतार क्या लगाए
मासूम का खाना कम हो गया
आदमी की बस्ती से अब खाना नहीं मिलता
तो चली अब गांवों की और

गांव भी अब बेतार से जुड़े हैं
जंगल कटते जा रहे हैं
ये तो जीवन ही लुप्त हो गया
मैने कहा अभी उम्मीद है

बस सूरज को देख, हवा को देख, मिलेगी शक्ति

24/03/2026

मनुष्य

खूंखार धूप से सामना हुआ
आदमी काम करे या पानी ढूंढे
आसमान से तरेंगे बरसती हुई
कुछ प्यासे जमीन खोदने लगे

काले कर्मों के अलावा कुछ नहीं
कहां था जब धरती प्रदूषण से तड़प रही थी
अब समां रुक नहीं सकता
जायेगा गर्म घर की तरफ

आग धधकती हुई पथ पर
बर्फ पिघलकर समां गई पैरों मैं
खून प्यासा होकर पानी मांग रहा
एक हाकिम गुजरा ठंडी गाड़ी मैं

देख मेरे साथ सेठ है, तेरा वोट है, खाना है और सौ रुपया

02/03/2026

कहानी : अंतरिक्ष मैं तरंग
समय : 2026 भारत
कथा : काल्पनिक

समय और अंतरिक्ष की गणना से सारा संसार बना हुआ है इसमें हमारे जैसे जीव भी शामिल हैं। मानव सभ्यता भरसक प्रयत्न कर रही हैं कहीं कोई ऐसा ग्रह मिल जाए जिस पर जीवन हो पर ये प्रयत्न आजतक सफल नहीं हुए। सुदेश भी ऐसी ही कोशिश मैं लगा हुआ था। सुदेश रतन स्पेस एजेंसी मैं काम करता था और एक तजुर्बे पर शोध कर रहा था कि जबरदस्त सिग्नल की प्रक्रिया से एक तरंग को एक अत्यधिक दूरी पर तरंग से जोड़ा जा सकता है।

सुदेश अध्य्यन कर रहा था कि ऐसी कत्रिम बुद्धि बने जो सिग्नल को सूर्य तक ले जाए और उसके बाद अन्य जीव ग्रह के सूर्य तक। शोध के अनुसार सूर्य से हमें जिंदगी मिलती है और सारे जीव ग्रह के सूर्य एक दूसरे से जुड़े हैं। सुदेश ने अपने शोध के कागज यूरोप भेजे जो नकार दिए गए। सुंदर की 24 साल की मेहनत थी जो पल भर मैं छू हो गई। फिर भी सुदेश ने हार नहीं मानी और इस आपत्ति पर ध्यान दिया कि सूर्य की ऊष्मा मैं कोई तरंग जिंदा नहीं रह सकती तो तुम्हारी कृत्रिम बुद्धि कैसे जिंदा रहेगी।

सुदेश ने काफी सोचा और तब समझ मैं आया कि जीवित सपनो की तकनीक बनानी पड़ेगी जिसके अंदर कत्रिम बुद्धि जिंदा रहेगी। सुदेश इस शोध मैं लग गया और 8 साल मैं ऐसा सपना बनाने मैं कामयाब रहा जिसमें आदमी के दिमाग मैं एक यंत्र लगाकर सपने को सॉफ्टवेयर में खींचा जा सके और उस सॉफ्टवेयर मैं कृत्रिम बुद्धि को खींच कर रखा जा सके। अपनी शोध पर सुदेश ने परीक्षण किया रतन स्पेस एजेंसी मैं और सूर्य पर अपनी तरंग को पांच मिनट जिंदा रखने मैं कामयाब रहा।

एक बार फिर सुदेश ने अपने शोध के कागज यूरोप भेजे जो जांच मैं ठीक पाए गए। ऐसा होते ही रतन स्पेस एजेंसी को सुदेश की शोध पर आगे काम करने की अनुमति मिल गई। आज सुदेश सेवा निवृत्त हो चुका है और बेंगलुरु मैं अपनी पत्नी के साथ जीवन व्यापन कर रहा है। सुदेश खुश है जीवन मैं कुछ बड़ा करने मैं कामयाब रहा।

ये ही आदमी की सभ्यता का स्वरूप है जिसमें आदमी का दिमाग नया सोचता रहता है और आविष्कार को जन्म देता रहता है। इसका कोई अंत नहीं की दिमाग की सोच कहां तक चलेगी पर उम्मीद है जब तक जीवन है चलती रहेगी। वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग के अनुसार पृथ्वी हजार साल और ही हमें जीवन दे पाएगी पर कौन जानता था साफ हाइड्रोजन की खोज हो जाएगी जो कई हजार साल तक पृथ्वी को जिंदा रखेगी क्योंकि प्रदूषण ही है जो पृथ्वी के जीवन को कम करता जा रहा है।

13/12/2025

कहानी : आत्मा की खोज तृतीय
समय : 2002 भारत
कथा : काल्पनिक

आदित्य अपने पूर्वजों से तो संपर्क स्थापित नहीं कर पाया पर इतना जरूर समझ गया कि परिवार पर कोई आत्मा सवार रहती है जिससे कुछ समय बाद कोई ना कोई दिमागी मरीज बन जाता है। समीर अपने घर के ज्योतिष के पास गया और उसने उसे दस रति का गोमेद पहनने की सलाह दी जिससे आत्मा शरीर से उतर जाएगी और दिमाग ठंडा रहेगा। इसमें खर्चा था जो आदित्य की मां इंतजाम नहीं कर पाई और आदित्य की दिमागी स्थिति वैसी ही चलती रही। डॉक्टर से जरूरी परामर्श आदित्य लेता रहता था जिससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा और आदित्य अपने पिता का व्यवसाय ठीक से संभाल नहीं पाया इसलिए इसकी जिम्मेदारी आदित्य के छोटे भाई को सौंपी गई।

धीरे धीरे आदित्य को हर तरफ साजिश ही दिखने लगी और ऐसे मैं ही उसकी मां उसे रामपुर मैं एक तांत्रिक के पास ले गई जिसने बता दिया कि आत्मा सवार है और उसने आत्मा कुछ समय के लिए उतार दी। घर पर आकर आदित्य पर आत्मा फिर से सवार हो गई। मां से जो बन पड़ता था सब किया जैसे पूजा पाठ हवन वगैरह पर कुछ फर्क नहीं पड़ा। एक दिन आदित्य को लगा कि घर से दूर चला जाता हूं शायद आत्मा से पीछा छूट जाए और वो पुणे आ गया। मां भी साथ आना चाहती थी पर आदित्य ने मना कर दिया। पुणे आकर आदित्य को कंप्यूटर के क्षेत्र मैं नौकरी लग गई और कुछ साल अच्छे बीते जिससे आदित्य की आर्थिक तंगी भी दूर हो गई। इतना आदित्य को समझ मैं नहीं आया कि पैसा है तो नग का इंतजाम कर लेता हूं और आत्मा इसलिए चुप बैठी है कि वो स्थानांतरित हो रही है। आदित्य ने एक और गलती की और वो की शहर से बाहर मकान बना लिया जिस इलाके मैं कोई नहीं जाता था। आदित्य ने जरूरी सलाह पर ध्यान नहीं दिया कि इस इलाके मैं भूतों का प्रकोप अधिक है और यहां पर आकर आत्मा की शक्ति और बढ़ जाएगी। आदित्य की स्थिति फिर अपने पुराने घर के जैसे हो गई।

आदित्य की मां उसकी मदद के लिए उसके पास आकर रहने लगी। धीरे धीरे आदित्य की नौकरी छूट गई और वो अकेलेपन का शिकार हो गया। डॉक्टर जो दवाई दे रहा था वो जीवन थोड़ा ही बचा पा रही थी। आदित्य ने आखिर एक रणनीति को जन्म दिया जिसमें जड़ी बूटियों से इलाज और अपने पूर्वजों से संपर्क स्थापित करना शामिल था। आदित्य ने अपने शरीर की चौबीस शक्तियों को जगाया और इलाज के साथ अपने ध्यान को इतना मजबूत कर लिया कि आदित्य के शरीर मैं एक तंत्र स्थापित हो गया। लगभग ग्यारह साल तक गलत विचारों को बदलकर सही विचार दिमाग तक पहुंचाना इसी कोशिश मैं आदित्य लगा रहा। एक दिन आदित्य ने ध्यान लगाकर अपने पूर्वजों से संपर्क स्थापित कर लिया। एक चमत्कार हुआ और आदित्य के शरीर मैं उनकी दवाई खुद ही पहुंच गई जिससे दो घंटे मैं आदित्य के शरीर से आत्मा उतर गई और उसकी दिमागी स्थिति ठीक हो गई। पूर्वजों ने आदित्य की आर्थिक स्थिति को बदलने का भी भरोसा दिलाया।

2025 मैं आदित्य ने शादी कर ली और अपने पिताजी का कपड़े का व्यवसाय फिर संभाल लिया और एक भाई प्रबंधन संभालता था और एक भाई कपड़े की बिक्री संभालता था। मां ने भी चैन की सांस ली की 24 साल बाद बेटे की ग्रह दशा ठीक हुई।

इतना हो जाने के बाद भी आदित्य ने ज्योतिष की सलाह पर ध्यान नहीं दिया जो आत्मा की समस्या का बड़ा आसान सा हल है और आपको कुछ दिनों में ही आराम मिल सकता है नहीं तो करोड़ों लोग आजकल दिमागी मरीज बनकर घूम रहे हैं और उनके प्रबंधन को लेकर सरकारी तंत्र पर दबाव पड़ रहा है। इसे किस्मत की मजबूरी समझ ले या भाग्य की कमजोरी पर जिंदगी ऐसे मोड लेती रहती है और आपको ये सबक देती है कि मेरे बिना तुम कुछ नहीं हो।

01/09/2025

कहानी : आत्मा की खोज द्वितीय
समय : 1947 भारत
कथा : काल्पनिक

समीर कुछ अपनी दुकान पर बैठा सोच रहा था क्या दादाजी अगर जीवित होते तो हमारी ऐसी हालत होती। मां ने बताया उनके पास काफी पैसा था फिर मुझे अपने पास स्पेन क्यों नहीं बुलाया। इतने मैं दुकान पर एक ग्राहक आया और समीर उसके लिए सामान जुटाने मैं लग गया। धीरे धीरे शाम हो गई और समीर को घर जाने की इच्छा सताने लगी। ये फर्क था समीर की सपनो की दुनिया मैं और हकीकत मैं। वो अपने काम को मामूली ही समझता था और बस सपने देखता रहता था कब उसे ज्यादा पैसा मिल जाए जिससे वो कपड़ों का व्यापार शुरू कर सके।

समीर को ये कभी नहीं लगा कि जो उसकी मां ने उसे दादाजी के बारे मैं बताया क्या वो सही है। मां को भी तो पीछे से किसी और ने बताया होगा। ये बात तो सही थी कि समीर के पिता एक अच्छे खासे व्यापारी थे और कुछ डकैतियों से 1947 के आते आते मध्यम वर्गीय हो गए थे। समय बीतता गया और समीर को लगने लगा कि दादाजी के बारे मैं विचार उसके दिमाग पर हावी होने लगे हैं। मां तो अब बूढ़ी हो चली हैं क्यों ना इस बारे में अपनी बहन को बताया जाए। समीर ने ये ही ठीक समझा। बहन ने काफी देर समीर के खयालात समझे और आखिर मैं ये ही निष्कर्ष निकाला कि डॉक्टर से मिलना जरूरी है।

डॉक्टर ने समीर की जांच की और समीर को समझाया कि अगर दादाजी स्पेन मैं बड़े करोड़पति होते तो क्या पिताजी या और किसी परिवार के सदस्य से संपर्क स्थापित नहीं करते। इस सपने को भूल जाओ और ये दवाई तीन महीने तक खाओ। समीर को विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस बात को पूरा परिवार एक भगवान की तरह पूजता था वो सिर्फ एक कहानी है। समीर को फिर अपनी दुकान का ख्याल आया जो उसे उबासी देती थी। बहन ने काफी समझाया कि तुम अपनी दुकान पर ध्यान दो शायद इसी व्यापार से तुम इतनी पूंजी जुटा सको कि अपना कपड़े का व्यापार शुरू कर सको। समीर ने बाकी सब परिवार के सदस्यों से बात की और सबका ये ही मत था कि संपर्क कभी स्थापित नहीं हुआ।
करीब दो महीने बाद समीर के बैंक खाते मैं दस लाख रुपए जमा हुआ। समीर ने आश्चर्यचकित होते हुए समझने की कोशिश की ये दस लाख कहां से आ गए। फिर तो समीर को सपने और हकीकत बनते हुए दिखने लगे। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। कुछ समय बाद सरकार ने दुकान पर छापा मारा और छानबीन मैं समीर को दोषी पाया। समीर को कुछ पैसे का हिस्सा सरकार को राजस्व मैं देना पड़ा। मां को लगा कहीं पैसा शापित तो नहीं समीर की झाड़ फूंक करवा देती हूं नहीं तो बीमार ही पड़ जाएगा।

अब समीर मैं काफी जोश था और विचार दिमाग पर हावी नहीं हो पा रहे थे। एक दोस्त को साथ लेकर समीर ने कपड़ों का व्यापार शुरू किया और व्यापार अच्छा चलने लगा। डॉक्टर ने भी इलाज बंद कर दिया और समीर को सलाह दी कि नींद का ध्यान रखो। पैसा हमारे जीवन मैं कितना महत्व रखता है ये समीर के जीवन से साबित हो जाता है।

एक बार फिर आत्मा को उस तत्व के बारे मैं समीर के दिमाग से कुछ पता नहीं चला और उसने निर्णय लिया कि अब समीर के परिवार को छोड़ देती हूं। ये थी इस आत्मा की खोज 1836 से लेकर 1951 तक जिसमें एक मध्यम वर्गीय परिवार अमीर बनता है वापिस मध्यम
वर्गीय बनता है और फिर अमीर बन जाता है।

02/02/2025

कहानी: आत्मा की खोज
समय : 1836 भारत
कथा : काल्पनिक

1836 का समय और मुगल साम्राज्य अपनी चमक खो चुका था। अंग्रेजी साम्राज्य ने लगभग सारे भारत पर कब्ज़ा कर लिया था। कहते हैं दक्षिण भारत सोने की चिड़िया था और उसके गर्भ में सोना और हीरे जवाहरात भरे पड़े थे जिन्हे मुगलों ने भी बाहर निकाला और अंग्रेज़ों ने भी बाहर निकाला था। ये सम्राज्य खज़ाने को अपने देश में भेज रहे थे। 1836 में ऐसा हुआ कि इंग्लैंड का समुद्री मार्ग बंद हो गया। अंग्रेजो को भारत में ही खज़ाने को छुपाकर रखने की जरुरत महसूस हुई । दक्षिण भारत में कोयंबटूर स्थान खजाने को रखने के लिये चुना गया।

खज़ाने को रख कर कैप्टन माइकल बेस अपनी टुकडी के साथ जंगल के रास्ते से वापस अपनी छावनी लौट रहा था। अचानक से बागियों की फौज ने हमला कर दिया। बाकी टुकडी भाग गयी और कैप्टन घायल होकर गिर गया । कुछ देर बाद उधर से एक राहगीर निकला जिसने कैप्टन को घायल अवस्था मै देखा। उसने अपनी जेब से एक शिशी निकाली और कप्तान को पिला दी। कप्तान को कुछ समय के लिए होश आ गया। कप्तान ने खजाने का नक्शा राहगीर को बताया और बोला की नक्षे को छावनी मैं दे दो तो तुम्हें इनाम मिलेगा। ऐसा कहकर कप्तान चल बसा। राहगीर को पता नहीं चला कि कप्तान की आत्मा उस पर सवार हो गई थी।

अंग्रेजों ने जांच की और राहगीर रूपचंद को पकड़ लिया। जांच के दौरान आत्मा ने कोई भी ख़ज़ाने की जानकारी बाहर नहीं आने दी। रूपचंद को कप्तान के खून के जुर्म में दस साल के लिए जेल भेज दिया गया। रूपचंद जेल से बाहर आया तो एक दिमागी मरीज था। रूपचंद ने अंग्रेजो से बदले की सोच बना ली और दस साल इंतजार कर अपने लड़को के साथ मिलकर खजाना निकाल लिया। खजाना हजारों करोड़ की कीमत का था। अंग्रेजो को पता चला तो उन्हें रूपचंद के परिवार को गाजर मुली की तरह काट दिया। रूपचंद को भारत से बाहर भागकर अपनी जान बचानी पड़ी। बस उस समय से लेकर आज तक अंग्रेज रूपचंद के खानदान में दिमागी बीमारी कर ख़ज़ाने का पता लगाने की कोशिश कर रहा है। रूपचंद और उसके लड़के पैसे की ताकत से अंग्रेजो का सामना कर रहे हैं और अपने परिवार को दिमागी बीमारी से बचाने की कोशिश कर रहे हैं। अंग्रेजो को आज भी ये लगता है कि खज़ाना उन्हें मिल जायेगा ।

आत्मा की खोज ख़त्म नहीं हुई शायद वो खज़ाने के तत्त्वो से कुछ जानने की कोशिश कर रही थी जो जानकारी आत्मा को नहीं मिली।

14/01/2025

सबक

वर्क्ष लता से भरे हुए
झूमते हुए मस्ती मैं
एक हवा का झोंका आया
पूछने लगा यहां कौन रहता है

एक लेखक है पर सीखता नही
विचार हैं तो कर्म हैं
कर्म हैं तो जिन्दगी कायम है
गिरकर उठने की चाहत शुरुवात है

वर्क्ष की एक लता पूछने लगी
किसका इन्तजार कर रहा है
भविश्य के गर्भ मैं सोना है
रोज लिखेगा तो चलेगा किस्मत की छाती पर

बीता समय एक खाली एहसास था, लिखने की उंम्र नही

19/10/2024

भविश्य

एक मंजर दिखने लगा
क्या दुख कम हुआ
एक करहाट ने दम तोड दिया
जिन्दगी ने हुंकार भर ली

देख खबर आयी है
सितारो की रोशनी से कोई आया है
कौन है जिसने पुकार सुनी
चुप है कोई दस्तक नही

भविश्य जिसे देखा नही
एक पर्दा है आंखो का
चल रहा है लय की तरह
क्यों भाई कैसे हो

कोई जबाब नही आया शायद सो रहा है

28/09/2024

जिंदा

सुबह की ओस मन पर
एक तपिश छन कर आती हुई
पूछ रही है अपने आप से
क्या है अन्तर्मन का विचार

कला ने एक एक दिन पार किया
अब आ गया उस मुकाम पर
जब सन्तोष है मन मैं
अब मन थमेगा उस रेत की तरह

जो उडना भूल गयी
फिर भी उष्मा जीवन है
मिट्टी ने जीना सीख लिया
समेट लिया अपने अस्तित्व को

रोशनी की किरण है जो छू गयी आत्मा को

10/09/2024

आसमान

समय की चुनौती पार हुई
एक आभा है चेतन मन मैं
संतुलन बन जाये तो मिलूं किस्मत से
एक विराम पर अटकी है

वास्तविकता को समझना होगा
हाकिम कहता है लिखना छोड
भाई लेखक हूं लिखता रहूंगा
एक घोर अन्ध्कार गुफा थी

निकल आया सुर्य की रोशनी मैं
शायद वक़्त की सीमा थी
संभल कर चलता रहा पैदल
अब रास्ता गुमसुम है

धीरे धीरे विश्वास होगा, ये शान्ती का पहला पड़ाव है

29/08/2024

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10/08/2024

परिवार

कर्मो का महायुध है
अभेद ही सक्षम है
बुद्धि एक हो गयी
तर्क हिम्मत देता हुआ

आशीर्वाद है जीवन का
घर आकर रुक गया
एक चाबी जो खो गयी थी
अन्धकार ने वापिस कर दी

आखिर इस जीवन से क्या मिलेगा
शान्ती जीवन है
एक निरंतर कोशिश
जनता जुडती हुई कला से

क्या सिर्फ दो वक्त की आत्मा ही कमाई है

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