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26/06/2026

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⚔️✊ हुकूमत के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने की ताक़त हमारे बुज़ुर्गों ने हमें दी है! ✊⚔️🔥 "तुम्हारी हर नस्ल को उमर मुख़्तार मि...
25/06/2026

⚔️✊ हुकूमत के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने की ताक़त हमारे बुज़ुर्गों ने हमें दी है! ✊⚔️

🔥 "तुम्हारी हर नस्ल को उमर मुख़्तार मिलते रहेंगे!" 🔥
⚖️ मुक़दमे के दौरान जज, उमर मुख़्तार से पूछता है:
👨‍⚖️ जज: क्या तुम मानते हो कि तुमने बगावत की है?
🧔 उमर मुख़्तार: हाँ।
👨‍⚖️ जज: क्या तुम जानते हो इसकी सज़ा क्या होगी?
🧔 उमर मुख़्तार: हाँ।
👨‍⚖️ जज: तो फिर अफ़सोस के साथ तुम्हारा अंजाम मौत है।
🧔 उमर मुख़्तार: मुझे कोई अफ़सोस नहीं, यही मेरी ज़िंदगी का बेहतरीन अंजाम होगा। ☝️✨

⚖️ जज इंतहाई मसलहत, मौत का ख़ौफ़ और लालच देकर उमर मुख़्तार से कहता है कि अगर तुम अपनी क्रांति को रोक दो और क्रांतिकारियों से कहो कि वे आज़ादी की जंग छोड़ दें, तो तुम्हें छोड़ दिया जाएगा।

🧔 उमर मुख़्तार जज को एक लम्हे के लिए देखते हैं 👀, और फिर अपना तारीखी क़ौल कहते हैं:

🗣️ "हम या तो शानदार फ़तह हासिल करेंगे 🏆, या फिर वतन के लिए अल्लाह की राह में शहीद होंगे 🕊️।

💚 और यही हमारी ज़िंदगी का असल मक़सद है।
⚔️ तुम लोग नस्ल दर नस्ल हमें ख़त्म करने की कोशिश करते रहो...

🔥 तुम्हारी हर नस्ल को मुख़्तार मिलते रहेंगे। 🔥
🌹🤲🏻💚🕊️⚔️📜✨





मदीना मुनव्वरा के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में गिने जाने वाला बिर-ए-अरीस (बिर एरीस), जिसे बिर-ए-ख़ातम भी कहा जाता है, ...
25/06/2026

मदीना मुनव्वरा के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में गिने जाने वाला बिर-ए-अरीस (बिर एरीस), जिसे बिर-ए-ख़ातम भी कहा जाता है, इस्लामी इतिहास में विशेष महत्व रखता है।

धार्मिक रिवायतों के अनुसार इस कुएँ का उल्लेख सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत के माध्यम से मिलता है। रिवायत के मुताबिक एक अवसर पर रसूलुल्लाह ﷺ इस कुएँ की मेड़ पर तशरीफ़ फरमा थे, तभी हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु वहाँ उपस्थित हुए। उस अवसर पर उन्हें जन्नत की खुशखबरी दी गई।

ऐतिहासिक रिवायतों में यह भी वर्णित है कि नबी-ए-करीम ﷺ की मुहर वाली अंगूठी आपके विसाल के बाद ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन रज़ियल्लाहु अन्हुम के पास सुरक्षित रही। बाद में हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु के दौर-ए-खिलाफ़त के छठे वर्ष में यह अंगूठी बिर-ए-अरीस में गिर गई। इसके बाद उसे खोजने के लिए बहुत प्रयास किए गए, लेकिन वह प्राप्त नहीं हो सकी।

ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार यह कुआँ चौदहवीं हिजरी सदी तक अपनी मूल जगह पर मौजूद रहा। यह स्थान मस्जिद-ए-क़ुबा के पश्चिम में वर्तमान मुख्य मार्ग के निकट स्थित था। हालांकि बाद में हुए निर्माण कार्यों और शहरी विकास के कारण इसकी मूल संरचना और स्वरूप सुरक्षित नहीं रह सका।

बिर-ए-अरीस उन महत्वपूर्ण इस्लामी ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है जो अहद-ए-नबवी ﷺ और ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन रज़ियल्लाहु अन्हुम से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की याद दिलाते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer):
यह विवरण ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्रोतों तथा प्राचीन इस्लामी संदर्भों में वर्णित रिवायतों पर आधारित है। कुछ ऐतिहासिक विवरण विभिन्न विद्वानों और इतिहासकारों की व्याख्याओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। यह सामग्री केवल जानकारी और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए प्रस्तुत की गई है।





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📜🇮🇳 लोग जब अपने देश में अंग्रेज़ो से नही लड़ पा रहे थे,तब इन्होंने देश से बाहर एक निर्वासित भारतीय सरकार बना दी ।।यह कोई म...
24/06/2026

📜🇮🇳 लोग जब अपने देश में अंग्रेज़ो से नही लड़ पा रहे थे,तब इन्होंने देश से बाहर एक निर्वासित भारतीय सरकार बना दी ।।यह कोई मामूली बात है कि जब आपके ख्याल में आज़ादी के बाद का इतना बड़ा सपना हो ।

यही वजह है कि उन्हें अखण्ड भारत का पहला प्रधानमंत्री कहा जाता है । अखण्ड भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं मौलाना बरकतउल्ला भोपाली और पहले राष्ट्रपति हैं राजा महेंद्र प्रताप सिंह ।

🇮🇳✊ राजा महेन्द्र प्रताप,मौलाना बरकतउल्ला और उबैदुल्लाह सिंधी समेत बहुत से देशप्रेमियों ने मिलकर 1915 में काबुल में भारत की पहली निर्वासित सरकार (Provisional Government of Free India) बनाई। राजा महेन्द्र प्रताप इसके राष्ट्रपति, बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री और मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी गृहमंत्री बने।

⚔️ उनकी योजना थी कि युद्धबंदी भारतीय सैनिकों को संगठित कर ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी जाए। बाद में इसी मॉडल को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अधिक व्यापक रूप से अपनाया । आज़ाद हिन्द सरकार और आज़ाद हिन्द फ़ौज के रूप में।

🌍 युद्ध की बदलती परिस्थितियों और अफ़ग़ानिस्तान-ब्रिटेन समझौते के कारण उनकी योजनाएँ सफल नहीं हो सकीं, लेकिन बरकतुल्लाह ने हार नहीं मानी। वे रूस, यूरोप, मध्य एशिया और अमेरिका में भारत की आज़ादी के लिए अभियान चलाते रहे।

🕯️ 27 सितंबर 1927 को सैन फ़्रांसिस्को में ग़दर पार्टी के लिए काम करते हुए उनका निधन हुआ। वे अपनी मातृभूमि की आज़ादी देखने की तमन्ना दिल में लिए दुनिया से विदा हुए। उनका सम्मान देश का हर देशप्रेमी करता था । आज़ादी के समय मौजूद रही हर लीडरशिप ने इनका बेहद सम्मान किया । पंडित जी और सुभाष बाबू भी इनका बहुत सम्मान करते थे ।

🏛️ हुआ यह कि मौलाना बरकतुल्लाह के जाने के बाद मुल्क आज़ाद हुआ । भोपाल विश्विद्यालय का नाम उनके सम्मान में बरकतुल्लाह विश्विद्यालय कर दिया गया ।।यह तब किया गया जब उनके संघर्ष को सम्मान दिया गया ।

⚠️ फिर आई बीजे पार्टी की हुक़ूमत और उसने इस विश्वविद्यालय का नाम बरकतुल्लाह से बदलने का फरमान जारी कर दिया । कुछ बीजे पार्टी के समर्थक कहते हैं कि हम उनके खिलाफ क्यों हैं । ज़रा उनके साथ रहने की एक नही,चौथाई वजह ही बता दीजिए । जिस दल की सोच में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और उसके नायकों के लिए कोई स्थान ही नही है । उसका साथ हम भला एक पल भी क्यों ही देंगे ।

🔥 अखण्ड भारत के प्रथम प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह का नाम विश्विद्यालय से हटाने से वह मिट थोड़े ही जाएंगे । वह तो अमर हैं मगर तुम लोग ज़रूर इतिहास में सम्मान से कोसो मीलों दूर रहोगे । इतिहास का एक नियम है, कुंठित व्यक्ति का,कुंठित सोच का उसमें कोई सम्मानजनक स्थान नही है ।

🇮🇳🌹 मौलाना बरकतुल्लाह भारत का गर्व थे और रहेंगे...





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