22/03/2026
रुपया जब ₹93–94 के बीच पहुंचता है, तो यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं रहता।
यह देश की आर्थिक दिशा का संकेत बन जाता है।
हर बार कारण बताया जाता है—वैश्विक दबाव।
लेकिन सवाल यह है कि घरेलू मजबूती कहाँ है?
क्या हम अब भी आयात पर ज़्यादा निर्भर हैं?
क्या उत्पादन उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा जितना चाहिए?
क्या नीतियाँ ज़मीनी स्तर पर असर दिखा रही हैं?
इस गिरावट का असर सीधे आम आदमी पर पड़ता है।
पेट्रोल-डीज़ल महंगे होते हैं।
महंगाई धीरे-धीरे हर चीज़ में घुल जाती है।
हाँ, export sector को कुछ फायदा मिलता है।
लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।
अब वक्त है सवाल पूछने का, बहाने सुनने का नहीं।
क्योंकि मुद्रा का गिरना सिर्फ बाजार नहीं बताता,
यह नीतियों की सच्चाई भी सामने लाता है।
“रुपया गिर रहा है, अब सोच भी बदलनी होगी।