10/07/2026
📢 विकास की रफ़्तार...
कहते हैं, देश बहुत आगे बढ़ गया है,
पर आम आदमी आज भी अपने रोज़मर्रा के संघर्षों से जूझ रहा है।
वादे हर चुनाव में नए होते हैं,
लेकिन सवाल वही पुराने रह जाते हैं।
महँगाई बढ़ती है, उम्मीदें भी बढ़ती हैं,
और जनता हर बार एक नई सुबह का इंतज़ार करती है।
कुछ पंक्तियाँ—
"भाषणों में खुशहाली बरसती,
धरती पर प्यासा खेत खड़ा।
अख़बार बोले—सब अच्छा है,
आईना बोला—ज़रा इधर आ।"
व्यंग्य किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि व्यवस्था और हमारी सामूहिक सोच पर एक आईना है।
अगर ये पंक्तियाँ आपको सोचने पर मजबूर करें, तो अपनी राय ज़रूर साझा करें।
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