Pratik sadhu

Pratik  sadhu world record holder

01/07/2020

We Thank Mr. O P Singh (President , Cadila Pharmaceutical) For His amazing contribution during the time of pandemic!

KULJYOTI FOUNDATION is making a step towards acknowledging and felicitating Corona Warriors for their Courageous and Dedicated work for society in the time of pandemic! We appreciate the efforts of people coming forward to help others and we would like to give their work recognition!

“There is only one happiness in this life, to love and be loved.”– George Sand
27/06/2020

“There is only one happiness in this life, to love and be loved.”– George Sand

17/05/2020

Jasu khan live
18 May - 6 pm

20/06/2019

संगीत शास्त्र परिचय

भारतीय संगीत
भारतीय संगीत से, सम्पूर्ण भारतवर्ष की गायन वादन कला का बोध होता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की 2 प्रणालियाँ हैं। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति अथवा कर्नाटक संगीत प्रणाली और दूसरी हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली, जो कि समुचे उत्तर भारतवर्ष मे प्रचलित है। दक्षिण भारतीय संगीत कलात्मक खूबियों से परिपूर्ण है। और उसमें जनता जनार्दन को आकर्षित करने की और समाज मे संगीत कला की मौलिक विधियों द्वारा कलात्मक संस्कार करने की क्षमता है।
हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली के गायन वादन में, जन साधारण को कला की ओर आकर्षित करते हुए, भावना तथा रस का ऐसा स्त्रोत बहता है कि श्रोतृवर्ग स्वरसागर में डूब जाता है और न केवल मनोरन्जन होता है अपितु आत्मानन्द की अनुभूति भी होती है; जो कि योगीजन अपनी आत्मसमाधि मे लाभ करते हैं।
नाद
आवाज अथवा ध्वनि विशेष को नाद कहते हैं। दो पदार्थों के परस्पर टकराने से नाद या आवाज उत्पन्न होती है। इसके दो भेद हैं - एक, जो नाद क्षणिक हो, लहर शून्य अथवा जड़ हो, तो वह आवाज संगीत के लिये अनुपयोगी तथा स्वर शून्य रहेगी। लेकिन दूसरे प्रकार की आवाज कुछ देर तक वायुमंडल पर अपना मधुर प्रभाव डालती है। वह सस्वर होने के कारण संगीत के लिये उपयोगी है।
नाद के दो प्रकार हैं, अनहद नाद और लौकिक नाद। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जिसने संगीत रूपी दैवी शक्ति को न सुना हो। नदियों की मधुर कलकल ध्वनि, झरनों की झरझर, पक्षियों का कूजन किसने नहीं सुना है। प्रकृति प्रदत्त जो नाद लहरी उत्पन्न होती है, वह अनहद नाद का स्वरूप है जो कि प्रकृति की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जो नाद स्वर लहरी, दो वस्तुओं के परस्पर घर्षण से अथवा टकराने से पैदा होती है उसे लौकिक नाद कहते हैं।
वातावरण पर अपने नाद को बिखेरने के लिये, बाह्य हवा पर कंठ के अँदर से उत्पन्न होने वाली वजनदार हवा जब परस्पर टकराती है, उसी समय कंठ स्थित 'स्वर तंतु' (Vocal Cords) नाद पैदा करते हैं। अत: मानव प्राणी द्वारा निर्मित आवाज लौकिक है।
स्वर
स्वर एक निश्चित ऊँचाई की आवाज़ का नाम है। यह कर्ण मधुर आनंददायी होता है। जिसमें स्थिरता होनी चाहिये, जिसे कुछ देर सुनने पर, मन में आनंद की लहर पैदा होनी चाहिये। यह अनुभूति की वस्तु है। भारतीय संगीत में एक स्वर की उँचाई से ठीक दुगुनी उँचाई के स्वर के बीच 22 संगीतोपयोगि नाद हैं जिन्हें "श्रुति" कहा गया है। इन्हीं दोनो उँचाईयों के बीच निश्चित श्रुतियों पर सात शुद्ध स्वर विद्यमान हैं जिन्हें सा, रे, ग, म, प, ध और नि, से जाना जाता है और जिनके नाम क्रमश: षडज, ऋषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद हैं। इसे सप्तक के नाम से जाना जाता है।
प्रायः गायक अथवा गायिका के आवाज कि रेंज तीन सप्तक तक सीमित होती है। जिसमें गायक के प्राकृतिक सप्तक को मध्य सप्तक कहते है। मध्य सप्तक से कम फ्रिक्वेंसी वाले सप्तक को मंद्र सप्तक एवम उँची फ्रिक्वेंसी वाले सप्तक को तार सप्तक कहते है।
उपरोक्त सात शुद्ध स्वरों में 'सा' और 'प' अचल स्वर हैं पर बाकी 5 स्वर अपनी जगह से हटते हैं, जिनमें रे, ग, ध, नि ये चार स्वर नीचे की तरफ हटते हैं और उन्हे कोमल स्वर कहते हैं। इसी तरह मध्यम ऊपर की तरफ हटता है और उसे तीव्र स्वर कहते हैं। इस तरह एक सप्तक में कोमल, शुद्ध और तीव्र स्वर मिलाकर कुल 12 स्वर होते हैं। 12 स्वरों के नाम इस प्रकार हैं - सा, रे कोमल, रे शुद्ध, ग कोमल, ग शुद्ध, म शुद्ध, म तीव्र, पंचम, ध कोमल, ध शुद्ध, नि कोमल और नि शुद्ध।
वर्ण
वर्ण का अर्थ है मोड। संगीत मे 4 प्रकार के वर्ण होते हैं:

आरोही वर्ण - केवल आरोह मात्र। तात्पर्य यह कि नीची आवाज़ को ऊँचाई की ओर ले जाना। फिर चाहे वह एक स्वर तक ही ऊँची क्यों न हो, आरोही वर्ण है।

अवरोही वर्ण - केवल अवरोह मात्र। ऊँची से नीची आवाज़ ले आना।

स्थाई वर्ण - एक ही जगह पर रुकते हुए कुछ देर तक कायम रहना। जैसे - ममम धध गग रेरे पप आदि।

संचारी वर्ण - ऊपर लिखे हुए तीनो वर्णों का मिला-जुला रूप। जहाँ से मन चाहा वहाँ को आवाज़ कि दिशा बदल दी या एक ही स्थान पर रुक गये।

आरोह-अवरोह
आरोह : (सा से सा') अर्थात मध्य सप्तक के सा से तार सप्तक के सा तक चढाने की क्रिया का नाम है आरोह।
अवरोह : सा' से सा अर्थात तार सप्तक से मध्य सप्तक के सा तक उतरने का नाम है अवरोह।
राग
स्वरों की ऐसी मधुर तथा आकर्षक ध्वनि जो सुनिश्चित् आरोह-अवरोह, जाति, समय, वर्ण, वादी-संवादी, मुख्य-अंग आदि नियमों से बद्घ हो और जो वायुमंडल पर अपना प्रभाव अंकित करने मे समर्थ हो। वातावरण पर प्रभाव डालने के लिये राग मे गायन, वादन के अविभाज्य 8 अंगों का प्रयोग होना चाहिये।
ये 8 अंग या अष्टांग इस प्रकार हैं: स्वर, गीत, ताल और लय, आलाप, तान, मींड, गमक एवं बोलआलाप और बोलतान। उपर्युक्त 8 अंगों के समुचित प्रयोग के द्वारा ही राग को सजाया जाता है।
जाति
राग स्वरूप अपने विशेष प्रकार के आरोह-अवरोह के क्रम में रहता है। जिस राग में सातों स्वर सा रे ग म प ध नि हों उसे सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति कहते हैं। इसी प्रकार 6 स्वरों के क्रम को षाढव। 5 स्वरों के क्रम को औढव और 4 स्वरों को सुरतर कहते हैं। ध्यान में रखें कि आरोह में जितने स्वर लगेंगे उससे कहीं अधिक या कम से कम आरोह के बराबर स्वर अवरोह में आने चाहिये। आरोह की अपेक्षा अवरोह में कम स्वर भारतीय संगीत में नहीं लिये जाते कारण वह नितान्त अस्वाभाविक बात है। इस प्रकार जातियों के कुल 10 प्रकार बनते हैं -

सम्पूर्ण - सम्पूर्ण

षाढव - सम्पूर्ण

षाढव - षाढव

औढव - सम्पूर्ण

औढव - षाढव

औढव - औढव

सुरतर - सम्पूर्ण

सुरतर - षाढव

सुरतर - औढव

सुरतर - सुरतर

थाट
संस्कृत में थाट का अर्थ है मेल। थाट, यह रागों के वर्गीकरण हेतु तैयार की हुई पद्धति है। पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने १० थाट प्रचिलित किये जिनको कोमल, शुद्ध और तीव्र स्वरों के आधार पर बनाया गया जो निम्न हैं - (१) कल्याण (२) बिलावल (३) खमाज (४) भैरव (५) पूर्वी (६) मारवा (७) काफी (८) आसावरी (९) भैरवी (१०) तोड़ी। उपरोक्त राग पद्धति प्रचलन में होते हुए भी आज बहुत से ऐसे राग हैं जो इन थाटों के खांचों में नहीं बैठते। अतः कुछ विद्वान इन्हें नकारते हुए रागांग पद्धति अर्थात राग वाचक स्वर समूह तथा उसके आरोह अवरोह को ही मान्यता देते हैं।
वादी/संवादी
राग एक माहौल या वातावरण विशेष का नाम है जो रंजक भी है। स्पष्ट रूप से इस वातावरण निर्मिती के केंद्र में वह स्वरावली है जो रागवाचक है इसे रागांग कहते हैं। इस रागांग का केंद्र बिंदु होता है वादी स्वर। इसे राग का जीव या प्राण स्वर भी कहा गया है। राग को राज्य की संज्ञा देकर वादी स्वर को उसका राजा कहा जाता है। स्पष्टतः वादी का प्रयोग अन्य स्वरों की अपेक्षा सर्वाधिक होता है तथा इस पर ठहराव भी अधिक होता है।
यह सर्वविदित है की एक सप्तक में दो भाव पैदा होते हैं - षड्ज-पंचम (सा-प) व षड्ज-मध्यम (सा-म) भाव। इस परिपेक्ष्य में यदि वादी स्वर पूर्वांग में है तो उसका, उस स्वर से संवाद करने वाला, उक्त दोनों भावों में से किसी एक भाव में (किसी निश्चित राग के अनुसार), उत्तरांग में एक स्वर जरूर होगा जो सप्तक के दोनों अंगों (पूर्वांग या उत्तरांग) को संतुलित कर राग की रंजकता में वृद्धि करने में सहायक होगा। इस स्वर को संवादी स्वर कहते हैं। वादी और संवादी स्वर पूर्वांग और उत्तरांग की तुलना पर समान वज़न के होने चाहिए तभी राग स्वरुप शुद्ध शास्त्रीय और रस स्रोत बहाने में समर्थ होगा।
घराना
भारतीय संगीत में संगीत शिक्षा एक कंठ से दूसरे कंठ में ज्यों की त्यों उतारी जाती है। जिसे नायकी ढंग की शिक्षा कहते हैं। और जब एक ही गुरू के अनेक शिष्य हो जाते हैं तो उन्हें घराना या परम्परा कहा जाता है। किराना घराना, ग्वालियर घराना, आगरा घराना, जयपुर घराना इत्यादि घराने भारतीय संगीत में प्रसिद्ध हैं।
आविर्भाव-तिरोभाव
आविर्भाव व तिरोभाव भारतीय संगीत में अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। किसी भी राग के स्वरों को ऐसे क्रम में लगाना, जिससे किसी दूसरे राग की छाया दृष्टिगोचर होने लगे उसे तिरोभाव कहते हैं। परन्तु राग के मार्मिक स्वर पुन: लगाकर राग का आविर्भाव किया जाता है जिससे रागरूप स्पष्ट अपने रूप में आ जाए, आविर्भाव कहलाता है।
आविर्भाव-तिरोभाव बहुत कलापूर्ण है और अनुभवी, राग विज्ञान के दक्ष लोगों द्वारा ही संभव है अन्यथा इसमें राग स्वरूप नष्ट होने की अधिक संभावना रहती है।
मनाक् तथा इषत् स्पर्श
मींड जहाँ से प्रारम्भ होती है उस स्वर का आभास जो कानों के द्वारा सूक्ष्मतर ढंग से सुना जाता है, उस प्रारंभिक आभास वाले स्वर को इषत् स्पर्श कहते हैं।
जिस प्रकार मन में कहीं से भी विचार आते हैं तदनुसार मींड आती हुई दिखाई दे, लेकिन कहाँ से आ रही है वह सिर्फ मन द्वारा ही जान सकते हैं उसे मनाक् स्पर्श कहते हैं।
लाग-डाट
मींड के आरोह को लाग और मींड के अवरोह को डाट कहते हैं। इशत् और मनाक् स्पर्श लाग-डाट के आगे की स्थितियाँ हैं।
श्रुति
भारतीय शास्त्रीय संगीत श्रुतिव्यवस्था पर प्रतिष्ठित है और अनेक राग, जैसे राग बहार आदि, हमें आज के १२ स्वरों के प्रचलित वातावरण से श्रुतियों की ओर खींचते हैं। श्रुति का अर्थ है वह सूक्ष्म नाद लहरी जो कि श्रवणेन्द्रिय (कान) के द्वारा सुनी जा सके। और ऐसी 22 श्रुतियां, सा से सां (मध्य सप्तक के सा से तार सप्तक के सा तक) तक अवस्थित है।
पूर्वांग-उत्तरांग
मध्य सप्तक के आधे भाग यानि षडज, ॠषभ, गंधार व मध्यम स्वरों को पूर्वांग कहते हैं। तथा दूसरे भाग यानि पंचम, धैवत, निषाद व तार-षडज को उत्तरांग कहते हैं।
पुरुष राग
प्राचीन काल के संगीत विश्लेषण के अनुसार छह (6) पुरुष राग और छत्तीस (36) रागिनियाँ या उनकी भार्याएँ हैं। वे 6 राग हैं भैरव, मालकौंस, हिन्डोल, श्रीराग, दीपक और मेघ।
ताल
ताल एक निश्चित मात्राओं मे बंधा और उसमे उपयोग में आने वाले बोलों के निश्चित् वज़न को कहते हैं। मात्रा (beat) किसी भी ताल के न्यूनतम अवयव को कहते हैं। हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली में विभिन्न तालों का प्रयोग किया जाता है। जैसे, एकताल, त्रिताल (तीनताल), झपताल, केहरवा, दादरा, झूमरा, तिलवाड़ा, दीपचंदी, चांचर, चौताल, आडा-चौताल, रूपक, चंद्रक्रीड़ा, सवारी, पंजाबी, धुमाली, धमार इत्यादि।

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