Jatin Kumar Hindi Kahaniyan

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01/09/2023
26/08/2023

हर हर महादेव,
आज हम आपके लिए लाये है. भगवान शिव की सुंदर कहानिया। इन कहानियो में आपको भगवान शिव की महानता और अपने भक्तों के प्रति उनके प्रेम भाव के दर्शन होंगे। इन कहानियों में कुछ कहानिया काफी रोचक है, जैसे कि किस तरह एक बूड़ी औरत ने शिवजी को ठग लिया, और शिवजी और एक बालक की कहानी.? तो चलिए सुनते है भगवान शिव की कुछ कहानियाँ।

ये बात बहुत ही पुरानी है, एक गांव में जिसका नाम महिपालपुर था, वहा एक अंधी बुढ़िया रहती थी. वह शिवजी की बहुत बड़ी भक्त थी. आंखों से भले ही दिखाई नहीं देता था, परंतु वह सुबह-शाम शिवजी की बंदिगी में मग्न रहती. शिवजी बुढ़िया की भक्ति से बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने सोचा यह बुढ़िया नित्य हमारा स्मरण करती है, परंतु बदले में कभी कुछ नहीं मांगती.

भक्ति का फल तो उसे मिलना ही चाहिए. ऐसा सोचकर शिवजी एक दिन बुढ़िया के सम्मुख प्रकट हुए तथा बोले, माई, तुम हमारी सच्ची भक्त हो. जिस श्रद्धा व विश्वास से हमारा स्मरण करती हो, हम उससे प्रसन्न हैं. अत: तुम जो वरदान चाहो, हमसे मांग सकती हो. बुढ़िया बोली, प्रभो. मैं तो आपकी भक्ति प्रेम भाव से करती हूं.

मांगने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं. अत: मुझे कुछ नहीं चाहिए. शिवजी पुन: बोले, हम वरदान देने के लिए आए हैं. बुढ़िया बोली, मुझे मांगना तो नहीं आता. अगर आप कहें, तो मैं कल मांग लूंगी. तब तक मैं अपने बेटे व बहू से भी सलाह कर लूंगी. शिवजी कल आने का वादा करके वापस लौट गए. बुढ़िया का एक पुत्र व बहू थे. बुढ़िया ने सारी बात उन्हें बताकर सलाह मांगी.

बेटा बोला, मां, तुम शिवजी से ढेर सारा पैसा मांग लो. हमारी ग़रीबी दूर हो जाएगी. सब सुख चैन से रहेंगे. बुढ़िया की बहू बोली, नहीं आप एक सुंदर पोते का वरदान मांगें. वंश को आगे बढ़ाने वाला भी, तो चाहिए. बुढ़िया बेटे और बहू की बातें सुनकर असमंजस में पड़ गई. उसने सोचा, यह दोनों तो अपने,अपने मतलब की बातें कर रहे हैं.

बुढ़िया ने पड़ोसियों से सलाह लेने का मन बनाया. पड़ोसन भी नेक दिल थी. उसने बुढ़िया को समझाया कि तुम्हारी सारी ज़िंदगी दुखों में कटी है. अब जो थोड़ा जीवन बचा है, वह तो सुख से व्यतीत हो जाए. धन अथवा पोते का तुम क्या करोंगी. अगर तुम्हारी आंखें ही नहीं हैं, तो यह संसारिक वस्तुएं तुम्हारे लिए व्यर्थ हैं. अत: तुम अपने लिए दोनों आंखें मांग लो. बुढ़िया घर लौट आई फिर बुढ़िया और भी सोच में पड़ गई. उसने सोचा, कुछ ऐसा मांग लूं, जिससे मेरा, बहू व बेटे, सबका भला हो, लेकिन ऐसा क्या हो सकता है. बुढ़िया कभी कुछ मांगने का मन बनाती, तो कभी कुछ. परंतु कुछ भी निर्धारित न कर सकी. दूसरे दिन शिवजी पुन: प्रकट हुए तथा बोले, आप जो भी मांगेंगी, वह हमारी कृपा से हो जाएगा. यह हमारा वचन है.

शिवजी के पावन वचन सुनकर बुढ़िया बोली, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो कृप्या मुझे मन इच्छित वरदान दीजिए. मैं अपने पोते को सोने के गिलास में दूध पीते देखना चाहती हूं. बुढ़िया की बातें सुनकर शिवजी उसकी सादगी व सरलता पर मुस्कुरा दिए. बोले, तुमने तो मुझे ठग ही लिया है. मैंने तुम्हें एक वरदान मांगने के लिए बोला था, परंतु तुमने तो एक वरदान में ही सब कुछ मांग लिया. तुमने अपने लिए लंबी उम्र तथा दोनों आंखे मांग ली हैं.
बेटे के लिए धन व बहू के लिए पोता भी मांग लिया. पोता होगा, ढेर सारा पैसा होगा, तभी तो वह सोने के गिलास में दूध पीएगा. पोते को देखने के लिए तुम जिंदा रहोगी, तभी तो देख पाओगी. अब देखने के लिए दो आंखें भी देनी ही पड़ेंगी. फिर भी वह बोले, जो तुमने मांगा, वे सब सत्य होगा. यूं कहकर शिवजी अंर्तध्यान हो गए. कुछ समय पाकर शिवजी की कृपा से बुढ़िया के घर पोता हुआ. बेटे का कारोबार चल निकला तथा बुढ़िया की आंखों की रौशनी वापस लौट आई. बुढ़िया अपने परिवार सहित सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी. तो दोस्तों इस प्रकार से एक बुढ़िया ने शिवजी को आखिर मैं ठग ही लिया.

हमारी दूसरी कहानी है,
शिवजी और एक बालक की कहानी

शिव जी ने देखा की एक बालक मंदिर में उनकी पूजा कर रहा है, वह देख रहे थे की बालक अभी बहुत छोटा है और वह मेरा ध्यान लगा रहा है, उसे क्या परेशानी है, वह तो शिवजी जानते थे मगर उनका मन उस बालक से बात करने का हो रहा था। इसलिए शिवजी अपना वेश बदलकर उसके पास जाते है। वह बालक उनका ध्यान कर रहा था तभी शिवजी ने उसे आवाज लगाई थी, वह बालक देखता है की एक साधु जी पीछे खड़े है,

वह साधु जी कहते है की तुम मुझे बुला रहे हो। बालक कहता है की में तो शिवजी को बुला रहा था, मगर वह अभी तक नहीं आये है, यह सुनकर साधु जी कहते है की तुम्हे क्या परेशानी है। वह बालक कहता है की मेरी माता की तबियत बहुत खराब है वह ठीक नहीं हो रही है। में शिवजी से यही कह रहा था की उनकी तबियत को ठीक कर दो मगर, वह तो मेरे सामने नहीं आ रहे है। मेने तो सुना है की पूजा करने से सब कुछ हो सकता है वह मेरी माता को ठीक कर सकते है,

उस बालक की बाते सुनकर शिवजी प्रसन्न होते है, क्योकि उन्हें पता है की वह बालक सच कह रहा है। शिवजी कहते है की तुम्हे घर जाना चाहिए तुम्हारी माता ठीक हो गयी है यह सुनकर बालक खुश हो जाता है। वह कहता है कि क्या शिवजी ने मेरी माता को ठीक कर दिया है। जब वह घर जाता है तो माता ठीक हो गयी थी, यह देखकर वह खुश हो जाता है। वह अपनी माता से कहता है की, मै हर रोज मंदिर में जाकर पूजा करता था, इसलिए शिवजी ने मेरी बात मान ली है,

यह सुनकर माता कहती है की भगवान सभी बच्चो की बाते आराम से सुनते है उनकी मनोकामना पूरी करते है, इसलिए मेरी तबियत ठीक हो गयी हैं, वह लड़का कहता है की अब से में हर रोज शिवजी की पूजा करूँगा यह सुनकर माता खुश हो जाती है, शिव जी भी उनकी बाते सुनते है वह भी प्रसन्न हो जाते है, उसके बाद उस जगह से चले जाते है यह शिवजी की कहानी हमे यही बताती है की सच्चे मन से की गयी पूजा सफल हो जाती है।

21/08/2023

जय श्री कृष्णा दोस्तों। आज हम आपके लिए लाये है. भगवान कृष्णा की सुंदर कहानिया। इन कहानियो में आपको भगवान कृष्ण की महानता और अपने भक्तों के प्रति उनके प्रेम भाव के दर्शन होंगे। इन कृष्ण कहानियों में कुछ कहानिया काफी रोचक है, जैसे कि कृष्ण भगवान के पास हमेशा रहने वाली बांसुरी की अनोखी कहानी, और भगवान कृष्ण और कर्मा बाई की खिचड़ी की कहानी.? तो चलिए सुनते है भगवान श्री कृष्ण की सुंदर कहानियाँ।

कृष्णा की बांसुरी की कहानी।

द्वापर युग का समय चल रहा था. भगवान श्री कृष्ण के रूप में महाविष्णु अपने आआठवे अवतार में जन्म ले चुके थे. सभी देवता, भगवान, सुर, ऋषिमुनी भेस बदलकर एक-एक करके बाल कृष्ण से मिलने आ रहे थे.

वह देख भगवान शिव के मन में भी अपने प्रिय प्रभु से मिलने की इच्छा उत्पन्न हुई, पर वह यह सोच कर रुके हुए थे, कि बाल कृष्ण के लिए उपहार के रूप में क्या दिया जाये, जिसे वह हमेशा अपने पास रख सके.

तब शिवजी को याद आया की उनके पास महान ऋषि दधीचि की वज्र की अस्थियाँ रखी हुई है. ऋषि दधीचि वह ऋषि है जिन्होंने राक्षस एवं असुरों के संहार के लिए, अपनी आत्मा त्याग कर अपनी वज्र की हड्डिया देवताओं को दान दी थी। जिससे ऋषि विश्वकर्मा ने कुछ हतियार बनाये थे.

उस बची हुई एक हड्डी को तराशकर भगवान शिवजी ने एक अत्यंत सुंदर बांसुरी बनाई. फिर जब वह बालक भगवान कृष्ण से मिले तब उन्होंने वही बांसुरी उन्हें भेट करदी. वो सुंदर भेट कृष्ण भगवान को बहुत पसंद आयी.

शिवजी और कृष्ण भगवान के बीच स्नेह देखकर उस दिन देवताओं ने भगवान कृष्ण को बांसुरीवाला, इस नाम से गौरवान्वित किया. उसी बांसुरी को ही कृष्ण भगवान के अपने अवतार काल के अधिकतम समय हमेशा अपने साथ रखा. तो यह थी कृष्णा की बांसुरी की कहानी.

हमारी दूसरी कहानी है,
कर्माबाई की खिचड़ी की कहानी

यह कहानी है भगवान कृष्ण की प्रिय भक्त कर्माबाई की. कर्माबाई बचपन से ही अपने पिता जीवनराम को कृष्ण भगवान की पूजा करते हुए देखती थी. वह कभी भी कृष्ण भगवान को भोग लगाये बिना भोजन ग्रहण नहीं करते थे.

जब कर्माबाई 13 साल की थी, तब एक दिन जीवनराम को तीर्थ पुष्कर स्नान के लिए जाने की इच्छा हुई, साथ में उनकी पत्नी ने भी पुष्कर स्नान की इच्छा प्रकट की, जीवनराम अपनी बेटी को भी लेजाना चाहते थे, लेकिन दुविधा यह थी की अगर वह सब घर से बाहर गए तो, भगवान श्री कृष्ण को भोग कौन लगाएगा? . तब जीवनराम ने इस नित्यकर्म की जिम्मेदारी कर्माबाई को सौंपी और कहा की देखो बेटी कर्मा, सुबह भगवान कृष्ण को भोग लगाने के पश्चात ही तुम भोजन ग्रहण करना. कर्मा ने भी अपने पिता की हां में हामी भरदी. अगले दिन सुबह कर्माबाई ने उठकर सबसे पहले गुड और घी डालके बाजरे की खिचड़ी बनाई और भगवान कृष्ण की मूर्ति के सामने रख दिया और बोली भगवान मैने आपका भोग रख दिया है. आपको जब भूक लगे तब खालेना. तब तक मैं घर के काम पूरे कर लेती हूं. इतना कहकर कर्मा अपने घर कामो में जुट गई.

काम करते-करते बीच-बीच में आकर देखने पर जब कर्मा को ज्ञात हुआ की भगवान ने अभीतक खिचड़ी नहीं खाई है, तब उसे संदेह हुआ, की शायद खिचड़ी में घी और गुड कम है. इसलिए भगवान कृष्ण भोजन ग्रहण नहीं कर रहे है.

तभी कर्माबाई ने खिचड़ी में थोडा गुड और घी मिलाया और मूर्ति के सामने बैठ गई. वह बोली भगवान मेरे पिताजी जब खिलाते है, तब तो आप खा लेते हो, तो अब क्यों नहीं खा रहे? .

और अभी तो पिताजी बाहर गए है, उन्हें आने में बहुत दिन लगेगे तब तक आपको भोग लगाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई है. इसलिए जब तक आप भोजन नहीं खायेंगे, मैं भी कुछ नहीं खाउंगी.

इस तरह जिद पर अड़ी नन्ही कर्मा की प्यारी बातों से कृष्ण भगवान का सिंहासन डोल गया और फिर मूर्ति मेसे आवाज आयी बेटी कर्मा तुमने पर्दा तो किया ही नहीं, तो मैं भोजन कैसे ग्रहण करूं.

तब कर्माबाई ने मूर्ति के आगे अपनी चुनरी का पर्दा किया और कुछ ही समय में कृष्ण की मूर्ति के सामने रखी खिचड़ी की थाली खाली हो गई. अब कर्मा रोज सुबह सबसे पहले कृष्णा को बाजरे की खिचड़ी खिलाती और बादमे खुद भोजन ग्रहण करती.

कुछ दिनों बाद घर लौटने पर कर्मा के मां बाप भी कृष्ण की लीला देखकर दंग रह गए. इस तरह कर्माबाई ईश्वर कृष्ण की निस्सीम भक्त बन गई. अपने जीवन के अंतिम दिनों में कर्माबाई भगवान जगन्नाथ की नगरी जगन्नाथ पुरी में एक कुटिया में बस गई थी.

वहाँ पर एक दिन कर्माबाई की कुटिया के सामने एक तेजस्वी कांति वाला बालक आया और उसने कर्माबाई से कहा मुझे भूक लगी है मां खाना दो. उस वक्त भी कर्मा अपने भगवान कान्हा को खिचडी का भोग लगा रहीथी।

कर्मा ने उस बालक को भी खिचडी खिलायी. उसके बाद से वही बालक हर रोज कर्मा के हाथ की खिचडी खाने आता था. यह सिल सिला कई वर्षों तक चलता रहा. वह बालक कोई और नहीं स्वयं जगन्नाथ भगवान थे, क्योंकि जिस दिन कर्माबाई का दिहांत हुआ, उस दिन जगन्नाथ भगवान की मूर्ति की आंखों से आंसू बह रहे थे, और उसी रात मंदिर के पुजारी के स्वप्न में जगन्नाथ भगवान आये, और अपने दुखी होने का कारण बताया की, उनकी परम प्रिय भक्त कर्माबाई गोलोक सिधार गई है. मैं रोज सुबह उसके हाथ की खिचड़ी खाता था.

अब मुझे खिचड़ी कौन खिलायेगा. अगले दिन से मंदिर के पुजारियों ने निर्णय लिया, भगवान को रोज बाजरे के खिचडी का भोग लगेगा और उस भोग को नाम दिया गया.
कर्माबाई की खिचड़ी.

हमारी पोस्ट भगवान श्री कृष्ण की सुंदर कहानिया सुनने के लिए धन्यवाद दोस्तों, इस भक्ति पूर्ण पोस्ट को अपने प्रियजनों के साथ जरुर शेयर कर और इन कहानियों में से भगवान कृष्ण की कौनसी कहानी आपको सबसे ज्यादा पसंद आयी यह कमेंट करे. जय श्री कृष्ण।

21/08/2023

Welcome Guys you will find many interesting stories on this page.

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