04/08/2026
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नव सृजन – 292
मंगलवार, 4 अगस्त, 2026
विषय : सादगी, आर्जव, निश्छलता, सरलता एवं समानार्थी
समय : प्रातः 11 बजे से रात्रि 9 बजे तक
नोट : नव सृजन क्रमांक तथा अंत में अपना नाम अवश्य लिखें। गद्य अथवा पद्य में अधिकतम दो रचनाएँ अपेक्षित हैं। चयनित रचनाएँ स्पंदन – हृदय से हृदय तक में प्रकाशित होंगी।
••●●•●•●● ••• सुप्रभात ••• ●●•●•●●••
"सादा जीवन, उच्च विचार" भारतीय सनातन संस्कृति का एक शाश्वत आदर्श है। सादगी, सरलता, आर्जव, निष्छलता और विनम्रता ऐसे गुण हैं, जो किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को सहज, आकर्षक और अनुकरणीय बनाते हैं। भारतीय इतिहास, संस्कृति और संत-परंपरा के पृष्ठ ऐसे असंख्य उदाहरणों से आलोकित हैं, जो हमें सादगीपूर्ण जीवन का महत्व बताते हैं।
महात्मा गांधी की सादगी से भला कौन अपरिचित है? इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर लौटे गांधीजी प्रारंभिक जीवन में पाश्चात्य वेशभूषा धारण करते थे। दक्षिण अफ्रीका के प्रवास के दौरान भी उनका व्यक्तित्व उसी अनुरूप था। किंतु भारत लौटने के पश्चात, विशेषकर चंपारण तथा अन्य जनआंदोलनों के समय उन्होंने अनुभव किया कि यदि देश के निर्धन, श्रमिक और ग्रामीण जनों के दुःख-दर्द को वास्तव में समझना है, तो उनके जीवन के साथ स्वयं को जोड़ना होगा। इसी भावना से उन्होंने सादगीपूर्ण वेशभूषा—धोती और खादी—को अपनाया। उनके इस जीवन-दर्शन ने न केवल स्वदेशी आंदोलन को नई दिशा दी, बल्कि खादी को राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक बना दिया। लंदन में गोलमेज सम्मेलन के समय भी उनके सादे वस्त्रों ने अनेक लोगों को आश्चर्यचकित किया, किंतु शीघ्र ही वही सादगी विश्वभर में उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गई।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री सादगी और ईमानदारी की सजीव प्रतिमूर्ति थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने अपने जीवन में किसी प्रकार का आडंबर नहीं अपनाया। कहा जाता है कि वे अपने पुराने कोट को रफ़ू कर वर्षों तक पहनते रहे। देश में खाद्यान्न संकट के समय उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक समय उपवास रखने का आग्रह किया और स्वयं भी उसका कठोरता से पालन किया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा नेतृत्व उपदेश से नहीं, बल्कि अपने आचरण से प्रेरणा देता है।
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, जिन्हें भारत "मिसाइल मैन" के नाम से जानता है, सादगी के अद्भुत उदाहरण थे। तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक साधारण परिवार में जन्मे डॉ. कलाम ने बाल्यावस्था में समाचार-पत्र वितरित कर परिवार की सहायता की। आगे चलकर वे भारत के अग्रणी वैज्ञानिक बने, देश को सामरिक और वैज्ञानिक दृष्टि से सशक्त बनाया तथा भारत के राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। इतने उच्च पदों पर पहुँचने के बाद भी उनकी विनम्रता, सादगी और सहजता कभी परिवर्तित नहीं हुई। राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के पश्चात भी वे जीवन के अंतिम क्षण तक विद्यार्थियों के बीच ज्ञान का प्रकाश फैलाते रहे।
गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं भारत के पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर भी सादगीपूर्ण जीवन के लिए प्रसिद्ध थे। मुख्यमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर रहते हुए भी वे अनेक बार साधारण वाहन से यात्रा करते थे और सामान्य वेशभूषा में ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में पहुँचते थे। एक प्रसिद्ध प्रसंग है कि एक बार पाँच सितारा होटल में आयोजित कार्यक्रम में टैक्सी से पहुँचने पर उनके सादे वस्त्र देखकर द्वारपाल ने उन्हें भीतर प्रवेश नहीं करने दिया। जब उन्होंने स्वयं को गोवा का मुख्यमंत्री बताया तो द्वारपाल ने विश्वास नहीं किया। बाद में वास्तविकता ज्ञात होने पर सभी उनकी सादगी से अभिभूत रह गए।
विजयनगर साम्राज्य के समय के महान संत पुरंदरदास का जीवन भी लोभ और मोह से परे सादगी का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। एक कथा के अनुसार उनकी परीक्षा लेने के लिए राजा ने भिक्षा में दिए जाने वाले अनाज में बहुमूल्य हीरे भी मिला दिए। जब राजा ने उनके घर जाकर देखा, तो संत की पत्नी उन हीरों को कंकड़-पत्थर समझकर अलग फेंक रही थीं। राजा के आश्चर्य व्यक्त करने पर उन्होंने सहज भाव से कहा—"राजन्! आपके लिए ये बहुमूल्य रत्न होंगे, हमारे लिए तो ये केवल पत्थर के समान हैं।" इस उत्तर ने राजा को सच्चे वैराग्य और सादगी का अर्थ समझा दिया।
हिंदी साहित्य के अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद का जीवन भी अत्यंत सादा और संघर्षपूर्ण था। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से भारतीय समाज की वास्तविक समस्याओं को स्वर दिया। उनके व्यक्तित्व की सरलता उनके लेखन में भी स्पष्ट झलकती है।
विश्वप्रसिद्ध साहित्यकार एवं नोबेल पुरस्कार से सम्मानित जॉर्ज बर्नार्ड शॉ भी अत्यंत सादगीप्रिय थे। एक प्रसंग के अनुसार, जब उन्हें एक प्रतिष्ठित महिला ने भोज पर आमंत्रित किया, तो उनके साधारण वस्त्र देखकर उनसे बेहतर कपड़े पहनकर आने का आग्रह किया गया। वे नए वस्त्र पहनकर लौटे, किंतु भोजन करते समय जानबूझकर भोजन अपने वस्त्रों पर गिराने लगे। जब लोगों ने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने मुस्कराकर कहा—"भोजन का निमंत्रण मुझे नहीं, मेरे वस्त्रों को दिया गया है।" यह घटना बाहरी आडंबर पर करारा व्यंग्य है।
इसी प्रकार विश्वविख्यात उद्योगपति हेनरी फोर्ड भी अपनी सादगी के लिए प्रसिद्ध थे। अपार संपत्ति के स्वामी होने के बावजूद वे अपने अनेक दैनिक कार्य स्वयं करते थे। उनका मानना था कि सादगी मनुष्य को श्रम, अनुशासन और आत्मसम्मान से जोड़ती है।
वर्तमान समय में भौतिकता, उपभोगवाद और दिखावे की अंधी दौड़ ने जीवन की सहजता और सादगी को पीछे छोड़ दिया है। आज सफलता का मूल्यांकन प्रायः बाहरी वैभव से किया जाने लगा है, जबकि वास्तविक सुख सरल जीवन, संतोष, आत्मीयता और संयम में निहित है। सादगी केवल पहनावे या रहन-सहन का नाम नहीं, बल्कि विचारों की पवित्रता, व्यवहार की विनम्रता और जीवन की सहजता का दूसरा नाम है।
यदि हम अपनी अनावश्यक इच्छाओं, प्रदर्शन की प्रवृत्ति और विलासिता की लालसा को सीमित कर दें, तो जीवन अधिक शांत, संतुलित, आनंदमय और सार्थक बन सकता है। वास्तव में सादगी ही वह आभूषण है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती और जो मनुष्य को भीतर से महान बनाती है।
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मोहनलाल जाँगिड़
नेशनल राइटर्स एंड कल्चरल फोरम (NWCF), आगरा