Azhar Sabri

Azhar Sabri Educating minds by profession, but my heart lives between the lines. Proud author of 3 books. Living life one chapter at a time.
(1)

29/08/2026

दश्त-ए-तन्हाई को गुलज़ार बना लेते हैं।
ख़ार से जो भी मिले, हार बना लेते हैं।

लोग देते हैं हमें दर्द के तोहफ़े अक्सर,
हम उन्हीं दर्द को अशआर बना लेते हैं।

काँच के जितने भी टुकड़े हैं हमारी ज़द में,
उनको पलकों का ही शृंगार बना लेते हैं।

सामने आए कोई लाख समंदर बन कर,
हम तो तिनके को ही पतवार बना लेते हैं।

रात जितनी भी सियह हो, हमें डर क्या उसका,
हम चराग़ों को भी हथियार बना लेते हैं।

ज़िंदगी राह बदल ले तो बदलते हैं हम,
अपने हर मोड़ को किरदार बना लेते हैं।

सामने आए अगर कोई मुसीबत का पहाड़,
हम उसी ख़ाक से मिनार बना लेते हैं।

जितने शिकवे हैं ज़माने से भुला कर 'अज़हर',
हम तो हर लम्हे को त्यौहार बना लेते हैं।

~ Azhar Sabri ~

27/08/2026

हम ने देखी है बदलती सी नज़र शाम के बा'द।
चुप से हो जाते हैं ये सारे शजर शाम के बा'द।

तेरी यादों का धुआँ फैलता जाता है यूँ,
जैसे बुझता हो कोई शहर-ए-नज़र शाम के बा'द।

बुझ गए आँखों में जलते हुए ख़्वाबों के चराग़,
और बढ़ जाता है तन्हाई का डर शाम के बा'द।

चाँद निकला तो कई रंग नज़र आने लगे,
फिर भी सूना ही रहा दिल का नगर शाम के बा'द।

रेत पर नाम तिरा लिख के मिटाया तो लगा,
और गहरा हुआ सीने में असर शाम के बा'द।

इक दिया मेरी चौखट पे जला कर रखना,
कौन जाने कोई लौटे मेरे घर शाम के बा'द।

दूर सहरा में कोई दीप चमकता है अभी,
जैसे बाक़ी हो किसी दिल में सहर शाम के बा'द।

उम्र कटती रही, इक रात मगर कटती नहीं,
कौन लाता है सहर की भी ख़बर शाम के बा'द।

शाम ढलती है तो याद आती है तेरी 'अज़हर',
दिल में उठता है कोई दर्द मगर शाम के बा'द।

~ Azhar Sabri ~

25/08/2026

सितारे आसमाँ के भी फ़ज़ाओं से निकल जाएँ।
अगर ये दर्द मेरी बद्दुआओं से निकल जाए।

कोई रस्ता दिखा ऐ रब्ब-ए-आलम, अब अँधेरे में,
कि भटका कारवाँ काली घटाओं से निकल जाए।

तुम्हें पाकर भुलाना अब नहीं मुमकिन मेरे दिलबर,
तुम्हारा ज़िक्र कैसे अब दुआओं से निकल जाए।

हवा का रुख़ बदल दे जो, उसी का नाम आँधी है;
चराग़-ए-हक़ कहाँ डरकर हवाओं से निकल जाए।

ज़माना लाख बदले अपनी फ़ितरत और रवायत को,
मगर सच कब किसी झूठी सदाओं से निकल जाए?

सियाह रातों में भी रौशनी का दौर आएगा,
कोई जुगनू भी शायद इन फ़ज़ाओं से निकल जाए।

दुआ बस इतनी है, गिरते हुओं को थाम ले कोई;
कि इंसाँ अपने भीतर की ख़ताओं से निकल जाए।

~ Azhar Sabri ~

24/08/2026

मुंतज़िर आँखें हसीं अरमान होती जाएँगी।
आरज़ू भी एक दिन तूफ़ान होती जाएगी।

हर क़दम पर ज़िंदगी इम्तिहाँ लेती रहे,
तजरबों से राह भी आसान होती जाएगी।

दर्द जब हद से बढ़ेगा मुस्कुरा देंगे वहीं,
मुश्किलें ही राह का सामान होती जाएँगी।

बे-रुख़ी बढ़ती रही तो फ़ासले बढ़ जाएँगे,
दिल की दुनिया फिर बहुत वीरान होती जाएगी।

हम चिराग़ों को हवा से डर नहीं लगता कोई,
शब हमारी लौ से भी ताबान होती जाएगी।

आसमाँ छूने की ख़्वाहिश कम न होगी उम्र भर,
हर नई मंज़िल नई उड़ान होती जाएगी।

~ Azhar Sabri ~

22/08/2026

अकेले राह में मंज़िल कहाँ है।
जो मिल जाएँ तो राहें कारवाँ हों।

अलग रहकर कहाँ ताक़त बचेगी,
मिलें तिनके तो फिर इक आशियाँ हो।

बिखरकर ख़ाक में मिलना है सबको,
जो जुड़ जाएँ तो फिर हम इक जहाँ हो।

न बाँटो रंग में इस बाग़-ए-हस्ती,
हर इक रंगत यहाँ इक गुलसिताँ हो।

सँवर जाएँगी दुनिया की ये राहें,
अगर हर दिल सभी पर मेहरबाँ हो।

दीवारें बुग़्ज़ की ढहती रहें सब,
दिलों के बीच बस इक साएबाँ हो।

चलो मिलकर नया इतिहास लिख दें,
हमारी मुट्ठियों में आसमाँ हो।

न उजड़े फिर कभी अपना ये गुलशन,
अगर हर दिल हर इक का पासबाँ हो।

~ Azhar Sabri ~

21/08/2026

हर ज़ख़्म को फूलों से छुपाने नहीं आते।
हर टूटे हुए ख़्वाब सजाने नहीं आते।

अब याद के मौसम भी सुहाने नहीं आते,
रूठे हुए रिश्ते भी मनाने नहीं आते।

आँखों में समंदर हो, बहाने नहीं आते,
हम को कभी रो कर के दिखाने नहीं आते।

ताबीर की उम्मीद में कब तक कोई जागे,
अब ख़्वाब भी आँखों को लुभाने नहीं आते।

सच्चाई पे अड़ जाना तो आदाब हैं अपने,
हम को तो अदालत में बहाने नहीं आते।

ख़ुद्दार क़बीले के हमीं लोग बचे हैं,
दहलीज़ पे सर अपना झुकाने नहीं आते।

जो दिल में उतर जाए, ज़ुबाँ पर नहीं लाते,
हम दिल का कोई राज़ बताने नहीं आते।

सच बोल के हम ख़ुद को गँवाते भी रहे हैं,
अब झूठ को रिश्तों में मिलाने नहीं आते।

~ Azhar Sabri ~

19/08/2026

सच्चाई को लफ़्ज़ों में छुपाना नहीं आता।
हर झूठ को सच जैसा बनाना नहीं आता।

नफ़रत के मकानों को गिरा देते हैं हँस कर,
हमको कभी नफ़रत को बढ़ाना नहीं आता।

हम डूब भी जाएँ तो समंदर की तरह हैं,
साहिल पे आ के शोर मचाना नहीं आता।

गैरों के इशारों पे ढलें किस लिए 'अज़हर',
हमको किसी साँचे में समाना नहीं आता।

~ Azhar Sabri ~

18/08/2026

उनसे पल भर नज़र मिला बैठे।
अपनी दुनिया ही हम लुटा बैठे।

दिल में तूफ़ाँ कई छुपा बैठे।
हम ही अपना सुकूँ गँवा बैठे।

बे-वफ़ाई का ज़िक्र क्या करना,
हम ही ख़ुद से नज़र चुरा बैठे।

रास्ता रोक कर खड़े थे जो,
हम उन्हें रास्ता दिखा बैठे।

दुश्मनों से गिला करें क्या हम,
अपने अपनों को आज़मा बैठे।

ज़ख़्म सीने के जो छुपाए थे,
ख़ुद ही महफ़िल में सब सुना बैठे।

रोशनी की तलाश में निकले,
ख़ुद अँधेरों को घर बुला बैठे।

आशियाँ अपना ढूँढने निकले,
आँधियों को गले लगा बैठे।

हसरतें दिल में जो छुपाई थीं,
आज आँखों से सब बहा बैठे।

~ Azhar Sabri ~

17/08/2026

चेहरा रहे जो ज़ख़्म से तर तुमको इससे क्या।
काटा गया है मेरा ही सर तुमको इससे क्या।

तुम रौशनी के साथ नई राह पर चलो,
काटूँ मैं बे-चिराग़ सफ़र तुमको इससे क्या।

मंज़िल मिले तुम्हें तो मुबारक हो हमसफ़र,
भटके मेरा जुनून-ए-नज़र तुमको इससे क्या।

~ Azhar Sabri ~

15/08/2026

Celebrating 80 years of the tricolour. Wishing you pride, strength, and the spirit of harmony. Jai Hind. 🇮🇳

#स्वतंत्रतादिवस #भारत

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