29/08/2026
दश्त-ए-तन्हाई को गुलज़ार बना लेते हैं।
ख़ार से जो भी मिले, हार बना लेते हैं।
लोग देते हैं हमें दर्द के तोहफ़े अक्सर,
हम उन्हीं दर्द को अशआर बना लेते हैं।
काँच के जितने भी टुकड़े हैं हमारी ज़द में,
उनको पलकों का ही शृंगार बना लेते हैं।
सामने आए कोई लाख समंदर बन कर,
हम तो तिनके को ही पतवार बना लेते हैं।
रात जितनी भी सियह हो, हमें डर क्या उसका,
हम चराग़ों को भी हथियार बना लेते हैं।
ज़िंदगी राह बदल ले तो बदलते हैं हम,
अपने हर मोड़ को किरदार बना लेते हैं।
सामने आए अगर कोई मुसीबत का पहाड़,
हम उसी ख़ाक से मिनार बना लेते हैं।
जितने शिकवे हैं ज़माने से भुला कर 'अज़हर',
हम तो हर लम्हे को त्यौहार बना लेते हैं।
~ Azhar Sabri ~