19/06/2026
गुज़रे हुए दिनों का न इतना मलाल कर।
आईना सामने है तो ख़ुद से सवाल कर।
काँटों से डर के राह में रुकना नहीं कभी,
गुलशन में अपने ख़्वाबों की फ़सलें बहाल कर।
सच की डगर पे चलना तो मुश्किल है दोस्तों,
हँसते हैं लोग पाँव में छाले उछाल कर।
ख़ामोश रह के सहना भी इक जुर्म है यहाँ,
ज़ालिम के सामने तू ज़रा सा सवाल कर।
सूरज की सम्त देख के चलता नहीं है जो,
बैठा है अपनी राह में ज़ुल्मत को पाल कर।
किरदार में अगर तेरे पाकीज़गी नहीं,
क्या फ़ायदा जो चेहरा तू रखे संभाल कर।
दुनिया के ऐब देखने की तुझको धुन है क्यूँ,
'अज़हर' तू अपने आप से पहले सवाल कर।
~ Azhar Sabri ~