Kaavyokti

Kaavyokti Hritwik Rudra

31/05/2026

कुछ संजीदा बातें हल्की-फुल्की भाषा में...

एक महीना बीतने में कभी भी एक महीना नहीं लगता। कभी-कभी एक महीना बीतने में दो-एक साल लगते हैं और कभी दो-तीन दिनों में भी ब...
29/05/2026

एक महीना बीतने में कभी भी एक महीना नहीं लगता। कभी-कभी एक महीना बीतने में दो-एक साल लगते हैं और कभी दो-तीन दिनों में भी बीत जाता है। मेरा पिछला महीना पाँच दिनों में बीत गया। इन पाँच दिनों में जो सीखा शायद पाँच-दस महीनों में भी नहीं सीख पाता। कविताएं लिखते हुए दस बरस से ऊपर हो गए पर मंचों पर जाना हाल ही में हुआ।

दिल्ली गया तो मंच ( .delhi .co ) मिले, सुनने वाले लोग मिले, कहने वाले लोग मिले, सीखने-सीखाने वाले लोग मिले। इन लोगों से मिलते-मिलते ही महीना कब बीता, ये सोचते-सोचते अभी एक-दो महीने और बीतेंगे।

ख़ैर तस्वीरों से आपको कहानी मालूम पड़ जाएगी। बाकी मैं किसी ना किसी मंच पर सुनाने के लिए बचा कर भी रखूँगा। पहली बार दिल्ली दिल को भाई, उसके लिए इन तमाम लोगों का शुक्रिया जिन्होंने मंच के ऊपर से लेकर मंच के पीछे तक केवल प्यार दिया।

कोशिश रहेगी कि प्यार फिर से लुटाने और लूटने जल्द ही आऊँगा। तब तक के लिए बशीर बद्र साहब के ये अश'आर :

कहाँ आँसुओं की ये सौगात होगी
नए लोग होंगे नई बात होगी

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

28/05/2026

"इसी तरह से लोकतंत्र भी रोज़ ठोकरें खाता है... "

पूरी कविता पब्लिक डिमांड पर। ✨

22/05/2026

एक स्त्री रहती है हम सब के भीतर ...❤️

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