08/19/2011
अन्ना की पुकार पर देश भर में जो माहौल बना है, उसका संकेत यह तो नहीं की हम वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था से उब गए हैं और कोई अन्य साफ़-सुथरी व्यवस्था के आकांक्षी है. क्या सचमुच हमारी संसद लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करती है? सुकरात ने ऐसे ही लोकतंत्र के बारे में सच ही कहा था "लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत हित जब सामूहिक रूप धारण कर लेते हैं तो वे जन-हितों पर कुठाराघात करने से नहीं चूकते." यही तो हो रहा है हमारे देश में.