Sandip Kumar Singh.

Sandip Kumar Singh. For my poems. I am a writer.And social worker. My view is all my friend take some knowledge to my poems.

प्यार प्यार जिन्दगी साज है,इससे ही संसार।दिल में रख इसको सदा,सबको करें दुलार।।सभी काम सुलझे सही, रखें अगर हम प्यार।बाधा ...
11/18/2022

प्यार
प्यार जिन्दगी साज है,इससे ही संसार।
दिल में रख इसको सदा,सबको करें दुलार।।

सभी काम सुलझे सही, रखें अगर हम प्यार।
बाधा सारे खत्म हों, जीवन चमके यार।।

दीए नित ही खुद जला, कर दें जगत प्रकाश।
खुशियां चूमे कदम को, छू लें मनु आकाश।।

बगिया सुरभित प्यार से, खुशी रहे परिवार।
करें भला सब जीव का,मिलता दुआ हजार।।

सजा प्यार से आज को, कल भी होगा हर्ष।
चलते रहिए रोज ही, सदा करें उत्कर्ष।।
संदीप कुमार सिंह✍🏼
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार

11/18/2022

मधुर -- मिलन || हो तकदिर जगा कर लाया हूँ , एक नई दुनिया बसा कर लाया हूँ | नमस्ते -- नमस्ते ये प्यार हो गया हस्ते -- हस्ते , आते -- जाते मिले गली में || दुनिया रह गयी जलते -- जलते, हमको तो यारा तेरी यारी जान से प्यारी |

11/18/2022

मुलाकात परी से
एक रात की बात है, सोया मैं था,
अचानक सामने कुछ आभास हुआ।

चौंक कर मैं उठ बैठा, सामने देखा,
एक खूबसूरत बला की सुन्दरी खड़ी है।

मैं हर्षित नज़रों से देखता ही रह गया,
ओर बेहद रहस्यमय मुस्कान चेहरे पे लाया।

परी तो पहले से ही मुस्कुरा रहीं थीं,
मुस्कान _मुसकान से टकरा गई।

तब एक आवाज बाहर निकला,
परी पूछी कैसे हो चिंटू?

मैं एक बार पुनः चकरा सा गया,
क्योंकि उसे मेरा नाम भी पता था।

फिर भी मैं तुरन्त खुशी जाहिर कर कहा ठीक हूं,
परी बोली मेरे साथ चलो घूमने।

मैं और खुश होते हुए कहा जरुर,
लेकिन आप हो कौन?

परी बोली मैं स्वर्ग लोक से आई परी हूं,
मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूं।

फिर बोली पहले भी हम दोनों पिछले जन्म में,
साथ रह चुके हैं।

मैं अति हर्षित हुआ,
बोला अवश्य आप के साथ चलूंगा।

मैं आके बगल में खड़ा हुआ,
अपने पीठ पर लाध कर उड़ गई।

ले गई समुंदर किनारे,
और वहां के दृश्य साथ मिलकर देखने लगे।

इस दरमियान हम दोनों काफी बातचीत किए,
एक_दूसरे को और अधिक जाना।

अब सुबह पांच बजने वाला था,
परी को स्वर्ग लोक वापस जाना था।

परी बोली आज से हमदोनों दोस्त हुए,
यदा_कदा हम दोनों यूं ही मिलते रहेंगें।

मैं बोला निश्चय ही बेशंका के,
आपका दिल से स्वागत रहेगा।

फिर मुझे वह उड़ा कर घर छोड़ गई,
और खुद उड़ते स्वर्ग लोक को चली गई।
संदीप कुमार सिंह✍🏼
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार

11/18/2022

प्यार
प्यार जिन्दगी साज है,इससे ही संसार।
दिल में रख इसको सदा,सबको करें दुलार।।

सभी काम सुलझे सही, रखें अगर हम प्यार।
बाधा सारे खत्म हों, जीवन चमके यार।।

दीए नित ही खुद जला, कर दें जगत प्रकाश।
खुशियां चूमे कदम को, छू लें मनु आकाश।।

बगिया सुरभित प्यार से, खुशी रहे परिवार।
करें भला सब जीव का,मिलता दुआ हजार।।

सजा प्यार से आज को, कल भी होगा हर्ष।
चलते रहिए रोज ही, सदा करें उत्कर्ष।।
संदीप कुमार सिंह✍🏼
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार

रहस्यमय _लड़की उसका आना और जाना मेरे लिए कौतूहक था,दिव्य सुन्दरी जिसे देखते ही खुशी होता था।बहुत ही रहस्यमय लग रही थी वो...
11/17/2022

रहस्यमय _लड़की
उसका आना और जाना मेरे लिए कौतूहक था,
दिव्य सुन्दरी जिसे देखते ही खुशी होता था।

बहुत ही रहस्यमय लग रही थी वो,
पूरी शरीर में एक मादकता भरी थीं।

बातों में गज़ब की नजाकत थीं,
चालों में गज़ब की अदाकत थीं।

नयना देखते कभी थकती ना थीं,
दिल में कोई हलचल सी होती थीं।

लब उसके जैसे मय से भरा हुआ हो,
सारे अपने आप प्यासे हो जाते थे।

उसका आना और जाना मेरे लिए कौतुहक था,
दिमाग की नसें सोच कर शांत हो जाता था।

उसका नाम रखने को मन करता था,
नाम दिया रहस्यमय परी।

कहां से आती कहां को जाती,
कुछ भी तो ख़बर नहीं था मुझे।

एक दिन मैंने बड़े ही अदब से रोका उसे,
परी बोलकर संबोधित किया।

परी ने बहुत ही मनोहर मुस्कान से,
ज़वाब दी क्या बात है?

मैंने पूछा आपका नाम क्या है?
ज़वाब मिला सृष्टि ।

सृष्टि सुनकर संपूर्ण सृष्टि उसमें ही दिखने लगी,
मैं हक्का_बक्का देखे जा रहा था।

फिर वह बोली मेरे विषय में जानना चाहते हो,
मैंने भी बोला हां।

वह एक क़िताब मुझे भेंट दी,
और बोली इसे पढ़ लेना सब जान जाओगे।

फिर वह बड़ी ही फुर्ती से,
आगे को निकल पड़ी।

और उसे मैं जाते हुए देखता ही रहा,
जबतक ना ओझल हुई देखता ही रहा।

फिर क़िताब पर ध्यान दिया,
क़िताब का नाम था सृष्टि श्रृंगार।

अन्दर किताब के सृष्टि संबंधित जानकारियां भरा था,
जितना मैं पढ़ता जाता रहस्य उतना ही गहराता जाता।
संदीप कुमार सिंह✍🏼
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार

"रात की दर्पण"चंचल _चांदनी है,जगमगाते तारें ,महकी रात है।आंखों में आनंद की रौशनी है,लब पर मधुर गीत के बोल हैं।सफ़ेद आसमा...
11/17/2022

"रात की दर्पण"
चंचल _चांदनी है,जगमगाते तारें ,
महकी रात है।
आंखों में आनंद की रौशनी है,
लब पर मधुर गीत के बोल हैं।

सफ़ेद आसमान यूं देख रहें हैं,
जैसे उनके निगाहें मुझे देख रहें हों।
आलम यह कैसा अद्भुत है,
वीरानगी की दृश्य छाई है।

वीरानगी की छाती चीर,
अमृत नीर बहा रही हो।
रात की दर्पण में,
मैं देख रहा हूं।

तमाम अकाश गंगा,
अपनी मधुर तान दे रही है।
मन मेरा उतावला,
हुआ जा रहा है।

सारे नजारे दृष्टिगोचर हो रहें हैं,
दर्पण यह कैसा गजब है?
हृदयतल के सारे तार,
झंझकृत हो रहें हैं।

आज समा गज़ब है,
आज आसमा गजब है।
धरा की नींद कहीं खो गई है,
एक अनोखी जागृति छाई है।

रात की दर्पण में,
तमाम उन्माद निकल रहें हैं,
मेरे जैसे सबके दिल में ही,
अदृश्य परिहास चल रहीं हैं।
(स्वरचित मौलिक)
संदीप कुमार सिंह✍🏼
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार

https://youtube.com/channel/UCfW7ZcH6IhgpXWwabv4O6gA
07/16/2022

https://youtube.com/channel/UCfW7ZcH6IhgpXWwabv4O6gA

जाने_माने काव्यकार/ज्ञानवर्धक कविताएं जो आपके मनो में एक नई जोश_उमंग और उत्साह का भरपूर संचार करेगा।❤️❤️

01/31/2022
जब जजबा और तजुर्बा एक साथ मिलकर काम करते हैं,तो एक नई इतिहास की पुस्तक बन जाती है।
12/25/2021

जब जजबा और तजुर्बा एक साथ मिलकर काम करते हैं,
तो एक नई इतिहास की पुस्तक बन जाती है।

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