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31/08/2026

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लाभ और हानि — सोच का अंतरएक छोटे से गाँव में एक बहुत गरीब आदमी रहता था। उसका नाम था रामू।रामू बहुत मेहनती और ईमानदार इंस...
16/08/2026

लाभ और हानि — सोच का अंतर

एक छोटे से गाँव में एक बहुत गरीब आदमी रहता था। उसका नाम था रामू।
रामू बहुत मेहनती और ईमानदार इंसान था।
उसके परिवार में उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे थे।
परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी।
रामू दिन-रात मेहनत करके किसी तरह अपने परिवार का पालन-पोषण करता था।
वह जिस घर में रहता था, वह घर वास्तव में घर कम और एक पुरानी झोपड़ी ज्यादा था।
बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता था।
सर्दियों में ठंडी हवाएँ अंदर आ जाती थीं और गर्मियों में झोपड़ी इतनी गर्म हो जाती थी कि बच्चों का सोना भी मुश्किल हो जाता था।
रामू की सबसे बड़ी इच्छा थी कि एक दिन वह अपने परिवार के लिए एक पक्का और मजबूत मकान बनाएगा।
लेकिन उसकी कमाई बहुत कम थी।
वह जानता था कि केवल इच्छा करने से मकान नहीं बन सकता। इसलिए उसने एक छोटा-सा संकल्प लिया—
"मैं चाहे जितनी मुश्किल में रहूँ, लेकिन हर महीने अपनी कमाई में से थोड़ा-थोड़ा पैसा जरूर बचाऊँगा।
एक दिन अपने परिवार के लिए पक्का घर बनाकर ही रहूँगा।
उस दिन से रामू ने अपनी जरूरतों को कम करना शुरू कर दिया।
कभी वह नए कपड़े नहीं खरीदता, कभी अपने लिए मिठाई नहीं लाता और कभी कोई छोटी इच्छा भी सिर्फ इसलिए छोड़ देता क्योंकि उसे अपने सपने के लिए पैसे बचाने थे।
उसकी पत्नी भी उसका पूरा साथ देती थी।
कई बार बच्चे किसी खिलौने की जिद करते तो रामू प्यार से उन्हें समझाता— "बेटा, अभी थोड़ा इंतजार कर लो। जब हमारा अपना पक्का घर बन जाएगा, तब मैं तुम्हें तुम्हारी पसंद का खिलौना जरूर दिलाऊँगा।"
बच्चे भी पिता की मजबूरी समझते थे।
इस तरह दिन बीतते गए।
एक साल… फिर दूसरा साल… फिर पाँच साल… देखते-देखते बीस साल बीत गए।
बीस वर्षों तक रामू ने एक-एक रुपया जोड़कर अपने सपने को जिंदा रखा।
आखिरकार वह दिन आ ही गया, जिसका उसे वर्षों से इंतजार था।
रामू ने अपने जीवन की सारी बचत लगाकर एक सुंदर-सा पक्का मकान बनवाना शुरू किया।
जब मकान की दीवारें उठने लगीं, तो रामू की आँखों में खुशी के आँसू आ जाते।
वह रोज अपने बनते हुए घर को दूर खड़ा होकर देखता और मन ही मन कहता—
"अब मेरे बच्चों को बारिश में भीगना नहीं पड़ेगा। अब मेरी पत्नी को ठंड में परेशान नहीं होना पड़ेगा। अब मेरा परिवार भी चैन से रह सकेगा।"
कुछ महीनों की मेहनत के बाद आखिरकार मकान बनकर तैयार हो गया।
रामू की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
उसने पंडित जी को बुलाया और उनसे गृह प्रवेश का शुभ मुहूर्त निकलवाया।
पंडित जी ने पंचांग देखकर कहा—
"रामू, दो दिन बाद बहुत शुभ मुहूर्त है। उस दिन तुम अपने परिवार के साथ नए घर में प्रवेश करना।"
रामू खुशी-खुशी घर लौटा।
उसने अपनी पत्नी और बच्चों को यह खुशखबरी सुनाई।
पूरा परिवार खुशी से झूम उठा।
बच्चे नए घर में अपना कमरा देखने लगे।
पत्नी ने भी सोचा कि किस कमरे में पूजा होगी और रसोई में सामान कहाँ रखा जाएगा।
रामू ने उस रात भगवान के सामने हाथ जोड़कर कहा—
"हे भगवान! आपने मेरी बीस साल की मेहनत को सफल कर दिया। अब बस मेरे परिवार को हमेशा खुश रखना।"
लेकिन शायद भगवान ने उसके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।
गृह प्रवेश में केवल दो दिन बाकी थे।
अचानक आधी रात के समय धरती जोर-जोर से हिलने लगी।
लोग घबराकर अपने घरों से बाहर निकलने लगे।
यह एक भयंकर भूकंप था।
कुछ ही क्षणों में चारों ओर चीख-पुकार मच गई।
और देखते ही देखते रामू का वह नया मकान, जिसे बनाने में उसकी बीस साल की मेहनत और पूरी जिंदगी की बचत लगी थी, तेज आवाज के साथ जमीन पर गिर पड़ा।
रामू दूर खड़ा अपने सपनों के घर को टूटते हुए देखता रह गया।
उसकी आँखों के सामने उसका बीस साल का सपना मलबे में बदल चुका था।
लोग उसके पास आए और उसे सांत्वना देने लगे।
कोई बोला—
"रामू, बहुत बुरा हुआ।"
दूसरा बोला—
"बेचारे की पूरी जिंदगी की कमाई चली गई।"
तीसरा व्यक्ति बोला—
"इतने साल मेहनत करके घर बनाया था और एक पल में सब खत्म हो गया।"
रामू कुछ देर तक चुपचाप उस मलबे को देखता रहा।
फिर अचानक वह बाजार की ओर चला गया।
कुछ देर बाद जब वह वापस लौटा तो उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था।
वह मलबे के पास खड़े लोगों को मिठाई बांटने लगा।
लोगों को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ।
उसका एक करीबी मित्र उसके पास आया और बोला—
"रामू! क्या तुम पागल हो गए हो? तुम्हारा घर गिर गया है। तुम्हारी बीस साल की मेहनत और सारी जमा पूंजी खत्म हो गई। तुम्हारे पास दुखी होने के बजाय मिठाई बांटने का कारण क्या है?"
रामू मुस्कुराया।
उसने अपने मित्र के कंधे पर हाथ रखा और शांत आवाज में कहा—
"मित्र, तुम इस घटना का केवल नकारात्मक पक्ष देख रहे हो। मैं इसका दूसरा पक्ष देख रहा हूँ।"
मित्र ने हैरानी से पूछा—
"दूसरा पक्ष? इसमें अच्छा क्या हो सकता है?"
रामू ने मलबे की तरफ देखते हुए कहा—
"सोचो, मेरा गृह प्रवेश दो दिन बाद होने वाला था।
अगर यह मकान आज गिरने के बजाय दो दिन बाद गिरता, तो उस समय मैं, मेरी पत्नी और मेरे दोनों बच्चे इसी घर के अंदर होते।"
यह कहते-कहते रामू की आँखें नम हो गईं।
वह आगे बोला—
"तब केवल मेरा मकान नहीं गिरता…
मेरा पूरा परिवार मुझसे छिन सकता था।
मेरी बीस साल की कमाई चली गई है, लेकिन मेरा परिवार तो मेरे पास है।"
उसने अपने बच्चों की तरफ देखा और कहा—
"घर दोबारा बनाया जा सकता है।
पैसा दोबारा कमाया जा सकता है।
लेकिन अगर मेरे अपने लोग चले जाते, तो मैं उन्हें कभी वापस नहीं ला सकता था।"
रामू का मित्र बिल्कुल शांत हो गया।
अब उसे समझ आ गया था कि रामू मिठाई क्यों बांट रहा था।
रामू ने मुस्कुराते हुए कहा—
"आज मेरा घर जरूर गिरा है, लेकिन मेरा परिवार बच गया। मेरे लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है?"
वहाँ खड़े सभी लोगों की आँखें नम हो गईं।
जिस घटना को लोग रामू के जीवन की सबसे बड़ी हानि समझ रहे थे, रामू उसी घटना में भगवान की सबसे बड़ी कृपा देख रहा था।
उस दिन रामू ने सभी को एक बहुत बड़ी सीख दी—
हमारे जीवन में होने वाली हर घटना को हम अपनी सोच के अनुसार देखते हैं।
कभी कोई घटना हमें बहुत बड़ी हानि दिखाई देती है,
लेकिन समय बीतने के बाद वही घटना हमारे लिए किसी बड़े लाभ का कारण बन सकती है।
इसलिए जब जीवन में कोई मुश्किल आए, तो तुरंत निराश मत हो जाइए।
एक बार रुककर सोचिए—
"क्या पता, इस घटना के पीछे भी भगवान ने मेरे लिए कोई बड़ी भलाई छिपा रखी हो?"
क्योंकि जीवन में हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।
एक पहलू हमें दिखाई देता है और दूसरा हमारी सोच के पीछे छिपा होता है।
शिक्षा .....
मित्रों, जीवन में हर घटना के दो पहलू होते हैं—एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक।
नकारात्मक सोच हमें दुखी करती है,
जबकि सकारात्मक सोच हमें उसी परिस्थिति में उम्मीद और शक्ति देती है।
इसलिए परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों,
हमें अपना नजरिया सकारात्मक रखना चाहिए।
कभी-कभी जो हमें नुकसान दिखाई देता है,
वही भविष्य में हमारे जीवन का सबसे बड़ा लाभ बन जाता है।
याद रखिए—
"परिस्थितियाँ हमारे हाथ में नहीं होतीं, लेकिन उन परिस्थितियों को देखने का नजरिया हमारे हाथ में जरूर होता है।"

दोस्तों, कहानी आप को कैसी लगी, कमेंट करके बताएं और पसंद आयी हो तो लाइक और सबस्क्राइब करना ना भूलें।
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30/07/2026

जिज्ञासा

💐कल पर टली खुशियाँ💐राजस्थान के छोटे से गाँव नयासर में बबलू और उसकी पत्नी प्रमिला अपने दो बच्चों के साथ एक सादा लेकिन खुश...
28/07/2026

💐कल पर टली खुशियाँ💐

राजस्थान के छोटे से गाँव नयासर में बबलू और उसकी पत्नी प्रमिला अपने दो बच्चों के साथ एक सादा लेकिन खुशहाल जीवन जीते थे। बबलू मेहनती किसान था। सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में चला जाता और देर शाम थका-हारा घर लौटता। प्रमिला पूरे घर की जिम्मेदारी संभालती। उसने कभी अपने लिए कोई बड़ी मांग नहीं की। न सोने के गहने, न महंगी साड़ी और न ही किसी बड़े शहर में घूमने की जिद।

लेकिन उसकी एक छोटी-सी इच्छा थी।

वह अक्सर मुस्कुराकर कहती, "सुनो जी, एक दिन हम दोनों कहीं दूर चलेंगे। बस दो दिन... बिना बच्चों के, बिना किसी चिंता के।"

बबलू हर बार हँसकर कहता, "अरे प्रमिला, अभी फसल का काम है। अगले साल पक्का चलेंगे।"

अगला साल आता, लेकिन कोई न कोई बहाना तैयार रहता। कभी खेती, कभी पैसों की कमी, तो कभी बच्चों की पढ़ाई। देखते-देखते ग्यारह साल बीत गए और प्रमिला हर साल वही सपना अपनी आँखों में सजाए रहती।

एक दिन घर की पुरानी अलमारी साफ करते समय बबलू को प्रमिला की एक डायरी मिली। जिज्ञासा से उसने उसे खोलकर पढ़ना शुरू किया।

पहले पन्ने पर लिखा था—

"आज फिर उन्होंने कहा, अगले साल चलेंगे। शायद इस बार सच हो जाए।"

दूसरे पन्ने पर लिखा था—

"मुझे किसी महंगी जगह नहीं जाना। मुझे बस उनके साथ दो दिन अकेले बिताने हैं।"

फिर एक पन्ना आया जो आठ साल पुराना था।

"अब घूमने की इच्छा नहीं रही। बस कभी ऐसा हो कि वे बिना किसी काम की चिंता के मेरे साथ बैठकर बातें करें।"

डायरी पढ़ते-पढ़ते बबलू की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे पहली बार एहसास हुआ कि प्रमिला को पहाड़, शहर या होटल नहीं चाहिए थे। उसे तो सिर्फ अपने पति का थोड़ा-सा समय चाहिए था।

उसी शाम बबलू पास के शहर गया और दो दिन की यात्रा के टिकट बुक करा लाया। घर आकर उसने मुस्कुराते हुए टिकट प्रमिला के हाथ में रख दिए।

प्रमिला ने टिकट देखे। उसकी आँखों में हल्की चमक आई, लेकिन अगले ही पल वह फीकी मुस्कान के साथ बोली, "अब मन नहीं करता।"

बबलू घबरा गया।

"क्यों प्रमिला? यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी इच्छा थी।"

प्रमिला ने शांत स्वर में कहा, "इच्छाएँ भी इंसानों जैसी होती हैं। अगर उन्हें बहुत लंबे समय तक इंतज़ार करवाओ, तो वे भी धीरे-धीरे मर जाती हैं।"

यह सुनकर बबलू का सिर शर्म से झुक गया। उसे समझ आ गया कि उसने काम और जिम्मेदारियों के पीछे भागते-भागते अपनी पत्नी की सबसे प्यारी इच्छा को ही अनदेखा कर दिया।

उस दिन के बाद बबलू ने एक संकल्प लिया कि अब वह अपने परिवार के लिए समय ज़रूर निकालेगा। उसने सीखा कि जीवन में धन, खेती और काम फिर भी पूरे हो सकते हैं, लेकिन अपनों के साथ बिताने वाला समय एक बार निकल जाए तो कभी लौटकर नहीं आता।

शिक्षा:
रिश्ते बड़े झगड़ों से नहीं, बल्कि उन छोटी-छोटी खुशियों के बार-बार टल जाने से कमजोर पड़ जाते हैं। इसलिए अपनों की सच्ची इच्छाओं को "कल" पर मत टालिए, क्योंकि कई बार वह "कल" बहुत देर से आता है।
🙏🙏🙏🙏🙏

धन, पुत्र, वही जो परमार्थ में लगे     एक सेठ बड़ा साधु सेवी था। जो भी सन्त महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर ...
21/07/2026

धन, पुत्र, वही जो परमार्थ में लगे

एक सेठ बड़ा साधु सेवी था। जो भी सन्त महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर उनकी सेवा करता। एक बार एक महात्मा जी सेठ के घर आये। सेठानी महात्मा जी को भोजन कराने लगी। सेठ जी उस समय किसी काम से बाज़ार चले गये।

भोजन करते करते महात्मा जी ने स्वाभाविक ही सेठानी से कुछ प्रश्न किये। पहला प्रश्न यह था कि तुम्हारा बच्चे कितने हैं ? सेठानी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से चार बच्चे हैं।

महात्मा जी ने दूसरा प्रश्न किया कि तुम्हारा धन कितना है? उत्तर मिला कि महाराज! ईश्वर की अति कृपा है लोग हमें लखपति कहते हैं।

महात्मा जी जब भोजन कर चुके तो सेठ जी भी बाज़ार से वापिस आ गये और सेठ जी महात्मा जी को विदा करने के लिये साथ चल दिये।

मार्ग में महात्मा जी ने वही प्रश्न सेठ से भी किये जो उन्होंने सेठानी से किये थे। पहला प्रश्न था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं? सेठ जी ने कहा महाराज! मेरा एक पुत्र है।

महात्मा जी दिल में सोचने लगे कि ऐसा लगता है सेठ जी झूठ बोल रहे हैं। इसकी पत्नी तो कहती थी कि हमारे चार बच्चे हैं और हमने स्वयं भी तीन-चार बच्चे आते-जाते देखे हैं और यह कहता है कि मेरा एक ही पुत्र है।

महात्मा जी ने दुबारा वही प्रश्न किया, सेठ जी तुम्हारा धन कितना है? सेठ जी ने उत्तर दिया कि मेरा धन पच्चीस हज़ार रूपया है। महात्मा जी फिर चकित हुए इसकी सेठानी कहती थी कि लोग हमें लखपति कहते हैं। इतने इनके कारखाने और कारोबार चल रहे हैं और यह कहता है मेरा धन पच्चीस हज़ार रुपये है।

महात्मा जी ने तीसरा प्रश्न किया कि सेठ जी! तुम्हारी आयु कितनी है? सेठ ने कहा-महाराज मेरी आयु चालीस वर्ष की है महात्मा जी यह उत्तर सुन कर हैरान हुए सफेद इसके बाल हैं, देखने में यह सत्तर-पचहत्तर वर्ष का वृद्ध प्रतीत होता है और यह अपनी आयु चालीस वर्ष बताता है।
सोचने लगे कि सेठ अपने बच्चों और धन को छुपाये परन्तु आयु को कैसे छुपा सकता है?

महात्मा जी रह न सके और बोले-सेठ जी! ऐसा लगता है कि तुम झूठ बोल रहे हो?

सेठ जी ने हाथ जोड़कर विनय की महाराज!

झूठ बोलना तो वैसे ही पाप है और विशेषकर सन्तोंं के साथ झूठ बोलना और भी बड़ा पाप है।

आपका पहला प्रश्न मेरे बच्चों के विषय में था। वस्तुतः मेरे चार पुत्र हैं किन्तु मेरा आज्ञाकारी पुत्र एक ही है। भक्ति भाव पूजा पाठ में लगा हुआ है मैं उसी एक को ही अपना पुत्र मानता हूँ। जो मेरी आज्ञा में नहीं रहते कुसंग के साथ रहते हैं वे मेरे पुत्र कैसे?

दूसरा प्रश्न आपका मेरा धन के विषय में था। महाराज! मैं उसी को अपना धन समझता हूँ जो परमार्थ की राह में लगे। मैने जीवन भर में पच्चीस हज़ार रुपये ही परमार्थ की राह में लगाये हैं वही मेरी असली पूँजी है। जो धन मेरे मरने के बाद मेरे पुत्र बन्धु-सम्बन्धी ले जावेंगे वह मेरा क्यों कर हुआ?

तीसरे प्रश्न में आपने मेरी आयु पूछी है। चालीस वर्ष पूर्व मेरा मिलाप एक संत जी से हुआ था। उनकी सेवा चरण-शरण ग्रहण करके गुरु धारण किए मैं तब से भजन-अभ्यास और साधु सेवा कर रहा हूँ। इसलिये मैं इसी चालीस वर्ष की अवधि को ही अपनी आयु समझता हूँ।

"कबीर संगत साध की, साहिब आवे याद।
लेखे में सोई घड़ी, बाकी दे दिन बाद"।।

जब कभी सन्त महापुरुषों का मिलाप होता है-
उनकी संगति में जाकर मालिक की याद आती है,
वास्तव में वही घड़ी सफल है। शेष दिन जीवन के निरर्थक हैं!
🙏🙏🙏🙏

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