23/03/2026
“वाटी गाँव – वीर भूमि, संस्कृति धाम”
अरावली की गोद उज्ज्वल,
जहाँ पवन भी गाथा गाए,
उस पावन धरा का परिचय—
वाटी गाँव जगत कहलाए।
माटी में ममता घुली हुई,
हर कण में इतिहास बसा,
देव-मंदिर, ताल-तलाईयाँ,
धरती का आँचल झिलमिल सा।
जहाँ सुबहें शंखनाद करें,
और संध्या दीपों से सजे,
जहाँ संस्कारों की सरिता,
पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहती रहे।
इस पावन भूमि के आंचल में,
एक रहस्य भी छिपा गहरा,
“बुझ” नाम से विख्यात स्थल,
जिसे भीमेरा कहे यह चेहरा।
शांत, रमणीय, एकांत धरा,
जहाँ प्रकृति मुस्काती है,
कल-कल बहते निर्मल जल से,
ध्यान की धुन झरती जाती है।
किनारों पर वह आश्रम प्राचीन,
जहाँ ऋषि-मुनि तप में लीन,
साधना की अग्नि में तपकर,
बना यह क्षेत्र अलौकिक, नवीन।
आज भी वह पथ कठिन है,
जहाँ पहुँच न पाता हर कोई,
वीरान घाटी, दूर बसी,
मानो समय भी ठहर गया हो वहीं।
उसी भूमि पर एक पत्थर,
विशाल, अडिग, अनोखा खड़ा,
जिसे यहाँ की भाषा में कहते—
“गोफानिया भाटा” बड़ा।
जनश्रुति कहती, महाभारत में,
वनवास के उन कठिन दिनों में,
माता कुन्ती संग पांडव आए,
जन-रक्षा हेतु इस क्षेत्र में।
असुरों के आतंक से पीड़ित,
जब जन-जीवन हुआ अधीर,
तब महाबली भीम ने धारण किया,
अपने भीतर का अद्भुत वीर।
गोफन में भर वह शिला-वज्र,
गर्जन सा आकाश हिला,
एक ही प्रहार में दुष्ट दल टूटा,
धर्म का फिर दीप जला।
आज वही शिला साक्षी बनकर,
युगों की कथा सुनाती है,
“गोफानिया भाटा” बनकर भीम का,
पराक्रम अमर दिखाती है।
यह कथा केवल कल्पना नहीं,
आस्था का आधार यहाँ,
क्योंकि पास ही फरारा गाँव में,
खड़ा कुंतेश्वर महादेव महान।
माता कुन्ती की तप-स्थापना,
श्रद्धा का अटूट प्रमाण,
सीना ताने खड़ा वह मंदिर,
जन-जन का विश्वास महान।
इन सब गौरव गाथाओं से,
वाटी की माटी धन्य हुई,
वीरों की यह जन्मभूमि,
संस्कारों से पावन हुई।
यह केवल एक गाँव नहीं,
यह इतिहास का जीवंत ग्रंथ,
जहाँ हर कण कहता गाथा—
धर्म, शौर्य और तप का संतुलित पंथ।
जो यहाँ की धूल को छू ले,
उसमें भी कुछ बदल जाता है,
वाटी की इस पावन माटी से,
जीवन स्वयं काव्य बन जाता है।
अंबालाल उर्फ अमित लोढ़ा,
हृदय से आभार जताता है,
जो इस वाटी की पावन माटी में जन्म लेकर,
अपने जीवन को धन्य बताता है।
जिस धरा ने संस्कार दिए,
जिसने जीवन को अर्थ दिया,
उसी के गुणगान का अवसर पाकर,
मन कृतज्ञता से भर जाता है।
भाग्य है यह, सौभाग्य महान,
जो इस मिट्टी का स्पर्श मिला,
हर कण में छिपी पावनता ने
जीवन का हर रूप खिला।
जो यहाँ की धूल को छू ले,
उसमें भी कुछ बदल जाता है,
वाटी की इस पावन माटी से,
जीवन स्वयं काव्य बन जाता है।