28/04/2026
वृंदावन की पावन भूमि में एक परम भक्त रहते थे — कुंभदास। वे श्रीकृष्ण के अनन्य प्रेमी थे। उनका जीवन अत्यंत सरल था, पर भक्ति इतनी गहरी कि ठाकुर जी स्वयं उनकी ओर आकर्षित हो जाते।
कुंभदास जी रोज़ सुबह-सुबह अपने हाथों से ताज़ा माखन बनाकर ठाकुर जी को भोग लगाते। लेकिन एक दिन उन्होंने देखा कि भोग रखने के बाद माखन अपने आप कम हो जाता है… पहले तो उन्होंने सोचा कोई बिल्ली या चूहा होगा।
पर यह सिलसिला रोज़ होने लगा।
कुंभदास जी को संदेह हुआ — "कुछ तो रहस्य है!"
एक दिन उन्होंने छिपकर देखने का निश्चय किया…
जैसे ही उन्होंने माखन का भोग रखा और छुपकर बैठे, तभी एक नन्हा, अत्यंत सुंदर बालक धीरे-धीरे आया। उसके चेहरे पर मोहक मुस्कान थी, आँखों में शरारत… वह सीधे माखन के पास गया और चोरी-चोरी खाने लगा।
कुंभदास जी यह देखकर चौंक गए!
वे दौड़कर उस बालक को पकड़ने लगे…
लेकिन जैसे ही उन्होंने बालक का हाथ पकड़ा — वह अचानक दिव्य रूप में प्रकट हो गया!
वो कोई और नहीं, स्वयं श्रीकृष्ण थे… वही नटखट माखनचोर!
कुंभदास जी भाव-विभोर होकर रो पड़े और बोले—
“प्रभु! आप तो द्वापर युग में माखन चोरी करते थे… अब कलयुग में भी?”
श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले—
“कुंभदास! मैं अपने भक्तों के प्रेम का भूखा हूँ…
जहाँ सच्चा प्रेम और भक्ति होती है, वहाँ मैं आज भी वैसे ही आता हूँ जैसे द्वापर में आता था।”
यह सुनकर कुंभदास जी की आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे। उन्होंने समझ लिया कि भगवान को पाने का मार्ग केवल सच्चा प्रेम और निष्काम भक्ति है।