14/07/2026
#मेरेविचार #सोमवीरसूईकीकलमसे #मेरापहलालेख
बच्चे परिवार के संपूरक होते है। जिस दिन बच्चे का जन्म होता है सबसे ज्यादा खुश उसकी मां होती है और उसके बाद बाप या दादा दादी। बच्चे को जन्म देना एक मां के लिए युद्ध होता है । एक मां की सहन शक्ति, क्षमता, दृढ़ निश्चय पर सवाल उठाना अनैतिक कर्म होता है ।
बच्चे ज्यों ज्यों बड़े होते जाते है मां बाप लाड़ प्यार के साथ साथ डांट फटकार भी परोसते है ताकि हम हमारी अल्प विकसित समझ की वजह से गलत दिशा में न चले जाएं । मगर हम समझते कुछ और है।
बेशक सुना जाता है की मां बड़े बच्चे की बजाय छोटे बच्चे को अधिक प्यार या लड़की के अपेक्षा लड़के को अधिक प्यार करती है , मगर सच में ऐसा नहीं है मां ने दोनों के लिए बराबर युद्ध लड़े है। अगर हम सोचते है ऐसा ही होता है तो इसमें कहीं न कही हमारे कर्म जिम्मेदार है न की मां।
बच्चो की शादी करना हर मां बाप अपना अंतिम कर्तव्य समझते है सभी बच्चे अलग अलग परिस्थितियों में पलते बढ़ते हुए अपने अपने सपनो को साकार करने की और कदम बढ़ाते है। बीच में ज़िंदगी का ऐसा फेज आ जाता है जिसमे उनको खुद के सपनो को मारकर घर वालो के सपनो को पूरा करना पड़ता है और शादी के बंधन में बंधना पड़ता है।
जब बच्चों की शादी हो जाती है तो हमें यह मानने में बिल्कुल भी संकोच नहीं करना चाहिए कि एक पीढ़ी का अंतर पैदा हो गया है जिसे कभी भी भरा नहीं जा सकता है । हम परंपरागत तौर तरीकों (अंधविश्वास और पाखण्ड) से इतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने लगे है। जमाना बदल चुका है। हम 2G से 5G के युग में आ चुके है। हमारे उद्देश्य बदल रहे है। लड़किया के उद्देश्य चूल्हे चौकों तक सीमित नहीं है। देश के सार्वांगिक विकास में इनका बहुत योगदान है। मगर बहुतायत में यह भी देखा जाता है की शादी के बाद उनके सपने बस सपने बन के रह जाते है, पिता,पति, सास, ससुर के सपनो को पूरा करने का सपना देखती है।
शादी के पहले ही दिन से एक दुसरे पर आधिपत्य स्थापित करने का शीत युद्ध शुरू हो जाता है। क्योंकि एकाधिकार ही रोष पैदा करता है। इस युद्ध में ऐसी विकट स्थिति कई बार पैदा होती है जिसमे "एक" बंदा ना घर का रहता है ना घाट का। मतलब आप समझ ही गए होंगे। गंभीरतापूर्वक देखेंगे तो पायेंगे की लड़की शादी से पूर्व अलग वातावरण में पली पढ़ी है, वो आते ही कटपुतली की तरह आपके इशारों पर काम करे? या आपको कटपुटली की तरह नचाए?कैसे? कैसे ऐसी उम्मीद लगा सकते है। किसी से उम्मीद लगाना मतलब दुखों को बुलाना। इसी उम्मीद ने शीत युद्ध को शस्त्र युद्ध में बदल दिया। हजारों घर तबाह कर दिए।
अगर लड़की की उसके सास, ससुर से अनबन हो जाएं या बात न करे, उन्हें खाना न दे या उनसे बदतमीजी करे तो हो सकता है उस लङकी पर कोई प्रभाव न पड़े मगर उसके पति के लिए कुएं और खाई वाली स्थिति उत्पन्न हो जाती है। 20-25 साल बिताए है अपने मां बाप के साथ उस लड़के ने। उसके सुख दुख में हमेशा साथ रहे, उसकी छोटी छोटी बातों का ध्यान रखा और जब वह लड़का उनके छोटे छोटे सपने पूरे नही कर पाता है तो खुद से लड़ पड़ता है मगर हमेशा हार जाता है। बड़े बड़े राजा महाराजा भी इस से अछूते नहीं रहे है।
इसका समाधान है। खुद से जीतने का उपाय है । "नेकी कर और दरिया में डाल" सिद्धांत को अपनाना पड़ेगा। साथ ही साथ यह भी ध्यान रहें कि -
1) परिवार का कोई भी सदस्य झूठ न बोलें
2) चोरी न करे
3) व्यभिचार न करे
4) नशीले पदार्थों का सेवन न करें
5) किसी भी सजीव वस्तु को जान बूझकर हानि न पहुंचाएं।
यही गौतम बुद्ध द्वारा बताया गया पंचशील है। इसके अलावा परिवार के प्रत्येक सदस्य को "अष्टांगिक मार्ग" का पालन भी करना चाहिए।
इस मार्ग का सफर कठिन ज़रूर होगा मगर सुकूनभरा होगा। कभी न डगमगाने वाली हसीं होगी सदा चेहरे पर।
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