आखर

आखर आखर - एगो डेग भोजपुरी भाषा खातिर
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आखर , कुछ युवा लोगन के अपना माई भाखा ( मातृभाषा ) के प्रचार प्रसार साहित्यिक विकास खाति एगो प्रयास के नाव ह । आखर पेज के कोशिश बा भोजपुरी साहित्य संस्कृति संस्कार आ भोजपुरियापन के शब्दन से तस्वीरन के माध्यम से कविता के माध्यम से लेख कहानी के माध्यम से समाचार , यात्रा संस्मरण के माध्यम से देस दुनिया के सोझा ले आवल जाउ ।

आखर पेज अभी तकले तकरीब 120 गो भोजपुरी किताब अपना पेज प समय समयप होखे वाला लेख

न प्रतियोगिता मे प्रोत्साहन के रुप मे दे चुकल बा । तकरीबन 18 गो भोजपुरी किताब के डाउनलोड करे के लिंक भी आखर पेज प लागि चुकल बा आ ई कुल्हि चीझू समय समय प होत रहेला ।

आखर पेज के कोशिश बा कि भोजपुरिया नवहा लोग भोजपुरी मे लिखो , भोजपुरी के अनुभवी लोगन के आशिर्वाद रुपी लेख से आवे वाली पीढी के परिचय होखे आ हमनी के माई भाखा भोजपुरी दिन दुना रात चौगुना बढंती प रहसु ।

आखर पेज भोजपुरी के आठवा अनूसुची मे शामिल करे खाति संघर्षरत बा आ समय समय प भारत सरकार , सांसद आ विधायक लोगन किहा पाती भी लिखल गईल बा ओह लो के जिम्मेवारी के मन भी परावल गईल बा ।

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धन्यवाद

आखर पेज

अपनों लोग से कहाँ पटत बा भाई,कौनो लेखा जीवन कटत बा भाई।हँस के बिताईं, चाहे रो के बिताईं,एक एक दिन सांस घटत बा भाई।मन्दिर...
20/07/2026

अपनों लोग से कहाँ पटत बा भाई,
कौनो लेखा जीवन कटत बा भाई।

हँस के बिताईं, चाहे रो के बिताईं,
एक एक दिन सांस घटत बा भाई।

मन्दिर भी गइनीं, मस्जिद भी गइनीं,
दुख नाही दुवारी से हटत बा भाई।

सबके बेभरम कइ देहलस महँगाई,
एकरा आगे ना केहूँ ठटत बा भाई।

नून-रोटी सही से अटावे के खातिर,
दिन - रात आदमी खटत बा भाई।

नूरैन होखे चाहे आपन चाहे बेगाना,
गरज परे तबे लोग सटत बा भाई।

-नूरैन अंसारी

"1857 के गदर के जनक अमर शहीद मंगल पांडे जी के जयंती प शत शत नमन "" एगो बहाना चाहत रहे , करेजा मे धधकत आगि के बहरी निकले ...
19/07/2026

"1857 के गदर के जनक अमर शहीद मंगल पांडे जी के जयंती प शत शत नमन "

" एगो बहाना चाहत रहे , करेजा मे धधकत आगि के बहरी निकले खाति बहाना , आगि जवन कई बरिस से धधकत रहे ओह के उसुकावे खाति उटुकेरे खाति कि धधकत आगि के लहकावे खाति आ ओकरा लव मे अंग्रेज लहकि के जरि जा स ओह लहर के जगावे खाति काम कइलस बंदुख के कारतूस जवना मे चर्बी लागल रहे । "

दुर्भाग्य बा हमनी के कि अमर शहीद मंगल पांडे के जन्म स्थान जन्म दिन आ शहादत दिवस आदि के बारे मे इतिहास लगभग चुप बा , ई त कुछ लो कोट मे गईल जांच भईल ओकरा बाद ई सत्यापित भईल कि अमर शहीद मंगल पांडे के जनम युपी के बलिया जिला के नगवा गांव मे १९ जुलाई १८२७ मे भईल रहे । बाबुजी के नाव श्री दिवाकर पांडे ( जगन्नाथ पांडे ) आ माई के नाव अभय रानी रहे , गांवे प पढाई लिखाई भईल कसरती देहि अखाडा दंगल के सवख अमर शहीद के करेजा के भी कसरती बना देले रहे ।

टांठ करेजा, छरहर कसल देहि १८ साल के होत होत जइसे कि साधारण पुरबियन के अधिकतर स्थिति रहे कमाये धमाये पुरब देस जाये के मजबुरी , अमर शहीद के एहि १९-२० बरिस के उमिर मे ईस्ट इंडिया कम्पनी ज्वाईन करे खाति मजबूर कई देहलस आ ई भारत माता के लाल १८४८-४९ मे बैरकपुर के सैनिक छावनी मे ३४ बंगाल नैटिव इंफेंट्री के पैदल सेना १४४६ नम्बर के सिपाही के रुप मे ईस्ट इंडिया कम्पनी के सिपाही बनि गइले ।

एनफील्ड पी ५३ बंदुख के कारतूस ओह लुत्ती के काम कइलस जवना के इंतेजार मे संवसे भारत रहे , असल मे ई बंदुख , ब्राउन बैस बंदूख से ढेर बरिआर सही निशाना आ ब्राउन बैस लेखा मिस फायर ना करत रहे ना एकर नाल ढेर फायरिंग प फाटत रहे , एहि से अंग्रेजन के अकुताई धईले रहे एनफिल्ड पी ५३ के मय सैनिक लो के हाथ मे देबे के , बाकि एनफील्ड पी ५३ के संगे दिक्कत ई रहे के कि एकरा मे कारतुस भरे से पहिले कारतुसवा के दांत से नोचे के परत रहे फेरु बंदूखिया मे भरे के परत रहे , करतुसवा के बहरी चरबी लगावल जात रहे जवना से उ सिले ना नमी जनि धरे आ बंदुखिया मे भरे से पहिले उहे चर्बिया के दांत से नोचे के परत रहे । जब ई बंदूख सैनिक लोगन के मिलल ओहि बीचे ई हावा फईल गईल कि कारतूस के कभर जवन दांत से नोचाता उ चरबी ह आ उ चर्बिया गाई आ सुअर के ह । बस अतना सुनते सगरे हडकम्प मचि गईल आ का हिन्दू का मुसलमान सभे मेआन से बाहर ।

मंगल पांडे भी ओहि मे एगो रहले, पहिले लोकतांत्रिक तरिका से विरोध कइले बाकि अंग्रेजी सेना जवना के नीयत ही रहे भारत के संस्कार संस्कृति के कचरल , लागल बरिआरी करे । आ इहे बरिआरी की बागी बलिया के एह सपूत के ई कुल्हि सहाईल ना , आ विरोध शुरु हो गइल ।

२९ मार्च १८५७ के अपना संग साथ जवार के सैनिक लोगन के अपना ओजस्वी भाषण से जगवले आ ओहि दिने अंग्रेजन के कैम्प प हमला भईल , भारत के जनता सोचते रहे , तबले भारत के बेटा जागि गईल रहलन स , कुछ कई गुजरे खाति, आगि लहक चुकल रहे , शुरुवात हो गईल रहे माँ भारती के बेटा अमर शहीद मंगल पांडे ललकार देले रहले । खबर अंग्रेजन तक पहुंच गइल रहे की मा भारती के सपूत चल देले बाडन स ।

मेजर हडसन अपना सैनिक के टुकडी संगे मंगल पांडे आ इनिका संघतिया लो के रोके खाति निकलले एने से मंगल पांडे आ इनिकर संघतिया , मंगल पांडे आगे बढि के मेजर हडसन के निशाना बना के गोली दागते कहि कि उनुका संग के सैनिक लो लेह लम्मी आ मेजर हडसन ओजुगे सेल्हि गइले । मेजर हडसन के मुअला के खबर जइसे अंग्रेजी सेना के हेडक्वार्टर मे गइल त लेफ्टिनेट बाब लाव लश्कर ले मंगल के मारे चलले , युद्ध शुरु हो गईल रहे , लडत लडत एगो समय अईसन आईल कि मंगल पांडे आ लेफ्टिनेट बाब मे तलवार से युद्ध होखे लागल आ अंत मे मंगल पांडे लेफ्टिनेंट बाब के दुनि बाँहि काटि देहले । बाब के मुअत देखि कर्नल व्हीलर आगे बढले तलेले मंगल पांडे के संघतियन के गर्जना सुनि उ भागि चलले ।

बाद मे अंग्रेज सेना अपना लाव लस्कर के साथ हजारन सिपाहियन आ कई गो अंग्रेज अफसर के मंगल पांडे के पकडे खाति भेजलस कई गो हमला भईल आ अंत मे बलिया के बीर धरा गइले , कोर्ट मार्शल ६ अप्रैल १८५७ के भईल, कोर्ट मार्शल के बेरि ई तई भईल कि १८ अप्रैल के अमर शहीद के फांसी के सजा दिहल जाई । बाकि लुत्ती से लहकल आगि जवन संवसे देस मे पसर गईल रहे , ओकरा ताप से अंग्रेज लोग झुलसे लागल रहे आ इहे डर अंग्रेजवन के घात करे के हुदुकवलस, जवना वजह से अंग्रेजवा , आठे अप्रैल के चुप्पे चोरी शहीद मंगल पांडे के फांसी दे देहलन स । फांसी के बाद कई महीना ले एह विद्रोह के आगि जरत रहे आ एकर नतीजा ९० साल बाद मिलल जब देस १९४७ मे आजाद भईल ।

इतिहासकार एह इतिहास के अपना अपना कलम से अपना अपना हिसाब से लिखले बा लो , लिखाईलो ओतना नइखे जतना लिखाये के चाही बाकि ई हमनी के फर्ज बा कि इतिहास जवन रहे जवन हमनी के अपना पुरखा पुरनिया के मुहे सुनले बानी जा जवन ऊ लो देखले बा ओह के आगे आवे वाली पीढी मे पहुंचावल जाउ .... इतिहास गवाह बा , वर्तमान ओकरे सही रहे जे अपना इतिहास के कदर कइले बा , जे आपन इतिहास भुलवावल ओकरा नाव प दिया जरावे वाला केहु नइखे ।

आखर परिवार , भोजपुरिया समाज आ संवसे राष्ट्र के अमर शहीद मंगल जनमतिथी प बेरि बेरि नमन करत बा ।

मंगल पांडे जी के जयंती के ले के अलग अलग मत ।

1- अधिकतर जगह 19 जुलाई 1827 के कहल गइल बा ।

2- मंगल पांडे जी के गांव के लोगन के कहनाम बा कि - अमर शहीद मंगल पांडे जी के जब फांसी दिहल गइल ओह समय उमिर रहे - 26 बरिस, 2 महीना 8 दिन, जवना के प्रमाण बैरकपुर छावनी में आजो बा । एह हिसाब से अमर शहीद के जयंती 30 जनवरी 1831 होखे के चाहीं ।

3- अनिल ओझा नीरद जी , मंगल पांडेय जी प खण्ड-काव्य लिखले बानी ओह में ' तीसरका सर्ग ' में इहाँ के लिखत बानी -

सन अट्ठारह सइ अट्ठाइस
उनइस रहे दिसम्बर दिन ।
जगन्नाथ पाँडे का घर ऊ
लाल सुघर जनमल जेह दिन ॥

फुलही थारी बाजल अंगना
दुअरा पर बधाव बाजल ।
टोल परोसा तकले घर घर
में, एगो उमंग जागल ॥

अइलीं सभे पुरनियां संग में
सखी सेयानो आई जुटल ।
"मंगल गीति " गवाइल हिलिमिलि
" मंगल अंगना " सगुन उठल ॥

सगुन बिचरले पंडी जी
लड़िका ई तेज बड़ा होई ।
मुदई नाहीं एकरा आगे
तनि के कबो खड़ा होई ॥

[ एहि खण्ड-काव्य में अनिल ओझा नीरद जी , अमर शहीद मंगल पांडे जी बाबुजी के नाव श्री जगन्नाथ पांडे ह बाकिर क जगह दिवाकर पांडेय भी लिखल बा ]

नोट- जब ले आखर के लगे कवनो ठोस प्रमाण नइखे मिल जात तब ले 19 जुलाई के ही मंगल पांडे जी के जयंती के रुप में देखल जाई । उम्मेद बा कि जल्दिये प्रमाण मिल जाई ।

सुख-दुख जीवन में आवत-जात रही,चाहे जईसन भी बनल हालात रही,तहार-हमार जदि असहिं साथ रही,आपन जीवन हरदम मुसकुरात रही।तू हमेशा ...
19/07/2026

सुख-दुख जीवन में आवत-जात रही,
चाहे जईसन भी बनल हालात रही,
तहार-हमार जदि असहिं साथ रही,
आपन जीवन हरदम मुसकुरात रही।

तू हमेशा बनके हमार, साथे हमरा रही ह,
बोलेवाला बोली जेकरा जवन बुझात रही।
तहार हर जायज़ मांग पूरा करत रहब हम,
हमार जबले पूरा करे के बनल औकात रही।

गाँव-जवार से नाता कबहूँ ना टूटी आपन,
भले सालों ले कुवैत या अरब अमीरात रहीं।
जहँवा के माटी में खेल-कूद के हम बड़ भइनी,
ऊ माटी के महक हमरा जीवन में दिन-रात रही।

रस्ता-घाट पर गाछ आ पियाऊ लगावल करीं,
मरला के बादो राउर नेकी ऊपर लिखात रही।
धन-दौलत से कहाँ केहू के आज ले मन भरल बा,
चादर से लमहर गोड़ लोगन के हमेशा पसरात रही।

धन-दौलत के पीछे कबो जियादा मत भागल करीं,
मेहनत से कमाके दु रोटी रउवा शांति से खात रहीं।
मेहनत-मजूरी करेवाला लोगवा कबों भूखे ना मरी,
भूखे ऊ मरी जे मेहनत-मजूरी करे में लजात रही।

मोहम्मद ताजुद्दीन अंसारी
📍 बिजुलिया, असांव, सिवान (महबूला, कुवैत से)

*भोजपुरी गजल*कुछू क ह की देखत हम रहीं तोहकेचुपी भादो के उमड़ल घटा लागेला!!सवनी झपसी के बाटे गज़ब, बेसबबतहरी आँखियां में बू...
19/07/2026

*भोजपुरी गजल*

कुछू क ह की देखत हम रहीं तोहके
चुपी भादो के उमड़ल घटा लागेला!!

सवनी झपसी के बाटे गज़ब, बेसबब
तहरी आँखियां में बूड़ेके मन करेला!!

चान फ़ीका बा तोहरा नजर के तरे
घाम में नईखे तेजी जवन बा तहरे!!

सुर के तान, तुलसी के मानस के छंद
तहरा नजरि में बसे ला शीतल पवन!!

कली चटकन से जइसे गमकी जाला मन
प्यार में जइसे उमखेला सुजीत सवसे बदन!!

सु जीत बक्सर.

हास्य कविता बिना सींग वाली ऊ गाय मारखाहिन हिय,ईयारवा के मउगी हमरा बड़ी झगड़ाइन हिय।बोली-बोली अइसन, लोग कहे मुखियाइन हिय,...
19/07/2026

हास्य कविता

बिना सींग वाली ऊ गाय मारखाहिन हिय,
ईयारवा के मउगी हमरा बड़ी झगड़ाइन हिय।
बोली-बोली अइसन, लोग कहे मुखियाइन हिय,
ईयारवा के मउगी हमरा बड़ी झगड़ाइन हिय।

एक बेरी हरका में परल बानी हमहूँ,
चूल्हीं के चइली से जरल बानी हमहूँ।
पहिले से दुनू बेकत होत रहे लफड़ा,
झोटा-झोटी भइल रहे कीने खातिर कपड़ा।

काल मँडराइल रहे, जाए के परल,
दुआरा पर उनका चिल्लाए के परल।
बस एतने कहनी की आवऽ ईयार बहरी,
काहे मेहरी के संघे बनल बाड़ऽ मेहरी?

आही दादा! बात एतने ओकरा खल गइल,
कटाहवा पिल्ली लेखा हमरा पर पर गइल।
ईयार से पहिले बहरी आ गइल उहे,
कहतिया ढेर यदि बोलबऽ तऽ तुड़ देम मुँहे!

होई नाही ठीक दोबारा अगर अइली,
जरते हमरा पर चला देहलस चइली।
केस लटियाइल जइसे लागे सनकाइन हिय,
ईयारवा के मउगी हमरा बड़ी झगड़ाइन हिय।

धऽ के बढ़िया से रगड़ देहलस करेरे,
गलती रहे कुछू ना, पिटइनी अनेरे।
कहेले “कमली” की ललकी मिरचाइन हिय,
ईयारवा के मउगी हमरा बड़ी झगड़ाइन हिय।

कलामुद्दीन कमली “एक एहसास”

घर घर संस्कृति शहर वाली लागल पसारे पाँवएसी/कूलर के हवा में दब गइल बरगद के छाँवसमय के संगे केतना बदल गइल बा गांव !न रहल प...
19/07/2026

घर घर संस्कृति शहर वाली लागल पसारे पाँव
एसी/कूलर के हवा में दब गइल बरगद के छाँव
समय के संगे केतना बदल गइल बा गांव !

न रहल पुरनका लोग, न रहल बात पुरनका
किस्सा-कहानी बन गइल, सगरी चीज़ निमन का !

नवका फैशन में टूट गइल, सब लाज हया के डोर
भवे-भसुर, सास-ससुर के, रिश्ता भइल कमजोर !

मत पुछि त बढ़िया होइ, आज संस्कार के दशा
अब त लड़िका मारे बाप के, देखे लोग तमाशा !

केहु का कही के, मन से अब निकले लागल डर
गाव में बाबू जी से पहिले ही, बेटी खोज ले वर !

बदलल चाल-चलन के साथे ही, भेस भूषा पहनाव
इया,फुआ ,काका,काकी, बिसरल सगरी नाव
समय के संगे केतना बदल गइल बा गांव !

सोहर, झूमर होरी के लोग, भूल गइल बा गीतिया
छूछे- छूछे बीत जाले छठ ,पीढ़िया,खर-जीवितिया !

बिरहा ,निर्गुन, चइता त सुने के खूब मन तरसे
बाकिर अपने में बेसास लोगवा निकले नाही घर से !

प्रेम अउर भाईचारा में, हाकल डाइन लागल
देख के दोसरा के जरे के डाह मन में जागल !

पहिले जेकर बतिया मन, में मिसरी के रस घोले
अब पता ना उहे लोगवा, काहे अरूआईल बोले !

पर्व त्योहार में भी नइखे,अब पहिले जइसन भाव
बिना मूँछ के लोगवा, मूँछ पर फेरत बाटे ताव
समय के संगे केतना बदल गइल बा गांव !

कट गइल सगरी बाग-बगीचा, मुस्मात भइल फुलवारी
शहर में बसे के सबके, धइले बा घनघोर बीमारी
सुख गइल सगरी पोखरा-इनार, नहर भइल बियाबान
अपना दशा पर फफक- फफक के रोअत बा खलिहान !

गांव के लोगवा के ही आपन गांव ना निमन लागे
खीर-पूड़ी, के छोड़ के लोगवा पिज़्ज़ा के पीछे भागे !

मट्ठा-छाछ के जगे पिये लोग पेप्सी कोला ठंडा
क्रिकेट के आगे मुहधोआ, हो गइल बा गुलीडंडा !

पिछला एक दसक में भइया, गज़ब भइल बा बदलाव
डिजिटल दुनिया के पड़ल बा, बहुत गहरा प्रभाव
समय के संगे केतना बदल गइल बा गांव !

"नूरैन अंसारी"

सावन के झींसी में सावन के झींसी में कुछ गुनगुनाईंजा पावस के कवनों नया गीत गाईंजा।।कुछ अइसन लिखीं जवन कबहूँ ना लिखनीं,कुछ...
17/07/2026

सावन के झींसी में
सावन के झींसी में कुछ गुनगुनाईंजा
पावस के कवनों नया गीत गाईंजा।।

कुछ अइसन लिखीं जवन कबहूँ ना लिखनीं,
कुछ अइसन कहीं जवन कबहूँ ना कहनी।।
हिया के समुंदर में गोता लगा के,
मनमें तरल भावना के जगाईं जा।।
सावन के झींसी में...!

रहीं साथ सभे जुड़ी नेह धागे,
सँवर जाई जिनगी निकल जाईं आगे।।
नदिया के कल कल आ चहकत चिरैयाँ
सावन के झींसी में मनवा उमगाईं जा।।
सावन के झींसी में...!

नया जोश भरि के,नया आस के संग
जिनगी में भरि के नया प्यास के रंग।।
मिटाईं जा कटुता सभे के हिया से
उलझल समइया के मिलि सुलझाईं जा ।।
सावन के झींसी में...!

भोरs के बेरिया आ शीतल बेयरिया में,
फूटत किरनिया के सुन्नर अंजोरिया में।
खिलखिलात फुलवा अस परब मनाके,
बढ़त रहे डेगवा ना पीछे हटाईं जा।।
सावन के झींसी में...!

माधवी उपाध्याय
जमशेदपुर

तोहे कुछो भेटाई ना मनई एसे  बवाल  मत  करिहऽ देश विरोधी बन जइबऽ तू ढेर  सवाल  मत  करिहऽ राशन भासन में जियत रहऽकुछऊ  मलाल ...
17/07/2026

तोहे कुछो भेटाई ना मनई
एसे बवाल मत करिहऽ

देश विरोधी बन जइबऽ तू
ढेर सवाल मत करिहऽ

राशन भासन में जियत रहऽ
कुछऊ मलाल मत करिहऽ

युवा बाड़ऽ बस पढ़त रहऽ,
रोजगार के माँग मत करिहऽ

बुलू सियाही बस अंगुरी लगइहऽ,
उनकर मूड लाल मत करिहऽ

वादा पूरा होई जे कइल रहे पहिले,
झूठो के फुलल गाल मत करिहऽ

उड़े द साहेब के हवाईजहाजी में,
तू साइकिल के भी ख्याल मत करिहऽ

सुनऽ एगो बात जे रिशु कहेले,
देखिहऽ सब जे होता एहिजा
बस बोल के जिनगी नर्केहाल मत करिहऽ।

✍️ रिशु कुमार गुप्ता
📍 कसियां, डुमरांव, बक्सर से

््््  आदमी ््््हर जगहां कहां   बा आदमी हर केहू में    ना बा आदमी अनकर खुशीदेखी के खुश होखेओइसन कहां ल्उकता आदमी बेरि बेर...
17/07/2026

्््् आदमी ््््
हर जगहां कहां
बा आदमी
हर केहू में
ना बा आदमी
अनकर खुशी
देखी के खुश होखे
ओइसन कहां
ल्उकता आदमी
बेरि बेरि अपने
पता पूछता आदमी
कहां से चलल
कहां पहुचल
बा आदमी
तनी प्रसादी खातिर
कुछहू कर ली
मंदिर मस्जिद ला भी
ईमान बेच ले
बा आदमी
बतकही में मशहूर
बाकि काम से दूर
हर घड़ी निसा में
बा चूर आदमी
अब हित मीत
रिश्ता नाता
हो ग्ऐल वेपार
ऐहू में जोरता
हिसाब आदमी
पढल लिखल भी अब
निपढ भृऐल निर्मल
रख देले बा बन्हकी
अपन विचार आदमी।

सुर्येश प्रसाद निर्मल, तरैया शातलपुर

आँधी में दीया बारेम हम,हर मुश्किल के टारेम हम।ऐ जिनगी, आज़मा के देख,हिम्मत कबहूँ ना हारेम हम।अपना मेहनत के दम पर,फूटल भा...
15/07/2026

आँधी में दीया बारेम हम,
हर मुश्किल के टारेम हम।

ऐ जिनगी, आज़मा के देख,
हिम्मत कबहूँ ना हारेम हम।

अपना मेहनत के दम पर,
फूटल भाग्य सँवारेम हम।

गाँव के माटी से वादा बा,
एक दिन कर्ज उतारेम हम।

‘नूरैन’ आई चाहे मत आई,
बाकिर राह निहारेम हम।
-नूरैन अंसारी

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