आखर

आखर आखर - एगो डेग भोजपुरी भाषा खातिर
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आखर , कुछ युवा लोगन के अपना माई भाखा ( मातृभाषा ) के प्रचार प्रसार साहित्यिक विकास खाति एगो प्रयास के नाव ह । आखर पेज के कोशिश बा भोजपुरी साहित्य संस्कृति संस्कार आ भोजपुरियापन के शब्दन से तस्वीरन के माध्यम से कविता के माध्यम से लेख कहानी के माध्यम से समाचार , यात्रा संस्मरण के माध्यम से देस दुनिया के सोझा ले आवल जाउ ।

आखर पेज अभी तकले तकरीब 120 गो भोजपुरी किताब अपना पेज प समय समयप होखे वाला लेख

न प्रतियोगिता मे प्रोत्साहन के रुप मे दे चुकल बा । तकरीबन 18 गो भोजपुरी किताब के डाउनलोड करे के लिंक भी आखर पेज प लागि चुकल बा आ ई कुल्हि चीझू समय समय प होत रहेला ।

आखर पेज के कोशिश बा कि भोजपुरिया नवहा लोग भोजपुरी मे लिखो , भोजपुरी के अनुभवी लोगन के आशिर्वाद रुपी लेख से आवे वाली पीढी के परिचय होखे आ हमनी के माई भाखा भोजपुरी दिन दुना रात चौगुना बढंती प रहसु ।

आखर पेज भोजपुरी के आठवा अनूसुची मे शामिल करे खाति संघर्षरत बा आ समय समय प भारत सरकार , सांसद आ विधायक लोगन किहा पाती भी लिखल गईल बा ओह लो के जिम्मेवारी के मन भी परावल गईल बा ।

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आखर पेज

मत जिहीं मजबूरी मेंपढी-लिखीं भोजपुरी मेंएक हाली अउरी एगो भोजपुरी के नाव प भोजपुरी खाति होत सम्मेलन मे बोलत रहनी । हम भोज...
24/06/2026

मत जिहीं मजबूरी में
पढी-लिखीं भोजपुरी में

एक हाली अउरी एगो भोजपुरी के नाव प भोजपुरी खाति होत सम्मेलन मे बोलत रहनी । हम भोजपुरी के अबर दुबर स्थिति , भोजपुरी मे अश्लीलता , फुहरपन , भोजपुरी के संविधान मे जगहि ना मिलल पढाई लिखाई के भाषा ना बनल प बोलत रहनी , खुब बाँहि भांजि के मुडि झटकि झटकि के बोलत रहनी , अश्लीलता फुहरपन प आपन खीस उझिलत रहनी , अपना बात मे कबो संयम कबो जोश ले आवत रहनी , चई प तीन्ना हो के आपन बात बावन चोप के वाटर-प्रुफ समियाना के अंतिम कोना ले पहुंचावत रहनी ।

हम पुरा खीस मे रहनी , खीस के मारे मुह लाल हो गईल रहे , कबो आंखि के कोर से ठोपे ठोप लोर चु जात रहे , लोग हमरा जोश प , हमरा चई प तीन्ना होखे के आदत प , हमरा बात प , हमरा दिहल परतोख प , बाँहि भाजला , मुडि झटकला प, हमरा खीस प कसियाई के खुब थपरी पीटत रहे , हम कहनी भोजपुरिया लोग रीढविहीन मउग हो गईल बा , लोग ठठा के हंसल खुबे जोर से थपरी पीटल ।
लोगन के हमार बात के सुनि के बडा मजा आवत रहे , बाई जी आ भोजपुरिया सिनेमा के हीरो हिरोईन फुहर गायकन से चले वाला सम्मेलन , खलिहा हमरे भाषन से सफल हो गइल । सम्मेलन के आयोजक लो एक दम गील हो गईल रहे । सुने वाला ठठात हंसत अपने घरे गईल ।

जब हम अईसना कुल्हि सम्मेलन से घरे लवटेनी , खटिआ प ओठंघला के बाद आसमान मे एकटके तिकवत जोन्ही देखत सोचेनी कि जवना समाज के लोग लाज के मारे डूब मरे वाली बात प थपरी बजावत बा ,ठठा के हंसत बा मजा आवत बा ,ओह समाज के मातृभाषा के, का कबो सम्मान मिल सकेला ?

सम्मान त तबे मिली , तब जब लाजे डुब मरे वाला बात प थपरी बजावे वाला, ठहाका लगावे वाला के आलोचना होई आ खुद भोजपुरी में लिखि पढि के उदाहरण बनी, भोजपुरी के बेहतर रुप सोझा ले आई ?

( हरिशंकर परसाई जी से पईंचा ले के अपना हिसाब से बनावे के कोशिश )

- नबीन कुमार

धूप में आ जानी, छाँव में आ जानी,ट्रेन से आ जानी, नाव में आ जानी।उदासेला जब - जब जिउवा हमार,छोड़ के शहर हम गाँव में आ जान...
24/06/2026

धूप में आ जानी, छाँव में आ जानी,
ट्रेन से आ जानी, नाव में आ जानी।
उदासेला जब - जब जिउवा हमार,
छोड़ के शहर हम गाँव में आ जानी।

रिश्तन पे पड़ल पपरी उतर जाला इहवाँ,
सूना पड़ल घर-दुआर निखर जाला इहवाँ,
शरीर में एगो नया ऊर्जा भर जाला इहवाँ।

खुशी में आ जानी, तनाव में आ जानी,
हम जन्मधरती से लगाव में आ जानी।
उदासेला जब - जब ..जिउवा हमार,
छोड़ के शहर हम गाँव में आ जानी।

जिनगी के फ़ाटल पेवन सिलेला इहवाँ आके,
मन के मुरझाईल फूल खिलेला ईहवा आके
आशीष माई-बाबूजी के मिलेला इहवाँ आके,

टेंशन में आ जानी, दबाव में आ जानी,
माई-बाबू जी के प्रेम भाव में आ जानी।
उदासेला जब - जब ..जिउवा हमार,
छोड़ के शहर हम गाँव में आ जानी।

-नूरैन अंसारी

इंटरनेशनल सेमिनारडॉ. अमित भूषण द्विवेदी चलु रे भाई ज्ञान बटाता  एगो बैनर बना के सभे हाँकाता  विदेश से बुला के एगो अपने द...
24/06/2026

इंटरनेशनल सेमिनार

डॉ. अमित भूषण द्विवेदी

चलु रे भाई ज्ञान बटाता
एगो बैनर बना के सभे हाँकाता
विदेश से बुला के एगो अपने देश के आदमी
अब सेमिनार इंटरनेशनल कहाता

खुदहीं कइके योगदान राशि में सहयोग
एक दूसरा के प्रशंसा में कसीदा कढ़ाता
रउरा जे करब खामी ओर तनिको इशारा
रउरा के दूसरका खेमा के बतावल जाता

भारत बनी अब अइसही विश्वगुरु
ख़बर में अब रोज इहे ख़बर छपाता
कहत भूषण ना पड़ी अइसन ज्ञान के फेरा में
जवना में ज्ञान बिना शीर्षक वाचाता ।

(डॉ. अमित भूषण द्विवेदी जी के अर्थशास्त्र विषय में डॉक्टरेट के उपाधि मिलल बा। अबहीं उहाँ केप्रधानमंत्री उत्कृष्ट महाविद्यालय, शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर (मध्य प्रदेश) में अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत बानी।)

पटीदारवा भर गाँवे शादी के नेवता बंटले बा,खाली एगो हमरा के अँसोहातो में छंटले बा।छोट-मोट बात पर लोग आपन मुँह फुला लेला,फि...
24/06/2026

पटीदारवा भर गाँवे शादी के नेवता बंटले बा,
खाली एगो हमरा के अँसोहातो में छंटले बा।

छोट-मोट बात पर लोग आपन मुँह फुला लेला,
फिर भी हमरा दिल में सभे खातिर प्रेम बटले बा।

आज अपनो भाई से लोगवा कोसो दूर भागल रहेला,
जे गैर बा, ओकरा के प्यार से अपना में सटले बा।

हमार कोशिश रहेला कि सभे से मिल-जुल के रहती,
पर ओकरा के का करीं, जेके पागल कुकुर कटले बा।

सभे ठीक से जानेला कि हम हईं सीधा-सपाट आदमी,
तबे नू जेकरा जब मौका मिलल, हमरा के ही डंटले बा।

हम त केहू के बात के अपना दिल पर कबहूँ ना लेनी,
लोगे बा कि पुरनका बात के खोद के फेरू उपटले बा।

निमन त कहाईब जदि लोग के माँग हरदम पूरा करब,
बाकिर हम कहाँ से करीं, जब हमरे हरदम घटले बा।

ओकरा अपना घर के खाना कहाँ निमन लागी "ताज",
जे अपना घर से बाहरे घूम-घूम के हरमेशा चटले बा।

✍️ मोहम्मद ताजुद्दीन अंसारी
📍 बिजुलिया, असांव, सिवान (महबूला, कुवैत से)

झपोली में बायन पेहान कांच बांस के बनल, जवना में खाजा-खजुली ,कसार , गाजा, मोतीचूर, बेलगरामी, कोकड़उर-बुकवा भेजाला। आम के ...
23/06/2026

झपोली में बायन पेहान

कांच बांस के बनल, जवना में खाजा-खजुली ,कसार , गाजा, मोतीचूर, बेलगरामी, कोकड़उर-बुकवा भेजाला। आम के पलो भीतरी धई के अखबार आदि के राखि के बहरी से चारो ओर से ताव के पेपर के लेई से चपकावल जाला। अब एकर जगहि काटुन ले ले बा तबो।

(पाहुर)

फोटो साभार- अजय कुमार (कोसी)

ए भईया, बिसूरत , डंहकत आ अंहकत भोजपुरी-संस्कृति के गारी मत द लो।[ आखर प इ लेख 2015 में प्रकासित भइल रहे । ]जब से सुनले ब...
23/06/2026

ए भईया, बिसूरत , डंहकत आ अंहकत भोजपुरी-संस्कृति के गारी मत द लो।

[ आखर प इ लेख 2015 में प्रकासित भइल रहे । ]

जब से सुनले बानी कि भोजपुरी बेहयाई के भासा ह, का कही आग लागल बा देह में, रात में नींद ना आईल हा। तू लोग के नईखे पता। भोजपुरी भासा में गजब के ताकत बा। तू ओह ताकत के ठीक से नईख जानत।

हम अपना के ओकर संतान मानिले।प्रसिद्ध गायक छन्नू लाल मिश्र एक बेर गायन के क्रम में बतवले कि वेद पहिले गावल ना जात रहे, बांचल जात रहे।एक बेर भारद्वाज जी जात रहन। कुछ औरत सोहर गावत रही स। उनका सोहर चमत्कारिक लागल। उ रूक के सुनले आ उनका वेद गावे के धुन मिल गईल।हमनिके भोजपुरी के इ महिमा बा ए भईया।

बात अगर मात्र सोहर के करी त ओकरा भीतर करेजा काढ लेबे वाला करूणा आ जीवन के रस मे सराबोर कर देबे बाला संगीत बा। हमनिका इ भी जानतानी जा कि इ गीत कतही लिखल नईखे । जाने कतना राजा मर गईले, कतना रानी मर गईली, कतना सम्राज्य माटी में मिल गईल, बाकि इ सब गीत एक मुंह से दूसरा मुंह के यात्रा में सैकडन साल के समय हजारन लाखन लोग के अनुभव आ ताकत बटोर के आज हमनिके सामने जिंदा दिली के साथ कंठ स्वर बन उपस्थित बा, सचमुच इ गर्व करे लायक बात बा।

समय के जवना मोड पर आज खडा बानी जा ,इ कुछ अजीब समय बा। गांव टूट के बिखर रहल बा, परिवार टूट के बिखर रहल बा, आदमी भी भीतर भीतर टूट रहल बा। एह आन्ही में के कहवा जाके टिकी कहल मुश्किल बा। कृषि संस्कृति जवन एह दुनिया के पाल पोस के एईजा तक पहुंचवलस, ओकरा के उखाड फ़ेके खातिर औद्योगिक संस्कृति आ बाजार कमर कस के खाड बा।

होखे के इ चाहत रहे कि हमनिका संतान होखे के कार एकरा पक्ष में खडा होके एगो युद्ध रचितिजा बाकि हमनिके त मतिए फ़िरि गईल बा। हमनिके ओकरा प्रभाव में अपना माई बाप के पहचाने से इनकार कर रहल बानी जा, आपन भाषा संस्कृति के पिछडा पन के निशानी मान रहल बानी जा। आपन गर्व गंवा के हमनिके संस्कृति कवना तरह से बिसूर रहल बा, इ हम बतावल चाहतानी।

एकरा खातिर आज हम बात करब एगो सोहर प जवन राम राज्य के ही ना जाने कतना सम्राज्यन के कलई खोलता आ तात्कालीन समय से आज के समय तक आपन अनिवार्यता साबित करता।

छापक पेड़ छिहुलिया त पतवन गहवर हो।
ताहि तर ठाढ़ हरिनवा त हरिनी से पूछेले हो।

चरतहीं चरत हरिनवा त हरिनी से पूछेले हो।
हरिनी! की तोर चरहा झुरान कि पानी बिनु मुरझेलू हो।

नाहीं मोर चरहा झुरान ना पानी बिनु मुरझींले हो।
हरिना आजु राजा के छठिहार तोहे मारि डरिहें हो।

मचियहीं बइठली कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो।
रानी! मसुआ तो सींझेला रसोइया खलरिया हमें दिहितू न हो।

पेड़वा से टांगबी खलरिया त मनवा समुझाइबि हो।
रानी हिरि-फिरि देखबि खलरिया जनुक हरिना जिअतहिं हो।

जाहू! हरिनी घर अपना खलरिया ना देइबि हो
हरिनी खलरी के खंझड़ी मढ़ाइबि राम मोरा खेलिहें नू हो।

जब-जब बाजेला खंजड़िया सबद सुनि अहंकेली हो,
हरिनी ठाढ़ि ढेकुलिया के नीचे हरिन बिसूरेली हो............।

जवना जगह से एह गीत के शुरूआत भईल बा, इ बहुत खास जगह बा आ एह गीत के भीतर के ध्वनि आ करूणा तक पहुंचे खातिर एह जगह के पडताल बहुत जरूरी बा।

छापक यानी खास (छाप रखे वाला, जानल-पहचानल ) पेड के नीचे ,छिहुल के अरथ नईखे मिलत बाकि छिहना छिहरना के मतलब नष्ट भईल आ छिहान के अर्थ श्मशान होला, छिहुलिया के अरथ भी एकरे आस पास होई काहे पतवन मतलब पत्ता ,गहवन मतलब बेचैन,उद्विग्न होला। गीत जवना जगह आरम्भ भईल बा ,इ या त श्मशान ह जहां एगो पेड बा चाहे इ कहल जाय कि एगो खास पेड के नीचे श्मशानी सन्नाटा पसरल बा अउर पत्ता पत्ता बेचैन बा। गीत अपना आरम्भ में अतना बडा रूपक खडा करता कि मन में सहज ही एगो जिज्ञासा पैदा हो जाता कि आगे का बा, आगे का होखे वाला बा।

आगे एह जगह पर एगो हिरण बा ,एगो हिरणी । हिरण हिरणी का चेहरा उतरल देखके पूछता - ए हिरनी, तहार चेहरा काहे उतरल बा हो? का जंगल में चारा सूख गईल बा ? का जंगल में पानी कम पड गईल बा ?

हिरणी जबाब देतारी – ए हमार हिरन , हमरा जंगल में चारा सूखे के चिन्ता नईखे, पानी सूखे के चिन्ता नईखे, हमरा एह बात के चिन्ता बा कि आज राजा दशरथ के बेटा राम के छ्ठी ह। थोडही देर में राजा के सैनिक अईहे आ तहरा के मार के ले जईहे, एह से हम उदास बानी, एह से ह्मार चेहरा उतरल बा।

हिरण हिरणी के देख के उदास हो जातारे। इ बता देला के बाद कि आज राम के छ्ठिहार बा..तहरा के मार दीहल जाई, गीत में एगो अलग तरह के खामोशी पसर जाता । एह खामोशी के भीतर पाठक या श्रोता प्रवेश कर के मन ही मन पूछता कि का राजा के शिकारी अईले..का हिरण के मार के ले गईले..लेकिन ना त गीत के खामोशी टूटता ना सुने वाला के मन के बेचैनी कम होता। गीत कुछ नईखे बतावत कि का भईल। एह दू लाईन के बीच की दूरी के जब हमनिके अपना चेतना से भरे के प्रयास करतानी जा त उहे श्मशानी दहशत हमनिके भीतर पसरे लागता।

एही दहशत के बीच पाठक आ श्रोता के चकित करके गीत ओईजा जाता जहां कौशिल्या रानी मचिया पर बईठल बाडी आ रसोई में हिरण के मांस पक रह्ल बा । इ सुनला के बाद पहिला बेर मन में हूक नियन कुछ उठता कि बेचारा मार दिहल गईल आ सनसनी बन के पूरा देह में फ़ैल जाता। एकरा बाद कलेजा निकल जाता जब हिरणी हाथ जोड के कौशिल्या से कहतारी- ए महारानी, हमरा हिरण के मांस त रउरा रसोई में पाक रहल बा..हमरा आभागिन पर दया ्करी महरानी जी आ हमरा हिरन के खाल दे दी। कवनो पेड के डाढ हिरण के खाल टांगब आ दुखी भईला पर मन के समझाईब। जंगल में कतहीं से भी घूम ्के आईब आ खाल देख के संतोष कर लेब कि ह्मार हिरना हमरा साथे बा ।

गीत के आगे के लाईन में रानी कौशिल्या हिरणी के खाल देबे से ना सिर्फ़ इनकार करतारी बलुब डांट के कहतारी – ते त बडा स्वारथी बाडे रे हिरनिया, चल जो इहवा से , खाल मांगे के तोर हिम्मत कईसे भईल? तोरा अतनो नईखे बुझात कि जब हमार राम बड होईहे त खंजडी मढावे खातिर कम चमडा काहां खोजे जाईब। हम त एही खलरी से खंजडी मढाईब आ ओकरा के बजा बजा के हमार राम खेलिहे।

हिरनी उदास होके लौट आवतारी। एक बार फ़िर गीत में उहे सन्नाटा पसर जाता आ लागता कि सब कुछ खतम हो गईल। रानी कोसिला के आगे हिरनी हार मान गईल।बाकि ना भोजपुर प्रतिरोध के संस्कृति ह, हार ना माने। ऎइजे के विश्वामित्र नया सृष्टि रचने रहन। हिरनी के ताकत देखी। अगिला भाग में जब गीत आरम्भ होता हिरणी रो के आपना दुख के सार्वजनिक कर रहल बिया।
बहुत समय बीत चुकल बा। राम बड हो चुकल बाडे आ खंजडी बजा बजा के खेलतारे । अक्सर बजावत रहेले आ खेलेले। हिरनी जब जब खंजडी के आवाज सुनेली ,बेचैन हो जाली।विरोध करे के ताकत नईखे एह से अंहकेली। अंहकल पीडा ्के सबसे चरम और मर्मांतक ध्वनि ह. जेकरा के केहू और ना सुने। पीडा में जब कराह के ताकत क्षीण होखे लागेला त अहंकना आरम्भ होला ओकरा बाद बेहोश हो जाला आदमी। हिरणी अहंक रहल बाडी बाकि गौर करे के बात कि इ जगह कौन बा । एह जगह के गीत में खास महत्व बा । हिरनी श्मशानी सन्नाटा से चल के इहवा तक आईल बाडी। उ कवनो ढेकुल के नीचे खाड बाडी । ढेकुल से या त सिंचाई खातिर पानी निकालल जाता है या धान कूटल जाला। कहे के मतलब कि हिरनी श्मशानी सन्नाटा से चल के कवनो सार्वजनिक जगह प आ गईल बाडी कि लोग उनकर रोवल सुने। हिरणी के रोवल , अंहकल राम राज्य के खिलाफ़ प्रतिरोध के खुला आहवान बा। पूरा दुनिया के साहित्य में रोवाई के हथियार बनावे के इ पहिलका उदाहरण बा।

इ संस्कार गीत ह सोहर।
छन्नू लाल मिश्र एकरा के आदम राग कहले बाडे।
सोहर दुनिया का पहिला आ एकलौता गीत बा जेकरा मे शब्द ना वर्ण गावल जाला, अक्षर आ मात्रा गावल जाला, लंबा सांस में। छ.....आ...।....प..अ....क..अ..। एह तरह शब्द से अलग जवन एगो ध्वनि बनेला उ करूणा के बहुत करीब होला। गौर करे के बात इ बा कि एह करूणा के खुशी के करीब यानी घर में लईका के जनम के बाद गावल जाला। इ समूह गान ह,औरतन के समूह एकरा के गावेला। बच्चा के मुंह में माइ के दूध नियन कान खातिर संगीत के पहिला पहिला आहार, पहिला पहिला शब्द । संस्कार से संस्कृति बनेला एह से इ गीत ना एगो आंच ह..। संस्कृति के एही आंच प पाकी ओह लईका के जीवन जवन अभी अभी एह दुनिया में आइल बा।

इ हम बता चुकल बानी कि जवना जगह इ गीत आरम्भ होता उ बहुत खास जगह बा। राजा दशरथ के बेटा राम के छ्ठी बा, सैनिक अईहे आ हिरन के मार के ले जईहे.। तनी गौर करी, आ समझे के कोशिश करी.। हिरण के मराएवाला इ बात अगर ओह हिरनी के मालूम बा त हिरन के मालूम होई कि ना। जरूर मालूम होई। इ एह से भी बुझाता कि गीत में एह सूचना के बाद चकित होखे जईसन कवनो तात्कालिक उत्तेजना नईखे।

एकर मतलब हिरण हिरनी दूनो एह सत्य के स्वीकार कर चुकल बाडे। अब फ़ांसी के सजा नियन कवनो दोसर रास्ता नईखे बाचल एहि से पहिले से माहौल में मरघटी सन्नाटा बा आ पत्ता पत्ता बेचैन बा। अईसना मौका प ओईजा हिरण जब हिरणी से चारा और पानी के बारे में पूछता त समझ में आ जाता कि हिरण के मन में का बा। लागता जईसे सोचत होखे कि हमरा ना रहला प हिरणी के का होई। चारा पानी कंहवा से आई। मतलब इ बात समझ के आ जाता कि राजा दशरथ के राज में चारा और पानी के आभाव रहे आ सत्ता कतना निरंकुश रहे। गीत के समय रामराज्य के बा जवना के बारे में व्याख्याकार कहेले कि ईहवा तीनो ताप दैविक दैहिक और भौतिक आदमी के पास ना आवे। जहां ना त केहू दीन बा ना दरिद्र। इ हमार ना ओह समय के सत्ता आ शासन के नारा ह जवना के सबूत हर जगह उपलब्ध बा। राम राज्य के आदर्श के रूप में एकरा के हर जगह महिमा मंडित कईल गईल बा । बाकी ओही जगह प इ गीत जब आरम्भ होता त बता देता कि असल बात का बा। ओह राम राज में चारा पानी के भी सुविधा ना रहे आ लोगन के जीवन कतना कठिन रहे।
दूसर बात , हमनिके धर्म ग्रंथ बतावेला कि ओह काल में हिरण का मांस पवित्र मानल जात रहे आ ब्राह्मण लोग सिर्फ़ हिरण के ही मांस खात रहन। राम के जन्म लेबे के खुशी मे हिरण के पंडिजी लोग के भोजन खातिर मारल गईल रहे। मरवले रहन राजा दशरथ । इ गीत चिल्ला चिल्ला के बतावता कि इ राज तंत्र के हिंसा रहे जहां अपना उत्सव खातिर केहू के हत्या भी पाप ना रहे। मतलब रामराज्य में भी सत्ता और ब्राहमणवाद के एक हिंसक सामंती गठजोड रहे।

अब रानी कौशिल्या के बाजार वाद देखी। उनका से बहुत विनीत होके हिरणी अपना हिरण (पति ) के खाल मंगली आ खाल ना .कौशिल्या के डांट सुने के मिलल। डांट के बाद खाल के उपयोग में कैसे लावल जाई ,इ विचार मिलता। राम राज्य के उ दौर कतना संवेदनहीन, कतना क्रूर आ कतना बाजारू रहे,ओकर असल चरित्र एह गीत में ही सामने आ्वता। एह गीत में उपर से नीचे तक एक एक कर के राम राज्य के असलियत के परत खटिया के बाध नियन उघरत चल जाता आ मन में राम राज्य के प्रति नफ़रत का भाव पैदा होता आ समझ में आवता कि राम राज्य उच्च वर्ग के लोगन खातिर रहे। बाकि आपन हिरनी भी कम नईखे। उ लुका के अकेले में छिप के नईखे रोवत, अपना हिरण की चमडी से बनल खंजडी के आवाज के समानान्तर सार्वजनिक स्थान पर खडा होके रोवतिया । इ रोवल महज रोवल नईखे,आहवान बा। लागता जैसे चिल्ला चिल्ला के कहत होखे कि इ देखी सभे राम राज्य के असलियत है। देखी सभे हमरा साथे एकर सलूक।भोजपुरी के तमाम गीतन में इ स्वर ना मिलेला। जंतसार में एह तरह के करूणा के स्वर बा बाकि सोहर गीत त अकेला बा शायद।

एह बात के कवनो प्रमाण नईखे कि सोहर गीत के शुरूआत कब भईल । गायकी के लय आ सुर कई बार वैदिक पंक्तियन के उपर खाड बा।

बाकि वेद में ना त राम बाडे ना उनकर कथा। राम कथा सबसे पहले वाल्मिकी लिखले। भाषा के विकास क्रम के अनुसार इ ओह काल के नईखे लागत। वाल्मिकी के बाद भी कई गो रामायण लिखल गईल, बाकि राम के लोक नायक आउर मर्यादा पुरूषोतम तुलसी दास बनवले। जीवन के संस्कार से जुडल राम के गीत तुलसी लिखले । इहे ना होली में चैता में राम के नायक बना के के गीत रचे के परंपरा बन गईल। राम के जन्म पर बहुत अईसन सोहर बा जेकरा के स्वयं तुलसीदास लिखले बाडे।अपना के उ सोहर में शामिल कईले बाडे तुलसी गावेले गाई के बतावेले हो,,, बाकि उनकर सब सोहर आ संस्कार गीत रामचरित मानस नियन राम आ राम राज्य के मर्यादा स्थापित करे में बा।उनकर मूल्य बा कि राम के आदर्श बाचल रहे। मगर ओही जगह, ओही काल में एह सोहर के नया स्वर हमनिके मिलल बा आ राम के जन्म काल में ही उनकर बखिया उधेड के रख देता।
अब हमनिके तनी ओह काल पर गौर करी जा। उ काल अकबर के शासन काल के बा। एह बात के प्रमाण बा कि अकबर दीने इलाही धर्म चलाके हिन्दु मुसलमान को एक कईल चाहत रहे।ओकरे विरोध मे आ दबाव में भक्तिकाल के जन्म भईल। इ जाने के चाही कि तुलसीदास के चिन्ता रहे कि आपन धरम बांचे, प्राचीन भारतीय मूल्य बांचे, एह से उनकर दृष्टिकोण अपना समाज आ संस्कार के प्रति आलोचनात्मक नईखे एह से उ भक्त बन गईले। ओह समय शैव आ वैष्णवो के बीच जवन विवाद रहे ओकरा के निपटवले..इश्वर के बारे मे बतवले कि इ सबका खातिर बाडे जिए है। मगर ओह समय के जवन समाज रहे ,चाहे जईसन होखे,निमन रहे, बस धर्म बाचल रहे। धर्म बाचल रही त सब कुछ ठीक हो जाई। ओहॊ समय निर्गुण संप्रदाय के कबीर दास रहन जिनका पासे आलोचनात्मक दृष्टिकोण रहे।

याद करी ,इहे हाल रहे जब आपन देश गुलाम रहे। महात्मा गांधी के चिन्ता रहे कि अंग्रेजन के कईसे भगावल जाय। अंग्रेज चल जईहे , सत्ता आपन होई,सरकार आपन होई। मिल बैठ्के सब समस्या के समाधान खोज लिहल जाई। गांधी जी आ प्रे्मचन्द दूनो जाना टालस्टाय से प्रभावित रहन। आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के साथ दूनो जाना दूर तक चलल रहे लोग।बाद में प्रेमचन्द आलोचनात्मक यथार्थ वाद के सहारा लिहले आ अलग हो गइले। कहे के मतलब इ बा कि जवना तरह गांधी जी आपन अहिंसा ना छोडले ओही तरह तुलसी मर्यादा ना छोडले। प्रेमचन्द्र नियन कवनो अलग धारा लोक जीवन में जरूर रहे जवन इ सोहर रचे के जरूरत महसूस कईलस। आस पास के जीवन कतना जटिल रहे एकर सूचना एही सोहर से मिलता।

मुस्लिम शासक के बारे में कहल जाला कि खजाने में अतना धन रहे कि केहू के पते ना रहे कि कतना बा।कई बार खजाने के गिने के प्रयास भईल बाकि गिनाईल ना. हार कर छोड दिहल गईल।
इ बेशुमार धन आखिर कहां से आइल रहे?
केकरा के लूट्ल गईल रहे ?
कवना तरह लूटल गईल रहे?
ओह समय आम लोग कवना हाल में जीयत रहे ,बाबा तुलसी के पास एकर कवनो जबाब नईखे। उनकर स्वप्न त राम राज्य रहे। उनका लूट के चिन्ता ना रहे..धर्म के चिन्ता रहे । ओही जगह प ओह समय के अलग विवरण एह गीत में मिलता। इ गीत तुलसी के भक्ति से अलग हटल एगो धारा बा जेकर विवरण नइखे मिलत बाकि स्वर मिलता जवन प्रभावी अंदाज में गावल जाता है। ओह काल में निर्गुण पंथ आ दलित कवियन के उभार भी आश्वस्त करता कि इ स्वर रहे
अब छोड दीही ओह दौर की बात। बड रचना हमेशा काल के प्रवाह से आगे चलेले। लोक के जुबान प बाचल एह गीत में ओह हिरणी के करूणा की ताकत बा जवन समय के अतिक्रमण कर के आपन पहचान बनवले बा आ ओही जवांमर्दी से खाड बा । हम अपने सब से पूछतानी कि का अईसन नईखे लागत कि इ आज के रचना ह,आज के समय के विरोध के करूण स्वर एकरा में बा की ना। आज विरोध के हमनिके सब संवैधानिक आचरण कुंद पड गइल बा। हमनिके हर जगह हथियार डाल के खाड बानी जा। पूजीवादी समाज में, राम के जन्म के छ्ठी पर ब्राहमणों के लिए मारल जात हिरण नईखन दिखाई देत त कुर्बान होत आपन गांव के देखी। कौशल्या में आज के सत्ता नईखे दिखाई देत त बाजार के देखी।

ए भईया, ठीक से सुनी, ठीक से समझी, मति बोली, फ़िरंगी माई के पूंजी। बस हमरा के जाने दी
इ हिरनी ना ह, आपना हाल प बिसूरत डंहकत आ अंहकत हमनिके भोजपुरी संस्कृति ह।

-निलय उपध्याय

नाँव मंत्री के अब रटींला हम- बेढब बनारसीनाँव जेकर बहुत जपींला हमऊ त गुमनाम हौ सुनींला हमशिव क, दुर्गा क पाठ का होईनाँव म...
23/06/2026

नाँव मंत्री के अब रटींला हम

- बेढब बनारसी

नाँव जेकर बहुत जपींला हम
ऊ त गुमनाम हौ सुनींला हम

शिव क, दुर्गा क पाठ का होई
नाँव मंत्री क अब रटींला हम

जब से देखलीं ह रंग हम ओनकर
मन ओही रंग में रँगींला हम

छ रुपइया किलो मलाई हौ
नाम खाली रटल करींला हम

घिव क नाहीं मिलत जलेबा हौ
चाह ओनके बदे धरींला हम

तू त भइलऽ सिमेंट क बोरिया
इंतजारी में नित मरींला हम

अस फँसउलन कि का कहीं भयवा
ऊ चरावेलँऽ आ चरींला हम

तू लड़ाई में पार का पइबऽ
राजनीतिक समर लड़ीला हम

लोग हम्‍मे कहेलन 'बेढब' हौ
बात ढब के मगर कहींला हम

" गांव से भगनी " (उल्था)गांवे गइनीगांव से भगनीरामराज के हाल देखि केपंचायत के चाल देखि केआंगन मे देवाल देखि केकपार प आवत ...
23/06/2026

" गांव से भगनी " (उल्था)

गांवे गइनी
गांव से भगनी
रामराज के हाल देखि के
पंचायत के चाल देखि के
आंगन मे देवाल देखि के
कपार प आवत डाल देखि के
नदी के पानी लाल देखि के
अउरी , आंखि मे बाल देखि के
गांवे गईनी
गांव से भगनी

गांवे गईनी
गांव से भगनी
सरकारी स्कीम देखि के
बालू मे किरिम देखि के
देहि बनावत टीम देखि के
हावा मे उडत भीम देखि के
सई-सई गो नीम हकीम देखि के
बन्हकी धराईल राम रहीम देखि के
गांवे गईनी
गांव से भगनी

गांवे गईनी
गांव से भगनी
जरल खरिहान देखि के
नेता के दालान देखि के
मुसकुरात शैतान देखि के
घिघियात इंसान देखि के
कतहु ना मिले ईमान देखि के
बोझ भइल मेहमान देखि के
गांवे गईनी
गांव से भगनी

गांवे गईनी
गांव से भगनी
नवा धनी के रंग देखि के
रंग भइल बदरंग देखि के
बातचीत के ढंग देखि के
इनारे इनार मे भंग देखि के
झुठा शान उमंग देखि के
पुलिस चोर के संग देखि के
गांवे गईनी
गांव से भगनी

गांवे गईनी
गांव से भगनी
बिना टिकठ बारात देखि के
टांट देखि के भात देखि के
उहे ढाक के पात देखि के
पोखरा मे नवजात देखि के
परल पेट प लात देखि के
मै मै करत औकात देखि के
गांवे गईनी
गांव से भगनी

गांवे गईनी
गांव से भगनी
नया नया हथियार देखि के
खून खून तेवहार देखि के
झुठ के जै जै कार देखि के
सांच के परत मारि देखि के
भगतिन के सिंगार देखि के
गिरत ब्यास के लार देखि के
गांवे गईनी
गांव से भगनी

गांवे गईनी
गांव से भगनी
मुठ्ठी मे कानून देखि के
किचाईन करत दुनो जुन देखि के
कपार प चढल जनून देखि के
बेलमुंडा के नाखुन देखि के
उजबुक अफलातून देखि के
पंडित के सैलून देखि के
गांवे गईनी
गांव से भगनी

हिन्दी मे - कैलाश गौतम

भोजपुरी में उल्था - नबीन कुमार

चंदा के उमेद बाडॉ. अमित भूषण द्विवेदीचंदा के उमेद बा,  चंदनिया फेरु आई ।  उगल-उगल घाम सगरो,  छाँव बन जाई ।  बगिया के बगइ...
23/06/2026

चंदा के उमेद बा

डॉ. अमित भूषण द्विवेदी

चंदा के उमेद बा,
चंदनिया फेरु आई ।
उगल-उगल घाम सगरो,
छाँव बन जाई ।

बगिया के बगइचा गोरी,
जिनगी के साँस बा ।
चंदा के उमेद बा,
चंदनिया फेरु आई ।

उमड़ल-घुमड़ल बादर सगरो,
आंख के काजर बन जाई ।
बरखा बनके बरस जा ए गोरी,
सगरो सावन के झकझोर बा ।

चंदा के उमेद बा,
चंदनिया फेरु आई ।

भीजल-भीजल माटी सगरो,
फूल खिली जाई ।
कहाँ बाड़ी अब तक तू ऐ गोरी,
जिनगी में बड़ा अकेल बा ।

चंदा के उमेद बा,
चंदनिया फेरु आई ।

महकल-महकल जिनगी,
सराबोर होइ जाई ।
बहे रस के धारा चारो ओरी,
सनेहिया के डोर बा ।

चंदा के उमेद बा,
चंदनिया फेरु आई ।

टूटल-फूटल सपना सब,
पल में जुड़ जाई ।
तोहरो प्रीति से गोरी,
जिनगी में अंजोर बा ।

चंदा के उमेद बा,
चंदनिया फेरु आई ।

(डॉ. अमित भूषण द्विवेदी जी के अर्थशास्त्र विषय में डॉक्टरेट के उपाधि मिलल बा। अबहीं उहाँ केप्रधानमंत्री उत्कृष्ट महाविद्यालय, शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर (मध्य प्रदेश) में अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत बानी।)

।। कविता के धुमगजर ।।आज के कवि रचना के अइसन मान बढ़ावेलन,बिना तुकबंदी के गीत-कविता में ज्ञान बतावेलन।नाहीं लय के ही पता ...
23/06/2026

।। कविता के धुमगजर ।।
आज के कवि रचना के अइसन मान बढ़ावेलन,
बिना तुकबंदी के गीत-कविता में ज्ञान बतावेलन।

नाहीं लय के ही पता बा, नाहीं छंद के फिकिर,
ना भाव से लगाव, ना बा ओकर कहीं जिकिर।
ना तनिको शब्द- साधना पर ध्यान लगावेलन,
आज के कवि रचना के अइसन मान बढ़ावेलन।

जइसन छात्र, ओइसने एह घरी के माहटर बाड़न,
नाड़ी धके रोग बतावे,अब ऊ कहाँ डॉक्टर बाड़न।
बस चारगो शब्द जोड़ के दू-चार लाइन बढ़ावेलन,
आज के कवि रचना के अइसन मान बढ़ावेलन।

ई आधुनिक कविता ह,कहके मंच पर माँगस जगह,
कहवाँ चूक बा कविता में, एकर ना खोजस वजह।
तुकांत के बात पूछला पर उल्टे मुँह बिजूकावेलन,
आज के कवि रचना के अइसन मान बढ़ावेलन।

तुकबंदी पूछ दीं त, कहस हम बंधन ना मानिला,
अपना मन के शेर हईं, बहुत कुछ हम जानिला।
छंदन के बात चलेला त रुस के टाँग उठावेलन,
आज के कवि रचना के अइसन मान बढ़ावेलन।

श्रोता बेचारे थपरी पीटस, मन ही मन सोचेलन,
हँसस ठठाके कविजी प, तबहूँ कुछ ना बूझेलन।
"अजय" त अनपढ़ हवन असहीं हवा बनावेलन,
आज के कवि रचना के अइसन मान बढ़ावेलन।

कुमार अजय सिंह
गीतकार एवं कहानीकार
एकवना घाट, बड़हरा, (आरा), बिहार।

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