23/06/2026
ए भईया, बिसूरत , डंहकत आ अंहकत भोजपुरी-संस्कृति के गारी मत द लो।
[ आखर प इ लेख 2015 में प्रकासित भइल रहे । ]
जब से सुनले बानी कि भोजपुरी बेहयाई के भासा ह, का कही आग लागल बा देह में, रात में नींद ना आईल हा। तू लोग के नईखे पता। भोजपुरी भासा में गजब के ताकत बा। तू ओह ताकत के ठीक से नईख जानत।
हम अपना के ओकर संतान मानिले।प्रसिद्ध गायक छन्नू लाल मिश्र एक बेर गायन के क्रम में बतवले कि वेद पहिले गावल ना जात रहे, बांचल जात रहे।एक बेर भारद्वाज जी जात रहन। कुछ औरत सोहर गावत रही स। उनका सोहर चमत्कारिक लागल। उ रूक के सुनले आ उनका वेद गावे के धुन मिल गईल।हमनिके भोजपुरी के इ महिमा बा ए भईया।
बात अगर मात्र सोहर के करी त ओकरा भीतर करेजा काढ लेबे वाला करूणा आ जीवन के रस मे सराबोर कर देबे बाला संगीत बा। हमनिका इ भी जानतानी जा कि इ गीत कतही लिखल नईखे । जाने कतना राजा मर गईले, कतना रानी मर गईली, कतना सम्राज्य माटी में मिल गईल, बाकि इ सब गीत एक मुंह से दूसरा मुंह के यात्रा में सैकडन साल के समय हजारन लाखन लोग के अनुभव आ ताकत बटोर के आज हमनिके सामने जिंदा दिली के साथ कंठ स्वर बन उपस्थित बा, सचमुच इ गर्व करे लायक बात बा।
समय के जवना मोड पर आज खडा बानी जा ,इ कुछ अजीब समय बा। गांव टूट के बिखर रहल बा, परिवार टूट के बिखर रहल बा, आदमी भी भीतर भीतर टूट रहल बा। एह आन्ही में के कहवा जाके टिकी कहल मुश्किल बा। कृषि संस्कृति जवन एह दुनिया के पाल पोस के एईजा तक पहुंचवलस, ओकरा के उखाड फ़ेके खातिर औद्योगिक संस्कृति आ बाजार कमर कस के खाड बा।
होखे के इ चाहत रहे कि हमनिका संतान होखे के कार एकरा पक्ष में खडा होके एगो युद्ध रचितिजा बाकि हमनिके त मतिए फ़िरि गईल बा। हमनिके ओकरा प्रभाव में अपना माई बाप के पहचाने से इनकार कर रहल बानी जा, आपन भाषा संस्कृति के पिछडा पन के निशानी मान रहल बानी जा। आपन गर्व गंवा के हमनिके संस्कृति कवना तरह से बिसूर रहल बा, इ हम बतावल चाहतानी।
एकरा खातिर आज हम बात करब एगो सोहर प जवन राम राज्य के ही ना जाने कतना सम्राज्यन के कलई खोलता आ तात्कालीन समय से आज के समय तक आपन अनिवार्यता साबित करता।
छापक पेड़ छिहुलिया त पतवन गहवर हो।
ताहि तर ठाढ़ हरिनवा त हरिनी से पूछेले हो।
चरतहीं चरत हरिनवा त हरिनी से पूछेले हो।
हरिनी! की तोर चरहा झुरान कि पानी बिनु मुरझेलू हो।
नाहीं मोर चरहा झुरान ना पानी बिनु मुरझींले हो।
हरिना आजु राजा के छठिहार तोहे मारि डरिहें हो।
मचियहीं बइठली कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो।
रानी! मसुआ तो सींझेला रसोइया खलरिया हमें दिहितू न हो।
पेड़वा से टांगबी खलरिया त मनवा समुझाइबि हो।
रानी हिरि-फिरि देखबि खलरिया जनुक हरिना जिअतहिं हो।
जाहू! हरिनी घर अपना खलरिया ना देइबि हो
हरिनी खलरी के खंझड़ी मढ़ाइबि राम मोरा खेलिहें नू हो।
जब-जब बाजेला खंजड़िया सबद सुनि अहंकेली हो,
हरिनी ठाढ़ि ढेकुलिया के नीचे हरिन बिसूरेली हो............।
जवना जगह से एह गीत के शुरूआत भईल बा, इ बहुत खास जगह बा आ एह गीत के भीतर के ध्वनि आ करूणा तक पहुंचे खातिर एह जगह के पडताल बहुत जरूरी बा।
छापक यानी खास (छाप रखे वाला, जानल-पहचानल ) पेड के नीचे ,छिहुल के अरथ नईखे मिलत बाकि छिहना छिहरना के मतलब नष्ट भईल आ छिहान के अर्थ श्मशान होला, छिहुलिया के अरथ भी एकरे आस पास होई काहे पतवन मतलब पत्ता ,गहवन मतलब बेचैन,उद्विग्न होला। गीत जवना जगह आरम्भ भईल बा ,इ या त श्मशान ह जहां एगो पेड बा चाहे इ कहल जाय कि एगो खास पेड के नीचे श्मशानी सन्नाटा पसरल बा अउर पत्ता पत्ता बेचैन बा। गीत अपना आरम्भ में अतना बडा रूपक खडा करता कि मन में सहज ही एगो जिज्ञासा पैदा हो जाता कि आगे का बा, आगे का होखे वाला बा।
आगे एह जगह पर एगो हिरण बा ,एगो हिरणी । हिरण हिरणी का चेहरा उतरल देखके पूछता - ए हिरनी, तहार चेहरा काहे उतरल बा हो? का जंगल में चारा सूख गईल बा ? का जंगल में पानी कम पड गईल बा ?
हिरणी जबाब देतारी – ए हमार हिरन , हमरा जंगल में चारा सूखे के चिन्ता नईखे, पानी सूखे के चिन्ता नईखे, हमरा एह बात के चिन्ता बा कि आज राजा दशरथ के बेटा राम के छ्ठी ह। थोडही देर में राजा के सैनिक अईहे आ तहरा के मार के ले जईहे, एह से हम उदास बानी, एह से ह्मार चेहरा उतरल बा।
हिरण हिरणी के देख के उदास हो जातारे। इ बता देला के बाद कि आज राम के छ्ठिहार बा..तहरा के मार दीहल जाई, गीत में एगो अलग तरह के खामोशी पसर जाता । एह खामोशी के भीतर पाठक या श्रोता प्रवेश कर के मन ही मन पूछता कि का राजा के शिकारी अईले..का हिरण के मार के ले गईले..लेकिन ना त गीत के खामोशी टूटता ना सुने वाला के मन के बेचैनी कम होता। गीत कुछ नईखे बतावत कि का भईल। एह दू लाईन के बीच की दूरी के जब हमनिके अपना चेतना से भरे के प्रयास करतानी जा त उहे श्मशानी दहशत हमनिके भीतर पसरे लागता।
एही दहशत के बीच पाठक आ श्रोता के चकित करके गीत ओईजा जाता जहां कौशिल्या रानी मचिया पर बईठल बाडी आ रसोई में हिरण के मांस पक रह्ल बा । इ सुनला के बाद पहिला बेर मन में हूक नियन कुछ उठता कि बेचारा मार दिहल गईल आ सनसनी बन के पूरा देह में फ़ैल जाता। एकरा बाद कलेजा निकल जाता जब हिरणी हाथ जोड के कौशिल्या से कहतारी- ए महारानी, हमरा हिरण के मांस त रउरा रसोई में पाक रहल बा..हमरा आभागिन पर दया ्करी महरानी जी आ हमरा हिरन के खाल दे दी। कवनो पेड के डाढ हिरण के खाल टांगब आ दुखी भईला पर मन के समझाईब। जंगल में कतहीं से भी घूम ्के आईब आ खाल देख के संतोष कर लेब कि ह्मार हिरना हमरा साथे बा ।
गीत के आगे के लाईन में रानी कौशिल्या हिरणी के खाल देबे से ना सिर्फ़ इनकार करतारी बलुब डांट के कहतारी – ते त बडा स्वारथी बाडे रे हिरनिया, चल जो इहवा से , खाल मांगे के तोर हिम्मत कईसे भईल? तोरा अतनो नईखे बुझात कि जब हमार राम बड होईहे त खंजडी मढावे खातिर कम चमडा काहां खोजे जाईब। हम त एही खलरी से खंजडी मढाईब आ ओकरा के बजा बजा के हमार राम खेलिहे।
हिरनी उदास होके लौट आवतारी। एक बार फ़िर गीत में उहे सन्नाटा पसर जाता आ लागता कि सब कुछ खतम हो गईल। रानी कोसिला के आगे हिरनी हार मान गईल।बाकि ना भोजपुर प्रतिरोध के संस्कृति ह, हार ना माने। ऎइजे के विश्वामित्र नया सृष्टि रचने रहन। हिरनी के ताकत देखी। अगिला भाग में जब गीत आरम्भ होता हिरणी रो के आपना दुख के सार्वजनिक कर रहल बिया।
बहुत समय बीत चुकल बा। राम बड हो चुकल बाडे आ खंजडी बजा बजा के खेलतारे । अक्सर बजावत रहेले आ खेलेले। हिरनी जब जब खंजडी के आवाज सुनेली ,बेचैन हो जाली।विरोध करे के ताकत नईखे एह से अंहकेली। अंहकल पीडा ्के सबसे चरम और मर्मांतक ध्वनि ह. जेकरा के केहू और ना सुने। पीडा में जब कराह के ताकत क्षीण होखे लागेला त अहंकना आरम्भ होला ओकरा बाद बेहोश हो जाला आदमी। हिरणी अहंक रहल बाडी बाकि गौर करे के बात कि इ जगह कौन बा । एह जगह के गीत में खास महत्व बा । हिरनी श्मशानी सन्नाटा से चल के इहवा तक आईल बाडी। उ कवनो ढेकुल के नीचे खाड बाडी । ढेकुल से या त सिंचाई खातिर पानी निकालल जाता है या धान कूटल जाला। कहे के मतलब कि हिरनी श्मशानी सन्नाटा से चल के कवनो सार्वजनिक जगह प आ गईल बाडी कि लोग उनकर रोवल सुने। हिरणी के रोवल , अंहकल राम राज्य के खिलाफ़ प्रतिरोध के खुला आहवान बा। पूरा दुनिया के साहित्य में रोवाई के हथियार बनावे के इ पहिलका उदाहरण बा।
इ संस्कार गीत ह सोहर।
छन्नू लाल मिश्र एकरा के आदम राग कहले बाडे।
सोहर दुनिया का पहिला आ एकलौता गीत बा जेकरा मे शब्द ना वर्ण गावल जाला, अक्षर आ मात्रा गावल जाला, लंबा सांस में। छ.....आ...।....प..अ....क..अ..। एह तरह शब्द से अलग जवन एगो ध्वनि बनेला उ करूणा के बहुत करीब होला। गौर करे के बात इ बा कि एह करूणा के खुशी के करीब यानी घर में लईका के जनम के बाद गावल जाला। इ समूह गान ह,औरतन के समूह एकरा के गावेला। बच्चा के मुंह में माइ के दूध नियन कान खातिर संगीत के पहिला पहिला आहार, पहिला पहिला शब्द । संस्कार से संस्कृति बनेला एह से इ गीत ना एगो आंच ह..। संस्कृति के एही आंच प पाकी ओह लईका के जीवन जवन अभी अभी एह दुनिया में आइल बा।
इ हम बता चुकल बानी कि जवना जगह इ गीत आरम्भ होता उ बहुत खास जगह बा। राजा दशरथ के बेटा राम के छ्ठी बा, सैनिक अईहे आ हिरन के मार के ले जईहे.। तनी गौर करी, आ समझे के कोशिश करी.। हिरण के मराएवाला इ बात अगर ओह हिरनी के मालूम बा त हिरन के मालूम होई कि ना। जरूर मालूम होई। इ एह से भी बुझाता कि गीत में एह सूचना के बाद चकित होखे जईसन कवनो तात्कालिक उत्तेजना नईखे।
एकर मतलब हिरण हिरनी दूनो एह सत्य के स्वीकार कर चुकल बाडे। अब फ़ांसी के सजा नियन कवनो दोसर रास्ता नईखे बाचल एहि से पहिले से माहौल में मरघटी सन्नाटा बा आ पत्ता पत्ता बेचैन बा। अईसना मौका प ओईजा हिरण जब हिरणी से चारा और पानी के बारे में पूछता त समझ में आ जाता कि हिरण के मन में का बा। लागता जईसे सोचत होखे कि हमरा ना रहला प हिरणी के का होई। चारा पानी कंहवा से आई। मतलब इ बात समझ के आ जाता कि राजा दशरथ के राज में चारा और पानी के आभाव रहे आ सत्ता कतना निरंकुश रहे। गीत के समय रामराज्य के बा जवना के बारे में व्याख्याकार कहेले कि ईहवा तीनो ताप दैविक दैहिक और भौतिक आदमी के पास ना आवे। जहां ना त केहू दीन बा ना दरिद्र। इ हमार ना ओह समय के सत्ता आ शासन के नारा ह जवना के सबूत हर जगह उपलब्ध बा। राम राज्य के आदर्श के रूप में एकरा के हर जगह महिमा मंडित कईल गईल बा । बाकी ओही जगह प इ गीत जब आरम्भ होता त बता देता कि असल बात का बा। ओह राम राज में चारा पानी के भी सुविधा ना रहे आ लोगन के जीवन कतना कठिन रहे।
दूसर बात , हमनिके धर्म ग्रंथ बतावेला कि ओह काल में हिरण का मांस पवित्र मानल जात रहे आ ब्राह्मण लोग सिर्फ़ हिरण के ही मांस खात रहन। राम के जन्म लेबे के खुशी मे हिरण के पंडिजी लोग के भोजन खातिर मारल गईल रहे। मरवले रहन राजा दशरथ । इ गीत चिल्ला चिल्ला के बतावता कि इ राज तंत्र के हिंसा रहे जहां अपना उत्सव खातिर केहू के हत्या भी पाप ना रहे। मतलब रामराज्य में भी सत्ता और ब्राहमणवाद के एक हिंसक सामंती गठजोड रहे।
अब रानी कौशिल्या के बाजार वाद देखी। उनका से बहुत विनीत होके हिरणी अपना हिरण (पति ) के खाल मंगली आ खाल ना .कौशिल्या के डांट सुने के मिलल। डांट के बाद खाल के उपयोग में कैसे लावल जाई ,इ विचार मिलता। राम राज्य के उ दौर कतना संवेदनहीन, कतना क्रूर आ कतना बाजारू रहे,ओकर असल चरित्र एह गीत में ही सामने आ्वता। एह गीत में उपर से नीचे तक एक एक कर के राम राज्य के असलियत के परत खटिया के बाध नियन उघरत चल जाता आ मन में राम राज्य के प्रति नफ़रत का भाव पैदा होता आ समझ में आवता कि राम राज्य उच्च वर्ग के लोगन खातिर रहे। बाकि आपन हिरनी भी कम नईखे। उ लुका के अकेले में छिप के नईखे रोवत, अपना हिरण की चमडी से बनल खंजडी के आवाज के समानान्तर सार्वजनिक स्थान पर खडा होके रोवतिया । इ रोवल महज रोवल नईखे,आहवान बा। लागता जैसे चिल्ला चिल्ला के कहत होखे कि इ देखी सभे राम राज्य के असलियत है। देखी सभे हमरा साथे एकर सलूक।भोजपुरी के तमाम गीतन में इ स्वर ना मिलेला। जंतसार में एह तरह के करूणा के स्वर बा बाकि सोहर गीत त अकेला बा शायद।
एह बात के कवनो प्रमाण नईखे कि सोहर गीत के शुरूआत कब भईल । गायकी के लय आ सुर कई बार वैदिक पंक्तियन के उपर खाड बा।
बाकि वेद में ना त राम बाडे ना उनकर कथा। राम कथा सबसे पहले वाल्मिकी लिखले। भाषा के विकास क्रम के अनुसार इ ओह काल के नईखे लागत। वाल्मिकी के बाद भी कई गो रामायण लिखल गईल, बाकि राम के लोक नायक आउर मर्यादा पुरूषोतम तुलसी दास बनवले। जीवन के संस्कार से जुडल राम के गीत तुलसी लिखले । इहे ना होली में चैता में राम के नायक बना के के गीत रचे के परंपरा बन गईल। राम के जन्म पर बहुत अईसन सोहर बा जेकरा के स्वयं तुलसीदास लिखले बाडे।अपना के उ सोहर में शामिल कईले बाडे तुलसी गावेले गाई के बतावेले हो,,, बाकि उनकर सब सोहर आ संस्कार गीत रामचरित मानस नियन राम आ राम राज्य के मर्यादा स्थापित करे में बा।उनकर मूल्य बा कि राम के आदर्श बाचल रहे। मगर ओही जगह, ओही काल में एह सोहर के नया स्वर हमनिके मिलल बा आ राम के जन्म काल में ही उनकर बखिया उधेड के रख देता।
अब हमनिके तनी ओह काल पर गौर करी जा। उ काल अकबर के शासन काल के बा। एह बात के प्रमाण बा कि अकबर दीने इलाही धर्म चलाके हिन्दु मुसलमान को एक कईल चाहत रहे।ओकरे विरोध मे आ दबाव में भक्तिकाल के जन्म भईल। इ जाने के चाही कि तुलसीदास के चिन्ता रहे कि आपन धरम बांचे, प्राचीन भारतीय मूल्य बांचे, एह से उनकर दृष्टिकोण अपना समाज आ संस्कार के प्रति आलोचनात्मक नईखे एह से उ भक्त बन गईले। ओह समय शैव आ वैष्णवो के बीच जवन विवाद रहे ओकरा के निपटवले..इश्वर के बारे मे बतवले कि इ सबका खातिर बाडे जिए है। मगर ओह समय के जवन समाज रहे ,चाहे जईसन होखे,निमन रहे, बस धर्म बाचल रहे। धर्म बाचल रही त सब कुछ ठीक हो जाई। ओहॊ समय निर्गुण संप्रदाय के कबीर दास रहन जिनका पासे आलोचनात्मक दृष्टिकोण रहे।
याद करी ,इहे हाल रहे जब आपन देश गुलाम रहे। महात्मा गांधी के चिन्ता रहे कि अंग्रेजन के कईसे भगावल जाय। अंग्रेज चल जईहे , सत्ता आपन होई,सरकार आपन होई। मिल बैठ्के सब समस्या के समाधान खोज लिहल जाई। गांधी जी आ प्रे्मचन्द दूनो जाना टालस्टाय से प्रभावित रहन। आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के साथ दूनो जाना दूर तक चलल रहे लोग।बाद में प्रेमचन्द आलोचनात्मक यथार्थ वाद के सहारा लिहले आ अलग हो गइले। कहे के मतलब इ बा कि जवना तरह गांधी जी आपन अहिंसा ना छोडले ओही तरह तुलसी मर्यादा ना छोडले। प्रेमचन्द्र नियन कवनो अलग धारा लोक जीवन में जरूर रहे जवन इ सोहर रचे के जरूरत महसूस कईलस। आस पास के जीवन कतना जटिल रहे एकर सूचना एही सोहर से मिलता।
मुस्लिम शासक के बारे में कहल जाला कि खजाने में अतना धन रहे कि केहू के पते ना रहे कि कतना बा।कई बार खजाने के गिने के प्रयास भईल बाकि गिनाईल ना. हार कर छोड दिहल गईल।
इ बेशुमार धन आखिर कहां से आइल रहे?
केकरा के लूट्ल गईल रहे ?
कवना तरह लूटल गईल रहे?
ओह समय आम लोग कवना हाल में जीयत रहे ,बाबा तुलसी के पास एकर कवनो जबाब नईखे। उनकर स्वप्न त राम राज्य रहे। उनका लूट के चिन्ता ना रहे..धर्म के चिन्ता रहे । ओही जगह प ओह समय के अलग विवरण एह गीत में मिलता। इ गीत तुलसी के भक्ति से अलग हटल एगो धारा बा जेकर विवरण नइखे मिलत बाकि स्वर मिलता जवन प्रभावी अंदाज में गावल जाता है। ओह काल में निर्गुण पंथ आ दलित कवियन के उभार भी आश्वस्त करता कि इ स्वर रहे
अब छोड दीही ओह दौर की बात। बड रचना हमेशा काल के प्रवाह से आगे चलेले। लोक के जुबान प बाचल एह गीत में ओह हिरणी के करूणा की ताकत बा जवन समय के अतिक्रमण कर के आपन पहचान बनवले बा आ ओही जवांमर्दी से खाड बा । हम अपने सब से पूछतानी कि का अईसन नईखे लागत कि इ आज के रचना ह,आज के समय के विरोध के करूण स्वर एकरा में बा की ना। आज विरोध के हमनिके सब संवैधानिक आचरण कुंद पड गइल बा। हमनिके हर जगह हथियार डाल के खाड बानी जा। पूजीवादी समाज में, राम के जन्म के छ्ठी पर ब्राहमणों के लिए मारल जात हिरण नईखन दिखाई देत त कुर्बान होत आपन गांव के देखी। कौशल्या में आज के सत्ता नईखे दिखाई देत त बाजार के देखी।
ए भईया, ठीक से सुनी, ठीक से समझी, मति बोली, फ़िरंगी माई के पूंजी। बस हमरा के जाने दी
इ हिरनी ना ह, आपना हाल प बिसूरत डंहकत आ अंहकत हमनिके भोजपुरी संस्कृति ह।
-निलय उपध्याय