एकांत और मैं

एकांत और मैं || ~शिवोsहम~||📿🪘
"स्मरच्छिद्दं पुरच्छिद्दं भवच्छिद्दं मखच्छिद्दम्।
गजच्छिद्दान्धकच्छिद्दं तमन्तकच्छिद्दम् भजे॥"

यह कहानी टाइटैनिक के उस हिस्से की है जिसे ज्यादातर लोग कभी जान ही नहीं पाए। चमकते डेक, संगीत और शानो शौकत के नीचे एक दूस...
03/11/2025

यह कहानी टाइटैनिक के उस हिस्से की है जिसे ज्यादातर लोग कभी जान ही नहीं पाए। चमकते डेक, संगीत और शानो शौकत के नीचे एक दूसरी दुनिया थी, जहाँ Black Gang नाम के लोग काम करते थे। यही असली मेहनती हाथ थे जो टाइटैनिक को चलाते थे।

जहाज के सबसे निचले हिस्से में भट्ठियों का लंबा इलाका था। चारों ओर अंधेरा, भयंकर गर्मी, कोयले की उड़ती धूल और सिर्फ आग की लाल चमक। यही इन मजदूरों का रोज का माहौल था। कोई ठंडी हवा नहीं, कोई खिडकी नहीं, बस आग, धुआँ और पसीने से तर शरीर।
Firemen भट्ठियों में कोयला झोंकते थे ताकि भाप बनती रहे और इंजन घूमता रहे। Trimmers कोयले को संभाल कर रखते थे ताकि जहाज संतुलित रहे। टनों कोयला झांकने के कारण उनके हाथ जल जाते, कपड़े हमेशा गीले रहते और सांस लेना तक मुश्किल हो जाता। फिर भी यही मेहनत टाइटैनिक को ताकत देती थी।

फिर वह रात आई जिसे इतिहास कभी नहीं भूलता। टाइटैनिक बर्फीले पानी में हिमखंड से टकराया। ऊपर अफरा तफरी फैलने लगी, लेकिन नीचे Black Gang भागे नहीं। वे जानते थे कि अगर भट्ठियाँ अचानक बंद हो गईं तो जहाज और जल्दी डूबेगा।
उन्होंने वहीं रहकर पानी रोकने की कोशिश की, भट्ठियाँ बंद कीं और पम्प और बिजली को जितना हो सके उतने समय तक चलाए रखा। क्योंकि जब तक रोशनी और वायरलेस चलते रहे, ऊपर लोग बचाव नावों में चढ़ते रहे और मदद का संदेश भेजा जा सका।

इनमें से बहुत से मजदूर बाहर नहीं निकल पाए। जहाँ ऊपर संगीत और अमीरी थी, वहीं नीचे उन्हीं भट्ठियों के बीच उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली। दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।

यह कहानी उन अनसुने नायकों की है जिनकी पसीने और हिम्मत ने टाइटैनिक को चलाया और डूबते समय भी उम्मीद की रोशनी बुझने नहीं दी
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हरियाणा: गांव सौंडा में प्लॉट में खोदाई के दौरान श्रीराम लिखा हुआ तैरने वाला पत्थर और अन्य धातु की मूर्तियां मिली हैं। ज...
02/11/2025

हरियाणा: गांव सौंडा में प्लॉट में खोदाई के दौरान श्रीराम लिखा हुआ तैरने वाला पत्थर और अन्य धातु की मूर्तियां मिली हैं। जो लाल रंग के कपड़े में बांधी हुई थी। यह वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल की जा रही है। वहीं, प्लॉट मालिक मूर्तियां निकलने का दावा कर रहा है, लेकिन इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

लक्ष्मी नगर की रहने वाली राजरानी ने बताया कि उसका गांव सौंडा में प्लॉट है, जहां पर वह अपना मकान बनाने जा रही थी, इसको लेकर प्लॉट पर जेसीबी चल रही थी। उसके पास कॉल आई कि प्लॉट में तैरने वाला पत्थर और मूर्तियां मिली हैं। जिसके बाद वह मौके पर पहुंची।

देखा कि खाटू श्याम, हनुमान, लड्डू गोपाल की धातू की मिली मूर्तियां, श्रीराम लिखा तैरने वाला पत्थर है। जहां पर उसने काम रुकवा दिया है। उन्होंने कहा कि वह पहले उसका घर बनाया जाए, फिर अपना घर बनाया जाए। उन्होंने कहा कि लोग मांग कर रहे हैं कि यहां पर मंदिर बनाओ। क्योंकि आज एकादशी है और खाटू श्याम का जन्मदिन है। जिसके बाद खाली प्लॉट पर भजन कीर्तन शुरू कर दिया गया।

#दैनिक_जागरण

आज ही के दिन यानी 22 नवंबर, 1774 की दोपहर को, रॉबर्ट क्लाइव — जिन्हें आम तौर पर भारत का लॉर्ड क्लाइव कहा जाता था — श्रॉप...
02/11/2025

आज ही के दिन यानी 22 नवंबर, 1774 की दोपहर को, रॉबर्ट क्लाइव — जिन्हें आम तौर पर भारत का लॉर्ड क्लाइव कहा जाता था — श्रॉपशायर काउंटी के वाल्कोट स्थित अपने भव्य घर के बाथरूम में मृत पाए गया। उसी रात, उनके पार्थिव शरीर को पास के मोरेटन से स्थित चर्च ले जाया गया। वहाँ, अंतिम संस्कार में केवल कुछ ही शोकसभा में उपस्थित लोगों की उपस्थिति में, उन्हें दफनाया गया, उनकी कब्र का सही स्थान अज्ञात है। उनकी मृत्यु का विवरण प्रेस में अस्पष्ट जानकारी के माध्यम से जनता से छिपाया गया, जिससे प्रेस को संदेह हुआ कि क्या हुआ था।

18 वर्ष का राबर्ट क्लाइव भारत में केवल , ईस्ट इंडिया कंपनी मामूली क्लर्क बनकर 1744 में आया था । और नौ वर्ष तक लगातार, उसने हर तरह से भारत को लूटा , हर तरह से धन कमाया , सोना चांदी हीरा मोती । कुछ नही छोड़ा । राजाओं के राज्य के राज्य हड़प लिए । लोगो को सूलियों पर चढ़ा दिया । भारत में हर तरह से मौत का तांडव किया ।

दिलचस्प ये है की उसके जितना टूटा उसका आधा ही कंपनी को दिया । यानी भारत की लूट का आधा हिस्सा उसके खुद अपनी तिजोरी में रखा । और जब 1753 में क्लाइव भारत से लौटा तो लोग उसकी अकूत संपत्ति और आश्चर्यजनक वैभव देखकर लोग चकित रह गए । लोगो को बल्कि खुद उसके सहकर्मी और ईस्ट इंडिया कंपनी के तमाम उच्चाधिकारियों को उसमे ईर्ष्या होने लगी । ब्रिटिश सरकार के तमाम अधिकारियों को उसकी शोहरत हजम नही हुई ।
ऐसे में सरकार ने उसके खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा दायर कर दिया । और कोर्ट में उसकी पेशियां होने लगी ।
इसी बीच उसको एक बार फिर भारत जाने का मौका मिला चूंकि वो एक योद्धा था , इस लिए ब्रिटिश सरकार ने पुनः ब्रिटिश सरकार का प्रभुत्व स्थापित करने के लिए फोर्ट सेंट डेविड के उप गवर्नर बनाकर भारत भेजा । इसी समय 1757 में इसके सिराजुद्दौला को हराया , यह युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए एक निर्णायक जीत थी, जिसके परिणामस्वरूप कंपनी भारत में सर्वोच्च शक्ति बन गई। लेकिन इस बीच ब्रिटिश सरकार में इसकी लोकप्रियता में भारी कमी आई । इसके ऊपर भष्टाचार का आरोप धीरे धीरे सिद्ध होने लगे थे । भारत में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने बहुत धन कमाया, जिसके कारण ब्रिटेन में उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और संसद में उनकी कड़ी आलोचना हुई। इन मुकदमों और बदनामी से वह बहुत परेशान और शर्मिंदा रहने लगा था ।
जब क्लाइव ने जनवरी 1767 में भारत छोड़ा तो उसके पास £401,102 (2023 में £67,900,000 के बराबर) की संपत्ति थी । जो लोग कल तक इसकी भारत विजय का गुणगान करते नही थक रहे थे , वही लोग इसे कोसने लगे ।
वैसे भी भारत ने किए गए इसके अत्याचार की हाय इसे लेकर तर गई ।
भारत से वापसी के बाद इसे भारी अवसाद ने घेर लिया क्लाइव दिन दिन भर अपनी अरबों खरबों के महल में पड़ा रहता था । कहते है अंत आखिरी समय में ये भारत में किए गए गुनाह को सोचकर रोया करता था ।
खैर इसी तरह के अवसाद के चलते अफीस की लत ने उसे विक्षिप्त कर दिया और इसी विक्षिप्तता में उसने 22 नवंबर, 1774 को 49 वर्ष की अवस्था में आत्महत्या कर ली ।

“यह एक ऐसे व्यक्ति के जीवन का एक अपमानजनक अंत था जिसकी प्रतिष्ठा - उसके अपने चरित्र में प्रतिबिम्बित - एक चरम से दूसरे चरम तक झूलती रही। या तो वह ब्रिटिश इतिहास का सबसे महान सैन्य नेता था जिसने अकेले दम पर एक साम्राज्य स्थापित किया, या वह वह व्यक्ति था जिसने अपने लाभ के लिए एक गौरवशाली देश की संपत्ति को व्यक्तिगत रूप से लूटा और लूटा। शायद एकनिष्ठ दृढ़ निश्चयी और साहसी व्यक्ति या एक "अस्थिर समाजोपथ" (विलियम डेलरिम्पल के शब्दों में), जिसकी मूर्तियाँ नष्ट कर दी जानी चाहिए। इतिहास के फैसले पर अभी भी विवाद है। फिर भी, क्लाइव और उसकी विरासत के बारे में तर्क स्पष्ट रूप से इतिहास के बारे में नहीं , बल्कि राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर वर्तमान बहसों और दृष्टिकोणों के प्रति हमारे अपने दृष्टिकोण के बारे में हैं।”



चंद्रशेखर आजाद की माता जी पर यदि अलग से फिल्म बने तो लोग रोएंगे वो स्थित देख कर । इतनी गरीबी थी, लड़का मर गया, पति भी नह...
02/11/2025

चंद्रशेखर आजाद की माता जी पर यदि अलग से फिल्म बने तो लोग रोएंगे वो स्थित देख कर । इतनी गरीबी थी, लड़का मर गया, पति भी नहीं रहा । आवारा जानवरों के गोबर के कंडे बना के बेचती थी दो रोटी मिल पाती थी । दो उंगलियों बांध रखी थी, संकल्प में की जब चंदू आयेगा तब खोलेंगी चंदू तो नहीं आया वापस, उनका एक मित्र जब जेल से छूट के आया तब उसने उनकी उंगली खुलवाई जो आपस में चिपक चुकी थी । मांस से मांस मिल चुका था इतने वर्षों तक बंधे रहने के कारण।
ये वही मित्र था जिसकी ली चंद तस्वीरें हमें मिलती है । पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का परिवार भी बेहद गरीब था । पर इन्होंने लड़ना नहीं छोड़ा । न गरीबी का बहाना किया । अगर देश में किसी की मूर्तियां लगानी है तो ऐसे योद्धाओं की मां की लगाओ , जिन्होंने क्रांक्ति की आग को बुझने नही दिया । नमन है । शंदरशेखर आजाद की मां को । सादर पुष्पांजलि🙏

विज्ञान की इस अंधाधुंध दौड़ में गोपनीयता का तो अर्थ ही बदल गया है । मुझे नही लगता इस समय , जीवन की कुछ चीजों को छोड़कर क...
31/10/2025

विज्ञान की इस अंधाधुंध दौड़ में गोपनीयता का तो अर्थ ही बदल गया है । मुझे नही लगता इस समय , जीवन की कुछ चीजों को छोड़कर कुछ भी गोपनीय है । फिलहाल उन्ही कुछ गोपनीय चीजों में एक है , हमारा सपना । जो हम एकांत में , रात में , वो भी सोते समय ही देखते है । अगर हम ना बताएं तो कदाचित कभी कोई , हमारे सपनों के बारे में नहीं जान ही नहीं पाएगा । सपना तो इतना गोपनीय होता है , कि अगर ज्यादा देर हो जाए तो खुद भी याद नहीं रहता । फिलहाल सपना कैसा भी हो उससे ज्यादा पर्सनल कुछ नही होता ।

लेकिन अभी कुछ दिन पहले अमेरिका की एक कंपनी जिसका नाम है – “ REMspace ” ने दावा किया है कि हमने एक नई तकनीक विकसित की है । यह तकनीक सपने देखने के समय दो लोगों के बीच हुई बातचीत को रिकॉर्ड कर सकती है। इस प्रयोग के लिए वैज्ञानिकों ने खास तौर पर डिजाइन किए गए उपकरण का इस्तेमाल किया है। इसमें एक सर्वर, एक डिवाइस, वाईफाई' और सेंसर का प्रयोग होता है।

सुनने में ये सब किसी मूवी का स्क्रीन प्ले लग रहा होगा लेकिन ये सच है । चलिए बताते हैं की ये प्रयोग कैसे किया गया ?
वैज्ञानिनों ने पहले इस प्रयोग के लिए कुछ लोगो का चयन किया । और फिर अलग–अलग घरों में सोने के लिए बोला , ताकि सोने के बाद देखे गए सपने को रिकार्ड किया जा सके । प्रतिभागियों के सोने के बाद वैज्ञानिकों ने इंतजार किया कि कब ये लोग कब ल्यूसिड ड्रीम में प्रवेश करते है ( ल्युसिड ड्रीम दरअसल एक ऐसी स्थिति होती है , जब सपना देखने वाले को पता होता है कि वो सपना देख रहा है । ये ज्यादातर बहुत गहरी नींद में होता है ) ल्यूसिड ड्रीम में जब उन लोगो ने सपने में बाते की तो । इस तकनीकी ने उनकी मस्तिष्क की तरंगों को टेप किया ।और एक सर्वर की मदद से डेटा सहेजता है ।

हालांकि कंपनी ने इसके बारे में अधिक खुलासे तो नही किए है फिर भी उनका कहना है कि:– इस तकनीक को विकसित करने का मकसद मानसिक स्वास्थ्य में मदद करना और नए कौशल सिखाना है, लेकिन सिर्फ ल्यूसिड ड्रीम के दौरान ही यह घटना संभव है।

आरईएमस्पेस के सीईओ और संस्थापक माइकल रेडुगा ने बताया कि अभी तक सपनों में बात करना विज्ञान की कहानियों की तरह लगता है , लेकिन आने वाले समय में यह इतना आम हो जाएगा कि इंसान इस तकनीक के बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकेंगे । इस तकनीक से सपनों की दुनिया में बातचीत करने और लोगों के सोचने के तरीके को एक नया आकार मिलेगा।








हमारी धरती गोल नही चपटी है । बचपन से कुरान की लिखी बातें दिमाग में इस तरह बसी कि युटूबर जेरेन केम्पानेला ने इस एक बात को...
30/10/2025

हमारी धरती गोल नही चपटी है । बचपन से कुरान की लिखी बातें दिमाग में इस तरह बसी कि युटूबर जेरेन केम्पानेला ने इस एक बात को सही साबित करने के लिए तकरीबन 31लाख रुपए ($37,000) खर्च कर दिए । दरअसल अमेरिका के जेरेन केम्पानेला फ्लैट अर्थ' सिद्धांत के समर्थक थे । और इस सिद्धांत को सही साबित करने के लिए उन्होंने अंटार्कटिका में “ 'द फाइनल एक्सपेरिमेंट ” नाम का एक महंगा अभियान चलाया , ताकि यह साबित किया जा सके की धरती गोल नही चपटी है और अंटार्कटिका दुनिया के किनारे पर एक "बर्फ की दीवार" है।
हालांकि, दक्षिणी गोलार्ध की गर्मी के दौरान अंटार्कटिका पहुंचने पर, उन्हें 'मिडनाइट सन' (मध्यरात्रि सूर्य) का अनोखा अनुभव हुआ, जहाँ सूर्य 24 घंटे तक क्षितिज पर दिखाई देता है। यह खगोलीय घटना केवल गोल पृथ्वी के मॉडल से ही समझाई जा सकती है। इस अनुभव ने कैम्पानेला के विचारों को पूरी तरह से बदल दिया। उन्होंने यूट्यूब पर एक वीडियो जारी कर अपनी गलती मानी और स्वीकार किया कि 'एज़िमुथल इक्विडिस्टेंट' (AE) नक्शा, जो फ्लैट अर्थ थ्योरी का आधार है, इस घटना को नहीं समझा सकता। उनके लिए यह अभियान एक बड़ी व्यक्तिगत शिक्षा और एक साजिश सिद्धांत के खंडन का शक्तिशाली, वास्तविक दुनिया का प्रमाण बन गया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 अक्टूबर को रिलीज़ होने वाली फ़िल्म 'द ताज स्टोरी' की रिलीज़ और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी CBFC...
30/10/2025

दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 अक्टूबर को रिलीज़ होने वाली फ़िल्म 'द ताज स्टोरी' की रिलीज़ और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी CBFC सर्टिफिकेशन के खिलाफ़ दाखिल जनहित याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि फिलहाल इस मामले में जल्द सुनवाई की जरूरत नहीं दिखाई देती. इसलिए इसे तुरंत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया जा सकता.
याचिकाकर्ता वकील शकील अब्बास ने अदालत से फिल्म की रिलीज़ पर रोक लगाने और सेंसर बोर्ड द्वारा दिए गए प्रमाणपत्र को रद्द करने की मांग की थी.कोर्ट में दाखिल अर्जी में वकील ने कहा कि फिल्म में इतिहास को तोड़-मरोड़ कर दिखाया गया है. फिल्म से साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ सकता है.



अभी कुछ दिन पहले जब फिल्म ‘ द केरला स्टोरी ’ रिलीज हुई थी । तो बहुत से कांग्रेसी और कम्युनिस्ट नेता, फिल्म को प्रोपेगेंड...
30/10/2025

अभी कुछ दिन पहले जब फिल्म ‘ द केरला स्टोरी ’ रिलीज हुई थी । तो बहुत से कांग्रेसी और कम्युनिस्ट नेता, फिल्म को प्रोपेगेंडा बोल कर विरोध कर रहे थे। उनमें से एक थे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी केरल के नेता पीवी भास्करन जो पार्टी में बड़े पद पर हैं । कासरगोड के बड़े नेता है ।

“उन्होंने फिल्म केरल स्टोरी को फेक प्रोपेगेंडा कहा था । और कहा था कि केरल स्टोरी में सब झूठी बातें दिखाई गई है कोई भी मुस्लिम किसी हिंदू लड़की को अपने प्रेम जाल में नहीं फसाता है ।”

खैर मूवी रिलीज के समय विरोध और समर्थन तो आम बात होती है लेकिन अभी कुछ दिन पहले ही जब उनकी बेटी ने एक वीडियो रिलीज किया । तब तो तहलका मच गया ।
उनकी बेटी जिसका नाम संगीता है ।“ वह वीडियो में कह रही है कि मैं एक मुस्लिम व्यक्ति से प्यार करती हूं, लेकिन मेरे पिताजी ने मुझे घर में कैद कर दिया है । वह मुझे 20 दिन से घर से बाहर नहीं निकलने दे रहे हैं मुझे टॉर्चर किया जा रहा है ।

दरअसल उनकी बेटी संगीता को एक शादीशुदा मुस्लिम ने प्रेम जाल में फंसा लिया है ।
अब वही पीवी भास्करन मीडिया में कह रहे हैं कि मैं अपनी फूल सी बेटी को एक पहले से विवाहित मुस्लिम इसके पहले से चार बच्चे हैं मैं उसके साथ जाने की इजाजत कैसे दूं ?
अब वह कह रहे हैं कि उस शादीशुदा मुस्लिम ने जो पहले से चार बच्चों का बाप है मेरी बेटी को साजिश करके प्रेम जाल में फंसा लिया है

यही होता है जो जितना सेकुलर बनता है उसके परिवार ऐसे ही बर्बाद होते हैं ।

याद है शीला दीक्षित जो इतनी मजबूत महिला थी लेकिन तब वह टूट गई जब उनकी बेटी ने एक मुस्लिम से विवाह किया और वह मुस्लिम उनकी बेटी को इतना प्रताड़ित करता था इतना मारता था उनको पैसे के लिए इतना टॉर्चर करता था अंत में अपनी बेटी की हालत देखकर शीला दीक्षित बेहद टूट चुकी थी

और कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश के देवास के एक बड़े कांग्रेसी नेता जो कोई राजानी करके थे उन्होंने बड़ी धूमधाम से अपनी बेटी की शादी एक मुस्लिम से किया था उन्होंने भी तब कहा था कि हम कांग्रेसी हैं हम हिंदू मुस्लिम नहीं करते और विवाह के मात्र 3 महीने के बाद उस मुस्लिम ने उनकी बेटी को प्रताड़ित करके मार डाला ...
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पुलिस और चोर की कहानी में , चोर हमेशा पुलिस से दो कदम आगे की सोचता है । ये बस कहावत नही है ।बात करते है 60–70 के दशक में...
29/10/2025

पुलिस और चोर की कहानी में , चोर हमेशा पुलिस से दो कदम आगे की सोचता है । ये बस कहावत नही है ।
बात करते है 60–70 के दशक में चंबल घाटी की । ये वो जमाना था कि चंबल नदी के आसपास की घाटियों में कई खतरनाक डाकुओं के गिरोह सक्रिय थे । जिसने मोहर सिंह, मान सिंह , पान सिंह तोमर , मलखान सिंह , माधो सिंह के गिरोह बहुत प्रसिद्ध थे। उसमे एक गिरोह था , चार्ली राजा का । उन समय के गिरोहों सबसे सबसे आधुनिक और सबसे ज्यादा पुलिस को छकाने का रिकार्ड चार्ली राजा को ही था । 60–70 के दशक में जब अधितर डाकू पैदल ही लूटपाट करते थे । लेकिन कुछ के पास घोड़े आदि भी थे । लेकिन इसके बावजूद भी पुलिस के पास कोई विशेष सुविधा नही थी कि डाकुओं का सामना करने के लिए ।
लेकिन चार्ली राजा के पास उस समय के हिसाब से सबसे ज्यादा विकसित संसाधन उपलब्ध थे । विशेष बात तो ये थी कि वो सारे संसाधन उसने खुद ही विकसित किए थे ।
चलिए जानते है चार्ली राजा के बारे में । उसका जन्म मध्यप्रदेश( सागर) के बंभोरी गांव में हुआ था (उसके जन्म और बचपन के बारे में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है ) । उसका मूल नाम चंदर सिंह था । वो बचपन से ही पढ़ाई लिखाई और अविष्कार के प्रति बहुत जिज्ञासू था । कहते है – ज्यादा पढ़ा लिखा न होने के बावजूद भी वो बचपन से ही बहुत जुगाड़ू था । वो घर में ही छोटे मोटे कलपुर्जे जोड़ तोड़ कर छोटी छोटी चीजे बनाया करता था । समय ने करवट ली और उसका कानून से मोहभंग हो गया ।
कानून और दबंगों से परेशान चंदर सिंह को धीरे धीरे अपने जीवन से ही मोहभंग हो गया । अन्तत: उसने सबकुछ छोड़ छाड़ कर चंबल घाटी की शरण ली । और अपना अपना नाम चंदर से चार्ली रख लिया , चार्ली राजा। धीरे – धीरे अपनी तरह सताए हुए कुछ लोगो को मिलाकर उसका एक गिरोह बना लिया ।
चार्ली राजा ने अपने दिमाग की बदौलत पुलिस की नाक में दम कर रखा था । ये वो जमाना था , की पुलिस के पास भी कोई आधुनिक वाहन या कोई विशेष संसाधन नही था । उस समय चार्ली राजा ने , दिमाग लगाके अपनी साइकिल में मोटर को फिट किया , जो केरोसिन से चलती थी और मोपेड की तरह बिना पैडल मारे जंगल के ऊबड़ खाबड़ रास्ते में दौड़ती थी, उस समय जब पुलिस, चार्ली राजा का पीछा करने के लिए ,साइकिल का इस्तेमाल करती थी , और साइकिल के पैडल लगा–लगाकर थक जाती थी . पसीने में चूर– चूर हो जाती थी । तब चाली राजा अपनी साइकिल की मोटर को चालू कर भाग जाता था और पुलिस को चकमा देता रहता था । ये मोटर साइकिल का अविष्कार उस समय बहुत बड़ी बात थी । वो भी बीहड़ के लिए । ये चार्ली का दिमाग था ।इस तरह उसने पुलिस की नाक में दम कर कर के । अपना खौफ उनके दिल में भर दिया ।
कहते है की उसके अपना एक छोटा मोटा वायरलेस सिस्टम भी बनाया था जो कुछ दूरी तक की आवाज कैच कर सकता था । इस तरह के आधुनिक अविष्कार चार्ली को डाकुओं की दुनियां में विशेष सम्मान दिलाते थे । सारे गिरोह चार्ली की बुद्धि की दाद देते थे ।
लेकिन अंततः उसका भी वही परिणाम एक दिन वहीं हुआ जो सभी डाकुओं का होता है ।
चार्ली के द्वारा उस समय इंजन वाली, जिस साइकिल का उपयोग किया जाता था. वह आज सागर की जवाहरलाल नेहरू पुलिस अकादमी के संग्रहालय में रखी हुई है. इसे देखकर आज भी पुलिस वालों का दिमाग हिल जाता है. प्रशिक्षु पुलिसकर्मी भी इसे देखकर सोचने पर मजबूर हो जाते हैं या फिर यह कैसे किया होगा.

महज 24 साल की उम्र में 63 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद मुल्क की खातिर अपनी जान कुर्बान करने वाला एक ऐसा नौजवान जिसने ...
28/10/2025

महज 24 साल की उम्र में 63 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद मुल्क की खातिर अपनी जान कुर्बान करने वाला एक ऐसा नौजवान जिसने जुल्म के आगे झुकने से बेहतर मौत को गले लगा लिया
हम सभी जानते हैं की भगत सिंह जी ने अपने साथियों के साथ असेम्ब्ली में बम फेंका था लेकिन हम ये नहीं जानते की उस बम को बनाया किसने था। तो उस बम को बनाया था जतीन्द्रनाथ दास ने।

भारत की आज़ादी की जंग में बहुत से सूरमाओं ने अपने लहु से इतिहास लिखा, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो दर्द बनकर सीने में बस जाते हैं। जतिन दास उन्हीं में से एक थे। एक ऐसा नौजवान इन्क़लाबी, जिसने ज़ुल्म के आगे झुकने से बेहतर मौत को गले लगा लिया। 1904 में कलकत्ता में पैदा हुए जतिन दास बचपन से ही बाग़ी मिज़ाज रखते थे और असहयोग आन्दोलन से लेकर क्रांतिकारी संगठनों तक, हर मैदान में एक ही सपना देखते थे। ‘आज़ाद मुल्क’ भगत सिंह और आज़ाद जैसे साथियों के साथ उनका सफ़र इंक़लाब की आग में तपता गया और जब लाहौर षड्यंत्र केस में उन्हें गिरफ़्तार किया गया, तो अंग्रेज़ों ने सोचा कि सलाखें उनके हौंसले तोड़ देंगी। लेकिन अंग्रेज़ भूल गए थे जेल दीवारों से बनती है, हौसलों से नहीं।

जेल में राजनीतिक क़ैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक हो रहा था। जतिन दास ने ठान लिया कि इस ज़ुल्म के ख़िलाफ़ शरीर से नहीं, ज़मीर से लड़ेगे और वहीं से शुरू हुई वो भूख-हड़ताल जिसने पूरे हिंदुस्तान की रगों में आग भर दी। दिन गुजरते गए, शरीर टूटता गया, सांसें धीमी पड़ती गईं, लेकिन इरादे वैसे ही बुलंद रहे। वो कैसा जज़्बा था न खाने की टेबल बदली, न ज़ुल्म के क़ायदे, बस एक इंक़लाबी जिस्म पिघलता रहा, और अंग्रेज़ हुकूमत की नींद उड़ती रही। 63 दिनों तक भूख और दर्द से लड़ते हुए 13 सितंबर 1929 को जतिन दास ने आख़िरी सांस ली, लेकिन जाते-जाते पूरे हिंदुस्तान को जगा दिया।

उनका जनाज़ा जब कलकत्ता पहुँचा, तो सुभाष चंद्र बोस जी ने खुद स्टेशन पर रिसीव किया और सड़कों पर समंदर उमड़ पड़ा। लाखों आँखें रो रहीं थीं, लेकिन कोई सिर झुका हुआ नहीं था क्योंकि एक शहीद का क़दम आगे बढ़ चुका था और अब पीछे लौटना नामुमकिन था। भगत सिंह ने सही कहा था “ऐसे शहीद मरते नहीं, क़ौम की रगों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।” जतिन दास आज भी ज़िंदा हैं, हर उस दिल में जो आज़ादी, इंसाफ़ और इंक़लाब पर यक़ीन रखता है।




आप लोगो में से बहुतों ने आमिर खान की मूवी‘ तुम मेरे हो’ तो देखी होगी ! चलिए ठीक है जिन लोगो ने मूवी नही देखी , उनके लिए ...
27/10/2025

आप लोगो में से बहुतों ने आमिर खान की मूवी‘ तुम मेरे हो’ तो देखी होगी ! चलिए ठीक है जिन लोगो ने मूवी नही देखी , उनके लिए मूवी का पहला सीन बताता हूं । एक छोटा सा लड़का था जिसकी शादी भी हो चुकी थी (बाल विवाह) । खैर मुद्दा शादी का नही है । एक दिन उस लड़के को एक सांप ने काट लिया , परिवार में मातम का माहोल हो गया । सबके दुख व्यक्त किया , रोना–पीटना हुआ । फिर बड़े दुख के साथ उस बच्चे के शव को एक नदी में बहा दिया और भूल गए लेकिन तकरीबन तेरह साल बाद वो लड़का फिर से उनके बीच आ जाता है । क्योंकि उसे एक सपेरे बाबा ने बचा लिया था । याद आया । ठीक है ।

बिलकुल इसी तरह की एक घटना उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुई है । आज से तेरह साल पहले 2013 में ( तिथि अज्ञात) औरंगाबाद थाना क्षेत्र के गांव सूरज पुर टीकरी में एक दुखद घटना घटी । जिसमे गांव के ही सुखपाल सैनी के सबसे छोटे पुत्र दीपू को , जो की भूसा निकालने के लिए कोठरी के अंदर गया था । कोठरी मिट्टी की थी , जिसके कारण जमीन में चूहों ने बहुत सारी बिल बना रखी थी । अचानक उसका पैर किसी विषैले सांप पर पड़ गया , परिणाम ये हुआ की सांप ने उसे डस लिया । उस घटना से पूरे परिवार में मातम का माहोल हो गया । जिसने भी सुना , रो पड़ा । सुखपाल सैनी के पांच पुत्रो में दीपू सबसे छोटा था । इसलिए मां बाप का के हृदय के करीब था स्वाभाविक था । खैर झाड़ फूंक करवाई गई , वो सबकुछ किया गया जो गांव में संभव हो सका । लेकिन विधाता को ये मंजूर न था । गांव के लोगो ने उसे मृत घोषित कर दिया और परिवार को समझाया की सुखपाल भाई अब कोई फायदा नही । अब आगे की प्रक्रिया करो चूंकि लड़का अभी छोटा था । उसकी उम्र मात्र तेरह वर्ष की थी । इसलिए जलाना ठीक नहीं था । ( मान्यता है की छोटे लडको का शव जलाया नही जाता ) । तो उसे पास की एक नदी में उसे प्रवाहित कर दिया गया । परिवार के लोग कुछ दिन तक उसकी याद में दुखी हुए फिर सब सामान्य हो गया ।
समय बीतता गया दिनांक 25 अक्तूबर की साम 4 बजे एक आश्चर्य चकित करने वाली घटना घटी । गांव में एक बंगाली बाबा नाम का सपेरा एक जवान और हष्टपुष्ट लड़के के साथ आया और सुखपाल सैनी का घर पूछा । लोगो ने उसे सुखपाल सैनी का घर बताया । जैसे ही बंगाली बाबा सुखपाल सैनी के घर पहुंचा तो घर ने बैठी मां का निश्चल और ममतामई हृदय तुरंत ही अपने दीपू को पहचान गया । फिर क्या था घर के सारे लोग बारी बारी से आए और दीपू को प्यार से लगे लगाया । और बंगाली बाबा को भगवान की तरह पूजा गया । फिर बंगाली बाबा ने तेरह साल पहले की घटना बताते हुए हुए बोले – की जब आप लोगो ने इसे नदी में प्रवाहित कर दिया तो ये बहते बहते हमारे आश्रम के पास से गुजरा । तो हम लोगो ने इसे निकाला और इसकी जांच की । जब हमे विश्वास हो गया कि इसका जीवन अभी शेष है । फिर हम लोग इसे अपने गुरु के पास बंगाल ले गए और वहां इसकी चिकित्सा प्रारंभ हुई । अंततः चिकित्सा का परिणाम आपके सामने है ।आज हम इसे आप लोगो से मिलवाने लाए है । ये इतनी बड़ी खुशी थी की पूरे गांव में में शोर हो गया दीपू के नाते रिश्तेदार इकट्ठा हो गए , सभी लोग दीपू से लगकर खूब रोए। मां बाप की तो खुशी का कोई ठिकाना नहीं था । तेरह साल पहले जिस लड़के को मृत समझ कर गंगा में प्रवाहित कर दिया था , इसे तेरह साल बाद वापस देखकर कितनी खुशी हो रही थी ये तो दीपू का परिवार ही बता सकता था था ।

मिलन पूरा हुआ , लेकिन खुशी ज्यादा देर तक नही टिकी , बंगाली बाबा अब वापस जाने वाले थे । लेकिन दुख इस बात का था वो दीपू को अपने साथ ही ले जाने वाले थे । बहुत ज्यादा समझा बुझा कर बंगाली बाबा दीपू को अपने साथ पलवल स्थिति आश्रम पर ले गए । खैर परिवार ये सोचकर खुश था की मेरा लड़का जिंदा है और सुरक्षित है ।
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चीन की राम कथा----------------------चीनी साहित्य में राम कथा पर आधारित कोई मौलिक रचना नहीं हैं। बौद्ध धर्म ग्रंथ त्रिपिट...
26/10/2025

चीन की राम कथा
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चीनी साहित्य में राम कथा पर आधारित कोई मौलिक रचना नहीं हैं। बौद्ध धर्म ग्रंथ त्रिपिटक के चीनी संस्करण में रामायण से संबद्ध दो रचनाएँ मिलती हैं। 'अनामकं जातकम्' और 'दशरथ कथानम्'। फादर कामिल लुल्के के अनुसार तीसरी शताब्दी ईस्वी में 'अनामकं जातकम्' का कांग-सेंग-हुई द्वारा चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था जिसका मूल भारतीय पाठ अप्राप्य है। चीनी अनुवाद लियेऊ-तुत्सी-किंग नामक पुस्तक में सुरक्षित है।
'अनामकं जातकम्' में किसी पात्र का नामोल्लेख नहीं हुआ है, किंतु कथा के रचनात्मक स्वरुप से ज्ञात होता है कि यह रामायण पर आधारित है, क्योंकि इसमें राम वन गमन, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, सेतुबंधष लंका विजय आदि प्रमुख घटनाओं का स्पष्ट संकेत मिलता है। नायिका विहीन 'अनामकं जातकम्', जानकी हरण, वालि वध, लंका दहन, सेतुबंध, रावण वध आदि प्रमुख घटनाओं के अभाव के बावजूद वाल्मीकि रामायण के निकट जान पड़ता है। अहिंसा की प्रमुखता के कारण चीनी राम कथाओं पर बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है।
'दशरथ कथानम्'२ के अनुसार राजा दशरथ जंबू द्वीप के सम्राट थे। राजा की प्रधान रानी के पुत्र का नाम लोमो (राम)। दूसरी रानी के पुत्र का नाम लो-मन (लक्ष्मण) था। राजकुमार लोमो में ना-लो-येन (नारायण) का बल और पराक्रम था। उनमें 'सेन' और 'रा' नामक अलौकिक शक्ति थी तीसरी रानी के पुत्र का ना पो-लो-रो (भरत) और चौथी रानी के पुत्र का नाम शत्रुघ्न था।
राजा तीसरी रानी पर आसक्त थे। वे उसकी इच्छापूर्ति हेतु सर्व न्योछावर करने की बात करते थे। रानी ने उनके वचन को धरोहर के रुप में रख छोड़ा था। कालांतर में राजा बीमार हो गये। उन्होंने राजकुमार लोमो को राजा बना दिया। उनके बालों को रेशम की डोरी से बांधा गया और सिर पर दिव्य मुकुट पहना दिया गया। छोटी रानी को लोमो का राजा बनना रास नहीं आया। राजा के कुछ स्वस्थ होने पर उसने पूर्व में दिये गये वचन के अनुसार अपने पुत्र पो-लो-रो को राजा बनाने के लिए कहा। राजा को अपने ज्येष्ठ पुत्र पर पूरा भरोसा था। उन्होंने उसे अपदस्थ कर पो-लो-रो को राजा बना दिया।
लोमो के अनुज ने उनसे इसका विरोध करने के लिए कहा, क्योंकि उनके पास 'सेन' और 'रा' नामक अलौकिक शक्ति थी, किंतु उन्होंने उत्तर दिया कि आज्ञाकारी पुत्र को पिता की इच्छा के प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिए। छोटी माता को मेरे पूज्य पिता का स्नेह प्राप्त है। इसलिए वही सच्ची माता हैं। रामानुज चुप हो गये। पिता के आदेशानुसार वे दोनों बारह वर्षों के लिए वन चले गये।
राजा का स्वर्गवास हो गया। उस समय पो-लो-रो दूसरे देश में थे। उन्हें स्वदेश बुलाया गया और राजा बना दिया गया, किंतु परंपरा के प्रतिकूल आग्रज को अपदस्थ कर उन्हें राजा बनाया गया था। इसलिए उनके मन में अपनी माता के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी। वे सेना के साथ अपने अग्रज से मिलने पहाड़ परगये। लो-मन के मन में संदेह हुआ, किंतु लोमो के मन में किसी प्रकार का भ्रम उत्पन्न नहीं हुआ। उन्होंने पो-लो-रो से सेना के साथ आने का कारण पूछा,तो उसने बताया कि मार्ग में लुटेरों से बचने के लिए उसने ऐसा किया। उसने अपने अग्रज से स्वदेश लौटकर राज्य का शासन संभालने के लिए बार-बार अनुरोध किया, किंतु लोमो ने पिता की आज्ञा का उल्लंघन करना उचित नहीं समझा। अंतत: पो-लो-रो अपने अग्रज की चरण पादुका लेकर घर लौट गये और उन्हें राज सिंहासन पर स्थापित कर दिया।
पो-लो-रो चरण पादुका की पूजा करते थे और उससे आदेश लेकर शासन संचालन करते थे। लोमो को मालूम हो गया था कि पो-लो-रो उनकी चरण पादुका को आग्रज की तरह सम्मान देते हैं। इसलिए समय पूरा होने पर वे घर लौट गये। राजा का पद ग्रहण करने से इन्कार करने पर पो-लो-रो ने उन्हें यह कहकर निरुत्तर कर दिया कि परंपरानुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राज सिंहासन का उत्तराधिकारी होता है। परंपरा भंग करना उचित नहीं है। लोमो राजा बने। देश धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। कोई किसी रोग से पीड़ित नहीं रहा। जंबू द्वीप के लोगों की सुख-समृद्धि पहले से दस गुनी हो गयी
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1. रामकथा, पृ.४६
2. Raghuvir and yamamoto, The Ramayana in China, PP. 27-30
(ये जानकारी गूगल से प्राप्त है )

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