bk surendra 1975

bk surendra 1975 सुरेन्द्र कुमार साह
ओम् शान्ति �
रोज की मुरली | राजयोग | सकारात्मक विचार
"परचिंतन छोड़, अपना कल्याण

हिंदी (Hindi)Daily Murli08-08-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन“मीठे बच्चे - शान्त रहने का स्वभाव बहुत अच्छा है...
08/08/2026

हिंदी (Hindi)
Daily Murli
08-08-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन

“मीठे बच्चे - शान्त रहने का स्वभाव बहुत अच्छा है, शान्त स्वभाव वाले बहुत मीठे लगते हैं, फालतू बोलने से न बोलना अच्छा है''

प्रश्नः-किन बच्चों को सभी प्यार करते हैं? स्वयं को सेफ रखने का साधन क्या है?

उत्तर:-जो सभी की बहुत रूचि से, प्यार से सेवा करते हैं, उनको सभी प्यार करते हैं। तुम्हें कभी भी सेवा का अहंकार नहीं आना चाहिए। बाप द्वारा जो ज्ञान की कस्तूरी मिली है, वह दूसरों को देनी है, सबको शिवबाबा की याद दिलानी है। इस याद की यात्रा से ही तुम बहुत-बहुत सेफ रहेंगे। जितना याद में रहेंगे उतना खुशी भी रहेगी और मैनर्स भी सुधरते जायेंगे।
ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं, समझा-समझाकर कितना समझदार बना देते हैं। पढ़ाई भी सहज है ना। वह है स्थूल पढ़ाई और यह है सूक्ष्म पढ़ाई। तुम बच्चे जानते हो यह पढ़ाई बाप के सिवाए और कोई पढ़ा नहीं सकते हैं। बाप आये ही है पवित्र बनाने और पढ़ाने। एम-ऑब्जेक्ट सामने खड़ी है, तो ऐसे बाप को याद कर खुशी में रोमांच खड़े हो जाने चाहिए। यह भी बच्चे जानते हैं कि दिन-प्रतिदिन हमको शान्ति में ही जाना है। शान्ति तो सबको बहुत पसन्द होती है। बड़े आदमी जास्ती नहीं बोलते हैं और न जोर से बोलते हैं। तुम बहुत-बहुत बड़े आदमी बनते हो वास्तव में आदमी नहीं कहेंगे, तुम तो देवता बनते हो। देवताओं का बोलना बहुत थोड़ा होता है। तुमको भी जब देवता बनना है तो टॉकी से बदल साइलेन्स में रहने का अभ्यास करो। शान्ति में रहने वाले के लिए समझेंगे कि इनका अपने ऊपर अटेन्शन है जबकि तुमको शान्तिधाम जाना है तो बोलना भी बहुत आहिस्ते (धीरे) है। आहिस्ते बोलते-बोलते शान्तिधाम में चले जाना है। जितना तुम शान्ति में रहते हो उतना शान्ति फैलाते हो। तुमको बहुत शान्ति में रहना चाहिए। आवाज से बात करना अच्छा नहीं लगता। क्रोध भी अच्छा नहीं है। बच्चों में कोई भी विकार नहीं रहने चाहिए। देखना है - हम कोई से लड़ते-झगड़ते तो नहीं हैं! बाप ने समझाया है हियर नो ईविल, टॉक नो ईविल... जो बाते तुमको पसन्द नहीं हैं, उन बुरी बातों से तुम्हें किनारा कर देना चाहिए तो दोनों का मुख बन्द रहेगा। हर बात में दैवी गुणों को धारण करना है। कोई आवाज से बात करे तो बोलो शान्त, आवाज मत करो। तुम जानते हो हम शान्ति स्थापन करते हैं। सतयुग में शान्ति रहती है ना। मूलवतन में तो है ही शान्ति। शरीर ही नहीं तो बोलेंगे फिर कैसे। बाप बच्चों को श्रीमत तो बहुत अच्छी देते हैं, समझाते हैं मीठे बच्चों अब तुम्हें अपने घर चलना है, टॉकी से मूवी में आना है फिर साइलेन्स में चले जायेंगे। जो भी मिले उनको यही पैगाम देना है। तुम जितना साइलेन्स में रहेंगे उतना समझेंगे यह लोग किसी धुन में हैं। शान्त रहने का स्वभाव बहुत अच्छा है। वह बहुत मीठे लगते हैं। फालतू बोलने से न बोलना अच्छा है।

तुम सच्चे-सच्चे पैगम्बर हो। तुम्हारी सबके ऊपर मेहर (कृपा) होनी चाहिए। मेहर करने वाले बच्चे बड़े शान्त में बाप की याद में रहेंगे। सिर्फ पैगाम देना है कि बेहद के बाप को याद करो तो बेहद का सुख-शान्ति मिलेगा। लौकिक बाप के पास बहुत धन है तो बहुत वर्सा मिलेगा ना। बेहद के बाप पास तो है विश्व की बादशाही, जो हर 5000 वर्ष बाद तुम्हें विश्व की बादशाही मिलती है।

तुम बच्चों को सभी की बहुत रूचि से सर्विस करनी है। हरेक को सेवा के लायक बनना है। जो दूसरों की प्यार से सेवा करते हैं उनको सभी प्यार करते हैं। कभी भी सेवा का अहंकार नहीं आना चाहिए। तुम्हें बाप द्वारा ज्ञान की कस्तूरी मिली है, वह दूसरों को देनी है। एक दो को याद दिलाते रहो कि शिवबाबा याद है? इसमें खुशी भी होती है। याद दिलाने वाले को थैंक्स देना चाहिए। याद की यात्रा से तुम बच्चे बहुत-बहुत सेफ रहेंगे। जितना याद में रहेंगे उतना खुशी भी रहेगी और मैनर्स भी सुधरते जायेंगे। तुम्हें अपने कैरेक्टर्स जरूर-जरूर सुधारने हैं। हरेक अपनी दिल से पूछे हमारा स्वभाव बहुत-बहुत मीठा है? कभी किसी को नाराज़ तो नहीं करते। ऐसा वातावरण कभी न हो जो कोई नाराज़ हो जाए। ऐसी कोशिश करनी है क्योंकि तुम बच्चे बहुत ऊंच सर्विस पर हो। तुम्हें इस सारे माण्डवे को रोशनी देनी है। तुम धरती के चैतन्य सितारे हो। कहा भी जाता है नक्षत्र देवता... अब वह सितारे कोई देवता नहीं हैं, तुम तो उनसे महान बलवान हो क्योंकि तुम सारे विश्व को रोशन करते हो, तुम ही देवता बनने वाले हो। जैसे ऊपर सितारों की रिमझिम है, कोई सितारा बहुत तीखा होता है और कोई हल्का। कोई चन्द्रमा के नज़दीक होता है। तुम बच्चे भी योगबल से सम्पूर्ण पवित्र बनते हो तो चमकते हो।

अभी तुम बच्चों को अविनाशी ज्ञान रत्नों की लॉटरी मिल रही है तो कितनी खुशी रहनी चाहिए। अन्दर में खुशी की उछलें मारते रहो। यह तुम्हारा जन्म हीरे जैसा गाया जाता है। तुम ब्राह्मण ही नॉलेजफुल बनते हो तो तुमको नॉलेज की ही खुशी रहती है। इन देवताओं से भी तुम श्रेष्ठ हो। तो तुम्हारा चेहरा सदा खुशी से खिला रहे। बाप बच्चों को आशीर्वाद करते हैं मीठे बच्चे सदा शान्त भव! चिरन्जीवी भव! अर्थात् बहुत जन्म जियो। आशीर्वाद तो बाप से मिलती है फिर भी हरेक को अपना पुरुषार्थ करना है कि हम चिरन्जीवी कैसे बनें। बाप को याद करने से तुम चिरन्जीव बन रहे हो। यह आशीर्वाद बाप देते हैं। ब्राह्मण लोग भी कहते हैं आयुश्वान भव। बाप भी कहते हैं बच्चे सदा जीते रहो। तुम्हें आधाकल्प के लिए काल नहीं खायेगा। सतयुग में मरने का नाम नहीं होता। यहाँ तो मनुष्य मरने से डरते हैं ना। तुम तो पुरुषार्थ कर रहे हो मरने लिए। तुम जानते हो बाबा को याद करते-करते हम यह शरीर छोड़ अपने शिवबाबा के पास जायेंगे, फिर स्वर्गवासी बनेंगे।

अभी तुम मोस्ट बील्वेड बाप के बच्चे बने हो तो तुमको भी बाप जैसा बहुत-बहुत मीठा बहुत प्यारा बनना है। बाबा पत्रों में भी लिखते हैं मीठे-मीठे लाडले सिकीलधे बच्चों... बाबा बहुत मीठा है ना। प्रैक्टिकल में अनुभव करते हो कि बाबा कितना मीठा, कितना प्यारा है। हमें भी ऐसा बनाते हैं। यह भी तुम जानते हो कि हम कितने मीठे, कितने प्यारे थे। हम ही पूज्य से फिर पुजारी बनें तो खुद को पूजते रहे। यह भी बड़ी वन्डरफुल समझने की बातें हैं।

तुम बच्चे जानते हैं आधाकल्प के हमारे सब दु:ख दूर करने वाला बाबा अभी आया हुआ है। कहते हैं हर-हर महादेव। अब वह महादेव तो नहीं है। दु:ख तो बाप ही हरेंगे। दु:ख हरकर सुख देने वाला बाप है। आधाकल्प तुमने बहुत दु:ख देखे हैं। 5 विकारों की बीमारी बहुत बढ़ गई है, इस बीमारी ने बहुत दु:खी किया है, इसलिए बाप कहते हैं मीठे बच्चे, यह जो कर्मों का खाता है, उनको अब ठीक करो। व्यापारी लोग भी 12 मास का खाता रखते हैं ना।

बाप समझाते हैं बच्चे, अभी सारी सृष्टि पर देखो कितना किचड़ा है, यह है ही नर्क, तो बाप को आना पड़ता है नर्क को स्वर्ग बनाने। बाबा बहुत उकीर (प्रेम) से आते हैं, जानते हैं मुझे बच्चों की सेवा में आना है। मैं कल्प-कल्प तुम बच्चों की सेवा पर उपस्थित होता हूँ। जब खुद आते हैं तब बच्चे समझते हैं बाप हमारी सेवा में उपस्थित हुए हैं। यहाँ बैठे सभी की सेवा हो जाती है। सारी सृष्टि का कल्याणकारी दाता तो एक ही है ना। बाप जानते हैं सारी दुनिया की जो भी आत्मायें हैं सबको मैं ही वर्सा देने आता हूँ। बेहद के बाप की नज़र दुनिया की आत्माओं तरफ जाती है। भल यहाँ बैठे हैं परन्तु नज़र सारे विश्व पर और सारे विश्व के मनुष्यमात्र पर है, क्योंकि सारी विश्व को ही निहाल करना है। ड्रामा प्लैन अनुसार कल्प पहले मिसल सारे विश्व की आत्मायें निहाल हो जाने वाली हैं। बाप सब बच्चों को याद करते हैं, नज़र तो जाती है ना। संगमयुग पर ही बाप बच्चों की सेवा में उपस्थित होते हैं उनकी भेंट में कोई भी सेवा कर न सके। उनकी है बेहद की सेवा। तुम बच्चे भी बाप का शो तब कर सकेंगे जब उन जैसी सेवा करेंगे। सेवा करने वालों को फल भी बहुत भारी मिलता है। बच्चों को नशा भी चढ़ता है कि हम श्रीमत पर सारे विश्व के मनुष्यों को सुख देते हैं।

बाप कहते हैं मीठे बच्चे, अब ज्ञान रत्नों से अपनी खूब झोली भरो, जितनी भरनी है भरो। अपना टाइम बरबाद न करो। बाप की याद में टाइम को आबाद करो। जो अच्छी रीति धारणा करते हैं वह फिर औरों की भी अच्छी सर्विस जरूर करेंगे। समय बरबाद नहीं करेंगे। बच्चों को पुरुषार्थ कर अन्तर्मुखी बनना है। अन्तर आत्मा है ना। यह निश्चय करना है कि हम आत्माओं को बाप समझा रहे हैं। सोल-कॉन्सेस हो रहना ही सच्चा-सच्चा अन्तर्मुखी बनना है। अन्तर्मुखी अर्थात् अन्दर जो आत्मा है, उनको सब कुछ बाप से ही सुनना है। बाप प्यार से बार-बार समझाते हैं। मात-पिता और जो भी अच्छे अनन्य बड़े भाई-बहन हैं, जो अच्छी सर्विस करते हैं उनसे सीखते जाओ। अन्दर में यह निश्चय करो कि हमें फालतू टाइम नहीं गँवाना है। शरीर निर्वाह भी करना है, अपनी रचना को भी देखना है। सिर्फ ममत्व नहीं रखना है। ममत्व रखने से नुकसान हो जायेगा। ममत्व एक बाप में रखो। यहाँ तुम बाप के सम्मुख हो। आत्मायें और परमात्मा सम्मुख हैं क्योंकि यहाँ स्वयं बाप आत्माओं को पढ़ाते हैं। वहाँ आत्मायें आत्माओं को पढ़ाती हैं।

यह सब बातें तुम बच्चों के अन्दर मंथन होनी चाहिए। स्टूडेन्ट की बुद्धि में सारा दिन पढ़ाई रहती है ना। तुम्हारी बुद्धि में भी सारी पढ़ाई है। यह है रूहानी पढ़ाई। अच्छे स्टूडेन्ट जो होते हैं वह सदैव एकान्त में जाकर पढ़ते हैं। स्टूडेन्ट आपस में मिलते-जुलते हैं, तो पढ़ाई पर ही वार्तालाप करते हैं। इस बेहद की पढ़ाई में तो और ही खुशी से लग जाना चाहिए।

तुम बच्चे अभी बाप के मददगार बनते हो। याद में रहना ही मदद करना है क्योंकि याद की यात्रा माना शान्ति की यात्रा इसलिए कहा जाता है हर एक अपने घर को स्वर्ग बनाओ। हरेक की बुद्धि में अल्फ और बे है। अल्फ को याद करो तो बादशाही मिलेगी। और कुछ करना नहीं है। सिर्फ अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो राजाई तुम्हारी। तुम बच्चे - सबको यही पैगाम देते रहो कि बाप को याद करो तो स्वर्ग की राजाई मिलेगी। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का दिल व जान सिक व प्रेम से यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप की याद में अपना टाइम आबाद करना है। यह अमूल्य समय कहाँ भी बरबाद नहीं करना है। पुरुषार्थ कर अन्तर्मुखी अर्थात् सोल-कॉन्सेस होकर रहना है।

2) अभी हम देवताओं से भी श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, अभी बाप द्वारा अविनाशी ज्ञान रत्नों की लॉटरी मिली है, नॉलेजफुल बने हैं तो चेहरा सदा खुशी से खिला रहे। अन्दर में खुशी की उछलें मारते रहो।

वरदान:-मन्सा के महादान द्वारा हर संकल्प की सिद्धि प्राप्त करने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान भव

जो बच्चे मन्सा द्वारा शक्तियों का दान करते हैं उन्हें मास्टर सर्वशक्तिमान् का वरदान प्राप्त हो जाता है क्योंकि मन्सा द्वारा शक्तियों का दान करने से संकल्प में इतनी शक्ति जमा हो जाती है जो हर संकल्प की सिद्धि प्राप्त होती है। वे अपने संकल्पों को जहाँ चाहें वहाँ एक सेकण्ड में टिका सकते हैं, संकल्प उनके वश होते हैं। वे अपने संकल्पों पर विजयी होने के कारण चंचल संकल्प वाले को भी थोड़े समय के लिए अचल वा शान्त बना सकते हैं।

स्लोगन:-निरन्तर एक बाप के संग में रहो तो संगदोष से बच जायेंगे।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

कोई भी विकर्म वा व्यर्थ कर्म अगर बार-बार हो जाते हैं तो इसका कारण है कि सदा साथी को साथ में नहीं रखते हो अथवा साथ का अनुभव नहीं करते हो। जैसे शक्तियां एक सेकण्ड की दृष्टि से असुर संघार करती हैं, ऐसे कम्बाइण्ड रूप की स्मृति से अपने आसुरी संस्कार वा अपवित्रता के संकल्पों को सेकण्ड में संघार करो।

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Daily Murli09-08-26 प्रात:मुरलीओम् शान्ति''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 02-03-11 मधुबन“मास्टर सर्वशक्तिवान के स्वमान की सीट...
08/08/2026

Daily Murli
09-08-26 प्रात:मुरलीओम् शान्ति''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 02-03-11 मधुबन

“मास्टर सर्वशक्तिवान के स्वमान की सीट पर रह, एक दो को उमंग-उत्साह दिलाते, सहयोगी बन व्यर्थ संकल्पों के अक के फूल अर्पण कर नम्बरवन का इनाम लो''

आज आप सभी और साथ में चारों ओर के सर्व बच्चे अमृतवेले से लेकर बड़े स्नेह भरी मुबारकें अपने प्रेम और खुशी की दे रहे हैं। तो बाप भी आप सभी सिकीलधे बच्चों को इस जयन्ती की मुबारकें देने आये हैं। एक-एक बच्चा बाप के लिए अति प्यारा दिल का दुलारा है। तो बापदादा अपने बाहों की माला से आप सबको मुबारकें दे रहे हैं।

बापदादा देख रहे हैं आप तो सामने मुबारक दे भी रहे हो, ले भी रहे हो लेकिन चारों ओर के बच्चे कई स्थानों में मुबारकें दे रहे हैं और बाप भी देश विदेश सब तरफ के बच्चों को अति स्नेह पूर्वक मुबारकें दे रहे हैं। बापदादा देख रहे हैं हर बच्चा खुशनुमा सूरत से प्यार के सागर में लहरा रहे हैं। बाप को खुशी है कि बाप अकेला नहीं आता है, बच्चों के साथ ही आते हैं क्योंकि बाप आते ही हैं यज्ञ रचने। तो यज्ञ में कौन होते हैं? ब्राह्मण, इसलिए बाप अकेले नहीं आते लेकिन बच्चों के साथ आये हैं क्योंकि यही जयन्ती सब जयन्तियों से वन्डरफुल है। सारे कल्प में यह एक ही जयन्ती है जो बाप और बच्चों का साथ में जन्म होता है इसलिए इस जयन्ती को कहा ही जाता है हीरे तुल्य जयन्ती। बाप भी विशेष आदि रत्न बच्चों को विशेष मुबारक दे रहे हैं। तो आप सभी आज मुबारक देने आये हो वा लेने भी आये हो! बाप का कहना ही है साथ रहेंगे, साथ उड़ेंगे, साथ आयेंगे और ब्रह्मा बाप के साथ राज्य करेंगे। साथ रहने का वायदा है। आप भी क्या कहते हो? हम भी जहाँ बाप वहाँ साथ-साथ होंगे। यह है बच्चों का बाप से, बाप का बच्चों से वायदा। कहाँ भी शरीर द्वारा रहते हैं लेकिन दिल में सदा बाप साथ है इसीलिए बाप को दिलाराम कहते हैं। यहाँ यादगार भी दिलवाला (देलवाड़ा) मन्दिर है। तो सभी के दिल में साथ में दिलाराम है ना! और बाप सदा बच्चों को कहते हैं कभी भी अकेले नहीं बनना। सदा साथ हैं, साथ रहना ही है। अकेले होंगे तो माया अपना चांस लेती है और साथ है तो स्वयं लाइट हाउस साथ है, उसके आगे माया दूर से ही भाग जाती, नजदीक भी नहीं आ सकती है इसलिए बच्चों का बाप से, बाप का बच्चों से सदा साथ का वायदा है। आप सभी का भी वायदा है ना! साथ हैं, साथ रहेंगे। अच्छा लगता है ना साथ में। हाँ भले हाथ उठाओ।

बापदादा ने देखा हर बच्चा अमृतवेले बाप से बहुत दिल की बातें करते हैं। वैसे तो समय नहीं मिलता लेकिन अमृतवेले हर एक बहुत मीठी-मीठी दिल की बातें करते हैं और बाप भी हर एक बच्चे के दिल की बातें सुनकर सब बातों का उत्तर भी देते हैं। सभी को एक बात की बहुत खुशी है कि हम दिल से कहते मेरा बाबा, तो बाप हाज़िर हो जाते। हज़ूर हाज़िर हो जाते। इसमें सिर्फ दिल की बात है और कुछ करने की जरूरत नहीं, दिल से कहा मेरा बाबा, हज़ूर हाज़िर।

तो आज चारों ओर से बापदादा के कानों में मीठा गीत बज रहा था। कौन सा गीत? मेरा बाबा, प्यारा बाबा, मीठा बाबा और बापदादा भी बच्चों के स्नेह में समाये हुए थे, समाये हुए हैं। अभी बापदादा आपके स्नेह के दिव्य कर्तव्य को देख कहते कि आपके भक्त वह भी कम बुद्धि वाले नहीं हैं। उन्होंने भी आपके यादगार की कॉपी बहुत अच्छी बनाई है। द्वापर में आये, पहला-पहला जन्म वैसे भी सतोप्रधान होता है क्योंकि परमधाम से आत्मा आती है। तो भक्तों के तरफ भी आज दृष्टि गई। तो कॉपी बड़ी युक्तियुक्त की है क्योंकि आपके शुरू-शुरू वाले विशेष भक्त जैसा आपका प्रैक्टिकल कर्म है वैसे ही उन्होंने भी यादगार की कॉपी अच्छी बनाई है लेकिन आपका प्रैक्टिकल है उन्हों का यादगार है। जैसे आपने व्रत लिया, कौन सा व्रत लिया? पवित्रता का। तो वह भी व्रत लेते हैं, व्रत की कॉपी की है लेकिन आपका व्रत एक जन्म में लेने से अनेक जन्म वह व्रत चलता है। वह एक दिन के लिए पवित्र भी रहते और खान-पान भी शुद्ध रखते हैं। आपका 21 जन्मों का व्रत, उन्हों का अल्पकाल के लिए है। ऐसे ही जागरण, आप रोशनी में आये तो सारे विश्व के अन्दर अंधकार मिटाया। आधाकल्प अंधकार आ नहीं सकता। मन का अंधकार मिटाया और बाहर प्रकृति का दु:ख, वह अंधकार मिटाया। वह भी कॉपी की है, जागरण करते हैं। और बात, आप बाप के ऊपर बलिहार गये, बलि चढ़ गये। पूर्ण सरेन्डर हो गये तो उन्होंने भी कॉपी की है लेकिन अपने को नहीं करते, अपने को बलि नहीं चढ़ाते हैं, किसको चढ़ाते हैं? जानते हो ना! बकरे को चढ़ाते हैं। बकरे को क्यों ढूंढ़ा और किसको नहीं ढूंढा। सब हँस रहे हैं, जानते हो! जो बाप आप बच्चों को बार-बार इशारा देता है मैं पन छोड़ निमित्त भाव धारण करो तो उन्होंने भी बकरे को ढूंढा है क्योंकि वह भी में में करता है। तो भक्तों की बुद्धि कमाल की तो है ना! आपके भक्त हैं ना। बाप के, आपके भक्त हैं। इसीलिए बाप आपके भक्तों को भी जो सच्ची दिल से भक्ति करते हैं, उनको कुछ न कुछ भक्ति का फल दे देते हैं। वह भी सदा सच्चे और सात्विक रहते हैं, खुश रहते हैं। दु:ख में दु:खी नहीं होते हैं क्योंकि भक्ति सच्ची दिल से करते हैं। तो बाप भी आजकल आप बच्चों को यही इशारा देते हैं कि मैंपन नहीं लाओ। मैं जो कहता हूँ वही हो। मैं ही ठीक कहता हूँ, वही होना चाहिए। यह मैं मैं, एक साधारण है मैं शरीरधारी हूँ, देहधारी हूँ, तो एक है साधारण मैं और दूसरी है महीन मैं, उसमें बाप की देन को भी मैंने किया, मैंने बोला, मैं करता हूँ, बाप की विशेषताओं में भी मैंपन आ जाता है। ज्ञान की समझ, विशेषताओं की समझ उसमें भी महीन मैं-पन आ जाता है। तो बाप इशारा देते रहते हैं कि मैं और मेरा, सदा मेरा बाबा, उसी तरफ दिल का लगाव हो। हद का मेरा, मेरा नाम, मेरा शान, इसको समाप्त कर मैं बाबा का, बाबा मेरा, कितनी खुशी होती है! भगवान मेरा हो गया और क्या चाहिए! तो एक है साधारण मेरा, एक है महीन मेरा। यह महीन मेरा मैला कर देता है और मेरा बाबा मालामाल कर देता है।

तो आज बर्थ डे मनाने आये हो। अपना भी बर्थ डे मनाने आये हो ना! बाप बच्चों के बिना कुछ नहीं करता इसीलिए आज बाप बच्चों के जन्म उत्सव की मुबारक देने आये हैं, वाह मेरे बच्चे वाह! अभी एक बात कहूं, तैयार हैं! कहें? करना पड़ेगा। हाथ उठाओ, करेंगे? डबल फारेनर्स करेंगे? टीचर्स करेंगे? अच्छा। तो आज बापदादा जैसे यादगार में शिव परमात्मा की यादगार में अक के फूल चढ़ाते हैं, गुलाब के नहीं, और कोई फूल नहीं चढ़ाते, अक के फूल चढ़ाते हैं। तो आज बापदादा आपको कौन सी बात अर्पण करो, वह होमवर्क देने चाहते हैं। तैयार हो ना! अच्छा।

यह तो बच्चों का बाप को बहुत अच्छा लगता है, हाँ जी सब करते हैं। तो आज बर्थ डे पर बाप का यह संकल्प है कि सभी एक दो को उमंग उत्साह दिलाते हुए, एक दो के सहयोगी बनते हुए व्यर्थ संकल्प का अक का फूल अर्पण करो। व्यर्थ संकल्प न करना है, न सुनना है और न संग में आकर व्यर्थ संकल्पों के संग का रंग लगाना है क्योंकि व्यर्थ संकल्प जहाँ होगा वहाँ याद का संकल्प, ज्ञान के मधुर बोल, जिसको मुरली कहते हो, वह शुद्ध संकल्प स्मृति में नहीं रहेंगे। चाहे मुरली सुनते भी हो, पढ़ते भी हो वह तो आवश्यक है। ब्राह्मणों का नियम है लेकिन सुनने तक रहेगी। मन में मनन नहीं चलेगा। सोचेंगे, कहेंगे आज की मुरली बहुत अच्छी थी। सोच रही हूँ क्या थी...। वरदान भी बहुत अच्छा था, लेकिन याद आ जायेगा...। व्यर्थ संकल्प मन बुद्धि को अपने तरफ आकर्षित करने वाले हैं। पता है आपको क्या कहते हैं बाप के आगे? बाबा इन्ट्रेस्टेड समाचार तो सुनना चाहिए ना। नॉलेजफुल बनना होता है लेकिन व्यर्थ बातें पद की प्राप्ति में नुकसान कर देंगी। तो क्या आप सभी व्यर्थ संकल्प का बाप से वायदा करते हो? आप कहेंगे हम तो नहीं चाहते लेकिन वह आ जाते हैं। चाहते नहीं हैं लेकिन आ जाते हैं। तो बाप को दृढ़ संकल्प से देने से, पहले देना आता है? बाप को दे दिया। दी हुई चीज़ अगर आपके पास वापस भी आ जाए तो दी हुई चीज़ आप रखेंगे, कि वापस करेंगे? अगर दी हुई चीज़ आप अपने पास रखते हो तो आपका टाइटिल क्या होगा? तो बाप को एक बार अपनी रूचि से दृढ़ता से दे दो और चेक करो बार-बार दी हुई चीज़ हमारे पास वापस तो नहीं आई! दूसरे की चीज़ अपनी बनाना, इसको अच्छा नहीं मानते हैं। तो रोज़ आराम के पहले, आराम बाद में करना पहले चेक करना - आज सारे दिन में कोई भी व्यर्थ संकल्प आया तो नहीं? किया तो नहीं? दी हुई चीज़ वापस तो नहीं ले ली?

तो आज बर्थ डे की सौगात देने की हिम्मत है ना! है हिम्मत? हाथ उठाओ, हिम्मत है? तो जहाँ हिम्मत है वहाँ बापदादा भी आपको सौगात देगा। आप दिल से कहना मेरा बाबा, दयालु कृपालु बाबा, आप यह चीज़ ले लो। अगर दिल से कहेंगे तो बाप एकस्ट्रा गिफ्ट देगा क्योंकि हिम्मत आपकी, एकस्ट्रा मदद बाप देगा। जहाँ हिम्मत है वहाँ बाप की मदद अवश्य है ही, यह तो अनुभव किया है ना क्योंकि बापदादा काफी समय से सूचना दे रहा है कि अब तीव्र पुरुषार्थ का रास्ता है तीन बिन्दु लगाना। बिन्दु हूँ, बाप बिन्दु को याद करना है और बीती को बिन्दू लगाना, फुलस्टॉप बिन्दू है, जिसको बापदादा कहते हैं मनन करो, बिन्दू बनना है, बिन्दू देखना है और बिन्दू लगाना है इसलिए बिन्दू का बहुत महत्व है। आजकल के जमाने में भी बिन्दू का महत्व है। देखो पैसे गिनती करते हैं ना। आजकल सबका प्यार, सबसे ज्यादा किससे है? पैसे से। तो पैसा बढ़ता कैसे है? बिन्दू लगाते जाओ, 10 को बिन्दू लगाओ 100 हो जायेगा। दूसरी बिन्दू लगाओ तो 1000 हो जायेगा। तो बिन्दू का महत्व है लेकिन असली बिन्दू कौन सा है वह भूल गये हैं। तो आज बाप को जन्म दिन की सौगात दी? दी? दिल से दी? क्यों, क्या तो नहीं करेंगे? कैसे करूं, क्या करूं? यह कै कै की भाषा खराब है। क्यों करूं, कैसे करूं, क्यों क्या, कै कै नहीं करना। तो सौगात देने के लिए खुशी-खुशी से हाथ उठाया है या संगठन में मजबूरी से? क्योंकि मजबूरी से करने वाले का सदा नहीं होगा, कभी-कभी होगा। दिल से करने वाला करना ही है, बनना ही है। सौगात दे दी, देनी ही है। ऐसा खुशी-खुशी से संकल्प करेंगे तो आप सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे मास्टर सर्वशक्तिवान के लिए क्या बड़ी बात है! सीट पर रहना, मास्टर सर्वशक्तिवान की सीट पर सदा सेट रहना। भूलना नहीं। स्वमान है ना यह। स्वमान अपना छोड़ा नहीं जाता है। स्वमान के पीछे तो लड़ते हैं। तो इसीलिए आज बाप को प्यार आया कि छोटी सी बातों में अपना स्वमान, परमात्मा द्वारा मिला हुआ स्वमान, लोगों द्वारा मिला हुआ स्वमान उसमें भी कितना नशा रहता है! यह परमात्मा द्वारा स्वमान मिला है, मास्टर सर्वशक्तिवान। जो चाहे वह कर सकते हैं। है ना हिम्मत? कांध हिलाओ। हाथ नहीं हिलाओ कांध हिलाओ। हिम्मत है? टीचर्स। आपको कराना पड़ेगा, ध्यान देना पड़ेगा। आप करेंगी और अटेन्शन दिलाके करायेंगी। निमित्त हो ना। फिर देखेंगे कौन सा क्लास, किसका क्लास नम्बर लेता है? फिर अच्छा इनाम देंगे। कौन सा इनाम देंगे वह नहीं बताते हैं। बढ़िया इनाम देंगे। क्लास का क्लास कोशिश करना। ऐसे नहीं एक ने किया, नहीं। मैजारिटी करें।

तो आज बापदादा को एक-एक बच्चे के प्रति प्यार आ रहा है कि नम्बरवन में आवे। टू में भी नहीं। पहली राज गद्दी पर नहीं बैठेंगे, तख्त पर तो दो बैठेंगे लेकिन पहली राजधानी, पहले राज घराने के सम्बन्ध में आवें। दो नम्बर तो हो गये लेकिन राज्य करना है, राज्य अधिकारी बनना है तो पहले राज्य में आवे। तो बापदादा का यही बच्चों से प्यार है कि एक-एक बच्चा कोई न कोई विशेषता में नम्बरवन आवे। नम्बरवार नहीं, नम्बरवन। है उमंग? नम्बरवन में आना है कि जो मिले सो अच्छा? अच्छा, अच्छा नहीं करना। बाप की आशा है एक-एक बच्चा कोई न कोई कमाल में नम्बरवन आवे। चार सब्जेक्ट हैं, कोई न कोई सब्जेक्ट में नम्बरवन बनना ही है। बनना ही है, यह अन्डरलाइन करो। चलो ज्यादा मेहनत नहीं देते, कोई न कोई सब्जेक्ट में नम्बरवन। यह तो सहज है ना। बाकी आज के दिन अमृतवेले एक-एक बच्चा जो भी मिलन मना रहे थे, बड़ा खुशनुमा, खुशी में हँसता हुआ, खुशनुमा चेहरा दिखाई दे रहा था। और बाप ने भी हर बच्चे को सदा उड़ती कला का वरदान दिया। चलती कला नहीं, उड़ती कला। तो बापदादा का आज यह वरदान याद रखना। बापदादा ने आपके और अपने जयन्ती पर क्या वरदान दिया? उड़ती कला भव। आपने भी सारा दिन शिवरात्रि उत्सव दिल में मनाया है ना। तो सभी अच्छे हैं, अच्छे रहेंगे, अच्छे ते अच्छा राज्य पद प्राप्त करेंगे। सभी अच्छे हैं ना! बाप तो अच्छा ही देखता है। अच्छा।

चारों ओर के चाहे सम्मुख बैठे हैं चाहे अपने-अपने स्थान पर बैठ मना रहे हैं, सभी को बापदादा भी देखकर हर्षित हो रहे हैं और बच्चे भी बाप का मिलन देख खुश हो रहे हैं। लेकिन आज का संकल्प रखना सदा खुश। कभी-कभी वाला नहीं, सदा खुश। कोई भी देखे, आपके चेहरे को देख सोचे कि यह बहुत भाग्यवान आत्मा दिखाई देती है। आपका भाग्य चलन और चेहरे से दिखाई दे। ऐसे नहीं सिर्फ मन में बहुत है, नहीं। आपका भाग्यवान चेहरा खुशनुमा चेहरा औरों को परिचय करायेगा। चेहरा बोलेगा कुछ है। आपका चेहरा सर्विस करे। बाप तक लावे। खुशनुमा रहना, यह भी सेवा का साधन है। तो चारों ओर के बच्चों को आपके भी बर्थ डे की पदमगुणा मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। अच्छा।

वरदान:-संशय के संकल्पों को समाप्त कर मायाजीत बनने वाले विजयी रत्न भव
कभी भी पहले से यह संशय का संकल्प उत्पन्न न हो कि ना मालूम हम फेल हो जायें, संशयबुद्धि होने से ही हार होती है इसलिए सदा यही संकल्प हो कि हम विजय प्राप्त करके ही दिखायेंगे। विजय तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, ऐसे अधिकारी बनकर कर्म करने से विजय अर्थात् सफलता का अधिकार अवश्य प्राप्त होता है, इसी से विजयी रत्न बन जायेंगे इसलिए मास्टर नॉलेजफुल के मुख से नामालूम शब्द कभी नहीं निकलना चाहिए।
स्लोगन:-रहम की भावना सहज ही निमित्त भाव इमर्ज कर देती है।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

जैसे छुईमुई का पौधा जरा भी हाथ लगाने से शक्तिहीन हो जाता है, उसमें टाइम नहीं लगता। ऐसे आप एक सेकण्ड के शुद्ध संकल्प की शक्ति से माया को छुईमुई मुआफिक मूर्छित कर दो। अपना निजी-स्वरूप, वरदानी-स्वरूप, सदा ही स्मृति में रहे तो अपवित्रता वा विस्मृति का नामोनिशान भी न रहे।

मीठे बच्चे अपने आप से वादा करो कि हमें बहुत मीठा बनना है Om shanti
06/08/2026

मीठे बच्चे अपने आप से वादा करो कि हमें बहुत मीठा बनना है Om shanti

हिंदी (Hindi)Daily Murli07-08-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन“मीठे बच्चे - अब तक जो कुछ पढ़ा है, उसे भूल एक ब...
06/08/2026

हिंदी (Hindi)
Daily Murli
07-08-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन

“मीठे बच्चे - अब तक जो कुछ पढ़ा है, उसे भूल एक बाप को याद करो''

प्रश्नः-भारत पर सतयुगी स्वराज्य स्थापन करने के लिए कौनसा बल चाहिए?

उत्तर:-पवित्रता का बल। तुम सर्वशक्तिवान बाप से योग लगाकर पवित्र बनते हो। यह पवित्रता का ही बल है जिससे सतयुगी स्वराज्य की स्थापना होती है, इसमें लड़ाई आदि की कोई बात नहीं। ज्ञान और योगबल ही पावन दुनिया का मालिक बना देता है। इसी बल से एक मत की स्थापना हो जाती है।

गीत:-आखिर वह दिन आया आज...

ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। यह गीत कोई अपना बनाया हुआ नहीं है। जैसे और वेदों शास्त्रों का सार समझाया जा रहा है। वैसे यह भी जो गीत बनाये हैं, उनका भी सार समझाते हैं। बच्चे जानते हैं कि खिवैया वा बागवान वा सद्गति दाता एक ही बाप है। भक्ति करते हैं जीवनमुक्ति के लिए। परन्तु जीवनमुक्ति वा सद्गति दाता एक भगवान है। उसका अर्थ बच्चे ही समझ सकते हैं, मनुष्य नहीं समझते हैं। सद्गति अर्थात् दु:ख से छुड़ाकर शान्ति की प्राप्ति कराते हैं। भारतवासी बच्चे जानते हैं कि यहाँ पवित्रता सुख शान्ति थी, जबकि इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। राधे-कृष्ण का राज्य नहीं कह सकते। वास्तव में माताओं की हमजिन्स राधे है। उनको जास्ती प्यार करना चाहिए फिर भी श्रीकृष्ण को बहुत प्यार करते हैं। झूले में झुलाते हैं। श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी भी मनाते हैं। राधे की जयन्ती नहीं मनाते हैं। वास्तव में मनाना चाहिए दोनों का। समझ तो कुछ है नहीं। उन्हों की जीवन कहानी को तो कोई जानते नहीं। बाप आकर अपनी और सबकी जीवन कहानी सुनाते हैं। मनुष्य कहते भी हैं शिव परमात्मा नम: परन्तु उनकी जीवन कहानी को नहीं जानते। मनुष्य की जीवन कहानी को हिस्ट्री-जॉग्राफी कहा जाता है, दुनिया की हिस्ट्री-जॉग्राफी तो गाई जाती है ना - कितने इलाके पर राज्य करते थे, कितनी जमीन पर राज्य करते थे। कैसे राज्य किया फिर वह कहाँ गये..... यह बातें कोई नहीं जानते। तुम बच्चों को अच्छी रीति समझाया जाता है। रचयिता और रचना की नॉलेज बच्चों को समझाते हैं। तुम बच्चों को मालूम पड़ गया है कि बरोबर अब कलियुग का अन्त है और सतयुग का आदि है। संगम पर ही परमपिता परमात्मा आकर मनुष्य को पतित से पावन देवता बनाते हैं। उत्तम पुरुष अथवा पुरुषोत्तम बनाते हैं क्योंकि इस समय के मनुष्य उत्तम नहीं हैं, कनिष्ट हैं। उत्तम, मध्यम, कनिष्ट, सतो रजो तमो होते हैं। जो अच्छी तरह ज्ञान सुनेंगे उनको सतोगुणी कहेंगे, जो थोड़ा सुनेंगे उनको रजोगुणी कहेंगे, जो सुनते ही नहीं उनको तमो-गुणी कहेंगे। पढ़ाई में भी ऐसे होता है। तुम बच्चों को सतोप्रधान पढ़ाई चाहिए इसलिए सतोप्रधान लक्ष्मी-नारायण बनने का तुमको ज्ञान दिया जाता है। नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनना है। गीता के लिए भी तुम कहते हो कि यह है सच्ची गीता। तुम लिख भी सकते हो - यह है सच्ची गीता पाठशाला अर्थात् सत्य नारायण बनने की कथा अथवा सच्ची अमरकथा, सच्ची तीजरी की कथा। चित्र तो सब तुम्हारे पास हैं, इनमें सारा ज्ञान है। तुम बच्चे अब प्रतिज्ञा करते हो कि हम प्रजापिता ब्रह्माकुमार कुमारियाँ भारत को सतोप्रधान स्वर्ग बनाकर छोड़ेंगे। तुमको इतला (खबर) करनी है। गांधी जी भी पावन राज्य चाहते थे तो जरूर अब पतित राज्य है। यह कोई समझ नहीं सकते कि हम खुद पतित हैं। रावण है 5 विकार। कहते हैं राम-राज्य चाहिए तो जरूर आसुरी सम्प्रदाय ठहरे ना, परन्तु यह किसकी बुद्धि में नहीं आता है। कितने बड़े-बड़े गुरू लोग भी इतना नहीं समझते हैं। तुम बच्चे इतला करते हो कि हम श्रीमत पर ब्रह्मा द्वारा 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक दैवी राज्य स्थापन करेंगे। यह है पुरुषोत्तम संगमयुग जबकि कनिष्ट पुरुष से सतोप्रधान पुरुषोत्तम बनते हो। मर्यादा पुरुषोत्तम आदि सनातन देवी-देवता धर्म ही है। अब एक ही देवी-देवता धर्म की स्थापना होती है फिर दूसरे धर्म होंगे ही नहीं। तुम बच्चे सिद्ध कर समझाते हो कि सतयुग में एक धर्म, एक ही राज्य था। भल त्रेता में सूर्यवंशी से बदल चन्द्रवंशी में जाते हैं परन्तु होगी एक ही भाषा। अब तो भारत में अनेक भाषायें हैं। बच्चे जानते हैं कि हमारे राज्य में एक ही भाषा थी। आजकल तो बहुत कुछ देखते रहेंगे। जैसे मुसाफिरी से नजदीक आते जाते हैं अपने देश तरफ तो खुश होते हैं कि अब अपने घर आ गये। बस अब जाकर मिलेंगे। तुमको भी अपनी राजधानी का साक्षात्कार होता रहेगा। अपने पुरुषार्थ का भी साक्षात्कार होगा। देखेंगे कि बाबा हमको कितना कहते हैं कि पुरुषार्थ करो। नहीं तो हाय-हाय करेंगे और पद भी कम हो जायेगा। योग की यात्रा सबको बताते रहो। समझाना तो बहुत सहज है। सीढ़ी कितनी सहज है। जो देरी से आते हैं उनको दिन-प्रतिदिन सहज ज्ञान मिलता है। एक हफ्ता समझने से ही सहज समझ जायेंगे। चित्र ऐसे बने हुए हैं, जिनमें एक्यूरेट समझानी है। 84 जन्मों का चक्र बिल्कुल ठीक है। यह भारतवासियों के लिए है। तुम बच्चों की बुद्धि में सारा ज्ञान है। तुम जानते हो कि पतित-पावन, सद्गति दाता शिव-बाबा की मत पर हम फिर से सहज राजयोग बल से, अपने तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बनाते हैं। दूसरे कोई का हम नहीं लगाते हैं। अपने ही तन-मन-धन से सेवा करते हैं। जितना जो करेंगे वह अपने भविष्य के लिए बनाते हैं। तुम ही घर के भाती हो। तुम्हारे से ही बाबा सतयुगी स्वराज्य स्थापन करा रहे हैं। खर्चा भी तुम ही करेंगे। तुम्हारा कोई जास्ती खर्चा नहीं है। तुमको सिर्फ शिवबाबा को याद करना है, कन्याओं को क्या खर्चा करना है। उनके पास कुछ है क्या? बाबा बच्चों से क्या फी लेंगे। कुछ भी नहीं। स्कूलों में तो पहले फीस की बात करते हैं। वहाँ कितना पढ़ाई में खर्चा होता है। यहाँ तो शिवबाबा बच्चों से कैसे पैसा लेंगे। शिवबाबा को अपना घर थोड़ेही बनाना है, जो पैसा लेंगे। तुम बच्चों को भविष्य स्वर्ग में जाकर हीरे जवाहरों के महल बनाने हैं इसलिए तुम यहाँ जो करते हो उसका रिटर्न भविष्य में तुमको महल मिल जाता है। यह बड़ी समझने की बातें हैं। जितना जो तन-मन-धन से सेवा करेंगे, वह ऐसा वहाँ पायेंगे। कॉलेज वा हॉस्पिटल बनाते हैं। 10 लाख, 20 लाख लगाने पड़ते हैं। यहाँ तो इतना खर्चा नहीं लगता। छोटे से मकान में रूहानी कॉलेज कम हॉस्पिटल बनाते हैं। पाण्डवों का आदि पति कौन था? उन्होंने तो श्रीकृष्ण का नाम लिख दिया है। वास्तव में है निराकार भगवान। तुमको श्रीमत देने वाला भगवान है। बाकी तो सब हैं रावण की मत पर, रावण राज्य में। रावण की मत पर कितने डर्टी बन पड़े हैं। अब यही सृष्टि पुरानी, वही नई बनती है। सृष्टि में भारत ही था। भारत नया, भारत पुराना कहेंगे। नया भारत तो स्वर्ग था। फिर भारत पुराना है तो नर्क है। इनको कहा जाता है रौरव नर्क। मनुष्य की ही बात है। यहाँ सुख का नाम निशान नहीं है। यह कोई सुख थोड़ेही है। संन्यासी भी कहते हैं, इस समय का सुख काग विष्टा समान है, इसलिए वह गृहस्थ व्यवहार को छोड़ देते हैं। वह स्वर्ग वा सतयुग की स्थापना कर न सकें। श्रीकृष्णपुरी तो परमात्मा ही स्थापन करते हैं। श्रीकृष्ण की आत्मा और शरीर दोनों सतोप्रधान थे इसलिए श्रीकृष्ण को बहुत प्यार करते हैं क्योंकि पवित्र है ना। गाया भी जाता है छोटा बच्चा ब्रह्म ज्ञानी समान है। छोटे बच्चों को विकारों का पता नहीं रहता। संन्यासियों को फिर भी पता है। बच्चा तो जन्म से ही महात्मा है। बच्चों को तो पवित्र फूल कहा जाता है। नम्बरवन फूल है श्रीकृष्ण। स्वर्ग नई दुनिया का पहला प्रिन्स। जन्म लिया तो कहेंगे फर्स्ट प्रिन्स। श्रीकृष्ण को तो सब याद करते हैं कि श्रीकृष्ण जैसा बच्चा मिले। अब बाप कहते हैं कि जो बनना है सो बनो। सिर्फ एक श्रीकृष्ण थोड़ेही बनता है। प्रिन्स ऑफ वेल्स कितने बनते हैं? सेकेण्ड थर्ड होते हैं ना। तो यहाँ भी डिनायस्टी है। बाप के पिछाड़ी फिर दूसरे गद्दी पर बैठेंगे। जैसे घराने होते हैं वैसे यह घराना है। तुम्हारा कनेक्शन ही क्रिश्चियन से है। श्रीकृष्ण और क्रिश्चियन दोनों की एक ही राशि है। लेन-देन भी आपस में बहुत चलती है। भारत से वह कितना धन ले गये हैं। अब फिर दे रहे हैं। रिटर्न सर्विस कर रहे हैं। यह यूरोपवासी आपस में लड़कर खत्म हो जायेंगे। इस पर कहानी भी है - दो बिल्ले लड़े, बीच में माखन बन्दर खा गया। यह बात अभी की है। वह आपस में लड़ेंगे और राज्य भाग्य तुमको मिलना है। अब तुम बच्चों को अथाह ज्ञान है। तुम बच्चों की बुद्धि में है कि हम सब ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ हैं। ऐसे नहीं कि हम गुजराती हैं, हम बंगाली हैं। यह है नहीं। यह मतभेद भी निकल जाना चाहिए। हम एक बाप की सन्तान हैं। ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा की श्रीमत पर फिर से हम अपना स्वराज्य स्थापन कर रहे हैं - ज्ञान और योगबल से। योग बल से ही हम पावन बनते हैं। बाप है सर्वशक्तिमान्, उनसे बल मिलता है। तुम विश्व की बादशाही लेते हो। लड़ाई आदि इसमें कुछ नहीं करते हो। सारा पवित्रता का बल है। कहते भी हैं कि आकर पतित से पावन बनाओ, तो याद का ही बल है। ऐसे नहीं कि वहाँ उल्टे धन्धे में जाकर सब भूल जाये। यहाँ सम्मुख तो ज्ञान सागर की लहरें देखते रहते हैं। नदियों में तो वह लहरें नहीं होती हैं। सागर की एक लहर कितना नुकसान कर देती है। जब अर्थ क्वेक होगी तो सागर भी उथल खायेंगे। सागर को सुखाकर जमीन ली है, वह जमीन फिर कितने दाम में बेचते हैं। तुम जानते हो यह बाम्बे ही नहीं रहेगी। आगे यह बाम्बे थोड़ेही थी, छोटा एक गांवड़ा था। यह मातायें तो भोली हैं। यह इतना लिखी-पढ़ी नहीं हैं। यहाँ तो पढ़ा हुआ सब भूलना है। तुम कुछ नहीं पढ़े हो तो अच्छा है। पढ़े हुए मनुष्य समझने समय कितने प्रश्न करते हैं। यहाँ तो सिर्फ बाप को याद करना है। किसी देहधारी मनुष्य को याद करने की बात नहीं है। महिमा है ही एक बेहद के बाप की। तुम जानते हो कि ऊंचे ते ऊंचा है एक भगवान फिर सेकेण्ड नम्बर में ब्रह्मा। उनसे ऊंचा कोई होता नहीं। इससे बड़ी आसामी कोई नहीं, परन्तु चलते देखो कितना साधारण हैं। कैसे साधारण रीति बच्चों से बैठते हैं। ट्रेन में जाते हैं, कोई क्या जाने कि यह कौन हैं! भगवान आकर ज्ञान देते हैं, जरूर प्रवेश कर ज्ञान देंगे ना। अगर श्रीकृष्ण होता तो भीड़ मच जाती फिर तो पढ़ा भी न सके, सिर्फ दर्शन करते रहें। यहाँ तो बाप गुप्त साधारण वेश में बैठ बच्चों को पढ़ाते हैं।

तुम हो इनकागनीटो सेना। तुम जानते हो कि हम आत्मायें योगबल से फिर से अपना राज्य स्थापन कर रहे हैं। यह पुराना शरीर छोड़ जाए नया गोरा शरीर धारण करेंगे। अब है आसुरी सम्प्रदाय फिर बनेंगे दैवी सम्प्रदाय। आत्मा कहती है कि हम नई दुनिया में दैवी शरीर धारण कर जाए राज्य करूँगा। आत्मा मेल है, शरीर प्रकृति है। आत्मा सदैव मेल है। बाकी शरीर हिसाब-किताब से मेल-फीमेल का मिलता है। लेकिन मैं हूँ अविनाशी आत्मा। यह चक्र फिरता रहता है। कलियुग का विनाश भी जरूर होगा। विनाश के आसार भी सामने देखते हो। वही महाभारत लड़ाई है तो जरूर भगवान भी होगा। किस रूप में, किस तन में है वह तुम बच्चों के अलावा किसको पता नहीं। कहते भी हैं - मैं बिल्कुल साधारण तन में आता हूँ। मैं श्रीकृष्ण के तन में नहीं आता हूँ। यही पूरे 84 जन्म लेते हैं। मैं इनके बहुत जन्मों के अन्त के भी अन्त में आता हूँ। 84 जन्म सूर्यवंशी घराने वाले ही लेते हैं। वही पहले नम्बर में आयेंगे। साकारी झाड़ और निराकारी झाड़ दोनों का तुमको सारा ज्ञान है। मूलवतन से नम्बरवार आत्मायें आती हैं। पहले-पहले देवी-देवता धर्म की आत्मायें आती हैं फिर नम्बरवार और धर्म वाले आते हैं। चित्रों में समझानी तो बड़ी ऊंची है। बच्चों को समझाना है, कुमारियों को खड़ा होना चाहिए। कोई बच्चियाँ ऐसी-ऐसी बातें समझायें तो कमाल है ना। कितना नाम निकालेंगी। लौकिक अलौकिक दोनों नाम बाला करेंगी। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) संगमयुग पर श्रेष्ठ कर्म करके पुरुषोत्तम बनना है। कोई भी ऐसा कर्म नहीं करना है जो कनिष्ट बन जाये।

2) गुप्त रूप में बाप का मददगार बन भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है। अपने ही तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बनाना है। याद और पवित्रता का बल जमा करना है।

वरदान:-अपनी सम्पूर्ण स्टेज द्वारा सर्व प्रकार की अधीनता समाप्त करने वाले प्रकृति जीत भव

जब आप अपनी सम्पूर्ण स्टेज पर स्थित होंगे तो प्रकृति पर भी विजय अर्थात् अधिकार का अनुभव होगा। सम्पूर्ण स्टेज में किसी भी प्रकार की अधीनता नहीं रहती है। लेकिन ऐसी सम्पूर्ण स्टेज बनाने के लिए तीन बातें साथ-साथ चाहिए:- 1-रूहानियत, 2-रूहाब और 3-रहमदिल का गुण। जब यह तीनों बातें प्रत्यक्ष रूप में, स्थिति में, चेहरे वा कर्म में दिखाई दें तब कहेंगे अधिकारी वा प्रकृति जीत आत्मा।

स्लोगन:-श्रीमत की लगाम मजबूत है तो मन रूपी घोड़ा भाग नहीं सकता।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

अगर कोई भी अपवित्रता वृत्ति, स्मृति वा संकल्प में है तो ब्राह्मण-पन की स्थिति में स्थित नहीं हो सकते इसलिए कदम-कदम पर सावधान रहो। विशेषताओं के साथ अगर कोई एक भी कमजोरी है तो एक कमजोरी अनेक विशेषताओं को समाप्त कर देती है।

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