28/12/2025
मंच को नमन
शीर्षक *तुम्हे सफर में ढूंढ रहे हैं
जैसे जैसे लौह पथ गामिनी ,द्रुत गति से दौड़ रही है
मेरे विचारों की भी आंधी मेरे हृदय को बेध रही है !!
🌹यादों के पंछी निकले है , छोड़ सभी सीमाओं को
कहने लगे ,मिली है फुर्सत ,आज न बांधो हवाओं को 🌹
🌹 मां ,बाबूजी के संग में जब मैं ,
देस सफर को जाती थी
एक टोकरी भरे खिलौने अपने संग ले जाती थी 🌹
🌹 दो , तीन ट्रेन बदलना वो भी , लोहे की बक्से के साथ
बिस्तर बंद को पीठ पर ले कर
मुझे उठा कंधे पर साथ 🌹
🌹 अपने गंतव्य तक पहुंचने ,बाबूजी कुछ तेज चले
सर पर पल्लू संभालती मां भी कुछ सरपट सी दौड़ चली है 🌹
🌹नन्ही परी थी ,गुड़िया थी मैं अपने भाग्य विधाता की
अपने कल से अनजानी,मै गुड़िया से खेल रही थी 🌹
🌹काठ की सीटों के ऊपर , बिस्तर बंद लग जाता था
बिना सलाखों वाली खिड़की , जिस पर कुछ लौह पर्दा गिर जाता था 🌹
🌹बाहर खेत ,खलिहान ,पेड़ हरियाली ,
मुझको बड़ा लुभाते थे
एक नन्हा सवाल मेरा हरदम रहता
के सूरज दादा जहां भी जाओ
हरदम ,संग कैसे आ जाते थे 🌹
🌹 मां वो निश्छल हंसी तुम्हारी
मैं अब भी सुन पाती हूं
बाबू जी की पीठ पर लद कर अब भी
सपनों को जी पाती हूं 🌹
🌹 मां के हाथ की ठंडी रोटी ,सुखी सब्जी का वो स्वाद
अब भी मुंह में घुल जाता है
अब कितने भी व्यंजन लाओ सफर में
वो स्वाद कहां आता है🌹
🌹कितनी सुविधा ,ऐश है कितने अब तो
फ्लाइट से भी नभ चीर रहे है
पर वो जो सफर था बाबू जी संग
उसे सफर में ढूंढ रहें है
तुम्हे सफर में ढूंढ रहें है 🌹🌹
मौलिक
स्व रचित
*संगीता*शर्मा*(*गीत*)
*शिलांग*