Sangeeta Sharma -geet

Sangeeta Sharma -geet Poetess,writer,blogger, bhajan singer ,bhajan writer

21/02/2026

शीर्षक
" धर्म "
लघुकथा

मेरे पास आस्था थी ,भक्ति थी भजन था ,भाव था ,श्रद्धा थी
मैने सोचा ये काफी है प्रभु को रिझाने के लिए , लोगों को भी तो ईश्वर के प्रति आस्था है
वो सदा सत्य और धर्म का साथ देंगे
पर
उसके पास पैसा था ,पावर था ,
राजनैतिक व्यावहारिकता थी ,पहुंच थी और मैने देखा के लोगों को अचानक आस्था वहीं दिखाई देने लगी
और धर्म का पलड़ा उधर झुक गया ☘️🌹☘️

मौलिक

संगीता शर्मा ( गीत )
शिलांग

09/01/2026

लघु कथा
शीर्षक
*सम्मान*
राधेश्याम जी व श्यामलाल जी का घर पास पास था
राधेश्याम जी धनाढ्य व श्याम जी मध्यमवर्गीय ,दोनों के एक एक पुत्र रवि व सनी दोनों मित्र थे अक्सर साथ स्कूल जाते , सनी जो राधेश्याम जी का पुत्र था अक्सर देखता के बाजार से गुजरते हुए साधारण ठेले वाले भी रवि को राम राम कहते
उसके पिता व परिवार के कुशल क्षेम के बारे में पूछते
जबकि जब उसके पिता गाड़ी से गुजरते तो वो सिर्फ अभिवादन करते थे
जब उसने जिज्ञासा वस अपनी मां से यह बात कही तो उन्होंने बहुत सुंदर बात कही
के बेटा __वो तुम्हे और तुम्हारी पिता को नहीं तुम्हारी दौलत को सलाम ठोकते है क्यों के तुम तो अभी फिर भी बच्चे हो पर आपके पिता अपने धन की एंठ में रहते है
दूसरी और रवि के पिता सब से विनम्रता पूर्वक मिलते है ,दुख सुख की पूछते है
यथा संभव मदद का हाथ बढ़ाते है
बेटे जीवन में सम्मान देने से ही सम्मान पाने का हक मिलता है !!

मौलिक रचना
संगीता शर्मा (गीत )
शिलांग

सर्व अधिकार लेखिका के अधीन

09/01/2026

लघु कथा
शीर्षक
*गरीब*
सुरेश के मालिक का जन्म दिन था उसे एक उपहार देना था साब जी को आखिर 20 बरस से उनकी ड्राइवरी कर रहा था ,बाजार की महंगी सी दुकान देख कर गाड़ी रोकी ,झिझकते झिझकते अंदर गया ,
भैया कोई महंगी सी शर्ट दिखाओ
दुकानदार ने ऊपर से नीचे तक घूरा __जल्दी से बोला ,
अरे भाई मेरे मालिक के लिए ,सस्ती कमीज कैसे पकड़ा दूं उनको और महंगी दिखाओ _ दुकान दार भी मालिक को जानता था पैक करा कर दे दी ,सुरेश ने दिया मालिक को __गिफ्ट
समय बीता
सुरेश ड्राइवर के बेटे का भी जन्म दिन आया
वहीं दुकानदार ,वही दुकान इस बार मालिक आए
कहने लगे
वर्मा जी कोई एकदम सस्ती सी शर्ट दिखाओ जल्दी से
वो क्या है न मेरे ड्राइवर सुरेश के बेटे का जन्मदिन है आज
उसी को देनी है ,गरीब आदमी और क्या पहनेगा
और वर्मा जी सोच रहे थे
*गरीब*कौन*
मौलिक रचना
*संगीता*शर्मा*(*गीत*)
शिलांग
सर्व अधिकार लेखिका के अधीन

08/01/2026

*के थारो के म्हारो अठ ही रह ज्यासी सारो*
मेरी भेन भायलयों भाई बंधु
आ ही सुनता सुनता मिनख जमारो
वित्तियो जा रियो सारो !!

२) सुनबा म तो चोखा लाग
बोल य मीठा मीठा
पण म थाने सांची केऊं
अठ मिनख बडा ही ढीटा

3) निर्धनीय न कोई न बुझ
चाए सन मॉल
इया बइया कईयां बी आओ
धन को बडो कमाल !!

4) मोटो ख्वाबों मोटो पेराबो
इब लाग प्रपंच
किन न बोला , कईं बोला
बदलिया लोगा रा रंग ढंग !!

५) स जाना हां स समझा हां
जुग माया रो सारों
के ल्या या हा के ले जास्या
अठ के थारो और म्हारो
भाया के थारो और म्हारो!!

६) " गीत " कवे , हूं सुन रे हंसला
जुग म जीवनों च्यार दिना रो
*अठे रह ज्यासी सारों र बंदा*
*अठ रह ज्यासी सारों*

*संगीता (गीत ) शर्मा*
*शिलांग
मौलिक

कृपया कॉपी पेस्ट न करे
सभी अधिकार लेखिका के अधीन

08/01/2026

शीर्षक
सांसे
कोई चाहे या न चाहे , सांसे तो चलती रहती हैं
कैसा जीवन ,कितना जीवन ये मस्त पवन सी बहती हैं!!

प्राणी थोड़ा दान करे तो , बढ़ा चढ़ा कर कहता है
ऊपर बैठा वो मेरा मालिक ,बेहिसाब सब देता है !!

चाहे गर्मी हो चाहे सर्दी ,चाहे मनमर्जी चलती है
एक पल भी बिना रुके सांसों की नदिया बहती है !!

हम भी कितने अज्ञानी हैं ,और सब पर कितना ज्ञान करें
जिससे हर पल जीवन चलता ,उसका कभी न ध्यान धरें !!

कभी मिले जब फुर्सत तुमको , सांसों की टिक टिक सुनना
लोभ,मोह ,शोहरत , नाम और बेइमानी
व्यर्थ लगेगी तुमको बहना !!

कंचन काया देख लुभाया ,सांस बंद रही पिंजरे में
निकली सांस ,पड़ा रह गया पिंजर अमृत वाणी ये कहती है

निर्मल मन हो ,निर्मल वाणी निर्मल सांसे चलनी रे
"गीत "ऐसा जीवन जी ले ,ये जग तो है फ़ानी रे!!

हरि सुमिर ले हरि गुण गा ले ,सांसों की माला कहती है
प्रभु से मन की लौ लगा ले सांस की नदिया बहती है !!

मौलिक
संगीता शर्मा (गीत )
शिलांग कृपया कॉपी पेस्ट न करे
सर्वाधिकार लेखिका के अधीन

28/12/2025

मंच को नमन
शीर्षक *तुम्हे सफर में ढूंढ रहे हैं

जैसे जैसे लौह पथ गामिनी ,द्रुत गति से दौड़ रही है
मेरे विचारों की भी आंधी मेरे हृदय को बेध रही है !!

🌹यादों के पंछी निकले है , छोड़ सभी सीमाओं को
कहने लगे ,मिली है फुर्सत ,आज न बांधो हवाओं को 🌹

🌹 मां ,बाबूजी के संग में जब मैं ,
देस सफर को जाती थी
एक टोकरी भरे खिलौने अपने संग ले जाती थी 🌹

🌹 दो , तीन ट्रेन बदलना वो भी , लोहे की बक्से के साथ
बिस्तर बंद को पीठ पर ले कर
मुझे उठा कंधे पर साथ 🌹

🌹 अपने गंतव्य तक पहुंचने ,बाबूजी कुछ तेज चले
सर पर पल्लू संभालती मां भी कुछ सरपट सी दौड़ चली है 🌹

🌹नन्ही परी थी ,गुड़िया थी मैं अपने भाग्य विधाता की
अपने कल से अनजानी,मै गुड़िया से खेल रही थी 🌹

🌹काठ की सीटों के ऊपर , बिस्तर बंद लग जाता था
बिना सलाखों वाली खिड़की , जिस पर कुछ लौह पर्दा गिर जाता था 🌹

🌹बाहर खेत ,खलिहान ,पेड़ हरियाली ,
मुझको बड़ा लुभाते थे
एक नन्हा सवाल मेरा हरदम रहता
के सूरज दादा जहां भी जाओ
हरदम ,संग कैसे आ जाते थे 🌹

🌹 मां वो निश्छल हंसी तुम्हारी
मैं अब भी सुन पाती हूं
बाबू जी की पीठ पर लद कर अब भी
सपनों को जी पाती हूं 🌹

🌹 मां के हाथ की ठंडी रोटी ,सुखी सब्जी का वो स्वाद
अब भी मुंह में घुल जाता है
अब कितने भी व्यंजन लाओ सफर में
वो स्वाद कहां आता है🌹

🌹कितनी सुविधा ,ऐश है कितने अब तो
फ्लाइट से भी नभ चीर रहे है
पर वो जो सफर था बाबू जी संग
उसे सफर में ढूंढ रहें है
तुम्हे सफर में ढूंढ रहें है 🌹🌹

मौलिक
स्व रचित
*संगीता*शर्मा*(*गीत*)
*शिलांग*

14/12/2025

मुझको हंसते देख कर तुम ने कैसे कह दिया
के दिल के टूटने का मुझे कोई ग़म नहीं !!

लोगों का क्या है ,कुछ भी कह देते है
तुमने नहीं कहा था, तो, बस
एतबार हुआ नहीं !!

इस मोड़ से उस मोड़ तक, हम ,
मुड़े तो थे कई बार
तुम ही रहे ख़ामोश तो
मैं भी रुकी नहीं !!

आंखों में समन्दर ,दिल में एक तूफान था मेरे
वक्त ऐसा भी आएगा ,सोचा कभी नहीं !!

तुमको ही निभाने थे न ,दस्तूर दुनिया के
फिर अब गिला कैसा ,के मैने कुछ कहा नहीं !!

ये एहसासों की दुनिया है ,जज्बात महसूस किए जाते हैं
(गीत ) की दुनिया में
लफ्जों की ज्यादा जगह नहीं !!

रो कर जीते इस से अच्छा यही लगा
हंसते हुए जी ले ,किसी से कुछ भी कहा नहीं !!

संगीता (गीत )

01/12/2025

आईना

जब जब मैं आइने से रूबरू हुई
मेरी मुझ से ही कई बार गुफ्तगू हुई !!

रूह को सुकून दिल को करार आ गया
खुद से मिल कर आंखे कुछ शबनमी हुई !!

हौसला अफजाई जो उसने की थी कभी
उस मंजर को याद कर के हवा भी वादे _सबा हुई !!

पूछा जो आइने ने चांद निकला है किस तरह
फिर तो कब रात बीती ,कब सहर हुई !!

वही शहर वही गलियां, शोखियां वही
नादानियां मेरी अब तक नहीं गई !!

चेहरे पर पड़ी शिकन ,कुछ तल्खियां वक्त की
ताउम्र खुशियां दर से ,रफ्ता रफ्ता गई !!

सच ही तो कहता रहता है मुझ से आईना मेरा
"गीत" इस सफर में मुश्ताके _दीद बनी रही !!

संगीता शर्मा (गीत )
शिलांग

01/12/2025

*बहुत याद आती है **
सुबह की हल्की सर्द हवा
कुछ ठिठुरन लिए
भीगे भीगे से मौसम मे
चूल्हे की गर्म तपिश के बीच मुझे
याद आया मां के हाथ का
बादाम वाला दूध
जो थमा दिया करती थी
स्कूल जाते वक्त
मेरी ना नुकूर के बीच
जूते के फीते बांधते हुए ,सर नीचा किए
मेरी बचने की कोशिश
और मां का दूध का गिलास थामे
मेरे पास खड़े होना
आंखे तरेरते हुए ,स्नेह से भरी आंखे
और मेरे बाल सुलभ हठ को
नकारते हुए
दूध पिलाने की जिद
बहुत याद आती है
बहुत याद आती है

#संगीताशर्मा। #गीत
*शिलांग*

20/09/2025

विषय

हिन्दी दिवस
शीर्षक
हिन्दी की व्यथा

हिन्दी दिवस पर हिंदी होने की अपनी व्यथा सुनाती हूं
मुझको को कैसे तोड़ा मोड़ा जाता
वो पीड़ा बतलाती हूं !!

बड़े लाड से बड़े प्यार से ,कई मुझको लाड़ लड़ाते है
मुझको विभिन्न उपमा दे कर ,मेरे नाज उठाते है!!

मैं भी लोगों को अपने पन का पाठ पढ़ाती हूं
उनको अपनी सरलता से , बहुत ही सहज रख पाती हूं !!

बच्चे ,युवा, भोजी,बाबा, सब के मन को भाती हूं
गली,मोहल्ले ,बाजारों में ,खुल कर बोली जाती हूं !!

नई पीढ़ी के नए रंग ढंग ,अचंभित कर जाते हैं
मुझ में करते अंग्रेजी की मिलावट , बेबाकी से बोल भी जाते है !!

वो भी चलो मैं अनदेखी करती ,सब सहन कर जाती हूं
बोल चाल में अंग्रेजी को अपने में मिलवाती हूं !!

लेकिन कष्ट बड़ा होता जब राज्य सुलगने लगते हैं
कहीं कहीं अन्य भाषा वाले , मुझे बोलने पर लड़ते हैं!!

राजनीति के चंद स्वार्थी पिट्ठू ,निहित स्वार्थ की खातिर
निरपराध नागरिकों को दंगों की बलि चढ़ाते हैं !!

मैं अपने लोगों से कहती ,मेरा मन मत दुखी करो

भारत की हर भाषा मधुर है ,आओ मिल जुल कर सब रहो
हिन्दी दिवस की सार्थकता तब है
जब हृदय में प्रेम भरो !!

जन जन मुझे अपनाते है ,तुम भी मुझ को अपनावो
शांति और भाईचारे का ,संदेश सब को पहुंचाओ!!

संगीता शर्मा
शिलांग

20/09/2025

बातें कुछ मन की

मेरे किरदार की महक , बड़ी दूर तक महक रही थी
यही बात कुछ अपने परायों को चुभ रही थी !!

जी हजूरी ,चापलूसी ,आती नहीं मुझे
मेरी खुद्दारी बेवजह लोगों को खल रही थी !!

भरोसा दिला दिला कर के ,भरोसा तोड़ा गया
मंजिल पे आ के मुझको तनहा छोड़ा गया
कुछ मेरे अपने ग़म ,कुछ साजिशे दुनिया की
अब कुछ भी पाने खोने की हसरत नहीं रही

जो मिल गया सुकून से ,दिल से ले लिया
किसी को दर्द देने की आदत नहीं रही !!

वो भी क्या कामयाबी जो किसी की आह से मिले

खुश हूं के जैसी थी मैं वैसी ही बनी रही !!

दुनिया का मालिक जब एक दिन पूछेगा मुझे
फख्र से कहूंगी मैं चोट खा खा कर भी पत्थर नहीं रही

गीत " को एहसास है ,दुनिया के चलन का
जो हार जाता है ,दुनिया उसकी
कभी न रही 🙏🙏

संगीता शर्मा (गीत)
शिलांग

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