07/06/2024
विहंगम दृष्टि :: मगबन्धु - जनवरी-जून २०२४
चित्ताकर्षक स्वस्तिकावरण के अन्तर्गत गणमान्य मग कथाकारों की मोहक छायाचित्रों से सुसज्जित मग जागृति फाउण्डेशन ट्रस्ट (राँची) का छमाही मुखपत्र— मगबन्धु (अखिल) जनवरी-जून २०२४ लघुकथा विशेषांक के रूप में अपने नियत समय से काफी पूर्व प्रकाशित होकर, हस्तगत हुआ। अपनी सतत प्रकाशन यात्रा के १९वें वर्ष का ३८वाँ पड़ाव है ये विशेषांक। प्रस्तुत विशेषांक में मग-मातृशक्ति की अधिक भागीदारी मगसमाज के समुज्ज्वल प्रशस्त पथ का संकेतक प्रतीत हो रहा है। हालाँकि गत वर्ष ही मातृशक्ति पर आधारित मग महिला साहित्यिकी विशेषांक प्रकाशित किया जा चुका है।
आज के भागदौड़ भरी जीवनशैली वाले कालखण्ड में किसी पत्रिका का नियमित प्रकाशन, अपने आप में बहुत ही कठिन कार्य है। वो भी समय से महीने-डेढ़ महीने पूर्व विषय-एकत्रण, सम्पादन, प्रकाशन आदि कार्य सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न कर लेना और भी कठिन है। किन्तु जुनूनी, जुझारू, कर्मठ और लगनशील व्यक्ति के कोष में कठिन शब्द होता ही नहीं है। तदर्थ सम्पादक डॉ. सुधान्शु शेखर मिश्र जी एवं उनके सभी सहयोगीजन साधुवाद के पात्र हैं।
मुखपृष्ठ के बाद विषय सूची के पृष्ठ भाग में विशिष्ट विभूति—भामाशाह श्री सुनील शर्माजी, बेंगलुरु की चक्षुष्मीलक और अनुकरणीय गतिविधियों से साक्षात्कार होता है। अभी हाल में ही इनके द्वारा किए गए पुनीत कार्य से मगसमाज अनुगृहित हुआ है।
तदुपरान्त अति संक्षिप्त किन्तु चुश्त-दुरुस्त सम्पादकीय के बाद प्रबुद्ध मग-गौरव डॉ.विजय प्रकाश शर्मा जी एवं आदरणीय ज्योतीन्द्र भाईजी की कलम से मगबन्धु के गतांक पर उनके अनमोल विचारों से हम अवगत होते हैं। गतांक पर संक्षिप्त वा विस्तृत समीक्षा विशेषकर उन पाठकों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जिन्होंने गतांक का अवलोकन नहीं किया है। चुँकि प्रत्येक अंक किसी न किसी अनूठे-अनछुए विषय पर विशेषांक के रूप में ही हुआ करता है, इस कारण पत्रिका की संग्रहणीयता और बढ़ जाती है।
आगे, पृष्ठ तीन से कथाकारों की भावभूमि में पाठकों को उतरने का अवसर मिलता है, जिसका श्रीगणेश श्रीमती सुमेधा पाठक की दो लघुकथायें — आश्चर्य और नम्बर 27 से होता है। सामाजिक संदेश-प्रधान लघुकथा—आश्चर्य पर आश्चर्य करने के बजाय अमल करने की जरुरत है, जबकि नम्बर 27 भाउक दिल में नस्तर सी चुभ जाने जैसी है, भले ही परुष (कठोर) हृदय पर इसका कोई प्रभाव न पड़े। सच में सपना और कल्पना की मृदुलता यथार्थ की कठोरता से कतई तुलनीय नहीं है। यथार्थ भोगा हुआ सत्य होता है और कल्पना तो असत्य की पिटारी का ही दूसरा नाम है।
श्रीमती मृदुला मिश्र की दो लघुकथाएं—अनपढ़ और वृद्धावस्था संदेश-प्रधान हैं, तो डॉ.रश्मि मिश्र की कथा—नियति सामाजिक भाल पर स्याह प्रश्न चिह्न की भाँति। समय के मेले में अपनेपन की तलाश में खोयी माँ की भूख श्रीमती पद्मा मिश्र की मार्मिक कथा मन को छू गयी। पढ़ी-लिखी कमाऊ बहू की तुलना में क्या संस्कारी अनपढ़ बहूएँ ही अच्छी नहीं हुआ करती थी? और ये एनरॉयडी विकास ने क्या परिवारों को जोड़ने के बजाय तोड़ने का अधिक काम नहीं किया है? किन्तु दूसरी ओर डॉ.सविता मिश्र ’मागधी’ की रोचक रचना—जी चात के सुनूँ मोबाइन मन के पीड़ा— अपने-अपने नजरिये की बात है—बुराई बहुल से अच्छाई को ढूढ़ निकाल लेने का सबक। फिर भी अति सर्वत्र वर्जयेत् पर तो ध्यान रखना ही होगा न ! आगे का संस्मरण भी संस्मरणात्क है। घोर व्यापार बन चुकी आतुरालयी व्यवस्था में सेवा परायण प्रियंका और वर्षा जैसी नर्सें सौभाग्य से ही किसी रुग्ण को मिलते हैं। अनन्या वैद्य की कविता—वो परिवार हमारा आधुनिकता की विसंगतियों को उजागर करता है। डॉ.वीणा शर्मा की स्वाभिमान की गूँज (1-2) ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि बड़े सोच-विचार के लिए बड़ा खानदान, ऊँच्च शिक्षा, बड़ा पद आदि का होना कतई जरूरी नहीं। श्रीमती सुस्मिता मिश्र की माया तो सच में दूरुह और आभासी मायाजाल से उबरने में सफल हुयी अपने बुद्धि-विवेक से और विवेकपूर्ण फैसला तो वास्तव में विवेकपूर्ण है ही। भले ही इस उदारता से सबको जीने नहीं आता, फलतः संकीर्ण हृदय मानुस अपने आपके साथ अन्याय कर लेता है। डॉ.अर्पणा शर्मा असली शिक्षा की सबक सिखाती हैं और प्रभु की दुकान में टहलाती भी हैं। काश! हम आसमान पर रहें किन्तु पांव जमीन को छूने से न हिचकें और प्रभु की दुकान से सही खरीददारी सही समय पर करना यदि सीख जाए मानव, तो फिर कहना ही क्या। अधिवक्ता श्रीमती शुभ्रा मिश्र का फैसला वकालतपेशा की ईमानदारी और सत्-न्याय का फैसला है। यदि हर वकील इस भाँति विचारकर, हर केस हैंडिल करने लगें तो सत्य जलील न हो कभी एवं अनाचार, झूठ और असत्य को समाज से न्यायालय तक कहीं पनाह न मिले। पैसे-पैरवी के जोर पर अपराधी को बल न मिले । इनकी ही दूसरी लघुकथा— रामखेलावन का झुमका दम्पति के परस्पर स्नेह-सौहार्द और समर्पण की सीख देती है। कर्तव्यपरायणता का बोध जगागी है। श्रीमती प्रभा मिश्र की कहानी गुड़ बाबूजी और माँ का हक दो भिन्न भाव-ध्रुवों का तल-स्पर्श करती रोचक कथा है। लघुकथाओं की खिड़की से बीच में झाँकती श्रीमती रचना मिश्र की कविता—विश्वास हूँ मैं— ईश्वर के सही ठिकाने का बोध कराती है। सच में ईश्वर को कहाँ-कहाँ खोजते फिरते हैं और खोजने वाली जगह पर जाते नहीं कभी। आधुनिकता की अँधी दौड़ में माँ-वाप जब अपने सपने अपने बच्चों पर थोपने की धृष्टता करने लगते हैं, तब श्रीमती सविता शुक्ल की कहानी जनमती है—स्टेटस सिम्बल। भाव विह्वल रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति तो उढ़ेल जाता है कागज के पन्नों पर, किन्तु समाज के प्रबुद्ध कहे जाने वाले लोग भला कितना ध्यान दे पाते हैं, ध्यान दे भी दिए तो अमल-पहल कितना कर पाते हैं! सविता शुक्ल की दूसरी कहानी—आदर्श बहू में भी कुछ ऐसी ही बातें हैं। सास-बहू के नाजुक रिस्ते को कितनी सासें समझ पाती हैं और आधुनिकता में पली असंस्कारी बहुएँ कितनी विचारवान होती हैं—सोचने वाली बात है। मजे की बात तो ये है कि हमारी चाहत भी कुछ ऐसी ही विकृत हो गयी है—द्रौपदी की तरह बहुत सारे गुण एकत्र ढूढ़ने के चक्कर में दोषों की पिटारी उठा लाते हैं। समय से बच्चों का विवाह करना समझदारी भरा कदम तो है, किन्तु इसके दुष्परिणामों को भुगतते हुए भी अभी हम चेत नहीं रहे हैं। देखादेखी की भेड़चाल में सभी मगन हैं प्रायः। सुजाता मिश्र की दो लघुकथाएँ—परमेश्वर का रिमोट कन्ट्रोल और पतंग की डोर लगभक एक ही सीख के दो पहलुओं की भाँति हैं। कुमारी स्म़ृति पाठक की लघुकथाएं—वेटी का विवाह और बहुमत का सत्य भी रोचक और प्रासंगिक लगा। प्राची मिश्र की लघुकथाएं—ईश्वर के नाम पत्र और मदद सुप्रयास की बानगी है। इस तरह नव कथाकारों को पत्रिका में स्थान देकर लेखनधर्मिता को बल देना श्लाघ्य कार्य है। डॉ.सुनीता मिश्र की रचना— गृहणी महिला की कथा और स्त्री की कहानी भले ही दो दिशाओं में जाती दो कहानियाँ प्रतीत हो रही हैं, किन्तु दोनों का केन्द्र एक ही है—पुरुष प्रधान समाज की कुण्ठित विचारधारा में दुबकी नारी। डॉ.लक्ष्मी मिश्र की कहानी—फैसला में सोनल ने सही फैसला लिया—भावी पति के समक्ष सच्चाई को सामने रखकर और प्रणय ने भी नारी हृदय का मान रखा, अन्यथा नासमझी में ही संसार वरबाद हो जाता है। प्रीती भारती की कहानी जेब टटोलती माँ में एक गुह्य संदेश है। जेब माँ भी टटोलती है और पत्नी भी...। किन्तु दोनों में कोई तुलना नहीं। चारुमित्रा जी की कहानी खूबसूरती में तो अपनी खूबसूरती है ही, किन्तु कलेक्टर बिटिया में सबक और संदेश की अत्यधिक गहराई मिली। डेस्टीनेशन मैरिज और प्री वेडिंग की महामारी में हमारा समाज मरा जा रहा है। इस वायरस का सही टीका सही समय पर इज़ाद करना जरुरी है। मंजे हुए रचनाकार, निरन्तर शोधरत श्री सत्येन्द्र कुमार पाठक जी का आलेख—जन चेतना का आईना है लघुकथा रोचक और ज्ञानवर्धक लगा। इसके लिए पाठकजी को साशीष साधुवाद। आदरणीय मदनमोहन तरुण जी का कटाक्ष—आपका सिर सुरक्षित है वर्तमान चिकित्सा व्यवस्था पर तमाचा है। धरती के भगवान समझे जाने वाले डॉक्टर ज्यादातर अब हैवान हो गए हैं। उन्हें यमराज का सहोदर कहना समयोचित संज्ञा है। इन्हीं की दूसरी रचना— तुम तो प्रतिष्ठा ही खा गए पुरानी परम्परा की याद दिलाती है। हालाँकि जूठा तो लोग आज भी छोड़ते हैं, उद्देश्य और भाव बदल गया है सिर्फ। अधिक से अधिक जूठा छोड़ने को ही बड़प्पन की निशानी समझा जाने लगा है। डूंगरगढ़ वाले मेरे प्रिय सत्यदीप भाई की दो रचना— मेजरमेंट में सन्त जी का मेजरमेंट गड़बड़ाया हो या नहीं , हमारा-आपका, भिखमंगे भक्तों का दिमाग जरुर गड़बड़ा गया है। यज्ञ और कथा के नाम पर सिर्फ लूट मचा है। बहुरूपिये बाबाओं की बाढ़ में भोली या कहें मूर्ख जनता लुटे जा रही है, फिर भी अक्ल नहीं खुलती। तो दूसरी ओर धोखा वाला प्रसंग भी जगजाहिर है। ईमानदारी से रजिस्ट्री शायद ही कहीं होती हो। मजे की बात ये है कि जो जितना भ्रष्ट है, दूसरे से उतनी ही ईमानदारी की आश लगाये होता है। बंगलुरु से प्रेषित डॉ. मणिकान्त मिश्र जी की भावपूर्ण कहानी तेरी याद सताती है को इस अंक की श्रेष्ठतम रचना कहने की धृष्टता कर रहा हूँ। इसके लिए समुचित अन्य शब्द नहीं ढूढ़ पा रहा हूँ और न अन्य रचनाकारों से किंचित् भी भेदभाव कर रहा हूँ। पता नहीं क्यों ये कहानी मन को कहीं भीतर तक जाकर छू गयी। गढ़वा से श्री सुरेन्द्र कुमार मिश्र की दो लघुकाय रचनाएं इन्सानी ठोकर और महत्त्व प्रेरणादायी रचनाओं की पंक्ति में रखने योग्य लगी। कभी-कभी छोटी बातें ही बड़ी बन जाती हैं। श्री धनेन्द्र प्रवाही जी की दो रचनाएं—गुलदस्ते और जीवन ही जीवन जीवन के बाद भी जीवन के दर्शन को ईंगित करती है। जिजीविषा का अपना अलग महत्व है, आनन्द है। प्रिय ब्रजमाधव जी की कचनार टोली बड़े कथानक को करीने से लघुकथा में पिरोयी हुई मौक्तिकमाला की तरह प्यारी लगी। श्री सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ जी की समझ से सीख लेकर सच में अपनी समझ को बदलने की जरुरत है और बनारस का लड्डू तो शादी के लड्डू की तरह है—जो खाया वो भी पछताया, नहीं खाने वाला तो पछता ही रहा है। मिट्टी के घरौंदों को त्यागकर, कंकरीट के जंगलों में जाने को हम बेताब हैं। श्री उदयशंकर उपाध्याय जी की दो लघुकथाएं—पथरायी आँखें और पी पी ई किट झूठे ख्वावों की मृगमरीचिका में टहलती आधुनिकता की बानगी पेश करती है। पता नहीं क्यों लोग शान से कहते नहीं अघाते कि मेरा वेटा विदेश में नौकरी करता है। जबकि मेरे जैसा अल्पज्ञ तो इसे बड़े शर्म की बात समझता है। विद्यावाचस्पति महेश प्रसाद पाठक जी की पुस्तक मेला का रोचक अनुभव बहुत ही अच्छा लगा। छपवाने से लेकर बेंचने तक का पैसा लेखकों से ऐंठ कर ही तो पुस्तक मेले आयोजित होते हैं। और लेखन-वायरस-एडिक्ट भी बेचारा क्या करे, वो भी अपनी बुरी लत से लाचार है। दूसरी रचना— मेहनत की पंक्तियों में अच्छी सीख छिपी है। मगबन्धु के अगले पृष्ठ पर यथार्थ के साथ मैं स्वयं उपस्थित हूँ। लम्बी डींग हाँकने वाला आदमी भला लघुकथा जैसी चुस्त कलाबाजी क्या जाने। अपनी कथा-यात्रा में सिर्फ दो लघुकथा ही लिख पाया, जिसमें ये एक है। प्रिय पंकज की दो रचनाएँ—ब्रेकिंग न्यूज और अँगूठे की मौत पत्रकारिता के गिरते स्तर की बानगी है। खबर में खबर कितना है इससे कोई मतलब नहीं आज की पत्रकारिता को, राजनीतिक आँच कितनी हैं, ये अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। युवा रचनाकार को साशीष साधुवाद इस सुन्दर रचना हेतु। प्रिय दिलीप कुमार पाठकजी मंजे हुए रचनाकार हैं, साहित्य-जगत में “खूँटा” गाड़ने वाले। ऐसे में देवन मिसिर वाली चटनी चटाकर मगबन्धु के पाठकों को फुसला दिए हैं। अतः इसके परिमार्जन स्वरूप उन्हें अगले अंकों में सज-धजकर आने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। श्रीमती प्रभा मिश्र की कविता—क्या मैं वही हूँ सनातनी स्त्री की मनो-सामाजिक नियति को उजागर करती है, तो दूसरी कविता अँगूठा जरुर छूना में पुरुष के अहं का दुर्गन्ध और स्त्री के समर्पण का सुगन्ध शिक्षात्मक रूप से व्यक्त किया गया है। प्रिय विश्वेश्वर प्रसाद मिश्रजी की संक्षिप्त विवरणिका—छत्तीसगढ़ में प्रवासी मग-विप्र विषयवस्तु की प्रस्तुति शैली और रोचकता के कारण जिज्ञासा जगा गई। इसके विस्तृत स्वरूप की प्रतीक्षा रहेगी। आशा है “मगबन्धु” के आगामी अंकों में इसे समुचित स्थान अवश्य मिलेगा। आदरणीय डॉ. विजय प्रकाश शर्मा जी का आलेख—खैरा गाँव और शाकद्वीपीय ब्राह्मण में सूर्य-पूजा-परम्परा से लेकर, वैद्यक परम्परा तक की विशद चर्चा से स्पष्ट है कि हम मगों का सेवापरायण और त्याग-तपस्या पूर्ण जीवन कितना लोकहितकारी रहा है। सोशलमीडिया की सामाजिक हलचल में कुछ विचारणीय तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं। इन पर गम्भीरता से ध्यान देने की जरुरत है। कठोरता से पहल करने की जरुरत है। अन्यथा सूर्यांशियों का बचाखुचा तेज भी नष्ट हो जायेगा।
विविध आलेखों, कहानियों, कविताओं आदि के पश्चात् नियमित रूप से पत्रिका के अन्तिम पन्नों पर स्मृति-शेष और वैवाहिक-विवरण तथा पुस्तकों की समीक्षा प्रकाशित करना पुनीत, आवश्यक और उपयोगी स्तम्भ है। इसे यथावत जारी रहना चाहिए। जयभास्कर।
कमलेश पुण्यार्क
सम्प्रति-देवकोठी, पितामहेश्वर, गया
मो./वाट्स. 8986286163