Magbandhu Akhil

Magbandhu Akhil It is a community magazine of Shakdwipiya Brahman with concept of documentation of cultural heritage and work as platform for members of all age-sex group.

*ओडिशा में ओडिशा के मगबन्धुओं पर केंद्रित मगबन्धु पत्रिका के "ओडिशा के मग- ब्राह्मण" विशेषांक का भव्य लोकार्पण समारोह सम...
25/11/2025

*ओडिशा में ओडिशा के मगबन्धुओं पर केंद्रित मगबन्धु पत्रिका के "ओडिशा के मग- ब्राह्मण" विशेषांक का भव्य लोकार्पण समारोह सम्पन्न*

ओडिशा शाकद्वीपीय ब्राह्मण समाज की स्थापित संस्था "निखिलोत्कल शाकद्वीपीय ब्राह्मण समाज" एवं सार्वभौम शाकद्वीपीय ब्राह्मण महासभा, झारखंड के तत्वावधान में गत रविवार दिनांक (23 नवम्बर, 2025) को मगबन्धु (अखिल) पत्रिका के नवीनतम अंक ओडिशा के मग- ब्राह्मण (जुलाई - दिसम्बर 2025) (वर्ष 20, अंक 41) का भव्य लोकार्पण समारोह सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम निखिलोत्कल शाकद्वीपीय ब्राह्मण समाज के कटक (ओडिशा) स्थित मुख्यालय तनरापा, बीरीबाती में आयोजित था, जिसमें पुरी, भुवनेश्वर, जगतसिंहपुर, अंगूल, राउरकेला, केंद्रापारा सहित ओडिशा के अन्य जिलों के शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की उपस्थिति रही।
मगबन्धु पत्रिका लोकार्पण के अतिरिक्त संगठन द्वारा समाज में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले लगभग पचास मगबन्धुओं को मुख्यअतिथि, मगबन्धु पत्रिका के संपादक एवं संगठन के पदाधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित प्रशस्ति पत्र भी वितरित किया गया।
इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध उद्योगपति एवं समाजसेवी श्री सुरेश प्रसाद मिश्र (बड़बिल) थे, अन्य सम्मानित अतिथियों में श्री शंभू नाथ मिश्र (मुजफ्फरपुर), श्री रूद्र नाथ मिश्र एवं श्री मिथिलेश मिश्र (राँची) और मगबन्धु पत्रिका के संपादक डॉ सुधांशु शेखर मिश्र उपस्थित थे, जिन्हें प्रतीक चिह्न एवं अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर बोलते हुए मुख्य अतिथि श्री सुरेश प्रसाद मिश्र जी ने मगबन्धु (अखिल) पत्रिका के ओडिशा विशेषांक की भूरि- भूरी प्रशंसा की और आगे भी ऐसे ही समाजोपयोगी कार्यक्रमों को नियमित रूप से अभियान के रूप में जारी रखने का आह्वान किया।
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में सौर ब्राह्मण परिषद के अध्यक्ष पंडित रघुनाथ दास, राष्ट्रीय सूर्यांशी शाकद्वीपीय ब्राह्मण संगठन के महासचिव डॉ. रंजीत आचार्य, निखिलोत्कल शाकद्वीपीय ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष श्री विजय नायक शर्मा, मुख्य उपदेष्टा श्री शरद कुमार महापात्र, सह आचार्य प्रो. आशीष नायक, राष्ट्रीय संयोजक श्री चंद्रशेखर आचार्य, श्री कन्हाई आचार्य सहित अनेक पदाधिकारियों की सक्रिय भूमिका रही।

मगबन्धु (अखिल) पत्रिका का नवीनतम अंक जुलाई -दिसंबर, 2025 "*ओडिशा के मग ब्राह्मण*"  (वर्ष 20, अंक 41) शीघ्र प्रकाश्य।    ...
24/09/2025

मगबन्धु (अखिल) पत्रिका का नवीनतम अंक जुलाई -दिसंबर, 2025 "*ओडिशा के मग ब्राह्मण*" (वर्ष 20, अंक 41) शीघ्र प्रकाश्य।
इस अंक का लोकार्पण कार्यक्रम नवम्बर माह में भुवनेश्वर/पुरी (ओड़िशा) में संपन्न होगा।

मगबन्धु पत्रिका नवीनतम अंक "महाकुम्भ 2025, प्रयागराज और मग-समाज" के कुंभनगरी, प्रयागराज में लोकार्पण समारोह में आप सादर ...
03/02/2025

मगबन्धु पत्रिका नवीनतम अंक "महाकुम्भ 2025, प्रयागराज और मग-समाज" के कुंभनगरी, प्रयागराज में लोकार्पण समारोह में आप सादर आमंत्रित हैं

सूर्य सप्तमी के पावन अवसर पर कुंभनगरी, प्रयागराज स्थित "श्री सूर्य नारायण साधना केन्द्र", सेक्टर 18 हर्षवर्धन मार्ग, कल्पवासी थाना के पास रांची(झारखंड )से प्रकाशित मगबन्धु पत्रिका के नवीनतम अंक "महाकुम्भ 2025, प्रयागराज और मग-समाज" ' जनवरी - जून 2025', वर्ष 20, अंक 40 के लोकार्पण की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है।
कुंभनगरी, प्रयागराज में मुख्य रूप से सूर्य सप्तमी समारोह का आयोजन दो स्थानों क्रमशः श्री सूर्य नारायण साधना केन्द्र, सेक्टर 18 और सूरी सेवाश्रम, अरेल में सम्पन्न होता है, जिसमें मग समाज के सदस्यगण शामिल होते हैं। संयोग से पूजनोपरांत दोनों स्थानों पर पत्रिका के लोकार्पण का कार्यक्रम निर्धारित है।
आप सभी सादर आमंत्रित हैं।

* मगबन्धु (अखिल) का नवीनतम अंक शीघ्र प्रकाश्य* *मगबंधु (अखिल) पत्रिका के नवीनतम अंक "महाकुम्भ 2025-प्रयागराज और मग-समाज ...
15/12/2024

* मगबन्धु (अखिल) का नवीनतम अंक शीघ्र प्रकाश्य*

*मगबंधु (अखिल) पत्रिका के नवीनतम अंक "महाकुम्भ 2025-प्रयागराज और मग-समाज " का लोकार्पण कार्यक्रम आगामी 04 फरवरी 2025 (मंगलवार) को महाकुम्भ मेला परिक्षेत्र, प्रयागराज में होगा*

मग जागृति फाउंडेशन, रांची (झारखण्ड) द्वारा प्रकाशित मगबंधु (अखिल) त्रैमासिक पत्रिका (संयुक्तांक) के नवीनतम अंक "महाकुम्भ 2025- प्रयागराज और मग- समाज" , जनवरी - जून 2025 (वर्ष - 20, अंक- 40) प्रकाशन के लिए प्रेस में है। इस पत्रिका का लोकार्पण कार्यक्रम आगामी 04 फरवरी, 2025 (मंगलवार) को प्रयागराज में आयोजित महाकुम्भ 2025 मेला परिक्षेत्र में सूर्य सप्तमी के अवसर पर संपन्न होगा।
इस महत्वपूर्ण अंक में महाकुम्भ से जुड़े विभिन्न आयामों पर कई आलेख शामिल हैं। साथ ही प्रयागराज के इस अतिमहत्वपूर्ण आयोजन में मग समाज की उपयोगिता- सहभागिता विषयक आलेख भी इसमें शामिल हैं। ऐसे प्रमुख विद्वानों- विदुषियों में प्रो. शैल कुमारी मिश्र, पं. कमलेश पुण्यार्क, डॉ. विजय प्रकाश शर्मा, सतेन्द्र कुमार पाठक, वामाचरण मिश्र, महेश प्रसाद पाठक, डॉ. एस. प्रेमी, डॉ. द्विवेदी आदि मुख्य हैं, जिनके आलेखों ने इस अंक को विशिष्ट बना दिया है।
इस अंक में प्रयागराज मग समाज के विशिष्ट विभूतियों यथा डॉ. जगन्नाथ पाठक, डॉ. रामनारायण मिश्र, डॉ. शिव कुमार मिश्र, पंडित श्याम सुन्दर पाण्डेय, वैद्य गोकुलानंद- सदानंद मिश्र, पं. जगदीश नारायण मिश्र, आशुतोष मिश्र, डॉ. विभाकर पाठक आदि का जीवन परिचय प्रकाशित किया गया है। इसके साथ ही प्रयागराज में रचे- बसे एवं विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत दो सौ से भी अधिक परिवारों के निवास, विभिन्न जिलों, प्रदेशों से उनके आव्रजन सहित अन्य विवरण भी प्रस्तुत किए गए हैं। इसके अलावा पत्रिका के नियमित स्तम्भ यथा विवाह योग्य लड़के- लड़कियों की सूची समाचार, श्रद्धांजलि आदि भी पूर्ववत प्रकाशित किए गए हैं।
ज्ञातव्य है कि राष्ट्रीय स्तर की मग -समाज को समर्पित विशिष्ट सामाजिक पत्रिका "मगबंधु" का प्रकाशन पिछले 20 वर्षों से नियमित रूप से हो रहा है, जिसमें प्रत्येक अंक एक विषय केंद्रित होते हैं।
यह जानकारी पत्रिका के संपादक डॉ. सुधांशु शेखर मिश्र ने दी।

मगबन्धु पत्रिका के नवीनतम अंक पर डॉ. विजय प्रकाश शर्मा जी की समीक्षा
26/10/2024

मगबन्धु पत्रिका के नवीनतम अंक पर डॉ. विजय प्रकाश शर्मा जी की समीक्षा

मगबंधु (अखिल) का नवीनतम अंक (जुलाई - दिसम्बर) प्रकाशित।
04/09/2024

मगबंधु (अखिल) का नवीनतम अंक (जुलाई - दिसम्बर) प्रकाशित।

 #मगबन्धु_अखिल का अगला 'हीरो' 0️⃣9️⃣🌷0️⃣7️⃣🌷2️⃣0️⃣2️⃣4️⃣ विगत उन्नीस वर्षों से विद्वद्वरेण्य डॉ०  Sudhanshu Shekhar Mish...
10/07/2024

#मगबन्धु_अखिल का अगला 'हीरो'
0️⃣9️⃣🌷0️⃣7️⃣🌷2️⃣0️⃣2️⃣4️⃣

विगत उन्नीस वर्षों से विद्वद्वरेण्य डॉ० Sudhanshu Shekhar Mishra के निर्विकार सम्पादन में नियमित प्रकाशित मग-पत्रिका #मगबन्धु_अखिल (Magbandhu Akhil) त्रैमासिक ने मगसमाज की गरिमा का संवहन करते हुए समाज, साहित्य और संस्कृति से सन्दर्भित विविध विषयों से विभूषित एवं विशिष्ट विभूतियों पर केन्द्रित सम्मान-अंक का सुरुचिपूर्ण तथा स्तरीय कुल अड़तीस अंकों का प्रकाशन कर जातीय पत्रिका-कुल में अपना अद्वितीय स्थान बना लिया है, यह अपने आपमें स्थापित सत्य है।

हमें यह सूचित करते हुए आन्तरिक आह्लाद हो रहा है कि 'मगबन्धु अखिल' का आगामी विशेषांक मगसमाज के विद्यावयोवृद्ध मनोयुवा; जमुई की माटी के अनमोल रतन; बिहार के स्वनामधन्य कवि-गीतकार, शाइर, ग़ज़लगो, पत्रकार, बहुमुखी साहित्यकार, बहुभाषाविद् , सुधी लेखक, निष्पक्ष समीक्षक, विभिन्न सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं के मार्गदर्शक, ज्योतिपुरुष ज्योतीन्द्र मिश्रजी के व्यक्तित्व-कर्तृत्व और संस्मरणों पर केन्द्रित सम्मान-अंक होगा।

हमारी आपसे विनम्र अभ्यर्थना है कि सम्मान्य मिश्रजी के रचना-संसार पर समीक्षात्मक आलेख अथवा उनसे सम्बद्ध प्रेरक संस्मरण दिनांक 31 जुलाई, 2024 तक ई-मेल अथवा ह्वाट्सएप-द्वारा उपलब्ध कराने की कृपा करें।

आपकी सुविधा के लिए श्रीमिश्रजी का संक्षिप्त परिचय और उपलब्ध कृतियों के मुखपृष्ठ को भी प्रस्तुत किया जा रहा है। यथाप्रस्तुत मुखपृष्ठों के अतिरिक्त उनकी और भी स्तरीय कृतियॉं हैं।

आपके आक्षरिक योगदान से ही 'मगबन्धु अखिल' का यथोक्त विशेषांक पठनीय बन सकेगा। आशा है, आपका आशीर्वाच्यात्मक अमृताक्षर पत्रिका को ससमय सुलभ होगा।

भवत्स्नेहाधीन,
डॉ० सुधांशुशेखर मिश्र; सम्पादक
सन्दीपकुमार आचार्य; सम्पादक (सदस्य)

ई-मेल : [email protected]

ह्वाट्सएप नम्बर :
+91 9431561424
+91 8890579355

विहंगम दृष्टि :: मगबन्धु - जनवरी-जून २०२४चित्ताकर्षक स्वस्तिकावरण के अन्तर्गत गणमान्य मग कथाकारों की मोहक छायाचित्रों से...
07/06/2024

विहंगम दृष्टि :: मगबन्धु - जनवरी-जून २०२४

चित्ताकर्षक स्वस्तिकावरण के अन्तर्गत गणमान्य मग कथाकारों की मोहक छायाचित्रों से सुसज्जित मग जागृति फाउण्डेशन ट्रस्ट (राँची) का छमाही मुखपत्र— मगबन्धु (अखिल) जनवरी-जून २०२४ लघुकथा विशेषांक के रूप में अपने नियत समय से काफी पूर्व प्रकाशित होकर, हस्तगत हुआ। अपनी सतत प्रकाशन यात्रा के १९वें वर्ष का ३८वाँ पड़ाव है ये विशेषांक। प्रस्तुत विशेषांक में मग-मातृशक्ति की अधिक भागीदारी मगसमाज के समुज्ज्वल प्रशस्त पथ का संकेतक प्रतीत हो रहा है। हालाँकि गत वर्ष ही मातृशक्ति पर आधारित मग महिला साहित्यिकी विशेषांक प्रकाशित किया जा चुका है।
आज के भागदौड़ भरी जीवनशैली वाले कालखण्ड में किसी पत्रिका का नियमित प्रकाशन, अपने आप में बहुत ही कठिन कार्य है। वो भी समय से महीने-डेढ़ महीने पूर्व विषय-एकत्रण, सम्पादन, प्रकाशन आदि कार्य सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न कर लेना और भी कठिन है। किन्तु जुनूनी, जुझारू, कर्मठ और लगनशील व्यक्ति के कोष में कठिन शब्द होता ही नहीं है। तदर्थ सम्पादक डॉ. सुधान्शु शेखर मिश्र जी एवं उनके सभी सहयोगीजन साधुवाद के पात्र हैं।
मुखपृष्ठ के बाद विषय सूची के पृष्ठ भाग में विशिष्ट विभूति—भामाशाह श्री सुनील शर्माजी, बेंगलुरु की चक्षुष्मीलक और अनुकरणीय गतिविधियों से साक्षात्कार होता है। अभी हाल में ही इनके द्वारा किए गए पुनीत कार्य से मगसमाज अनुगृहित हुआ है।
तदुपरान्त अति संक्षिप्त किन्तु चुश्त-दुरुस्त सम्पादकीय के बाद प्रबुद्ध मग-गौरव डॉ.विजय प्रकाश शर्मा जी एवं आदरणीय ज्योतीन्द्र भाईजी की कलम से मगबन्धु के गतांक पर उनके अनमोल विचारों से हम अवगत होते हैं। गतांक पर संक्षिप्त वा विस्तृत समीक्षा विशेषकर उन पाठकों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जिन्होंने गतांक का अवलोकन नहीं किया है। चुँकि प्रत्येक अंक किसी न किसी अनूठे-अनछुए विषय पर विशेषांक के रूप में ही हुआ करता है, इस कारण पत्रिका की संग्रहणीयता और बढ़ जाती है।
आगे, पृष्ठ तीन से कथाकारों की भावभूमि में पाठकों को उतरने का अवसर मिलता है, जिसका श्रीगणेश श्रीमती सुमेधा पाठक की दो लघुकथायें — आश्चर्य और नम्बर 27 से होता है। सामाजिक संदेश-प्रधान लघुकथा—आश्चर्य पर आश्चर्य करने के बजाय अमल करने की जरुरत है, जबकि नम्बर 27 भाउक दिल में नस्तर सी चुभ जाने जैसी है, भले ही परुष (कठोर) हृदय पर इसका कोई प्रभाव न पड़े। सच में सपना और कल्पना की मृदुलता यथार्थ की कठोरता से कतई तुलनीय नहीं है। यथार्थ भोगा हुआ सत्य होता है और कल्पना तो असत्य की पिटारी का ही दूसरा नाम है।
श्रीमती मृदुला मिश्र की दो लघुकथाएं—अनपढ़ और वृद्धावस्था संदेश-प्रधान हैं, तो डॉ.रश्मि मिश्र की कथा—नियति सामाजिक भाल पर स्याह प्रश्न चिह्न की भाँति। समय के मेले में अपनेपन की तलाश में खोयी माँ की भूख श्रीमती पद्मा मिश्र की मार्मिक कथा मन को छू गयी। पढ़ी-लिखी कमाऊ बहू की तुलना में क्या संस्कारी अनपढ़ बहूएँ ही अच्छी नहीं हुआ करती थी? और ये एनरॉयडी विकास ने क्या परिवारों को जोड़ने के बजाय तोड़ने का अधिक काम नहीं किया है? किन्तु दूसरी ओर डॉ.सविता मिश्र ’मागधी’ की रोचक रचना—जी चात के सुनूँ मोबाइन मन के पीड़ा— अपने-अपने नजरिये की बात है—बुराई बहुल से अच्छाई को ढूढ़ निकाल लेने का सबक। फिर भी अति सर्वत्र वर्जयेत् पर तो ध्यान रखना ही होगा न ! आगे का संस्मरण भी संस्मरणात्क है। घोर व्यापार बन चुकी आतुरालयी व्यवस्था में सेवा परायण प्रियंका और वर्षा जैसी नर्सें सौभाग्य से ही किसी रुग्ण को मिलते हैं। अनन्या वैद्य की कविता—वो परिवार हमारा आधुनिकता की विसंगतियों को उजागर करता है। डॉ.वीणा शर्मा की स्वाभिमान की गूँज (1-2) ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि बड़े सोच-विचार के लिए बड़ा खानदान, ऊँच्च शिक्षा, बड़ा पद आदि का होना कतई जरूरी नहीं। श्रीमती सुस्मिता मिश्र की माया तो सच में दूरुह और आभासी मायाजाल से उबरने में सफल हुयी अपने बुद्धि-विवेक से और विवेकपूर्ण फैसला तो वास्तव में विवेकपूर्ण है ही। भले ही इस उदारता से सबको जीने नहीं आता, फलतः संकीर्ण हृदय मानुस अपने आपके साथ अन्याय कर लेता है। डॉ.अर्पणा शर्मा असली शिक्षा की सबक सिखाती हैं और प्रभु की दुकान में टहलाती भी हैं। काश! हम आसमान पर रहें किन्तु पांव जमीन को छूने से न हिचकें और प्रभु की दुकान से सही खरीददारी सही समय पर करना यदि सीख जाए मानव, तो फिर कहना ही क्या। अधिवक्ता श्रीमती शुभ्रा मिश्र का फैसला वकालतपेशा की ईमानदारी और सत्-न्याय का फैसला है। यदि हर वकील इस भाँति विचारकर, हर केस हैंडिल करने लगें तो सत्य जलील न हो कभी एवं अनाचार, झूठ और असत्य को समाज से न्यायालय तक कहीं पनाह न मिले। पैसे-पैरवी के जोर पर अपराधी को बल न मिले । इनकी ही दूसरी लघुकथा— रामखेलावन का झुमका दम्पति के परस्पर स्नेह-सौहार्द और समर्पण की सीख देती है। कर्तव्यपरायणता का बोध जगागी है। श्रीमती प्रभा मिश्र की कहानी गुड़ बाबूजी और माँ का हक दो भिन्न भाव-ध्रुवों का तल-स्पर्श करती रोचक कथा है। लघुकथाओं की खिड़की से बीच में झाँकती श्रीमती रचना मिश्र की कविता—विश्वास हूँ मैं— ईश्वर के सही ठिकाने का बोध कराती है। सच में ईश्वर को कहाँ-कहाँ खोजते फिरते हैं और खोजने वाली जगह पर जाते नहीं कभी। आधुनिकता की अँधी दौड़ में माँ-वाप जब अपने सपने अपने बच्चों पर थोपने की धृष्टता करने लगते हैं, तब श्रीमती सविता शुक्ल की कहानी जनमती है—स्टेटस सिम्बल। भाव विह्वल रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति तो उढ़ेल जाता है कागज के पन्नों पर, किन्तु समाज के प्रबुद्ध कहे जाने वाले लोग भला कितना ध्यान दे पाते हैं, ध्यान दे भी दिए तो अमल-पहल कितना कर पाते हैं! सविता शुक्ल की दूसरी कहानी—आदर्श बहू में भी कुछ ऐसी ही बातें हैं। सास-बहू के नाजुक रिस्ते को कितनी सासें समझ पाती हैं और आधुनिकता में पली असंस्कारी बहुएँ कितनी विचारवान होती हैं—सोचने वाली बात है। मजे की बात तो ये है कि हमारी चाहत भी कुछ ऐसी ही विकृत हो गयी है—द्रौपदी की तरह बहुत सारे गुण एकत्र ढूढ़ने के चक्कर में दोषों की पिटारी उठा लाते हैं। समय से बच्चों का विवाह करना समझदारी भरा कदम तो है, किन्तु इसके दुष्परिणामों को भुगतते हुए भी अभी हम चेत नहीं रहे हैं। देखादेखी की भेड़चाल में सभी मगन हैं प्रायः। सुजाता मिश्र की दो लघुकथाएँ—परमेश्वर का रिमोट कन्ट्रोल और पतंग की डोर लगभक एक ही सीख के दो पहलुओं की भाँति हैं। कुमारी स्म़ृति पाठक की लघुकथाएं—वेटी का विवाह और बहुमत का सत्य भी रोचक और प्रासंगिक लगा। प्राची मिश्र की लघुकथाएं—ईश्वर के नाम पत्र और मदद सुप्रयास की बानगी है। इस तरह नव कथाकारों को पत्रिका में स्थान देकर लेखनधर्मिता को बल देना श्लाघ्य कार्य है। डॉ.सुनीता मिश्र की रचना— गृहणी महिला की कथा और स्त्री की कहानी भले ही दो दिशाओं में जाती दो कहानियाँ प्रतीत हो रही हैं, किन्तु दोनों का केन्द्र एक ही है—पुरुष प्रधान समाज की कुण्ठित विचारधारा में दुबकी नारी। डॉ.लक्ष्मी मिश्र की कहानी—फैसला में सोनल ने सही फैसला लिया—भावी पति के समक्ष सच्चाई को सामने रखकर और प्रणय ने भी नारी हृदय का मान रखा, अन्यथा नासमझी में ही संसार वरबाद हो जाता है। प्रीती भारती की कहानी जेब टटोलती माँ में एक गुह्य संदेश है। जेब माँ भी टटोलती है और पत्नी भी...। किन्तु दोनों में कोई तुलना नहीं। चारुमित्रा जी की कहानी खूबसूरती में तो अपनी खूबसूरती है ही, किन्तु कलेक्टर बिटिया में सबक और संदेश की अत्यधिक गहराई मिली। डेस्टीनेशन मैरिज और प्री वेडिंग की महामारी में हमारा समाज मरा जा रहा है। इस वायरस का सही टीका सही समय पर इज़ाद करना जरुरी है। मंजे हुए रचनाकार, निरन्तर शोधरत श्री सत्येन्द्र कुमार पाठक जी का आलेख—जन चेतना का आईना है लघुकथा रोचक और ज्ञानवर्धक लगा। इसके लिए पाठकजी को साशीष साधुवाद। आदरणीय मदनमोहन तरुण जी का कटाक्ष—आपका सिर सुरक्षित है वर्तमान चिकित्सा व्यवस्था पर तमाचा है। धरती के भगवान समझे जाने वाले डॉक्टर ज्यादातर अब हैवान हो गए हैं। उन्हें यमराज का सहोदर कहना समयोचित संज्ञा है। इन्हीं की दूसरी रचना— तुम तो प्रतिष्ठा ही खा गए पुरानी परम्परा की याद दिलाती है। हालाँकि जूठा तो लोग आज भी छोड़ते हैं, उद्देश्य और भाव बदल गया है सिर्फ। अधिक से अधिक जूठा छोड़ने को ही बड़प्पन की निशानी समझा जाने लगा है। डूंगरगढ़ वाले मेरे प्रिय सत्यदीप भाई की दो रचना— मेजरमेंट में सन्त जी का मेजरमेंट गड़बड़ाया हो या नहीं , हमारा-आपका, भिखमंगे भक्तों का दिमाग जरुर गड़बड़ा गया है। यज्ञ और कथा के नाम पर सिर्फ लूट मचा है। बहुरूपिये बाबाओं की बाढ़ में भोली या कहें मूर्ख जनता लुटे जा रही है, फिर भी अक्ल नहीं खुलती। तो दूसरी ओर धोखा वाला प्रसंग भी जगजाहिर है। ईमानदारी से रजिस्ट्री शायद ही कहीं होती हो। मजे की बात ये है कि जो जितना भ्रष्ट है, दूसरे से उतनी ही ईमानदारी की आश लगाये होता है। बंगलुरु से प्रेषित डॉ. मणिकान्त मिश्र जी की भावपूर्ण कहानी तेरी याद सताती है को इस अंक की श्रेष्ठतम रचना कहने की धृष्टता कर रहा हूँ। इसके लिए समुचित अन्य शब्द नहीं ढूढ़ पा रहा हूँ और न अन्य रचनाकारों से किंचित् भी भेदभाव कर रहा हूँ। पता नहीं क्यों ये कहानी मन को कहीं भीतर तक जाकर छू गयी। गढ़वा से श्री सुरेन्द्र कुमार मिश्र की दो लघुकाय रचनाएं इन्सानी ठोकर और महत्त्व प्रेरणादायी रचनाओं की पंक्ति में रखने योग्य लगी। कभी-कभी छोटी बातें ही बड़ी बन जाती हैं। श्री धनेन्द्र प्रवाही जी की दो रचनाएं—गुलदस्ते और जीवन ही जीवन जीवन के बाद भी जीवन के दर्शन को ईंगित करती है। जिजीविषा का अपना अलग महत्व है, आनन्द है। प्रिय ब्रजमाधव जी की कचनार टोली बड़े कथानक को करीने से लघुकथा में पिरोयी हुई मौक्तिकमाला की तरह प्यारी लगी। श्री सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ जी की समझ से सीख लेकर सच में अपनी समझ को बदलने की जरुरत है और बनारस का लड्डू तो शादी के लड्डू की तरह है—जो खाया वो भी पछताया, नहीं खाने वाला तो पछता ही रहा है। मिट्टी के घरौंदों को त्यागकर, कंकरीट के जंगलों में जाने को हम बेताब हैं। श्री उदयशंकर उपाध्याय जी की दो लघुकथाएं—पथरायी आँखें और पी पी ई किट झूठे ख्वावों की मृगमरीचिका में टहलती आधुनिकता की बानगी पेश करती है। पता नहीं क्यों लोग शान से कहते नहीं अघाते कि मेरा वेटा विदेश में नौकरी करता है। जबकि मेरे जैसा अल्पज्ञ तो इसे बड़े शर्म की बात समझता है। विद्यावाचस्पति महेश प्रसाद पाठक जी की पुस्तक मेला का रोचक अनुभव बहुत ही अच्छा लगा। छपवाने से लेकर बेंचने तक का पैसा लेखकों से ऐंठ कर ही तो पुस्तक मेले आयोजित होते हैं। और लेखन-वायरस-एडिक्ट भी बेचारा क्या करे, वो भी अपनी बुरी लत से लाचार है। दूसरी रचना— मेहनत की पंक्तियों में अच्छी सीख छिपी है। मगबन्धु के अगले पृष्ठ पर यथार्थ के साथ मैं स्वयं उपस्थित हूँ। लम्बी डींग हाँकने वाला आदमी भला लघुकथा जैसी चुस्त कलाबाजी क्या जाने। अपनी कथा-यात्रा में सिर्फ दो लघुकथा ही लिख पाया, जिसमें ये एक है। प्रिय पंकज की दो रचनाएँ—ब्रेकिंग न्यूज और अँगूठे की मौत पत्रकारिता के गिरते स्तर की बानगी है। खबर में खबर कितना है इससे कोई मतलब नहीं आज की पत्रकारिता को, राजनीतिक आँच कितनी हैं, ये अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। युवा रचनाकार को साशीष साधुवाद इस सुन्दर रचना हेतु। प्रिय दिलीप कुमार पाठकजी मंजे हुए रचनाकार हैं, साहित्य-जगत में “खूँटा” गाड़ने वाले। ऐसे में देवन मिसिर वाली चटनी चटाकर मगबन्धु के पाठकों को फुसला दिए हैं। अतः इसके परिमार्जन स्वरूप उन्हें अगले अंकों में सज-धजकर आने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। श्रीमती प्रभा मिश्र की कविता—क्या मैं वही हूँ सनातनी स्त्री की मनो-सामाजिक नियति को उजागर करती है, तो दूसरी कविता अँगूठा जरुर छूना में पुरुष के अहं का दुर्गन्ध और स्त्री के समर्पण का सुगन्ध शिक्षात्मक रूप से व्यक्त किया गया है। प्रिय विश्वेश्वर प्रसाद मिश्रजी की संक्षिप्त विवरणिका—छत्तीसगढ़ में प्रवासी मग-विप्र विषयवस्तु की प्रस्तुति शैली और रोचकता के कारण जिज्ञासा जगा गई। इसके विस्तृत स्वरूप की प्रतीक्षा रहेगी। आशा है “मगबन्धु” के आगामी अंकों में इसे समुचित स्थान अवश्य मिलेगा। आदरणीय डॉ. विजय प्रकाश शर्मा जी का आलेख—खैरा गाँव और शाकद्वीपीय ब्राह्मण में सूर्य-पूजा-परम्परा से लेकर, वैद्यक परम्परा तक की विशद चर्चा से स्पष्ट है कि हम मगों का सेवापरायण और त्याग-तपस्या पूर्ण जीवन कितना लोकहितकारी रहा है। सोशलमीडिया की सामाजिक हलचल में कुछ विचारणीय तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं। इन पर गम्भीरता से ध्यान देने की जरुरत है। कठोरता से पहल करने की जरुरत है। अन्यथा सूर्यांशियों का बचाखुचा तेज भी नष्ट हो जायेगा।
विविध आलेखों, कहानियों, कविताओं आदि के पश्चात् नियमित रूप से पत्रिका के अन्तिम पन्नों पर स्मृति-शेष और वैवाहिक-विवरण तथा पुस्तकों की समीक्षा प्रकाशित करना पुनीत, आवश्यक और उपयोगी स्तम्भ है। इसे यथावत जारी रहना चाहिए। जयभास्कर।

कमलेश पुण्यार्क
सम्प्रति-देवकोठी, पितामहेश्वर, गया
मो./वाट्स. 8986286163

पत्रिका पर तलस्पर्शी समीक्षा के लिए हार्दिक आभार
25/05/2024

पत्रिका पर तलस्पर्शी समीक्षा के लिए हार्दिक आभार

विचार-संचार प्रो. उमाशंकर शर्मा ' ऋषि' जी की कलम से -       मेरा अहोभाग्य कि एक ही साथ मगबन्धु के दो अंक (३७ तथा ३८) मिल...
25/05/2024

विचार-संचार

प्रो. उमाशंकर शर्मा ' ऋषि' जी की कलम से -
मेरा अहोभाग्य कि एक ही साथ मगबन्धु के दो अंक (३७ तथा ३८) मिले। स्वाभाविक था कि मेरे ज्ञानवर्धन में दोनों ही बहुत सहायक सिद्ध हुए। पढ़कर अवाक् रहने पर भी कुछ व्यक्त करना जरूरी है क्योंकि वाणी की विफलता इससे बढकर क्या होगी कि अद्‌भुत वस्तु देखकर भी कोई मीन रह जाए?
मग- मगध विशेषांक (अंक ३७) की पाठ- सामग्री इतनी सधी हुई और प्रामाणिक होने के साथ रोचक भी है कि मुझे मगध निवासी होने पर गर्व हुआ। आदरणीय कमलेश पुण्यार्क, सत्येन्द्र कुमार पाठक, डॉ. मधुसूदन पाण्डेय जी ने अपने लेखों द्वारा अनेक ऐसे विद्वानों का परिचय दिया है जिन्हें मैंने बचपन में देखा, सुना किन्तु अब वे विस्मृत कर दिये गये हैं। पं. उमेश चन्द्र मिश्र और डॉ. शिवशंकर पण्डित मेरे आवास पर आ चुके थे तथा पं. रामावतार मिश्र के संस्कृत महाकाव्य "देवीचरितम्" पर मैं परोक्षतुः मगध विश्वविद्यालय से शोधकार्य करा चुका हूँ। इनके व्यक्तित्व के प्रकाशक डॉ. रामकृष्ण मिश्र तथा शकुन्तला 'अरुण' के प्रति मुझे धन्यवाद के शब्द नहीं मिल रहे। इन विद्वानों के साथ मगध के सांस्कृतिक जीवन, इतिहास, दंतकथा के रूप में याद किये जाने वाले ' देवन मिसिर' इत्यादि पक्षों पर यथासाध्य प्रकाश डालू‌ने वाले लेखकों को पत्रिका में समुचित स्थान देने की योजना बनाने वाले डॉ. सुधांशु शेखर मिश्र तथा उनकी टीम का मैं बहुत - बहुत कृतज्ञ हूँ।
मगबन्धु का ३८ वाँ अंक (लघुकथा विशेषांक) इस पत्रिका को एक नया आयाम प्रदान करता है जिसमें मुख्य रूप से समाज की छिपी हुई नारी- प्रतिभाओं को अपने कथ्य को व्यक्त करने की प्रेरणा दी गई है। इस क्रम में अत्यन्त रोचक पठनीय सामग्री आयी है। इस दिशा में दृष्टि डालने की आवश्यकता है। इससे लगता है कि हमारा परिवार कितना समृद्ध है। इस अंक में श्री सुनील शर्मा (बेंगलूरु) द्वारा अत्यधिक श्रम और श्रद्धा- सहित निर्मित श्रीसूर्यनारायण मन्दिर एवं भास्कर यात्री निवास के निर्माण का वृत्तान्त जानकर परम प्रसन्नता हुई। कुछ अन्य विद्वानों द्वारा लिखित लघुकथा- विषयक सामग्री पढ़कर तो रोचकता मूर्तिमती हो गई। पत्रिका में पूरी तरह आपने सर्व-समावेश करने का प्रयास किया है।
यह सूचना देते हुए प्रसन्नता हो रही है कि मेरी समग्र कृतियों के सर्वेक्षण पर पटना विश्व- विद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि अंजली कुमारी को उसके शोध-प्रबन्ध पर दी गयी है।

वैशाख पूर्णिमा २०८१

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