19/05/2026
कई मर्द…
रोते नहीं।
वो बस चुप हो जाते हैं।
धीरे धीरे कम बोलते हैं،
अपनी थकान को “ज़िम्मेदारी” का नाम दे देते हैं،
और मुस्कुराते हुए टूटते रहते हैं।
ये नज़्म
उन तमाम मर्दों के नाम —
जो अपने घर की रोशनी बनने में
खुद अँधेरों से गुज़रते रहते हैं। ❤️
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बहुत थक गए हो
बहुत थक गए हो
सफ़ेद आँधियों ने जो सर पर तुम्हारे हैं डेरे जमाए
तुम्हारी पेशानी की लकीरें गवाही सदा देंगी तुमको
कि तुमने कड़ी धूप को अपनी पलकों पे रोका हमेशा
तुम्हारे ही मज़बूत कंधों के दम से
घरौंदे में खुशबू की फ़सलें उगीं
और बच्चे खुशी से मचलने लगे
तुम्हें लग रहा है कि तुम हार बैठे
तुम्हें लग रहा है कि तुम अब अकेले हो इस ज़िंदगी में
मगर तुम ज़रा ग़ौर से देखो
इन सहमे चेहरों की जानिब
वो मासूम आँखें तुम्हें देखकर मुस्कुराती हैं अब भी
तुम्हारी ही क़ामत है उनका सहारा
तुम्हारा ये थकना ही उनकी खुशी का है अब कुल असासा
तुम्हारे ही जूते घिसे हैं
तो उनको ये रेशम मिले हैं
तुम्हारी रियाज़त का हासिल है ये मुस्कुराता घराना
तुम अब भी बहुत क़ीमती हो हमारे लिए जान-ए-जाना!
तुम्हारा ये होना ही हम सब की हिम्मत का उन्वान ठहरा
तुम्हारी थकन मोतबर है
— फ़ोज़िया रबाब
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कुछ लोग अपनी पूरी ज़िंदगी…
सिर्फ़ दूसरों को संभालते हुए गुज़ार देते हैं।
अगर आपके जीवन में भी कोई ऐसा आदमी है —
पिता,
भाई,
शौहर,
या बेटा…
जो चुप रहकर सब सहता है,
तो ये नज़्म उसे ज़रूर भेजिए। ❤️
और अगर आप खुद ऐसे इंसान हैं…
तो याद रखिए:
आपकी थकान भी मोहब्बत के क़ाबिल है।
⬇️ Comment में लिखिए:
“किसी मज़बूत इंसान को भी कभी कभी सहारे की ज़रूरत होती है।”
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