Art Diaries

Art Diaries In a time of relentless documentation, much is recorded, yet little is truly witnessed in its ‘moola’.

I’ve tried to inhabit this space — as a scholar, commentator, and as one who walks alongside stories, allowing them to unfold in their own cadence.

29/05/2026

24th May, 2026, ‘Night of Two Legends’ came alive at NMACC, Mumbai, as a captivating dance adaptation of legendary singer Talat Mahmood’s songs, scripted and narrated by award-winning journalist, author, and cultural curator Sahar Zaman. The production was curated directly from Zaman's deeply researched debut book, TALAT MAHMOOD: THE DEFINITIVE BIOGRAPHY, utilizing her unique insight as his grand-niece to weave a powerful narrative through his personal and professional life. This beautiful confluence of music and literature was performed and choreographed by Kathak maestro Padma Shri Shovana Narayan ji alongside her talented Asavari troupe disciples—Pallavi Lohani, Komal Biswal, Suparna Singh, Mahima Satsangi, and Ruchi Arya, with the stage lighting masterfully designed by Milind Srivastava.





Shovana Traxl Narayan Shovana Narayan - Asavari Institute for Kathak fans

26/05/2026

यस्य देवे परा भक्तिः
यथा देवे तथा गुरौ ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः
प्रकाशन्ते महात्मनः ॥






Maya Parijat Geetika Tewari fans

25/05/2026

रक्स में हो जा फ़ना

'ध्वनि' के वार्षिक उत्सव में शिवत्व का वैभव और खोए बचपन की पुकार

डॉ. माया पारिजात (लेखिका एवं कला समीक्षक)

नृत्य जब केवल दैहिक विलास या व्याकरण का प्रदर्शन न रहकर आत्मा की छटपटाहट और अंतस की अभिव्यक्ति बन जाए, तब वह कला नहीं, साधना बन जाता है। सूफी दरवेशों की भाषा में कहें तो, ‘रक्स में हो जा फ़ना’, यानी खुद को कला की अग्नि में इस तरह होम कर दे कि देखने वाले को ‘नर्तक’ नहीं, केवल ‘नृत्य’ दिखाई दे।
कलात्मक विसर्जन की यही पराकाष्ठा कल शाम कमानी ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में विख्यात नाट्य संस्था 'ध्वनि' के वार्षिक उत्सव में साक्षात देखने को मिली।

विगत 35 वर्षों से अधिक समय से श्रद्धेय श्री शंभु महाराज द्वारा प्रदत्त कथक नृत्य और अभिनय की इस सुंदर विरासत के साथ प्रयोगधर्मिता एवं नवाचार के सुंदर समायोजन से कला जगत को समृद्ध कर रहीं 'ध्वनि' की कलात्मक निर्देशिका वासवती मिश्रा जी की साधना इस मंच पर पूरी भव्यता के साथ परिलक्षित हो रही थी।

कला और संस्कृति की एक थिरकती गवाह के रूप में इस गरिमामयी शाम को सँवारा प्रेक्षागृह में उपस्थित विभूतियों ने। कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ गणमान्य जनों को पारंपरिक दुपट्टा (अंगवस्त्रम) ओढ़ाकर किया गया। इस उत्सव में विशिष्ट कला साधक के रूप में प्रख्यात अभिनेता एवं उद्यमी श्री राहुल आर. भुजराम, वरिष्ठ एवं लब्धप्रतिष्ठित कथक प्रतिपादक पद्मश्री विदुषी मंजुश्री चटर्जी, कथक की वरिष्ठ गुरु, गुरु गीतांजलि लाल, सुप्रसिद्ध कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम गुरु विदुषी वाणिश्री राव, संगीत नाटक एकेडमी की पूर्व सचिव श्रीमती हेलेन आचार्य, वरिष्ठ छऊ नृत्य कलाकार श्री संतोष तथा स्वयं लेखिका एवं कला समीक्षक डॉ. माया पारिजात उपस्थित थीं। (सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्रीमती रमा पांडे जी अपरिहार्य कारणों से अनुपस्थित रहीं)।

राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारे भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ एवं केन्द्रीय सरकार के पूर्व राज्य मंत्री श्री अश्विनी कुमार चौबे, ग्रेटर कैलाश की माननीय विधायक सुश्री शिखा राय, चांदनी चौक के निगम पार्षद श्री सुमन कुमार गुप्ता, भारत सरकार के विधि कार्य विभाग की अतिरिक्त केंद्रीय सरकारी अधिवक्ता सुश्री अनुप्रिया यादव और डॉ. रवि शर्मा ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

भाग १
सर्वत्र: शिवत्व की सर्वव्यापकता और तांडव का महावेग

कार्यक्रम का आगाज़ रेपरटॉरी की पहली भव्य प्रस्तुति 'सर्वत्र' से हुआ। जैसा कि शीर्षक से ही विदित है—'सर्वत्र' अर्थात् उस असीम, सर्वविद्यमान महाचेतना की वंदना, जो कण-कण में व्याप्त है। मंच का पर्दा उठते ही गंभीर डमरू ध्वनि और 'हर-हर महादेव' के सम्मोहन ने दर्शकों के हृदयों को वैराग्य के रंग में रंग दिया।

“जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले…” की इस अमूर्त अनुभूति को साकार करने मंच पर सूत्रधार के रूप में अक्षोभ्य अवतरित हुए। अपने नाम को सार्थक करते हुए—'अक्षोभ्य', जिसे कोई सांसारिक हलचल छू न सके—वे स्वयं शिव के सौम्य तेज के अवतार प्रतीत हो रहे थे। उन्होंने बेहद गरिमा के साथ शिव-विवाह, सती-देह-त्याग और महादेव के प्रलयंकारी तांडव की कथा को विस्तार दिया।

नर्तकों की तत्कार में वह ओज था कि पाश्चात्य समीक्षक कोलरिज की काव्य-थ्योरी 'विलिंग सस्पेंशन ऑफ डिसबिलीफ' (Willing Suspension of Disbelief) पूरी तरह चरितार्थ होती दिखी। दर्शक जानते हुए भी कि वे एक कृत्रिम भौतिक जगत में बैठे हैं, मानो स्वेच्छा से उस सत्य को भूल गए और साक्षात कैलाश पर्वत के हिमीय तेज के सामने उन्होंने स्वयं को अपनी संपूर्ण नग्न लघुता में खड़ा पाया।

सती के पार्थिव शरीर को लेकर जब एकाकी शिव चले, तो मेघ-मर्दन करते संगीत के बीच मंच से एक अट्टहास गूंजा—“शिव भोला है, किंतु अगर गुस्से में आए तो सर्वनाशी भी!” इस रौद्र क्षण में नर्तकों का आंगिक अभिनय ऐसा विलक्षण था, मानो वे स्वयं शिव के गले में लिपटे भुजंग हों, जो महादेव के क्रोध के साथ मचल रहे हों।

रौद्र से करुण और प्रलय की गोद से शक्ति-शिव के समागम की अमृत वर्षा ने प्रकृति और पुरुष के शाश्वत संतुलन को दर्शाया।(डेनियल फ्रेडी एवं इप्सिता मिश्रा) की अद्भुत प्रस्तुति ने शिव और शक्ति को साकार रूप प्रदान किया ।

इस गंभीर प्रस्तुति का सबसे निष्पाप क्षण वह था, जब नन्हीं मासूम नृत्यांगनाएँ मंच पर 'शिव भोले की बारात' लेकर उतरीं। गाजे-बाजे और भांग की मस्ती में झूमते इन नन्हे बारातियों को दर्शकों ने अपनी आत्मा में कैद कर लिया।

भाग २
तातिल: तकनीक के मरुस्थल में खोए बचपन की संगीतमय पुकार

यदि 'सर्वत्र' कैलाश का आध्यात्मिक वैभव था, तो दूसरी प्रस्तुति 'तातिल' (अवकाश) दर्शकों को सीधे वर्तमान की ठोस भौतिक दुनिया में ले आई। 'सर्वत्र' के ब्रह्मांडीय दर्शन के ठीक उलट, 'तातिल' ने आज तकनीकी समाज द्वारा छीने जा रहे बचपन की दुखती रग पर हाथ रखा। कागज़ की नाव, चोरी किए हुए आम और डूबते सूरज की जगह आज बेजान डिजिटल स्क्रीन ने ले ली है। खेल के मैदान खामोश हैं और प्रकृति खुद बच्चों को ढूंढ रही है।

वरिष्ठ मंच संचालिका सुश्री साधना श्रीवास्तव जी की संजीदा आवाज़ ने प्रत्येक प्रस्तुति की गरिमा में इज़ाफ़ा किया।

मंच पर बिखरते उन दृश्यों को देखकर रह-रहकर सुप्रसिद्ध गजल के स्वर अंतस में गूंज रहे थे:

‘मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी…’

मंच पर जब नन्हे कलाकार 'पोशंपा भाई पोशंपा' खेलते हुए आए, तो लगा कि अपने पूरे ओज में टिमटिमाते सितारों से भरा आसमान फिर लौट आया है, जहां चांद पर बुढ़िया के चरखा कातने की कहानी भी सच मालूम होती थी।

रस्साकशी, सितौलिया, गेंद की थपकी और रस्सी कूद जैसी लोक-क्रीड़ाएं मंच पर आकर शुद्ध शास्त्रीय नृत्य हो उठीं। विशेषकर, रस्सी कूदते हुए नृत्यांगनाओं द्वारा पैर की 'तत्कार' का प्रदर्शन करना एक विस्मयकारी प्रयोग था।

सफेद पंछियों के प्रॉप्स लिए नन्ही चिड़ियों का कलरव और मछलियां बनकर मंच पर 'ग्लाइड' करती बच्चियां प्रकृति का साक्षात संदेश लग रही थीं।

दिल्ली की इस झुलसा देने वाली मई की गर्मी में, इन मासूमों ने न जाने कितने सौ-सौ घंटे रिहर्सल की थकावट झेली होगी! मंच पर दिखने वाले परिधानों की इस रंगीन चमक-दमक के पीछे हमेशा एक फौलादी रीढ़ होती है, जो पूरी प्रस्तुति को खड़ा रखती है।

इस प्रस्तुति का चरमोत्कर्ष तब आया, जब बास्केटबॉल के टप्पों के साथ तत्कार की सुंदर जुगलबंदी ने प्रयोगधर्मिता की अद्भुत मिसाल पेश की। प्रेक्षागृह दर्शकों के 'वाह!' और करतल ध्वनि से गुंजायमान हो उठा।

'ध्वनि' का यह वार्षिक उत्सव केवल कला का प्रदर्शन नहीं, अपितु अपनी जड़ों से जुड़ने का एवं अपनी कला व संस्कृति पर गौरवान्वित होने का एक मर्मस्पर्शी संदेश था।

*****

22/05/2026

In these deeply turbulent times, art remains our ultimate sanctuary, acting as a powerful force that can heal and save us.
Through Art Diaries, we bring you exclusive glimpses from the vast world of art, serving a larger purposeful vision of spreading solace, beauty, and creativity to a wider audience.

This segment is an extract from the full television show RIYAAZ, broadcast on DD, which featured an insightful interview and teaching session with the legendary Padma Shri Guru Shovana Narayan Ji. Recorded on May 12th, the episode has been telecast twice over the past few days.

Training under Guru Shovana is a masterclass in the delicate equilibrium of the Guru-Shishya Parampara. It is a journey forged in the fires of strict discipline and elevated by a pristine aesthetic vision, yet always grounded in the gentle, protective embrace of a mother’s instinct. She doesn't just shape flawless dancers; she nurtures soulful artists.






Maya Parijat
Shovana Narayan - Asavari Institute for Kathak
Shovana Traxl Narayan

18/05/2026

Speaking Sculptures-Karanas in Kathak by Padma Shri Shovana Narayan

https://amzn.in/d/03Ilr9aq



Shovana Narayan - Asavari Institute for Kathak
Geetika Tewari

16/05/2026

A real research scholar looks beyond performance and enters the living history of an art form: its texts, philosophies, even silences, and forgotten contexts.

Original sources matter because art without its roots may survive aesthetically, yet lose its depth and soul.

And for a guru, it becomes a sacred responsibility to offer students not merely lessons within classrooms, but an understanding of the lineage, thought, and consciousness from which the art was born.

Vidushi Padma Shri Guru Shovana Narayan ji unravels the journey behind her book, Speaking Sculptures, a profound exploration of art, history, and inherited memory.

16/02/2026

क्या है एक रचनात्मक यात्रा? क्या आपकी मर्ज़ी से शुरू होती है? कहाँ शुरू और कहाँ ख़त्म होती है? क्या कभी ख़त्म होती है? कला के विभिन्न आयाम हैं, और उनके अनगिनत अनछुए पहलू । क्यों दुनिया को लगता है कि एक कलाकार को तथाकथित संपूर्णता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए? क्या है संपूर्णता? एक सुंदर चेहरा मोहरा, अच्छा क़द, छरहरा तन? या एक तीक्ष्ण दिमाग़, कोमल मन, संवेदनशीलता, आत्मविश्वास, रीढ़ में संकल्प की दृढ़ता, और करुणा?

क्या एक कलाकार अथवा रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन का प्रभाव उसकी कला अथवा रचना में दृष्टिगोचर होता है, होना चाहिए? ‘द शो मस्ट गो ऑन ‘ की रौ में क्या एक कलाकार खो जाता है? या स्वयं को पा जाता है?

आइए कुछ ऐसे ही सवालों, जिज्ञासाओं, और भावों के जवाब ढूँढे साथ मिलकर ।
कल शाम, इंडिया हैबिटैट सेंटर, ग़ुलमोहर, 7 बजे ।

10/02/2026

कुछ लम्हे, कुछ बातें, कुछ लतीफ़े, कुछ उत्सव, कुछ उमंग, कुछ तरंग… Shovana Traxl Narayan Renu Kaul Verma

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Pushpanjali Farms
New Delhi
110061

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