Tariq Umar khan

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05/06/2026

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05/06/2026

आज पर्यावरण दिवस है पर मुझे लगता है बधाई देने के बजाए हमे निम्न बिंदु पर सोचना चाहिए

वरना हमारी आने वाली पीढ़ी की तबाही के ज़िम्मेदार हम खुद होंगे ।।

भारत में जंगलों की कटाई, खनन और आदिवासी विस्थापन के भविष्यवादी प्रभाव: जलतंत्र पर गहरा संकट और दीर्घकालिक आपदा

*परिचय*

पर्यावरण दिवस पर संरक्षण की बातें करने वाली सरकारों और कॉर्पोरेटों की नीतियां वास्तव में देश के प्राकृतिक संसाधनों, खासकर जंगलों, जल स्रोतों और आदिवासी समुदायों को दीर्घकालिक क्षति पहुंचा रही हैं। हसदेव अरण्ड, सिजीमाली जैसी परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर वन कटाई और खनन से न केवल वर्तमान में नुकसान हो रहा है, बल्कि भविष्य में जल संकट, जलवायु असंतुलन, जैव विविधता का विनाश और सामाजिक अस्थिरता का भयानक चक्र शुरू हो चुका है। यह लेख गहन शोध (Global Forest Watch, NITI Aayog, विभिन्न अध्ययनों) पर आधारित है और जलतंत्र (water system) के नुकसान को विशेष रूप से शामिल करता है।

# # # 1. जलतंत्र (जल चक्र और संसाधनों) पर प्रभाव: सबसे गंभीर खतरा
जंगल जल चक्र के प्रमुख नियामक हैं। वे वर्षा को आकर्षित करते हैं, भूजल रिचार्ज करते हैं, नदियों को स्थिर रखते हैं और बाढ़/सूखे को नियंत्रित करते हैं। वन कटाई और खनन से यह व्यवस्था बिगड़ रही है।

- **भूजल रिचार्ज में कमी**: पेड़ों की जड़ें मिट्टी की नमी बनाए रखती हैं। कटाई से मिट्टी कटाव (soil erosion) बढ़ता है, पानी तेजी से बह जाता है। Hasdeo Arand जैसे क्षेत्रों में खनन से नदियों (Charnoi, Hasdeo) का catchment प्रभावित हो रहा है, Bango Dam पर siltation का खतरा। इससे सिंचाई और पीने के पानी की उपलब्धता कम होगी।
- **नदियों और जलाशयों का सूखना**: WWF और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार, जंगलों की कमी से स्थानीय वर्षा पैटर्न बदलता है, नदियों में प्रवाह कम होता है। भारत में पहले से NITI Aayog के अनुसार 2030 तक पानी की मांग आपूर्ति से दोगुनी हो जाएगी। 21 बड़े शहर 2020 तक भूजल खत्म होने की कगार पर थे; वन हानि इसे और तेज करेगी।
- **प्रदूषण और गुणवत्ता ह्रास**: खनन (कोयला, बॉक्साइट) से भारी धातुओं (मर्करी, आर्सेनिक आदि) का पानी में मिश्रण। Hasdeo और Mahan River catchment में groundwater quality खराब हो रही है — WQI अध्ययनों में mining क्षेत्रों में unfit पानी का प्रतिशत 50-75% तक। भविष्य में स्वास्थ्य संकट (किडनी, कैंसर) बढ़ेंगे।
- **भविष्यवादी अनुमान**: 2030-2050 तक, यदि वर्तमान दर जारी रही, तो मध्य भारत (छत्तीसगढ़, ओडिशा) में सूखा और बाढ़ दोनों बढ़ेंगे। जल संकट से कृषि उत्पादन 20-30% गिर सकता है, खाद्य सुरक्षा खतरे में।

# # # 2. जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि
जंगल कार्बन सिंक हैं। भारत ने 2001-2025 में लाखों हेक्टेयर tree cover खोया, जिससे Gt स्तर पर CO₂ उत्सर्जन हुआ।

- **तापमान और मौसम चरम**: वनों की कमी से local rainfall घटता है, heatwaves बढ़ते हैं। Hasdeo जैसे "central India के lungs" के नुकसान से पूरे क्षेत्र का micro-climate बदल जाएगा — गर्मी बढ़ेगी, मानसून अनियमित।
- **2050 तक**: IPCC पैटर्न के अनुसार, भारत में extreme events (सूखा, बाढ़) 2-3 गुना बढ़ सकते हैं। कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर trillions का नुकसान।

# # # 3. जैव विविधता का विनाश और पारिस्थितिकी असंतुलन
- प्राथमिक जंगलों (humid primary forest) की 6%+ हानि। हाथी कॉरिडोर, बाघ, अन्य प्रजातियां प्रभावित। Extinction risk बढ़ेगा।
- **परिणाम**: परागण, कीट नियंत्रण, मिट्टी उर्वरता प्रभावित। कृषि पर निर्भरता बढ़ेगी लेकिन उपज घटेगी।

# # # 4. आदिवासी समुदायों और सामाजिक प्रभाव
- **विस्थापन और आजीविका हानि**: लाखों आदिवासी पहले ही विस्थापित। भविष्य में सांस्कृतिक मृत्यु (loss of traditional knowledge, sacred sites), गरीबी, शहरी स्लम्स में migration बढ़ेगा। Women और children सबसे प्रभावित — forest produce (महुआ, तेंदू) खत्म।
- **सामाजिक संघर्ष**: Naxal प्रभावित क्षेत्रों में तनाव बढ़ सकता है। जल संकट migration को बढ़ावा देगा, urban-rural tension।
- **स्वास्थ्य**: प्रदूषित पानी, वायु से श्वसन रोग, कुपोषण।

# # # 5. आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभाव
- **शॉर्ट-टर्म गेन vs लॉन्ग-टर्म लॉस**: खनन से राजस्व, लेकिन compensatory afforestation survival rate कम (72% दावा, ground reality खराब)। जल संकट से GDP loss (कृषि 15-20% प्रभावित)।
- **2030-2050**: NITI Aayog चेतावनी — water demand double, mass migration, conflict over resources। National security threat: inter-state water disputes (Cauvery जैसा), border areas में instability।

# # # निष्कर्ष और सुझाव
यदि वर्तमान दोहरा रवैया (वन संरक्षण कानूनों में छूट, FRA उल्लंघन) जारी रहा, तो 2040-50 तक भारत जल, खाद्य और पर्यावरणीय संकट की चपेट में होगा। Hasdeo, सिजीमाली जैसे क्षेत्रों का विनाश पूरे देश को प्रभावित करेगा।

**समाधान के रास्ते**:
- FRA 2006, PESA और Gram Sabha consent का सख्त पालन।
- प्राकृतिक जंगलों पर पूर्ण रोक, sustainable mining alternatives (underground जहां संभव)।
- बड़े पैमाने पर native species afforestation + watershed management।
- आदिवासी-केंद्रित विकास मॉडल, community forest rights।
- स्वतंत्र мониторинг (satellite + ground audits) और जवाबदेही।

पर्यावरण दिवस सिर्फ प्रतीक नहीं, बल्कि कार्रवाई का दिन होना चाहिए। जंगलों को बचाना जलतंत्र, जलवायु और भविष्य की पीढ़ियों को बचाना है। कॉर्पोरेट लाभ के लिए प्रकृति की बलि दीर्घकालिक आत्मघाती है।

**संदर्भ**: Global Forest Watch, NITI Aayog Composite Water Management Index, Mongabay, The Wire, WWF, विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययन। आंकड़े समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन ट्रेंड स्पष्ट है।

यह विस्तृत विश्लेषण तथ्यों पर आधारित है। सतत विकास अपनाएं, आदिवासी अधिकारों का सम्मान करें।

11/05/2026

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बरगी डैम (नर्मदा बैकवॉटर), जबलपुर में 30 अप्रैल 2026 को हुए क्रूज़ हादसे ने हम सबको झकझोर दिया। इस तरह की घटनाओं को सिर्...
03/05/2026

बरगी डैम (नर्मदा बैकवॉटर), जबलपुर में 30 अप्रैल 2026 को हुए क्रूज़ हादसे ने हम सबको झकझोर दिया। इस तरह की घटनाओं को सिर्फ भावनात्मक तस्वीरों या “ममता” के प्रतीक से जोड़ देना शायद आसान है, लेकिन असली सवाल यह है कि यह हादसा क्यों हुआ और इससे क्या सीख ली जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स और सामने आए बयानों के अनुसार, यह हादसा अचानक आए तेज़ तूफान के दौरान हुआ। क्रूज़ में सवार कई लोगों को बचाया गया, जबकि कुछ लोगों की दुखद मृत्यु हुई और राहत-बचाव कार्य में NDRF, SDRF और स्थानीय प्रशासन की टीमों ने हिस्सा लिया।

हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स और सर्वाइवर के बयानों में कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं:

- क्या मौसम विभाग द्वारा जारी अलर्ट के बावजूद क्रूज़ संचालन किया गया?
- क्या सभी यात्रियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपकरण (जैसे लाइफ जैकेट्स) उपलब्ध थे?
- क्या क्रू और ऑपरेटर ने समय रहते सुरक्षा उपाय अपनाए?
- क्या बोट की फिटनेस और क्षमता मानकों का पूरी तरह पालन किया गया?

इन बिंदुओं पर आधिकारिक जांच जारी है, और अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट के बाद ही सामने आएंगे।

यह भी महत्वपूर्ण है कि संबंधित विभाग—जैसे पर्यटन, स्थानीय प्रशासन और अन्य जिम्मेदार एजेंसियां—इस घटना की गहराई से समीक्षा करें और यदि कहीं भी लापरवाही पाई जाती है तो उसके अनुसार कार्रवाई हो।

इस तरह की घटनाएं केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि कई बार सिस्टम और प्रक्रियाओं की कमियों से भी गंभीर हो जाती हैं। इसलिए ज़रूरी है कि:

- मौसम अलर्ट को गंभीरता से लिया जाए
- सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन हो
- और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं

कानून अपना काम करेगा—लेकिन अगर हर जिम्मेदार व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समय पर निभाए, तो शायद ऐसे हादसों को होने से ही रोका जा सकता है।

(यह पोस्ट विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर लिखा गया है। अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे।)

ग्रेट निकोबार द्वीप पर भारत सरकार द्वारा दी गई जंगल कटाई की अनुमति (फॉरेस्ट डायवर्शन) का क्षेत्र और दुप्रभाव। परियोजना क...
03/05/2026

ग्रेट निकोबार द्वीप पर भारत सरकार द्वारा दी गई जंगल कटाई की अनुमति (फॉरेस्ट डायवर्शन) का क्षेत्र और दुप्रभाव।

परियोजना का अवलोकन और क्षेत्रफल
ग्रेट निकोबार द्वीप (Andaman & Nicobar Islands) पर "होलिस्टिक डेवलपमेंट ऑफ ग्रेट निकोबार आइलैंड" परियोजना चल रही है। इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
- इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (पोर्ट) गलाथिया बे में।
- ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट।
- टाउनशिप और क्षेत्र विकास।
- 450 MVA गैस और सोलर आधारित पावर प्लांट।

कुल क्षेत्र परियोजना के लिए 166.1 वर्ग किमी भूमि का उपयोग प्रस्तावित है (लगभग 18% द्वीप का क्षेत्र)। इसमें:
- 130.75 वर्ग किमी वन भूमि (Forest Land) का डायवर्शन (मंजूरी)।
- शेष राजस्व भूमि (Revenue Land)।

यह Andaman & Nicobar के कुल वन क्षेत्र का मात्र ~1.82% है। फॉरेस्ट क्लियरेंस (Stage-1/In-principle) अक्टूबर 2022 में MoEFCC द्वारा दी गई। परियोजना चरणबद्ध है (Phase I, II, III)।

पेड़ कटाई
- कुल अनुमानित पेड़: 18.65 लाख (130.75 वर्ग किमी में)।
- कटाई: अधिकतम 7.11 लाख पेड़ (49.86 वर्ग किमी में)। शेष क्षेत्र में कुछ हरा-भरा रखा जाएगा।
- 65.99 वर्ग किमी को ग्रीन जोन घोषित किया गया (कोई कटाई नहीं)।
- चरणबद्ध कटाई: Phase I में ~2.79 लाख, आदि।

सरकार का दावा: 15% विकास क्षेत्र हरा-भरा रहेगा, प्रभावित पेड़ 75% वन कवर होने से CA हरियाणा (~17,000 ha) और मध्य प्रदेश में प्रस्तावित। कुल ~24,750 ha पर CA, जिसमें 1:10 अनुपात में पौधे लगाने का प्लान।

पर्यावरणीय और सामाजिक दुप्रभाव (Adverse Effects)
यह क्षेत्र Sundaland Biodiversity Hotspot का हिस्सा है, Pleistocene-era के प्राचीन evergreen rainforests, mangroves, coral reefs से भरा। Biosphere Reserve भी। मुख्य चिंताएं:

1. वन और जैव विविधता हानि
- प्राचीन ट्रॉपिकल फॉरेस्ट का विनाश (एक अनोखा इकोसिस्टम)।
- Endangered species प्रभावित: Leatherback sea turtles (nesting sites Galathea Bay में प्रभाव), Nicobar Megapode (30+ nests नष्ट), Nicobar Macaque, saltwater crocodiles आदि।
- Mangroves और coral reefs का नुकसान → प्राकृतिक tsunami/cyclone बैरियर कमजोर।
- जैव विविधता हॉटस्पॉट में अपरिवर्तनीय क्षति।

2. भू-आकृति और आपदा जोखिम
- उच्च seismic zone (2004 tsunami में 4.5m+ subsidence)। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर का जोखिम।
- Land reclamation (पोर्ट और एयरपोर्ट के लिए) से coastal erosion और wave pattern बदलाव।

3. जनजातीय समुदायों पर प्रभाव
- Shompen (PVTG, nomadic hunter-gatherers, बहुत कम संख्या, संवेदनशील): उनके habitat और hunting grounds प्रभावित। संपर्क से बीमारियां (disease) का खतरा। कई experts इसे "genocide" या "death sentence" कहते हैं।
- Nicobarese: Ancestral lands प्रभावित। Tribal Reserve का de-notification (84.1 वर्ग किमी में से कुछ भाग)। सरकार का दावा: Net tribal reserve बढ़ेगा (+3.9 वर्ग किमी), लेकिन critics कहते हैं consent inadequate और displacement होगा।
- Cultural erosion, outsider influx (लाखों लोग आने की संभावना) से पारंपरिक जीवन नष्ट।

4. अन्य: जल संसाधन दबाव, प्रदूषण, पर्यटन/शहर विकास से ecological imbalance।

सरकार का जवाब: Detailed EIA, 42 compliance conditions, Biodiversity Conservation Plan (WII, ZSI आदि द्वारा), turtle/coral conservation, mitigation measures, और tribal welfare। NGT ने भी हाल में मंजूरी दी है safeguards के साथ।

सरकार और कॉर्पोरेट की सांठगांठ (Collusion) पर
परियोजना ANIIDCO (Andaman & Nicobar Islands Integrated Development Corporation) द्वारा implement हो रही है, PPP मॉडल में।

- कॉर्पोरेट भूमिका पोर्ट के लिए Expression of Interest में Adani Ports समेत 10+ कंपनियां (JSW, Essar, Megha Engineering आदि) शामिल। Adani को अक्सर critics (Rahul Gandhi तथा अन्य ) द्वारा target किया जाता है, आरोप है कि परियोजना बड़े कॉर्पोरेट्स (खासकर Adani) को फायदा पहुंचाने के लिए pushed की जा रही है।

- आलोचना
- EIA और clearances में haste, inadequate public consultation, tribal consent की कमी (FRA violations के आरोप)।
- Compensatory afforestation को "unscientific" कहा जाता है (Nicobar के tropical forest को Haryana के degraded land से replace नहीं किया जा सकता)।
- Strategic importance (Malacca Strait के पास, China counter, defense) को बहाना बनाकर ecological/tribal costs को ignore किया जा रहा है।
- Opposition parties और activists इसे "scam" या corporate favouritism कहते हैं।

सरकार का पक्ष: यह राष्ट्रीय सुरक्षा, economic growth (transshipment hub), और Indo-Pacific strategy का हिस्सा है। Clearances multi-tiered scrutiny के बाद, पर्यावरण safeguards के साथ। कोई "सांठगांठ" नहीं, बल्कि transparent bidding। Critics को "international conspiracy" या politically motivated बताया जाता है।

निष्कर्ष: यह विकास vs संरक्षण की क्लासिक बहस है। रणनीतिक जरूरत (defense, trade) undeniable है, लेकिन जैव विविधता hotspot, vulnerable tribes, और fragile island ecosystem में इतनी बड़ी डायवर्शन (भारत में सबसे बड़ी में से एक) के long-term irreversible risks experts ने उठाए हैं। Compensatory measures अक्सर पर्याप्त नहीं साबित होते।

उपरोक्त लेख मीडिया में उपलब्ध सूचना पर आधारित

सभी देशवासियों को बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाये
01/05/2026

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सभी देशवासियों को महाराष्ट्र दिवस और मज़दूर दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
01/05/2026

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✍️ सत्यप्रकाश______________________मज़दूरों का त्योहार मई दिवस आठ घण्टे काम के दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आन्दोलन से पै...
01/05/2026

✍️ सत्यप्रकाश
______________________
मज़दूरों का त्योहार मई दिवस आठ घण्टे काम के दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आन्दोलन से पैदा हुआ। *उसके पहले मज़दूर चौदह से लेकर 16-18 घण्टे तक खटते थे। कई देशों में काम के घण्टों का कोई नियम ही नहीं था।*
“सूरज उगने से लेकर रात होने तक” मज़दूर कारख़ानों में काम करते थे। दुनियाभर में इस माँग को लेकर अलग-अलग आन्दोलन होते रहे थे। भारत में भी 1862 में ही मज़दूरों ने इस माँग पर कामबन्दी की थी। लेकिन पहली बार बड़े पैमाने पर इसकी शुरुआत अमेरिका में हुई।

*मज़दूरों ने अपने अनुभवों से समझ लिया था कि उनकी एकता ही उनकी सबसे बड़ी ताक़त है।*
अमेरिका में एक विशाल मज़दूर वर्ग पैदा हुआ था। इन मज़दूरों ने अपने बलिष्ठ हाथों से अमेरिका के बड़े-बड़े शहर बसाये, सड़कों और रेल पटरियों का जाल बिछाया, नदियों को बाँधा, गगनचुम्बी इमारतें खड़ी कीं और पूँजीपतियों के लिए दुनिया भर के ऐशो-आराम के साधन जुटाये।
उस समय अमेरिका में मज़दूरों को 12 से 18 घण्टे तक खटाया जाता था। बच्चों और महिलाओं का 18 घण्टों तक काम करना आम बात थी। अधिकांश मज़दूर अपने जीवन के 40 साल भी पूरे नहीं कर पाते थे। अगर मज़दूर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते थे तो उन पर निजी गुण्डों, पुलिस और सेना से हमले करवाये जाते थे!
उनके जीवन और मृत्यु में वैसे भी कोई फ़र्क नहीं था, इसलिए उन्होंने लड़ने का फ़ैसला किया! 1877 से 1886 तक मज़दूरों ने अमेरिका भर में आठ घण्टे के कार्यदिवस की माँग पर एकजुट और संगठित होना शुरू किया। 1886 में पूरे अमेरिका में मज़दूरों ने ‘आठ घण्टा समितियाँ’ बनायीं। शिकागो में मज़दूरों का आन्दोलन सबसे अधिक ताक़तवर था। वहाँ पर मज़दूरों के संगठनों ने तय किया कि 1 मई के दिन सभी मज़दूर अपने औज़ार रखकर सड़कों पर उतरेंगे और आठ घण्टे के कार्यदिवस का नारा बुलन्द करेंगे।
एक मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फ़ैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे। शिकागो महानगर के आसपास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और शिकागो के ज़्यादातर कारख़ाने और वर्कशाप बन्द हो गये। शहर के मुख्य मार्ग मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकला।
मज़दूरों की बढ़ती ताक़त से भयभीत उद्योगपति उन पर हमला करने की घात में थे। सारे अख़बार (जिनके मालिक पूँजीपति ही थे) “लाल ख़तरे” के बारे में चिल्ल-पों मचा रहे थे। पूँजीपतियों ने आसपास से भी पुलिस के सिपाही और सुरक्षाकर्मियों को बुला रखा था। इसके अलावा कुख्यात पिंकरटन एजेंसी के गुण्डों को भी हथियारों से लैस करके मज़दूरों पर हमला करने के लिए तैयार रखा गया था। पूँजीपतियों ने इसे “आपात स्थिति” घोषित कर दिया था। शहर के तमाम धन्नासेठों और व्यापारियों की बैठक लगातार चल रही थी जिसमें इस “ख़तरनाक स्थिति” से निपटने पर विचार किया जा रहा था।
3 मई को शहर के हालात बहुत तनावपूर्ण हो गये जब मैकॉर्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कम्पनी के मज़दूरों ने दो महीने से चल रही तालाबन्दी के विरोध में और आठ घण्टे काम के दिन के समर्थन में कार्रवाई शुरू कर दी। निहत्थे मज़दूरों पर गोलियाँ चलायी गयीं। चार मज़दूर मारे गये और बहुत से घायल हुए। अगले दिन भी मज़दूर ग्रुपों पर हमले जारी रहे। पुलिस दमन के ख़िलाफ़ चार मई की शाम को शहर के मुख्य बाज़ार हे मार्केट स्क्वायर में एक जनसभा रखी गयी। मीटिंग रात आठ बजे शुरू हुई। क़रीब तीन हज़ार लोगों के बीच अल्बर्ट पार्सन्स और ऑगस्टस स्पाइस ने मज़दूरों का आह्वान किया कि वे एकजुट और संगठित रहकर पुलिस दमन का मुक़ाबला करें। तीसरे वक्ता सैमुअल फ़ील्डेन बोलने के लिए जब खड़े हुए तो रात के दस बज रहे थे और ज़ोरों की बारिश शुरू हो गयी थी।
इस समय तक स्पाइस और पार्सन्स अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ वहाँ से जा चुके थे। भीड़ बहुत कम हो चुकी थी — क़रीब दो सौ लोग ही रह गये थे। मीटिंग क़रीब-क़रीब ख़त्म हो चुकी थी कि 180 पुलिसवालों का एक जत्था धड़धड़ाते हुए हे मार्केट स्क्वायर आ पहुँचा। उसकी अगुवाई कैप्टन बॉनफ़ील्ड कर रहा था जिससे शिकागो के नागरिक उसके क्रूर और बेहूदे स्वभाव के कारण नफ़रत करते थे। मीटिंग में शामिल लोगों को चले जाने का हुक्म दिया गया। सैमुअल फ़ील्डेन पुलिसवालों को यह बताने की कोशिश ही कर रहे थे कि यह शान्तिपूर्ण सभा है, कि इसी बीच किसी ने मानो इशारा पाकर एक बम फेंक दिया। आज तक बम फेंकने वाले का पता नहीं चल पाया है लेकिन यह माना जाता है कि बम फेंकने वाला पुलिस का भाड़े का टट्टू था।
स्पष्ट था कि बम का निशाना मज़दूर थे लेकिन पुलिस चारों और फैल गयी थी और नतीजतन बम का प्रहार पुलिस वालों पर हुआ। एक मारा गया और पाँच घायल हुए। पगलाये पुलिसवालों ने चौक को चारों ओर से घेरकर भीड़ पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। जिसने भी भागने की कोशिश की उस पर गोलियाँ और लाठियाँ बरसायी गयीं। छह मज़दूर मारे गये और 200 से ज़्यादा ज़ख़्मी हुए। मज़दूरों ने अपने ख़ून से अपने कपड़े रँगकर उन्हें ही झण्डा बना लिया।
इस घटना के बाद पूरे शिकागो में पुलिस ने मज़दूर बस्तियों, मज़दूर संगठनों के दफ़्तरों, छापाख़ानों आदि में ज़बर्दस्त छापे डाले। सैकड़ों लोगों को मामूली शक पर पीटा गया और बुरी तरह टॉर्चर किया गया। हज़ारों गिरफ़्तार किये गये।
आठ मज़दूर नेताओं – अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्टस स्पाइस, जार्ज एंजेल, एडॉल्फ़ फ़िशर, सैमुअल फ़ील्डेन, माइकेल श्वाब, लुइस लिंग्ग और आस्कर नीबे पर मुक़दमा चलाकर उन्हें हत्या का मुज़रिम क़रार दिया गया। इनमें से सिर्फ़ एक, सैमुअल फ़ील्डेन बम फटने के समय घटना स्थल पर मौजूद था। जब मुक़दमा शुरू हुआ तो सात लोग ही कठघरे में थे। अल्बर्ट पार्सन्स पुलिस की पकड़ में आने से बच सकता था लेकिन उसे यह गवारा नहीं था कि वह आज़ाद रहे जबकि उसके बेक़सूर साथी फ़र्ज़ी मुक़दमे में फँसाये जायें। पार्सन्स ख़ुद अदालत में आया और जज से कहा, “मैं अपने बेक़सूर कॉमरेडों के साथ कठघरे में खड़ा होने आया हूँ।”
पूँजीवादी न्याय के लम्बे नाटक के बाद 20 अगस्त 1887 को शिकागो की अदालत ने अपना फै़सला दिया। सात लोगों को सज़ाए-मौत और एक (नीबे) को पन्द्रह साल क़ैद बामशक़्क़त की सज़ा सुनायी गयी। स्पाइस ने अदालत में चिल्लाकर कहा था कि “अगर तुम सोचते हो कि हमें फाँसी पर लटकाकर तुम मज़दूर आन्दोलन को… ग़रीबी और बदहाली में कमरतोड़ मेहनत करनेवाले लाखों लोगों के आन्दोलन को कुचल डालोगे, अगर यही तुम्हारी राय है – तो ख़ुशी से हमें फाँसी दे दो। लेकिन याद रखो … आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो लेकिन यहाँ-वहाँ, तुम्हारे पीछे, तुम्हारे सामने, हर ओर लपटें भड़क उठेंगी। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे।”
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने पहले तो अपील मानने से इन्कार कर दिया लेकिन सारे अमेरिका और तमाम दूसरे देशों में इस क्रूर फै़सले के ख़िलाफ़ भड़क उठे जनता के ग़ुस्से के दबाव में बाद में इलिनॉय प्रान्त के गर्वनर ने फ़ील्डेन और श्वाब की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया। 10 नवम्बर 1887 को सबसे कम उम्र के नेता लुइस लिंग्ग ने कालकोठरी में आत्महत्या कर ली।
अगला दिन (11 नवम्बर 1887) मज़दूर वर्ग के इतिहास में काला शुक्रवार था। पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल और फ़िशर को शिकागो की कुक काउण्टी जेल में फाँसी दे दी गयी। अफ़सरों ने मज़दूर नेताओं की मौत का तमाशा देखने के लिए शिकागो के दो सौ धनवान शहरियों को बुला रखा था। लेकिन मज़दूरों को डर से काँपते-घिघियाते देखने की उनकी तमन्ना धरी की धरी रह गयी।
वहाँ मौजूद एक पत्रकार ने बाद में लिखा: “चारों मज़दूर नेता क्रान्तिकारी गीत गाते हुए फाँसी के तख़्ते तक पहुँचे और शान के साथ अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो गये। फाँसी के फन्दे उनके गलों में डाल दिये गये। स्पाइस का फन्दा ज़्यादा सख़्त था, फ़िशर ने जब उसे ठीक किया तो स्पाइस ने मुस्कुराकर धन्यवाद कहा। फिर स्पाइस ने चीख़कर कहा, ‘एक समय आयेगा जब हमारी ख़ामोशी उन आवाज़ों से ज़्यादा ताक़तवर होगी जिन्हें तुम आज दबा रहे हो।…’ फिर पार्सन्स ने बोलना शुरू किया, ‘मेरी बात सुनो… अमेरिका के लोगो! मेरी बात सुनो … जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकेगा…’ लेकिन इसी समय तख़्ता खींच लिया गया।”
13 नवम्बर 1887 को चारों मज़दूर नेताओं की शवयात्रा शिकागो के मज़दूरों की एक विशाल रैली में बदल गयी। छह लाख से भी ज़्यादा लोग इन नायकों को आख़िरी सलाम देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े।
स्पाइस की कही बात की सच्चाई को इतिहास साबित करता रहा है। उसके बाद से 134 साल बीत चुके हैं। मज़दूर वर्ग और पूँजीपति वर्ग के बीच का संघर्ष एक पल को भी थमा नहीं है। मज़दूरों ने कई बार, कई देशों में पूँजी के राज को ध्वस्त कर बराबरी और इन्साफ़ पर टिका समाज भी क़ायम किया। ये मज़दूर राज आज हारे जा चुके हैं, पूँजी और श्रम के ऐतिहासिक महासमर में आज पूँजी का पलड़ा भारी है। अकूत क़ुर्बानियों के बल पर जीते गये 8 घण्टे काम सहित अनेक अधिकार आज मज़दूरों से छीन लिये गये हैं। लेकिन लड़ाई जारी है।
अनगिन संघर्षों में बहा करोड़ों मज़दूरों का ख़ून इतनी आसानी से धरती में जज़्ब नहीं होगा। फाँसी के तख़्ते से गूँजती स्पाइस की पुकार पूँजीपतियों के दिलों में ख़ौफ़ पैदा करती रहेगी। अनगिन मज़दूरों के ख़ून की आभा से चमकता लाल झण्डा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहेगा।

India has lost approximately 2.33 million hectares (Mha) of tree cover since 2000, representing a 6–7% decrease in total...
29/04/2026

India has lost approximately 2.33 million hectares (Mha) of tree cover since 2000, representing a 6–7% decrease in total tree cover, according to Global Forest Watch data. Between 2015 and 2020, India experienced significant deforestation, losing about 668,400 hectares (6,684 sq km) of forest, one of the highest rates globally, with major losses in the Northeast.

Key findings on forest loss in India:

• Total Loss (2000–2024): Approximately 2.33 million hectares of tree cover.

• Primary Forest Loss: Between 2002 and 2024, India lost 348,000 hectares of humid primary forest, making up 15% of its total tree cover loss.

• Recent Deforestation (2015–2020): Roughly 668,400 hectares of forest were lost.

• Deforestation Ratio: A 2015–2019 study indicated that for every 1 square kilometre of forest gained, India lost roughly 18 square kilometres.

• Primary Drivers: Shifting cultivation, illegal logging, forest fires (e.g., in Odisha, Andhra Pradesh), and infrastructure expansion.

• Affected Regions: Assam, Mizoram, Arunachal Pradesh, Nagaland, and Manipur accounted for 60% of all tree cover loss from 2001 to 2023.

• Current Status (2023): As of 2023, total forest cover is 715,343 sq km, covering 21.76% of the country's geographical area, with states like Madhya Pradesh, Arunachal Pradesh, and Chhattisgarh holding the largest shares.

Let this sink in.



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