30/10/2024
मैंमैं ने सोचा था..
कि इक दौर-ए-फ़सुरदह की तरह
तेरे दरबार ए मुहब्बत से गुज़र जाऊंगा
तेरे ख़्वाबों के तिलस्मात को सुलझाऊंगा
तेरी ख़ामोशी के हम-पल्ला कोई बात नहीं
तेरी जुल्फों की स्याही से कहीं रात नहीं
तेरे चेहरे से किसी सुबह का आगाज़ नही
तेरी आंखों में कोई रम्ज़ कोई राज़ नहीं
मगर अफ़सोस कि ये मैं ने फ़क़त सोचा था
और मेरी सोच मेरे नफ़्स की है पैदावार
नफ़्स के साथ कभी खत्म न होगी तकरार
नफ़्स-इनकारी है पर मैं तेरा इक़रारी हूँ
तेरे दरबार का दरबारी था दरबारी हूँ
میں نے سوچا تھا۔۔
کہ اک دور فسردہ کی طرح
تیرے دربار محبت سے گزر جاؤنگا
تیرے خوابوں کے طلسمات کو سلجھاؤنگا
تیری خاموشی کے ہم پلہ کوئی بات نہیں
تیری زلفوں کی سیاہی سے کہیں رات نہیں
تیرے چہرے سے کسی صبح کا آغاز نہیں
تیری آنکھوں میں کوئی رمز کوئی راز نہیں
مگر افسوس کہ یہ میں نے فقط سوچا تھا
اور میری سوچ میرے نفس کی ہے پیداوار
نفس کے ساتھ کبھی ختم نہ ہوگی تکرار
نفس انکاری ہے پر میں تیرا اقراری ہوں،
تیرے دربار کا درباری تھا درباری ہوں،
Shadab javed