Panne Dil Ki Kitab Ke

Panne Dil Ki Kitab Ke Zindagi ke kuchh anubhav | Real life thoughts | Simple Emotions | Feel Connected �

जनगणना ड्यूटीजनगणना में सरकार ने ड्यूटी मेरी लगाई थी,एक घर के भीतर पहुँची, वहाँ बैठी एक बूढ़ी माई थी।जब मैंने घर के बारे...
19/05/2026

जनगणना ड्यूटी

जनगणना में सरकार ने ड्यूटी मेरी लगाई थी,
एक घर के भीतर पहुँची, वहाँ बैठी एक बूढ़ी माई थी।

जब मैंने घर के बारे में उससे कुछ पूछा,
माई को लगा जैसे सरकार का कोई दूत आ पहुँचा।

वह मुझे घर के पीछे वाले हिस्से में ले गई,
कहने लगी, “पीछे एक टोबा है,” और हल्की-सी मुस्कान दे गई।

मैंने मुस्कान दबाकर उसकी हर बात सुनी,
उसने अपना दर्द सुनाने के लिए मेरी ही संगत चुनी।

बोली, “मैडम जी, इस टोबे की समस्या का समाधान करवा दो,
हमारी तो कोई सुनता नहीं, आप ही सरकार तक बात पहुँचा दो।

लिख लो अपनी कॉपी में मेरी यह पुकार,
गैस खत्म हो जाए तो उपलों का ही होता है सहारा बार-बार।

पर उन्हें कहाँ थापें, यह टोबा सब निगल जाता है,
कई बार तो घर की दीवारों को भी खा जाता है।”

मैंने माई से कहा, “माता जी, आपकी बात लिख ली है,
सरकार तक अर्जी पहुँचाएँगे, शायद कोई राह निकल आई है।”

आशा तो शायद मैंने थोड़ी झूठी ही दी थी,
पर माई को उससे जीने की नई रोशनी मिली थी।
मेरी बात सुनते ही उसका चेहरा खिल गया,
जैसे सूखे आँगन में कोई फूल फिर से मिल गया।

मेरी सरकार से बस इतनी विनती है,
ऐसी समस्याओं पर भी कुछ संवेदना दीजिए।
और कुछ न सही, लोगों की बात तो सुनिए,
संवाद की राह खोलिए, समाधान भी चुनिए।

जब बात होगी तो हल भी ज़रूर निकलेगा,
टोबों के बीच भी एक दिन फूल खिलेगा।

यदि सफ़ाई रखी जाए तो यह सुंदर तालाब बन सकता है,
फिर पंजाब के गाँवों की सुंदरता को कौन छीन सकता है?

कौन छीन सकता है?

बचपन से सीधे बुढ़ापाआज मैंने अपने पति से लाल रंग का सूट पहनने की इच्छा जताई।उन्होंने हँसते-हँसते कह दिया,“अब तुम बूढ़ी ह...
10/05/2026

बचपन से सीधे बुढ़ापा

आज मैंने अपने पति से लाल रंग का सूट पहनने की इच्छा जताई।
उन्होंने हँसते-हँसते कह दिया,
“अब तुम बूढ़ी हो चुकी हो।”

शब्द हल्के थे,
पर मन पर भारी पड़ गए।

मैं चुपचाप अपने काम में लग गई—
रसोई की आवाज़ें चलती रहीं,
पर मेरे भीतर कुछ टूट-सा गया।
क्या सच में मैं बूढ़ी हो गई हूँ?
उम्र तो अभी चालीस के आसपास ही है।

कुछ समय पहले तक
लोग कहते थे—
“तुम तो अभी बच्ची हो, नासमझ हो।”
और आज, अचानक,
मैं बूढ़ी कैसे हो गई?

मैं सोचती रही—
घर की सारी ज़िम्मेदारी
कब मेरे कंधों पर आ गई?
कब नासमझी
समझदारी में बदल गई?
और कब समझदारी
थकान बनकर बैठ गई?

मुझे याद नहीं आता
कि मैंने वो अध्याय कब जिया—
दोस्तों के साथ बेफिक्री,
अच्छे कपड़े,
तैयार होने की खुशी,
मेकअप की छोटी-सी शरारत,
और सबसे बड़ी बात—
बिना वजह खुश रहना।

शायद वो अध्याय
कभी खुला ही नहीं।
या फिर ज़िम्मेदारियों की मोटी किताब में
कहीं दबकर रह गया।

बचपन से सीधे बुढ़ापा आ गया—
बिना सूचना, बिना तैयारी।
आईने में चेहरा वही है,
पर मन थका हुआ।

आज पहली बार लगा—
बुढ़ापा उम्र से नहीं आता,
वो तब आता है
जब इंसान अपने लिए जीना
चुपचाप छोड़ देता है।

और मैं?
मैं बस यही सोचती रही—
पता ही नहीं चला
कि मैं कब बड़ी हो गई।

शिक्षक और जनगणना ड्यूटीसभी सैनिक सिर्फ सीमा पर ही नहीं होते—कुछ को जनगणना जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ भी निभानी पड़ती ...
30/04/2026

शिक्षक और जनगणना ड्यूटी

सभी सैनिक सिर्फ सीमा पर ही नहीं होते—कुछ को जनगणना जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ भी निभानी पड़ती हैं।

आख़िर क्या है यह जनगणना ड्यूटी?
किसी को यह जबरन थोपी गई जिम्मेदारी लगती है, जहाँ मना करने पर सज़ा का डर या कुछ अतिरिक्त पैसे का लालच होता है। लेकिन हर किसी का अपना दृष्टिकोण होता है।

यदि गहराई से देखा जाए, तो जनगणना ड्यूटी एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय जिम्मेदारी है, जो सोच-समझकर सौंपी जाती है। इसके साथ मिलने वाला मानदेय केवल एक पहलू है; असल में यह हमारे एक जिम्मेदार नागरिक होने का प्रमाण है।

देश सेवा केवल सीमा पर जाकर युद्ध लड़ने तक सीमित नहीं है। यदि जनगणना का कार्य ईमानदारी और सहज भाव से किया जाए, तो यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कठिन परिस्थितियों में देश की रक्षा करना।
क्योंकि इस “अदृश्य अभियान” की सफलता से ही हमारा देश मजबूत बनता है और आगे बढ़ता है।

अब निर्णय आपका है—
आप इसे कैसे देखते हैं:
देश के प्रति अपना कर्तव्य, सरकार का आप पर विश्वास, या कुछ अधिकारियों द्वारा थोपी गई पाबंदी?

सोचिए… और जनगणना ड्यूटी को एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में अपनाइए।

आज मौसम बड़ा सुहाना था। स्कूल से ड्यूटी के लिए कहीं जाना था।बारिश के मौसम में रैपिडो, उबर और ओला वाले भी किराया बढ़ा देत...
28/04/2026

आज मौसम बड़ा सुहाना था। स्कूल से ड्यूटी के लिए कहीं जाना था।
बारिश के मौसम में रैपिडो, उबर और ओला वाले भी किराया बढ़ा देते हैं, और मैं—एक सरकारी कर्मचारी—पैसे बचाने के लिए ऑटो की सवारी करने का फैसला कर बैठी।

और फिर निकल पड़ी एक हसीन और रोमांचक यात्रा पर।

रास्ता बेहद खूबसूरत था—बारिश से धुले हरे-भरे पेड़, चमकते पत्ते और रंग-बिरंगे फूल, सब कुछ मन को मोह लेने वाला।
प्रकृति जैसे अपनी ही किसी मधुर धुन में मुस्कुरा रही थी।

रास्ते में और भी यात्री मिले।

एक लड़की थी—शायद किसी गहरी उधेड़बुन में खोई हुई। न जाने किस काम के लिए, किस चिंता को साथ लिए निकली होगी।

एक मोटे से सज्जन थे, जो दो लोगों की जगह घेरकर बाहर के नज़ारे देख रहे थे।

दो और यात्री थे, जो लगातार अपने फोन में व्यस्त थे, मानो प्रकृति के सुंदर नज़ारों से उनका कोई रिश्ता ही न हो।

और एक मैं थी—हर पल का आनंद लेते हुए, उन खूबसूरत दृश्यों को अपनी यादों और कैमरे में कैद करती हुई।

लाल बत्तियों पर रुकना, फिर आगे बढ़ जाना—जैसे ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है।

लगभग 30 मिनट की इस यात्रा ने अनमोल यादें और सुंदर अनुभव दे दिए।

आख़िरकार हम अपनी मंज़िल पर पहुँचे।
फिर सब अपने-अपने रास्तों पर चल दिए, और ऑटो वाला भी नई सवारियों की तलाश में आगे बढ़ गया।

एक साधारण-सी ऑटो यात्रा, लेकिन यादों में हमेशा के लिए बस जाने वाली।

आज मैंने अपने हाथों को ध्यान से देखा।वे चुप थे, पर बहुत कुछ कह रहे थे।ऐसा लगा जैसे उनकी उम्र मुझसे कुछ ज़्यादा हो गई हो।...
20/04/2026

आज मैंने अपने हाथों को ध्यान से देखा।

वे चुप थे, पर बहुत कुछ कह रहे थे।
ऐसा लगा जैसे उनकी उम्र मुझसे कुछ ज़्यादा हो गई हो।
मेरे चेहरे पर जितनी रेखाएँ नहीं थीं, उनसे कहीं अधिक कहानियाँ मेरे हाथों में उभर आई थीं।

कट के निशान, खुरदुरी त्वचा, थकान से भरी नसें—
सब मिलकर उनके संघर्ष की गवाही दे रहे थे।
ये वही हाथ थे जो सुबह सबसे पहले उठते थे
और रात को सबसे आखिर में आराम ढूँढते थे।

कभी रसोई की गरमी सहते,
कभी फर्श की ठंडक।
कभी काग़ज़ों के बोझ तले दबते,
तो कभी बच्चों की उँगलियाँ थामे उन्हें रास्ता सिखाते।
घर के भीतर और घर के बाहर—
इन हाथों ने कभी फर्क नहीं किया।

मैंने उनसे कभी पूछा ही नहीं,
“थक तो नहीं गए?”
मैं भागती रही ज़िम्मेदारियों के पीछे,
और वे चुपचाप मेरा साथ निभाते रहे।

आज पहली बार लगा
कि मेरी उम्र मेरे हाथों से पीछे छूट गई है।
मैं आईने में खुद को पहचानती रही,
और मेरे हाथ समय से पहले बड़े हो गए।

मैंने उन्हें हल्के से सहलाया।
शायद देर से सही,
पर आज मैंने उन्हें देख लिया था।
वे मुस्कराए नहीं,
पर उनकी चुप्पी में एक सुकून था—
जैसे कह रहे हों,
“देखा जाना ही हमारे संघर्ष का सबसे बड़ा इनाम है।”

15/04/2026

कई बार ऐसा लगता है कि
घर में भी अपनी कोई जगह नहीं है…

जहाँ बैठो, कोई न कोई कह देता है —
“ये कर लो… वो कर लो…”

और फिर इंसान ऐसी जगह ढूंढता है
जहाँ कोई disturb न करे…
जहाँ कोई ये न पूछे कि
“बैठी क्यों हो… कुछ काम ही कर लो…”

और सच कहें तो,
कई बार वो “safe place”
बस एक toilet ही बन जाता है…

जहाँ थोड़ी देर के लिए ही सही,
इंसान खुद के साथ रह पाता है… 💭

कभी-कभी बस कोई समझ ले…इतना ही काफ़ी होता है।हर बात शब्दों में कहना ज़रूरी नहीं होता,कुछ खामोशियाँ भी बहुत कुछ कह जाती है...
14/04/2026

कभी-कभी बस कोई समझ ले…
इतना ही काफ़ी होता है।

हर बात शब्दों में कहना ज़रूरी नहीं होता,
कुछ खामोशियाँ भी बहुत कुछ कह जाती हैं।
बस कोई हो… जो बिना कहे सुन ले,
बिना पूछे महसूस कर ले।

क्योंकि कई बार,
समझ लिया जाना ही सबसे बड़ी राहत होती है…

Do you also agree ?





Address

6282
Mohali
140301

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Panne Dil Ki Kitab Ke posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share

Category