19/05/2026
जनगणना ड्यूटी
जनगणना में सरकार ने ड्यूटी मेरी लगाई थी,
एक घर के भीतर पहुँची, वहाँ बैठी एक बूढ़ी माई थी।
जब मैंने घर के बारे में उससे कुछ पूछा,
माई को लगा जैसे सरकार का कोई दूत आ पहुँचा।
वह मुझे घर के पीछे वाले हिस्से में ले गई,
कहने लगी, “पीछे एक टोबा है,” और हल्की-सी मुस्कान दे गई।
मैंने मुस्कान दबाकर उसकी हर बात सुनी,
उसने अपना दर्द सुनाने के लिए मेरी ही संगत चुनी।
बोली, “मैडम जी, इस टोबे की समस्या का समाधान करवा दो,
हमारी तो कोई सुनता नहीं, आप ही सरकार तक बात पहुँचा दो।
लिख लो अपनी कॉपी में मेरी यह पुकार,
गैस खत्म हो जाए तो उपलों का ही होता है सहारा बार-बार।
पर उन्हें कहाँ थापें, यह टोबा सब निगल जाता है,
कई बार तो घर की दीवारों को भी खा जाता है।”
मैंने माई से कहा, “माता जी, आपकी बात लिख ली है,
सरकार तक अर्जी पहुँचाएँगे, शायद कोई राह निकल आई है।”
आशा तो शायद मैंने थोड़ी झूठी ही दी थी,
पर माई को उससे जीने की नई रोशनी मिली थी।
मेरी बात सुनते ही उसका चेहरा खिल गया,
जैसे सूखे आँगन में कोई फूल फिर से मिल गया।
मेरी सरकार से बस इतनी विनती है,
ऐसी समस्याओं पर भी कुछ संवेदना दीजिए।
और कुछ न सही, लोगों की बात तो सुनिए,
संवाद की राह खोलिए, समाधान भी चुनिए।
जब बात होगी तो हल भी ज़रूर निकलेगा,
टोबों के बीच भी एक दिन फूल खिलेगा।
यदि सफ़ाई रखी जाए तो यह सुंदर तालाब बन सकता है,
फिर पंजाब के गाँवों की सुंदरता को कौन छीन सकता है?
कौन छीन सकता है?