Azad parinde

Azad parinde एक कवि के मन का सार

08/01/2024

खोल दे पंख मेरे, कहता है परिंदा, अभी और उड़ान बाकी है,

जमीं नहीं है मंजिल मेरी, अभी पूरा आसमान बाकी है,

लहरों की ख़ामोशी को समंदर की बेबसी मत समझ ऐ नादाँ,

जितनी गहराई अन्दर है, बाहर उतना तूफ़ान बाकी है

अभी मेरे अंदर बहुत जान बाकी है....बहुत अरमान बाकी है....

06/03/2023

इच्छाओ ने मेरी मुझे इस कदर गुलाम बना दिया, ना दिन को चैन हे ना रात में आती हे निंदिया उमरकैद सा लगने लगा हे जीवन क्या प्रकृति ने मुझे इसलिया इंसा का जन्म दिया

06/03/2023

तू पास है या तेरे पास होने का अहसास है जो भी है बस ये पल मेरे लिए बहुत खास है

05/03/2023

ये फूल ये पत्ते ये पेडो की शाखें
ये मिट्टी ये पर्वत ये नदियो की लहरे
इन्ही से जीवन है इन्ही से है मेरी सांसे
उलझा रहा मैं , मैं के साये में
लगा रहा जीवन भर इनको मिटाने में
भूल गया था इन्हीं से है वजुद मेरा
इन्हीं से चल रही मेरी सांसे

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