Braj Vani & Viraasat

Braj Vani & Viraasat BRAJ BHASHA SAHITYA EVM LOK KALA SANSTHAN

27/04/2026

# #जय श्री राम # # #

27/04/2026

(पार्ट 3,)
मक्खन की लोनी गर्म करने पर काला-काला सा पदार्थ एकत्र होता है इस फूल कहते हैं । घी निकलने बाद मैल जैसा रह जाता है उसे मईहर या महिया कहते हैं। लोनी को अच्छी तरह उबालने को खरो ताईवो कहते हैं।
लोनी आवश्यकता से अधिक अगर उबल जाए तो उसे ढड़ेल कहते हैं। घी को ब्रज में घ्यों कहते हैं ।
कुल्हरी, कुल्हा ,मिट्टी के बने छोटे-छोटे पात्र, कुल्हड़ कुलिया दूध दही रखने देने के काम आते हैं। मथुरा के पेड़े,रबड़ी,खुरचन, दूध भात,कुलिया, दही की लस्सी, खीर , महेरी,कढ़ी रायता अद्भुत पारंपरिक व्यंजन है। विवाह के समय बारातियों को दही और बूरे की दावत प्रसिद्ध है उसके लिए लोग बहुत-बहुत दूर से पैदल दावत खाने के लिए आते हैं । मृत्यु भोज खीर पुआ है।
भला बृजवासी ऐसी दावतन कुं सदैव लालायित रहयो करें। एक उक्ति है**""
"सूखी सूखी कोस दोय कोसी,पूरी दही बूरो बारह।
जो सुनी पावे मालपुआन की , धावे कोस अठारह।। "

27/04/2026

आइए जाने ब्रज भाषा को (पार्ट 2)
दूध गरम करना औटना कहलाता है। जिस पात्र में दूध गरम किया जाता है वह तौला या चरुआ, जिससे ढकते हैं वह पारो कहलाता है। ढक्कन के बीच में उसे पकड़ कर उठाने के लिये एक छोटा सा उठा हुआ गोला बना होता है, इसे टूमना कहते हैं। दूध भैंगड़ा या भट्टा तथा बरोसी में दूध उबाला जाता है। भट्टा , भेंगड़ा आँगन की जमीन में गोलाकार खोदकर बनाया जाता है। बरोसी मिट्टी की बनी होती है और उठाकर होने से कहीं भी उठाकर रखी जा सकती है। दूध उबलने पर उसमें उफान आता है ठंडा होने पर मलाई को कहीं कहीं साटे भी कहते हैं। कभी एकदम तेज आग पर गरम करने से दूध में आने लगती है इसे दूध औधना कहते हैं।
जब दूध औटा कर आधा गाढ़ा कर लिया जाता है तो उसे अध औटा कहते हैं। बिल्कुल गाढ़ा होने पर वह खोया बन जाता है। दूध को गरम करने पर तौला या कढ़ाई में नीचे जो कुछ जम जाता है उसे खुरचन कहते हैं। दूध निकाल कर यह खुरचनी से खुरच ली जाती है। खुरचनी लोहे का बना हुआ सीपी का आकार लिये होता है।

ब्रज में दूध दही रखने के लिये रस्सी या तारों की बनी डलिया सी छत से लटकी होती है इसे छींका कहते हैं। जानवरों से सुरक्षा के लिये दही दूध या तो छींके पर रखा जाता था। कहावत भी है बिल्ली के भाग ते छीका टूटना।

दूध जमाकर दही बनाया जाता है। दूध जमाने का बर्तन चपटिया या मटकिया, मल्ला कहलाता है। ढुलकने से बचने के लिये इसके तले में आजू बाजू पत्थर ईंट के टुकड़े लगा देते हैं इन्हें उटेटा कहते हैं। बर्तन रखते रखते जमीन पर जो गड्ढा सा बन जाता है उसे गुल्ली कहते हैं। जब बहुत सा दही जमाना हो तो नांदों में जमाया जाता है। देवी के निम्न गीत में इसका उल्लेख है—

नांदन दही जमावती माँ ईमरत बीछन देति, ओ माय

दही जमाने हेतु मट्ठा को जामन ,सहेजा,बिरजन , बीछन , कहते है।सही से जमा दही चक्का,सही न जमने घुर घुराय गयो है अथवा सर्दी में दही न जमने पर ठरना ,वही गर्मी में खराब दही जमाना उबझना कहा जाता है।
दही बिलोकर मक्खन निकालते हैं जिस में दही बिलोते है उसे मथनिया, चलामनी, बिलोमना कहा जाता है। दही मथने के लिए दीवार से या खात से एक लकड़ी खड़ी होती है उसे बिल्लौट , और दो गोल कर के बंधी रस्सियों दौना , और उस के दोनों सिरों पर लगे छल्ले सेखरा ,मथने का डंडा जिस में नीचे फूल जैसा होता है लकड़ी का बना होता है जो रई कहलाता है। रई से बंधी रस्सी नेति और इस के किनारे लगे लकड़ी के टुकड़े क्याेली कही जाती है। रई का निचला हिस्सा बोंडा ऊपरी भाग डंडा कहा है। इन दोनों को जोड़ने का काम सींक करती है।इस प्रकार दही चलाना बिलोना कहा जाता है फिर निकलता है माखन फिर मट्ठा और घी। मट्ठे को मही , छाछ भी कहते है ।ब्रज में छाछ के संग महेरी कने का प्रचलन है।
छाछ के ऊपर जो कण तैरते है उनको मेमन कहते है।मक्खन महंत ने n निकले तो इसे दूध का विचरना कहते।मक्खन का निकलना लोनी कहलाता है। गांवों में लोनी सोमवार को ही लोनी ताई जाती है यानी घी निकलना जाता है सोमवार को प्रत्येक किसान परिवार में सभी की रोटी घी से चुपड़ते है।
आगे का क्रमशः********"

25/04/2026

ब्रज भाषा में पशु पालन के शब्द:

ब्रज की पहचान गायों और गौ पालकों से रही है ।भगवान श्री कृष्ण की प्रिय गाय रही हैं ।एक समय था वैदिक युग में गाय खरीद फरोख्त करने का एक मानक मूल्य थी।वेदों में सोम रस की खरीदारी के अनेकों प्रसंग में उसका उल्लेख आया है ।हमारे ऋषि- मुनि, मनीषी ,चिंतक का आहार "पय"था ,मधु पार्क था ।गोपाल को और पशुपालकों की संस्कृति में गौ धन था । गायों को सामाजिक प्रतिष्ठा समृद्धि का प्रतीक माना जाता था ,तो वहीं दूध पानी के मेल ने मानव की एकात्मक प्रवृत्ति और नवनीत ने उनके हृदय की कोमलता द्रवण शीलता को अभिव्यक्ति दी है। गोमूत्र यदि औषधि है तो गाय के गोबर मे सुचिता तथा पवित्रता बसी है । ब्रज की संस्कृति में गोदान जैसे संस्कार स्वर्गारोहण का प्रतीक है।
ब्रज की अपनी एक बोली है जिसे ब्रज भाषा कहते है ।अत्यंत मृदु भाषा जिस का प्रयोग भगवान श्री कृष्ण ने भी किया।उसकी अपनी समृद्ध परिभाषिक शब्दावली है जिस में पशु पालन से संबंधित अपने शब्द है आइए उन शब्दों को जानें जिन्हें "हमारा कन्हैया बोल्यो करै ओ"।ब्रज में गाय भैंसों को बांधने के लिए जमीन में एक लकड़ी का टुकड़ा गाढ़ा जाता है इसे "खूंटा" कहते हैं। गाय भैंसों को लोहा की (सांकर )रस्सी से बांधा जाता है । पघा या जैवरा कहते हैं। पघा दो तरह से बांधा जाता है एक गलखोला कहलाता है ।वही दूसरा मुंह के ऊपर से यह मोहरी कहलाता है। गाय भैंसों के गले में एक रस्सी विशेष रूप से बंधी होती है इसमें काले -नीले धागे ,मोर पंख मोती काली -नीले रंग की गुथे होते हैं ,एक नीचे छोटी सी घंटी लटकी होती है ।यह गंडा कहलाता है । रस्सी मे घंटी बांधकर अकेला भी गले में बांध देते हैं ।जिद्दी और भागने वाली गाय की गले में एक मोटी भारी लकड़ी का टुकड़ा छेद करके बांध दिया जाता है इसे घटमल्ल कहते हैं।
गाय भैंस बांधने की जगह को नौहरा या घेरा कहा जाता है ।जिन बर्तनों में पशु भोजन करते हैं उन्हें नाद और जब ऐसी कई नाद नर्म के पेड़ वगैरा की छाया में पंक्ति से लगा दी जाती है तो वह लड़ामनी कही जाती है ।
गाय को खिलाने वाले भुस और कुटी में डाले अनाजों को उबालकर बनाए जाने वाला पतला मिश्रण मिलाया जाता है इसे दाना या बांट एवं इस कुटी में मिलने की क्रिया को सानी देना कहा जाता है एक बार की सानी को एकसानी कहते है। जिस पात्र में दाना भुस आदि एकत्र किया जाता है उसे खंडरा तथा बांटका कहते है। कभी तसले मै भी दलिया दे देते है।
गाय भैंस के बच्चों को "बछड़ा, "जैगरा, "जैगरी," पडरा, पड़डा या पड़िया कहा जाता है। छोटे बच्चे को "लबारा", भी कहते है। गर्भाधान को "ग्याभन", हरि होना,मचलना "साह की होना ", "पायांतर" पड़ना,उठी जान आस की होना ,कहते है।यदि गर्भाधान न हो तो उसे" थोरिया "कहते है। प्रथम गर्भाधान को उसर दूसरी बार को दोसर कहते है।। गर्भ ग्रहण करने वाली बछिया "ओसरी" कहलाती है । पूँछ , बाल , रंग के अनुसार उनके नाम होते है जैसे सुरभि ,नंदिनी , कपिला आदि।

यदि गर्भाधान न हो "पलट जाना "बात न मानी "भैसिया तुई परि " शब्दों से बोला जाता है। कभी भी ग़यामन न करने वाली गाय बनझोटिया कहलाती है ।बार गर्भाधान गिरने वाली को "बाइल "कहते है।
बच्चा जन्मना ब्याना कहलाता है बच्चा डारना भी कहते है छोटे बच्चे के मुंह पर "मूर्छिका या कटीला बांध कर रखे," जाते है। जिस से वो न तो मिट्टी खा सकते है न ही दूधपी सकते है। ये रस्सी के बुने जाल से होते है। उनको इस सब से रोकने के लिए नमक की डाली खिलाई जाती है।
गाय के दूध को निकालना धार काढ़ना दुहना, गईया लगाना, जो लोग दूध निकालते है उनको दुहाईया और कढ़ाइया कहते है।
गाय का दूध निकालने से पूर्व बछड़ों को पिलाया जाता है जिसे "पाँसुरना" कहते है ।बच्चे का दूध पीना "चौंखना," कहते है। यदि गाय दूध न दे तो उसे लातना,भैंस का कूदना कहते है। दूध निकालते समय गाय के पीछेवाले पैरों में रस्सी बांधी जाती है उस "लोमना," कहते है। थनों में बेवक्त दूध आना" डोकरना " कहलाता है। ।
दूध निकालते समय नर्म धार दोधारा,थन कड़े होने पर कड़ी धार दूध में घी की मात्रा अधिक हो तो" घीयारी" समझी जाती है।
नई बयाई जैसी का दूध कीला कहलाता है।ग्राम करने पर ये हम जाता है जिसे "पेबसी,"कहते है जिसे गुड के साथ अड़ोसपडोस में बांटा जाता है।।जब दूध स्वच्छ हो जाता है तब खीर की जाती है।। चामड़ मैया पे दूध रखा जाता है वामन जिमाया जाता है। इस दिन से दूध का दही जमाना आरम्भ करते है। एक माह गाय का दूध अलबाया।भैंस को अलवाई कहते है।दस्त आठ माह के पशु को बाखरी,दूध को बाखरा कहते है। दूध देने का अगले गर्भाधान तक समय" ब्यांत "कहलाता है। जब गाय दूध देना बंद कर देती है उसे "लातना " कहते है।
खूंटे पर बंधी भैंस जो दूध नहीं देती ठल्ल कहलाती है।
गाय का झुंड जहां चरता है उसे पौहार कहते है।इस समूह को घेरनेवाला ग्वारियां कहलाता है। पशुओं को पौये भी कहते है। चारागाह बरहों (बरहा) कहा जाता है।
दूध बेचनेवाले दूधिया,घी बेचने वाला घिया कहा जाता है। बंधानी, कटऊ नियमित खरीद दार को कहा जाता है।
आगे का अगले लेख में क्रमशः***"***"

25/04/2026

भारत में क्षत्रिय राजा
इस्लाम के उदय से पूर्व वर्तमान अफगानिस्तान भारत का ही एक अभिन्न अंग था।भौगोलिक दृष्टि से यह सिंधु तट परवर्ती प्रदेश था ।सांस्कृतिक दृष्टि से यहां शेषनाग पुत्र विक्रमादित्यशालीवाहन का राज्य था। जाति की दृष्टि से देखें तो यह सूर्यवंशी राजा नारिश्यत की संतान शक जाति का देश था ।बौद्ध ,भागवत तथा सूर्यपूजक धर्म की यहां प्रधानता रही है ।इस्लाम के प्रदुर्भाव के समय यहां महाराजा गज का राज्य था ।राजा गज की बिहार भूमि जिसका नाम गजनवी प्रसिद्ध था। बाद में गजनी नगर कहा जाने लगा। राजा गज के शासन काल में ही शैव शाक्त व बौद्ध और नाथ मतों की प्रचुरता थी। ज्यों ही इस्लाम में गजनी में प्रवेश किया तो नाथ मतावलंबियों ने इस्लाम के आगे सर झुका दिया।।राजा गज यहां से पलायन कर गए। उन्होंने स्याल कोट को राजधानी बना कर पंजाब v सिंधु क्षेत्र पर राज्य किया। चौरंगी नाथ इनके ही वंशधर थे। कर्नल टॉड ने भीगजनी के सुल्तान तथा राजा गज के मध्य युद्ध होने की बात लिखी है।स्याल कोट आने से पूर्व गज ने रावल पिंडी को जिस का दूसरा नाम गजपुरी को अपनी राजधानी बनाया था। इस प्रकार देखे तो राजा गज के समय इस्लाम भारत में प्रवेश करने को छटपटा रहा था ।
नाथ संप्रदाय के अंतर्गत रावल संप्रदाय आता है इसी। के कारण गजपुरी का नाम रावल पिंडी पड़ा।रावल नाम आप तीर से राजपूत राजाओं के लिए प्रयोग होता है।बप्पा रावल एक प्रसिद्ध शक्तिशाली राजा रहे।रावल को राजकुल का अपभ्रंश बताया जाता है। जब पंजाब में नाथ पंथ आया तो रावल क्षत्रियो ने उसे सहारा दिया। नाथ संप्रदाय के 12पंथों में तीन पंजाब से संबंधित है जालंधर नाथ,चौरंगी नाथ ,चरपट नाथ बल नाथ।
ब्रज में भी नाथ पंथ का प्रभाव यहां के लोक साहित्य मे देखनेको मिलता है।साथ हितांतर मंत्र में शबर मंत्रों का उपयोग भी बहुत मिलता है

नाथ संप्रदाय ,शालीवाहन राजा पूरन भगत की कहानी,गरुड़ी विद्या के ब्रज के लोक गीतों में , मंत्रों में आज भी परिलक्षित होते है।

20/04/2026
20/04/2026

ब्रह्मवैवर्त पुराण में जिन गोपियों के नाम है वो इस प्रकार है
सुशीला,शशि रेखा,चंद्रमुखी,माधवी,कदम्बवाला, कुंती,सर्वमंगला, पद्ममुखी,जाह्नवी,सुधामुखी, शुभा, पद्मा, गौरी,सरस्वती,भारती, अपर्णा,नंदिनी,कृष्ण प्राना,मधुमति,चन्दना।
संदर्भ *श्री कृष्ण जन्म खंड27/28
वही 16वो शताब्दी में के मध्य लिखे वैष्णव काव्य में राधा की सखियों में ललिता ,विशाखा,चंद्रावली, वहीं गोदिया काव्यों में सखियों के नाम की लंबी सूची है। पद्मपुराण। मे चंद्रावली,हरिप्रिया,विशाखा,पद्मा,भद्रा,मधुमति,चंद्र रेखा आदि के नाम हैं चंद्रावली श्री राधा की प्रतिद्वंदी के रूप में है

20/04/2026

चलो रियाज़ हो जाए,राधा रानी का नाम हो जाए

With Maithili Thakur Fan – I just got recognised as one of their top fans! 🎉
19/04/2026

With Maithili Thakur Fan – I just got recognised as one of their top fans! 🎉

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