25/04/2026
ब्रज भाषा में पशु पालन के शब्द:
ब्रज की पहचान गायों और गौ पालकों से रही है ।भगवान श्री कृष्ण की प्रिय गाय रही हैं ।एक समय था वैदिक युग में गाय खरीद फरोख्त करने का एक मानक मूल्य थी।वेदों में सोम रस की खरीदारी के अनेकों प्रसंग में उसका उल्लेख आया है ।हमारे ऋषि- मुनि, मनीषी ,चिंतक का आहार "पय"था ,मधु पार्क था ।गोपाल को और पशुपालकों की संस्कृति में गौ धन था । गायों को सामाजिक प्रतिष्ठा समृद्धि का प्रतीक माना जाता था ,तो वहीं दूध पानी के मेल ने मानव की एकात्मक प्रवृत्ति और नवनीत ने उनके हृदय की कोमलता द्रवण शीलता को अभिव्यक्ति दी है। गोमूत्र यदि औषधि है तो गाय के गोबर मे सुचिता तथा पवित्रता बसी है । ब्रज की संस्कृति में गोदान जैसे संस्कार स्वर्गारोहण का प्रतीक है।
ब्रज की अपनी एक बोली है जिसे ब्रज भाषा कहते है ।अत्यंत मृदु भाषा जिस का प्रयोग भगवान श्री कृष्ण ने भी किया।उसकी अपनी समृद्ध परिभाषिक शब्दावली है जिस में पशु पालन से संबंधित अपने शब्द है आइए उन शब्दों को जानें जिन्हें "हमारा कन्हैया बोल्यो करै ओ"।ब्रज में गाय भैंसों को बांधने के लिए जमीन में एक लकड़ी का टुकड़ा गाढ़ा जाता है इसे "खूंटा" कहते हैं। गाय भैंसों को लोहा की (सांकर )रस्सी से बांधा जाता है । पघा या जैवरा कहते हैं। पघा दो तरह से बांधा जाता है एक गलखोला कहलाता है ।वही दूसरा मुंह के ऊपर से यह मोहरी कहलाता है। गाय भैंसों के गले में एक रस्सी विशेष रूप से बंधी होती है इसमें काले -नीले धागे ,मोर पंख मोती काली -नीले रंग की गुथे होते हैं ,एक नीचे छोटी सी घंटी लटकी होती है ।यह गंडा कहलाता है । रस्सी मे घंटी बांधकर अकेला भी गले में बांध देते हैं ।जिद्दी और भागने वाली गाय की गले में एक मोटी भारी लकड़ी का टुकड़ा छेद करके बांध दिया जाता है इसे घटमल्ल कहते हैं।
गाय भैंस बांधने की जगह को नौहरा या घेरा कहा जाता है ।जिन बर्तनों में पशु भोजन करते हैं उन्हें नाद और जब ऐसी कई नाद नर्म के पेड़ वगैरा की छाया में पंक्ति से लगा दी जाती है तो वह लड़ामनी कही जाती है ।
गाय को खिलाने वाले भुस और कुटी में डाले अनाजों को उबालकर बनाए जाने वाला पतला मिश्रण मिलाया जाता है इसे दाना या बांट एवं इस कुटी में मिलने की क्रिया को सानी देना कहा जाता है एक बार की सानी को एकसानी कहते है। जिस पात्र में दाना भुस आदि एकत्र किया जाता है उसे खंडरा तथा बांटका कहते है। कभी तसले मै भी दलिया दे देते है।
गाय भैंस के बच्चों को "बछड़ा, "जैगरा, "जैगरी," पडरा, पड़डा या पड़िया कहा जाता है। छोटे बच्चे को "लबारा", भी कहते है। गर्भाधान को "ग्याभन", हरि होना,मचलना "साह की होना ", "पायांतर" पड़ना,उठी जान आस की होना ,कहते है।यदि गर्भाधान न हो तो उसे" थोरिया "कहते है। प्रथम गर्भाधान को उसर दूसरी बार को दोसर कहते है।। गर्भ ग्रहण करने वाली बछिया "ओसरी" कहलाती है । पूँछ , बाल , रंग के अनुसार उनके नाम होते है जैसे सुरभि ,नंदिनी , कपिला आदि।
यदि गर्भाधान न हो "पलट जाना "बात न मानी "भैसिया तुई परि " शब्दों से बोला जाता है। कभी भी ग़यामन न करने वाली गाय बनझोटिया कहलाती है ।बार गर्भाधान गिरने वाली को "बाइल "कहते है।
बच्चा जन्मना ब्याना कहलाता है बच्चा डारना भी कहते है छोटे बच्चे के मुंह पर "मूर्छिका या कटीला बांध कर रखे," जाते है। जिस से वो न तो मिट्टी खा सकते है न ही दूधपी सकते है। ये रस्सी के बुने जाल से होते है। उनको इस सब से रोकने के लिए नमक की डाली खिलाई जाती है।
गाय के दूध को निकालना धार काढ़ना दुहना, गईया लगाना, जो लोग दूध निकालते है उनको दुहाईया और कढ़ाइया कहते है।
गाय का दूध निकालने से पूर्व बछड़ों को पिलाया जाता है जिसे "पाँसुरना" कहते है ।बच्चे का दूध पीना "चौंखना," कहते है। यदि गाय दूध न दे तो उसे लातना,भैंस का कूदना कहते है। दूध निकालते समय गाय के पीछेवाले पैरों में रस्सी बांधी जाती है उस "लोमना," कहते है। थनों में बेवक्त दूध आना" डोकरना " कहलाता है। ।
दूध निकालते समय नर्म धार दोधारा,थन कड़े होने पर कड़ी धार दूध में घी की मात्रा अधिक हो तो" घीयारी" समझी जाती है।
नई बयाई जैसी का दूध कीला कहलाता है।ग्राम करने पर ये हम जाता है जिसे "पेबसी,"कहते है जिसे गुड के साथ अड़ोसपडोस में बांटा जाता है।।जब दूध स्वच्छ हो जाता है तब खीर की जाती है।। चामड़ मैया पे दूध रखा जाता है वामन जिमाया जाता है। इस दिन से दूध का दही जमाना आरम्भ करते है। एक माह गाय का दूध अलबाया।भैंस को अलवाई कहते है।दस्त आठ माह के पशु को बाखरी,दूध को बाखरा कहते है। दूध देने का अगले गर्भाधान तक समय" ब्यांत "कहलाता है। जब गाय दूध देना बंद कर देती है उसे "लातना " कहते है।
खूंटे पर बंधी भैंस जो दूध नहीं देती ठल्ल कहलाती है।
गाय का झुंड जहां चरता है उसे पौहार कहते है।इस समूह को घेरनेवाला ग्वारियां कहलाता है। पशुओं को पौये भी कहते है। चारागाह बरहों (बरहा) कहा जाता है।
दूध बेचनेवाले दूधिया,घी बेचने वाला घिया कहा जाता है। बंधानी, कटऊ नियमित खरीद दार को कहा जाता है।
आगे का अगले लेख में क्रमशः***"***"