13/07/2026
बजते नगाड़े टीप दार स्वर लहरियां,कहां खो रहे है: स्वांग भगत जैसे लोक नाट्य
कहां गई नक्कारे की गूंज, कलाकारों के,टीपदार स्वर,कही विस्मृत तो नहीं हो रही भगत,स्वाँग ,नौटंकी की लोकनाट्य परंपरा। लोक नाट्य अर्थात लोक का नट अथवा नृत्य । मानव के विकास के साथ साथ लोक नाटकों की परंपरा विकसित होती रही है।उत्सवों मेलो, ,लोक संस्कारों के विभिन्न अवसरों पर अपने उल्लास एवं प्रसन्नता को मानव संगीत एवं नृत्य के माध्यम से प्रकट करता रहा है वही आगे चल कर लोक नाट्य के रूप में विकसित हुआ।।
लोक नाट्य सदैव खान साधारण के जीवन के निकट रहा है। सदैव बदलते परिवेश को आत्मात करता रहा है।भारत के प्रत्येक प्रांत के अपने लोक नाट्य है। जिनमें पंजाब की नौटंकी, मैसूर का यक्षगान, उत्तर प्रदेश का स्वांग,रामलीला रासलीला, बंगाल का जात्रा, गुजरात का भवाई, महाराष्ट्र का तमाशा, मद्रास का पागल वेषम,, आंध्रा का कथा प्रमुख है ,
देख जाए तो लोक नाट्य मानव जीवन में नमक की तरह घुले मिले हुए है।अवकाश एवं आनंद के पलों में इस का प्रदर्शन होता है। ग्रामीण सारी सारी रात जागकर इनका रसास्वादन करते है। ये लोक जीवन के सन्निकट होते है। इनके कथानक प्रायः पौराणिक,ऐतिहासिक,सामाजिक होते है कथानक को जोड़ने वाला एक सूत्रधार रंगा कहा जाता है।एक हास्य कलाकार विदूषक होता है ।कलाकार विभिन्न चरित्रों को बदल बदल कर प्रदर्शन करते है। लोक नाट्य की भाषा क्षेत्रीय होती है। ये खुले मंचों पर प्रस्तुत किए जाते है।कुछ नाटकों में निर्देशक भी देखे गए हैं।।कथानक में लोक वार्ताएं, सम्मिलित होती है जो परंपराओं की थाती लेकर ही प्रस्तुतीकरण होता है इस लिए इन कलाओं को लोक विश्वास का आधार प्राप्त हो जाता है जो इनको जीवित रखता है।
ब्रज की प्रमुख लोकनाट्य शैली है भगत सांगीत। ढोलक,मजीरा,करताल,चिकारा,सारंगी, और सांगीत की शान नकारा ब्रज के ग्र ग्रामीण क्षेत्र में बहुत लोक प्रिय हैं। मोरध्वज,नरसी, हरिश्चंद्र, जैसे पौराणिक कथानक,तो अमरसिंह राठौर, शिवाजी, जैसे ऐतिहासिक एवं सामाजिक कथानकों के साथ देश भक्ति, स्थानीय चरित्रों ,हीर रांझा, जैसे प्रेमाख्यान भी विषय के रूप में समाहित रहते है।
नक्कारे का स्वर दूरस्थ ग्रामीणों को बुलावा भेजता दीखता है ।पारंपरिक बंदो में बंधा गायन दोहा ,, दुबौला ,चौबोला, बहरा तबील,चौकड़ी , लवानी,लंगड़ी लावनी ,सोरठा, ग़ज़ल ,शेर,आल्हा आदि का प्रयोग गायन में होता है।रंग विरंग परिधानों में सजे कलाकार अपनी अलग बानगी प्रस्तुत करते है।
वर्तमान में सोशल मीडिया ने इन कलाओं को नष्ट प्राय कर दिया है। अब कोई इनमें रुचि नहीं लेता। आयोजक भी कम हो गए है। ब्रज के स्वांग विधा के प्रमुख कलाकार दीप चंद,हुकम चंद,रामसिंह सिसोदिया,में सिंह,तारा चंद प्रेमी, गिरिराज जी, मनोहर जी आदि है । उस समय इन लोक नाट्य में महिलाओं का काम करना बहुत ही हिम्मत का काम माना जाता था ।ब्रज की इन विधाओं की सशक्त महिला कलाकार , कृष्णा कुमारी माथुर,आशा रानी वर्मा ,कमलेश लता आर्य,बेबी,मैना कुमारी,चांदनी जैसी कलाकार है
आज पुनः आवश्यकता है ब्रज की लोक नाट्य विद्या भगत,स्वांग को नवजीवन देने की । अपनी पारंपरिक विरासत को संजोने की संरक्षित करने की और लोक कलाकारों की आजीविका समस्या दूर करने की।जिस में ब्रज की संस्थाएं, स्थानीय नगर सेठ,प्रशासन बहुत कारगर साबित होगा।