Braj Vani & Viraasat

Braj Vani & Viraasat BRAJ BHASHA SAHITYA EVM LOK KALA SANSTHAN

22/08/2026

# # #सावन का हिंडोला # # #

18/08/2026

# # #देवदासियां /गणिकाएं # #

देव उपासना के अंतर्गत पूजा में नृत्य का समावेश होता आया है ।प्राचीन सभ्यताओं में भी यह अस्तित्व में थी ।मिस्र ,मेसोपोटामिया,यूनान, साईंप्रस बेबोलिन में यह प्रथा हजारों वर्ष पूर्व प्रचलन में थी। मिस्र में ओसिरिस, आईसिस ,यूनान में एफरोडाइट मंदिरों में बहुत सारी नर्तकियों का उल्लेख प्राप्त होता है। प्राचीन यूनान ए लड़कियों के मंदिर में दान करने की परंपरा थी।
भारत में यह प्रथा पूर्व मध्यकाल में अपने चरम पर थी।
देवदासी का सबसे प्राचीन अभिलेखीय उल्लेख तीसरी शती ईसा पूर्व का जोगी मढ़ा का शिला लेख है जिसमें सुतनुका नामक देवदासी का वर्णन मिलता है।दक्षिण भारत में मातृसत्तात्मक परिवार ही देवदासी प्रथा का मूल कारण बनी
देवदासी गणिकाओं के विषय में जातक कहानियों में उल्लेख प्राप्त होता है।कौटिल्य के अर्थशास्त्र में गणिकाओं का वर्णन तो मिलता है पर देवदासियों का नहीं।
प्राचीन काल में बेटियों का पिता की संपत्ति पे कोई अधिकार नहीं होता था अतः अपना भरपोषण करने केलिए उनको देवदासी बनना विवशता थी। गुप्त काल के बाद यह प्रथा दिखाई देने लगी थी। पुराणों में भी देवदासियों का वर्णन मिलता है।कालिदास के मेघदूत नाटक में भी उल्लेख है कि उज्जैन के महाकाल मंदिर में अनेक देवदासी नृत्य वो गायन में व्यस्त रहती थी।
पद्मपुराण में उल्लेख है कि राजा को मंदिर की सेवा के लिए अनेक सुन्दरियों को क्रय करके देना चाहिए इस से उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी और वह धनवान बनेगा।
भविष्य पुराण में सूर्य लोक की प्राप्ति के लिए मंदिर में उल्लेख है कि वैश्य और कदंब मंदिर न अर्पित करने चाहिए।
वैदिक काल में पुरुष सदाचारी थे अतः देवदासियों का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सूक्त कल में वैश्या को सम्मानित पद प्राप्त था बौद्ध काल में आम्रपाली के यहां बुद्ध भोजन करने गए थे।। मौर्य काल में भी वैश्याओं की यही प्रतिष्ठा रही । एकवैश्या वैश्या विभाग की अध्यक्ष नियुक्त होती थी दरबार में भी इनकी नियुक्ति होती थी यही कोई वैश्या शुल्क लेकर सहवस के लिए तैयार नहीं होती तो राजा को उस पर दुगुना जुर्माना करना चाहिए । याज्ञवल्य ने वैश्या एवं गणिक में भेद बताया है गणिका अन्य कलाओं युक्त होती है । उन्होंने रखैल स्त्री का भी उल्लेख किया है।
भरहुत अभिलेख से ज्ञात होता है वैश्या मंदिरों में देवदासियों के रूप में रहती थी।सभी लोग उनके पास जाते थे। मंदिरों में देवदासी दर्शको से मनोविनोद करती थी । गुप्त काल में विलासिता चरम पर थी। धनी अपना रुपया देवदासी व वैश्याओं पर लुटा देते थे। लोग गणिकाओं के पास जाने लगे।समाज विघटन की ओर जाने लगा।। आदमियों की आदतों के दुखी महिलाएं गुप्त रूप से सेवकों के साथ अनैतिक संबंध बनाने लगी।।राजाओं के मनोरंजन के लिए दरबार में गणिकाएं रहने लगी । बहुत सी गणिकाएं राजाओं द्वारा मंदिर हेतु दान दी गई। वाराणसी के गंभीरेश्वर मंदिर में एक देव दासी रहती थी। कश्मीर के राजा जय पीड़ा ने कार्तिक मंदिर में कमला नामकी देवदासी को देखा था। गुप्तोत्तर कसल में पतन चरम पर था। लोग गणिकाओं के साथ रहने को बुरा नहीं मानते थे। राजाओं के दरबार में 1000ईसा से 1200ईसा में राजद्वार में गणिकाओं को मनोविनोद के लिए रखा जाने लगा।।कुंतल देश का राजा परमार्दि नग्न स्त्रियों का नृत्य देखकर मनोरंजन करता था।। हमीर रासो में उल्लेख है कि चाहमान शासक हरिराजन गणिकाओं के चक्कर में सारा धन बर्बाद कर दिया।

बनारस के राजा जयचंद्र ने एक नागरिक की पत्नी सुहावा को अपहृत कर अपनी पत्नी बनाया। सामंत कई कई पत्नियां रखते थे।
गणिकाएं संगीत नृत्य में निपुण होती । मुसलमान यात्रियों ने वर्णन किया है कि गणिकाएं अपनी सारी कमाई मंदिरों में दान दे देती थी ।वैसे इस बात को मान नहीं जा सकता क्यों कि मंदिर की अज्ञानी से ही ये देवदासियों जीवित रहती थी। धीरे धीरे देव दसियों के कारण मंदिर काम क्षेत्र बन गए ।मंदिरों में भी काम संबंधी चित्र बनाए जाने लगे ।
मथुरा अभिलेख में जैन गणिका नादा वैश्या का वर्णन आया है यह आदा वैश्या लोण शोभिका की पुत्री थी ।वह जैन वसंयसियों की श्रमण सेविका बनी।
वैश्या अपनी कला साधना के द्वारा उच्च स्थान रखती थी। उनका जीवन विलासिता पूर्ण था।
महाभारत में भी वैश्याओं का समाज में प्रतिष्ठित स्थान था।
महाभारत के शांति पर्व में वर्णन है जब कृष्ण शांति स्थापना के लिए कौरवो के पास गए थे तब उनका स्वागत गणिकाओं ने किया था।।सेनाओं के साथ भी वैश्या आती थी
धनी वर्ग गणिकाओं का बहुत सम्मान करता था। उनसे उत्पन्न बच्चे भी समाज में उच्च स्थान रखते थे।
मंदिरों में गणिकाएं बढ़ती गई गुजरात के मंदिर मैं बीस हजार गणिकाएं थी।
धीरे धीरे मंदिर अमोद प्रमोद के अड्डे बन गए।

क्रमशः।

17/08/2026

इस जैसे का क्या।किया जाए

17/08/2026

ब्रज की जोगी जाति

नाथ संप्रदाय में देवी उपासना एवं शुभ की उपासना का विशेष महत्व है ।नगरकोट देवी को जालंधर नाथ ने स्थापित किया था। लेकिन नाथ संप्रदाय की जोगियो के अतिरिक्त ब्रज के जीवन में एक अन्य प्रकार के जोगी जाति के लोग हैं जो भरथरी और नांदिया जोगी कहे जाते हैं। यह अपने आप को हिंदू ही मानते हैं ।यह गोरखपंथी हैं एवं गोरखनाथ इनके आदि गुरु है, लेकिन इनके अतिरिक्त ब्रज के लोक देवी देवताओं से संबंधित अनुष्ठानों को भी यह करते हैं । उन देवताओं की मान्यता रखते हैं गिर्राज जी, राधा रानी ,कृष्ण, बलदेव, महादेव आदि की भी उपासना करते हैं। विशेष रूप से जाहरवीर के तो यह परम भक्त होते हैं। उनमें अत्यंत आस्था रखते हैं। श्रावण मास में यह छड़ी लेकर डमरू बजाते हुए सारंगी, चिकारा आदि वाद्य यंत्रों पर जाहरवीर के गीत गाते हैं तथा घर-घर जाकर जाहरवीर की प्रतीक के रूप में छड़ी की पूजा करवाते हैं। ब्रज में महिलाएं भी "सीधा," पैसे इत्यादि से उस छड़ी की पूजा करती है तथा योगियों को अपनी श्रद्धा अनुसार दान देते है। जोगी उपवास करते हैं और मांस मदिरा नहीं खाते हैं। गले में रुद्राक्ष भी पहनते हैं तथा मैंने कुछ योगियों को हस्तरेखा और मस्तक रेखा को भी पढ़कर भविष्य बताते देखा है। भंडारी जोगी नांदिया बैल लेकर गली-गली में भीख मांगते हैं। वे बैल को कौड़ियों फटी पुराने रंगीन कपड़ों से सुसज्जित करते हैं। तथा महादेव के वाहन नंदी के समान उसकी पूजा करते हैं। हिंदू योगी उनकी झोली में अनाज डालते हैं ।उनका खप्पर भरते हैं। जिसमें से वह कुछ बैल को खिला है बाकी वह अपने बच्चों को लिए ले जाता है ।यह मोर पंख के माध्यम से छोटे बच्चों की नजर भी उतरते हैं। यह जाहरवीर की जोत किया करते हैं ।साथ ही रात्रि का जागरण भी किया करते हैं। जिसमें वे राजा भरथरी, सुआ सेवरा,जगदेव महादेव का ब्याहुला, भैरव तथा विभिन्न देवियों के गीत भी गाते हैं। कहीं-कहीं आख्यान के रूप में जोगियो के मुख से मैने हीर रांझा जैसे प्रेम गीतों को गाते हुए रिकॉर्ड किया है। वह अपने गीतों में अधिकतर जाहरवीर के गीतों और उनकी गाथाओं को गाते हैं "अइसो बलशाली जोधा लाड़लो।,जाकी फातिमा जोहे बाट"
कही कहीं गंगा से जुड़े गीत भी गाते दिखाई देते है।जो हर गंगे की टेक के साथ गाए जाते है।

27/07/2026

पावस ऋतु और ब्रज लोक गीत मल्हार

ग्रीष्म की भीषण तपन से तप्त पृथ्वी जब बहुत अधिक संतप्त हो उठती है तो समस्त जनमानस से एक ही आवाज उठती है कि कब श्रावण मास आये और कब अपनी शीतल, स्निग्ध, सौंधी फुआरों से हमें शीतल करेगा । इस सिरहन की कल्पना में डूबा मन बादल के बरसने का आमन्त्रण दे उठता ह। बगिया में गड़ा झूला ओर सखियाँ ,बरबस बरबस मायके की याद दिलाता है।
नन्ही नन्हीं बुंदिया रे ,सामन में मेरो झुलना
एक झूला झुल्लयो मैने बाबा जी के राज मे ,
बाग़ हिंडोला री गुड़िया के संग खेलना।
छोटी बालक ओर बालिकाएं बादल और रिमझिम होती बरसात को देख कर सावन को बुलाने लगते है सावन शीघ्रता से आओ क्यों कि नीम के पेड़ पर निबोली आने लगी है।
कच्चे नीम की निबौरी सामान जल्दी आयो रे
जल्दी आईयो रे सामान बेगूँ आइयो। रे
बाबुल दूर मत भेजे भैया नाय बुलाबेगो।
श्रावण का मास प्रारम्भ होते ही प्रकृति अपना रूप सँवारने लगती है। इस मास का महत्व वर्षाऋतु के आगमन और विभिन्न त्यौहारों के कारण और बढ़ जाता है । सम्पूर्ण प्रकृति हरित वस्त्र धारण कर मन को खुशहाली से भर देती है । किसानों के मन भी प्रफुल्लित हो उठते हैं। ब्रज की ललनाएं अपने पीहर जाने को आतुर हो उठती हैं सहेलियों से मिलने की इच्छा प्रबल हो उठती है।
वन के तो फूले आली फूलने,
एरी बहना बागन में फूली फुलवारी
झूला तो डारों बाग में।
ब्रज में तो शोभा आली है रही
एरी बहना हरियाली छाई चहुं ओर
झूला तो डरो बाग में
सातों सहेली चलो संग में एरी
बहना ले लो रेशम डोर
झूला तो डारो बाग में
कृषक महिलाएं गरीबी में रहते हुए सावन में वृष से पूर्व पतियों से अपने घर के पुराने छप्पर बदलने का अनुरोध करती है।
छप्पर पुराने मेरे पिया परी गए जियें कोई टूटन लागे बांस
अब घर आए जा धन के साहिबा जी।
मंदिरों में हिंडोले सजते हैं । भक्त अपने आराध्य को रिझाने के लिए मंदिरों में हिंडोले गीत गाते है
हिंडोला कुंज बन डार्यो रे झूलन आई राधिका प्यारी रे
काहे के खंभ गढ़वाए रे कहे कि डारी डोरियां प्यारी रे
एरी
सोने के खंभ गढ़वाए रे ,रेशम की डारी डोरियां प्यारी रे।

सभी स्त्री-पुरुष श्रावण की मल्हारों को झूम-झूम कर गाते हैं
कोकिल कंठी महिलाओं की तो बात ही क्या ? वे प्रति दिन संध्या के समय घर के आँगन में हिंडोले ,घर बाहर नीम के वृक्ष पर झूलती हुई सखी सहेलियों के संग मल्हार गाती देखी जा सकती हैं।
एरी बहना के चल रेशम डोर खुला तो डारें हरियल बाग में,
संग की सहेली हिल मिली चलो,एरी बहना के आओ रेशम डोर
झूला तो डारे बाग में।
श्रावण के गीतों में विशेष रूप से दो प्रकार के गीत सुनने को मिलते हैं । एक वे जिनका सम्बन्ध भावात्मक विषय वस्तु से है। मल्हारों में ऋतु की शोभा, राधाकृष्ण अथवा भैया बहिन के स्नेह भरे गीत गाए जाते हैं। भावात्मक गीत अधिकतर अपने आप में किसी-न-किसी कथा को समेटे हुए हैं । ये कथानक लघुवृत्त भी हैं और और दीर्घवृत्त भी हैं। लघुवृत्त वाले गीतों में पनिहारी, मनरा, विजैरानी, लहरिया, मोरा, चंदना जैसे गीत गाए जाते हैं
जैसे मोरा गीत को ही ले दुख भरा है एक महिला मोर को अत्यधिक प्रेम करती है पर पति नहीं चाहते कि उस की पत्नी उस से अतिरिक्त किसी को भी प्रेम करे। बस इतनी ईर्ष्या की मोर को मार कर उसे पकाने के लिए कहता है बेचारी महिला
भर भादो की मोरा ब्रिन अंधेरी तो राजा की रानी पानी निकरी जी
काहे की गागरी मोर कहे कि लेज़ु ,कहे जड़ाऊ धन की इन्डूरीजी
जोई जोई खींचू मोरा देय लुढ़काय,पंख पसारे मोरा जल पिये जी
हट हट हट रे मोरा भरन दे नीर,मो घर सास रिसाईये जी
चंद्रावली एक ऐसी ब्रज लालना की करुण कथा है जी परिस्थिति वश मुगल या तुर्क आताताई के चूगल में फंस फस जाती है और जब उसके परिवार के भी उसकी मुक्ति में सफल नहीं होते हैं तो वह अपनी उड़ती हुई चल से अपने पिता ससुर और भाई के पास संदेश भेजते हैं वह उसके धन हाथी घोड़ा लेकर छुड़ाने आते हैं लेकिन मुक्त करने में सफल नहीं होते हैं तब वह अपने परिवार की रक्षा को करते हुए स्वयं की भी रक्षा करती है
जाओ ससुर घर आपने रखूँ पगड़ी की लाज
जाओ बाबुल घर अपने राखो दोनों कुल की लाज
जाओ सजन घर आपने रखो फेरन की लाज
खानो न खाऊं पठान को भूखी मर जाऊं
सेज ना सोऊं पठान की औंधन मर जाऊं
मुगलाने फेरी रे पीठ चंद्रा दे लइ तम्बुआन आग
ठाड़ी तो जरै चंद्रावली जाके माई न बाप।
ऐसे गीतों में भारतीय नारी की वीरता और अपनी मर्यादा आन बान और शान के लिए मर मिटने का बड़ा ही अदभुद भाव देखने को मिलता है।
वही पति से अद्भुत प्रेम का विश्लेषण करता गीत मनरा गीत है बहुत से गीत अंतर जनपदीय यात्रा कर के ब्रज भूमि में पहुंचे है। बंजारों द्वारा ये गीत एक स्थान से दूसरे क्षेत्रों तक गए और वहां की संस्कृति ने मधुरता के कारण उनको आत्मसात कर लिये ऐसा ही गीत है मनरा
गलिन गलिन मनरा फिरे, बीबी मनराये दीजो बुलवाया
चूड़ों तो मेरी जान चूड़ों तो हाथी दांत को
हरी बंगा री रे मनरा नाय पहरू,मनरा हरे मेरे राजा जी के बाग
धोरौ बांगा री रे मनरा नाय पहरू,धोरे मेरे राजा की के वसन
इन गीतों में ढोला मारू, भरथरी,गोपीचंद आल्हा ऊदल जैसी कटाएं भी गाई जाती है राम की कथा महिलाएं गाती है
मेरी बहना राम दियो वनवास, केकई तो बैरन है गई
जब से, दोउ सुत बन को गए ,हरि बहना अजुध्या तो है गई उदास
केकई तो बैरन है गई
आल्हा ऊदल संबंधी गीतों में उनके जीवन की विविध घटनाओं द्वारा दोनों वीरों के अदभुद भ्रात प्रेम को दर्शाया है। उनकी माता चंद्रावली को समझा रही है
अरी बेटी बैरी बस्त चाहू ओर झूला तो झूला महल में
आल्हा और ऊदल बेटी घर नहीं,,एरी बेटी ब्रह्मा तो बायो है कठोर
मांन कहांन मेरी लाडली,,आरी बेटी दिल्ली को राजा खाय रहियो जोर
वही ब्रज में नाथ संप्रदाय के प्रभाव को भी ये गीत दर्शाते है। राजा गोपीचंद जोगी हो गए उन्होंने गुरु गोरखनाथ से दीक्षा ले ली। उनकी पत्नी उनको समझती है और आंगन में ही धुनी रमा ने की कहती है
सेज बिहूनी सैयाँ मेरी मत करो जी,एजी कोई जोग लियो तन धार
धुनी रमाय लियो घर के चौक मे जी,राजी कोई समझाऊँ हर बार
नरसी का भात भी मल्हार गीतों का करुणा से भरा गीत है
जन्म भिखारी सो बाबुल मेरी बाप है जी
एजी कोई कौन पे मांगू भात
भैया भतीजों कोई है नहीं जी
एरी मेरे घर केउ न पूँछे मेरी बात
वही निहाल दे भी स्त्री स्वाभिमान की रक्षा की कहानी है।बहुत प्रसिद्ध गीत
झूला तो पड़ गए अमुवा की डार पे जी
एजी कोई राधा कु गोपाल बिन राधा कु झुलवी झुला कौन
धीरज धर ले मन समझाय ले जी
एजी अब के सावन में झूलेंगे मिली संग
झूला तो पड़ गए अमुवा की डार पे जी
निहाल दे की तर्ज पर ही लिखा गया है
सावन के लगते ही बहन भाई के आने की प्रतीक्षा करती है
चंदा के ढिंग की वीरा तारई , अरे वीरा जगत उजारो होय
सामान ऋतु आइए
कसी के तो घोड़ा वीरा चल दिए
अरे वीरा पहुंचे बहनिया के देस
सामान ऋतु आईये
कैसे तो वीरमेरे अनमने,कैसे तिहारो मेलो भेस
धूप ये बहना वीरा अनमने,गर्द उड़त मेलो भेष
सामान ऋतु आईये
पह बहन तू कैसे दुखी दिख रही है वह भाई को बताती है सास लड़ती है सास चुनरी के लिए लड़ती है और ननद साड़ियों के लिए भैया भतीजों को कोसती है
तब वह बहन के सम्मान हेतु कहता है
चुंदरी तो ले दऊ बहना डेढ़ सौ
एरी बहना साड़ीन की ओर न छोर ।
वही ये गीत पर्यावरण को बचाने का संदेश भी देते है पन्ना मारु इसी प्रकार का गीत है
नीमारियाँ के छोटे छोटे पात
पन्ना मारूँ किन्ने सताई हरियल नीम री जी महाराज
देवरिया ने तोड़ी वाकी डार
।पन्ना मारु ननद सताई हरियल नीम री जी महाराज।
ब्रज के सावन गीत मन की मलिनता को हरने वाले है इस लिए ही उनके मल हार अर्थात मन का मैल समाप्त करनेवाले मल्हार गीत कहे जाते है।इनके स्वर गाते समय ऊंची नीचे झोटो के सम्मान प्रतीत होते है इन में दोलन की अधिकता होती है जो झूले पर झूलते समय की स्थिति को दर्शाते है। वही कजरी चैती जैसे उपशास्त्रीय गायन की तरह ब्रज में भी सुंदर सावन गीत है
कारी कमरिया कान्हा दियो न उढ़ाय
कारे बदरा ने घेरी है आय
अंग को भीजे कान्हा सलुआरा
कामार बूंद परे झर जाए
इस प्रकार समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं, इतिहास सावन गीतों के रूप में हमारे मध्य बिखरी हुई है आज आवश्यकता है उनको संजोने और संरक्षित करने की।आओ सब मिल कर बचाए अपनी विरासत।
डॉ सीमा मोरवाल
लोक गायिका एवं ब्रज संस्कृति विशेषज्ञ
B 56 कृष्णापुरम
निकट बिरला मंदिर, जय सिंह पुरा
मथुरा,281001
Ph 9837128970

13/07/2026

बजते नगाड़े टीप दार स्वर लहरियां,कहां खो रहे है: स्वांग भगत जैसे लोक नाट्य

कहां गई नक्कारे की गूंज, कलाकारों के,टीपदार स्वर,कही विस्मृत तो नहीं हो रही भगत,स्वाँग ,नौटंकी की लोकनाट्य परंपरा। लोक नाट्य अर्थात लोक का नट अथवा नृत्य । मानव के विकास के साथ साथ लोक नाटकों की परंपरा विकसित होती रही है।उत्सवों मेलो, ,लोक संस्कारों के विभिन्न अवसरों पर अपने उल्लास एवं प्रसन्नता को मानव संगीत एवं नृत्य के माध्यम से प्रकट करता रहा है वही आगे चल कर लोक नाट्य के रूप में विकसित हुआ।।
लोक नाट्य सदैव खान साधारण के जीवन के निकट रहा है। सदैव बदलते परिवेश को आत्मात करता रहा है।भारत के प्रत्येक प्रांत के अपने लोक नाट्य है। जिनमें पंजाब की नौटंकी, मैसूर का यक्षगान, उत्तर प्रदेश का स्वांग,रामलीला रासलीला, बंगाल का जात्रा, गुजरात का भवाई, महाराष्ट्र का तमाशा, मद्रास का पागल वेषम,, आंध्रा का कथा प्रमुख है ,
देख जाए तो लोक नाट्य मानव जीवन में नमक की तरह घुले मिले हुए है।अवकाश एवं आनंद के पलों में इस का प्रदर्शन होता है। ग्रामीण सारी सारी रात जागकर इनका रसास्वादन करते है। ये लोक जीवन के सन्निकट होते है। इनके कथानक प्रायः पौराणिक,ऐतिहासिक,सामाजिक होते है कथानक को जोड़ने वाला एक सूत्रधार रंगा कहा जाता है।एक हास्य कलाकार विदूषक होता है ।कलाकार विभिन्न चरित्रों को बदल बदल कर प्रदर्शन करते है। लोक नाट्य की भाषा क्षेत्रीय होती है। ये खुले मंचों पर प्रस्तुत किए जाते है।कुछ नाटकों में निर्देशक भी देखे गए हैं।।कथानक में लोक वार्ताएं, सम्मिलित होती है जो परंपराओं की थाती लेकर ही प्रस्तुतीकरण होता है इस लिए इन कलाओं को लोक विश्वास का आधार प्राप्त हो जाता है जो इनको जीवित रखता है।
ब्रज की प्रमुख लोकनाट्य शैली है भगत सांगीत। ढोलक,मजीरा,करताल,चिकारा,सारंगी, और सांगीत की शान नकारा ब्रज के ग्र ग्रामीण क्षेत्र में बहुत लोक प्रिय हैं। मोरध्वज,नरसी, हरिश्चंद्र, जैसे पौराणिक कथानक,तो अमरसिंह राठौर, शिवाजी, जैसे ऐतिहासिक एवं सामाजिक कथानकों के साथ देश भक्ति, स्थानीय चरित्रों ,हीर रांझा, जैसे प्रेमाख्यान भी विषय के रूप में समाहित रहते है।
नक्कारे का स्वर दूरस्थ ग्रामीणों को बुलावा भेजता दीखता है ।पारंपरिक बंदो में बंधा गायन दोहा ,, दुबौला ,चौबोला, बहरा तबील,चौकड़ी , लवानी,लंगड़ी लावनी ,सोरठा, ग़ज़ल ,शेर,आल्हा आदि का प्रयोग गायन में होता है।रंग विरंग परिधानों में सजे कलाकार अपनी अलग बानगी प्रस्तुत करते है।
वर्तमान में सोशल मीडिया ने इन कलाओं को नष्ट प्राय कर दिया है। अब कोई इनमें रुचि नहीं लेता। आयोजक भी कम हो गए है। ब्रज के स्वांग विधा के प्रमुख कलाकार दीप चंद,हुकम चंद,रामसिंह सिसोदिया,में सिंह,तारा चंद प्रेमी, गिरिराज जी, मनोहर जी आदि है । उस समय इन लोक नाट्य में महिलाओं का काम करना बहुत ही हिम्मत का काम माना जाता था ।ब्रज की इन विधाओं की सशक्त महिला कलाकार , कृष्णा कुमारी माथुर,आशा रानी वर्मा ,कमलेश लता आर्य,बेबी,मैना कुमारी,चांदनी जैसी कलाकार है
आज पुनः आवश्यकता है ब्रज की लोक नाट्य विद्या भगत,स्वांग को नवजीवन देने की । अपनी पारंपरिक विरासत को संजोने की संरक्षित करने की और लोक कलाकारों की आजीविका समस्या दूर करने की।जिस में ब्रज की संस्थाएं, स्थानीय नगर सेठ,प्रशासन बहुत कारगर साबित होगा।

11/07/2026

कारे बदरा ने घेरी है आय,सावन रुत आईए

ग्रीष्म की भीषण तपन से तप्त पृथ्वी जब बहुत अधिक संतप्त हो उठती है तो समस्त जनमानस के हृदय से अकुलाहट उठती है कि कब श्रावण मास आये और कब अपनी शीतल, स्निग्ध, सौंधी फुआरौ से हमें शीतल करेगा । इस सिरहन की कल्पना में डूबा मन बादल के बरसने का आमन्त्रण दे उठता है। बगिया में गढ़ा झूला और सखियाँ ,बरबस मायके की स्मृतियाँ नैनो में चित्रित करता है।

नन्ही नन्हीं बुंदिया रे ,सामन में मेरौ झूलना
एक झूला झुल्लयो मैने बाबा जी के राज मै,
बाग़ हिंडोला री गुड़िया के संग खेलना।

छोटी बालक ओर बालिकाएं बादल और रिमझिम होती बरसात को देख कर सावन को बुलाने लगते है सावन शीघ्रता से आओ
क्यों कि नीम के पेड़ पर निबौली आने लगी है।

कच्चे नीम की निबौरी सामान जल्दी आयो रे।

जल्दी आईयो रे सामान बेगूँ आइयो रे।

बाबुल दूर मत भेजे भैया नाय बुलाबैगौ ।

श्रावण का मास प्रारम्भ होते ही प्रकृति अपना रूप सँवारने लगती है। इस मास का महत्व वर्षाऋतु के आगमन और विभिन्न त्यौहारों के कारण और बढ़ जाता है । सम्पूर्ण प्रकृति हरित वस्त्र धारण कर मन को खुशहाली से भर देती है । किसानों के मन भी प्रफुल्लित हो उठते हैं। ब्रज की ललनाएं अपने पीहर जाने को आतुर हो उठती हैं सहेलियों से मिलने की इच्छा प्रबल हो उठती है।

वन के तो फूले आली फूलने,
एरी बहना बागन में फूली फुलवारी
झूला तो डारों बाग में।
ब्रज में तो शोभा आली है रही
एरी बहना हरियाली छाई चहुं ओर
झूला तौ डारो बाग में
सातों सहेली चलौ संग में एरी
बहना ले लो रेशम डोर
झूला तो डारौ बाग में

कृषक महिलाएं गरीबी में रहते हुए सावन में वर्षा से पूर्व पतियों से अपने घर के पुराने छप्पर बदलने का अनुरोध करती है।
छप्पर पुराने मेरे पिया परी गए जी
एजी कोई टूटन लागे बांस
अब घर आए जा धन के साहिबा जी।

मंदिरों में हिंडोले सजते हैं । भक्त अपने आराध्य को रिझाने के लिए मंदिरों में हिंडोले गीत गाते है
हिंडोला कुंज बन डारौ रे
झूलन आई राधिका प्यारी रे
काहे के खंभ गढ़वाए रे ,
कहे कि डारी डोरियां प्यारी रे
सोने के खंभ गढ़वाए रे
,रेशम की डारी डोरियां प्यारी रे।

सभी स्त्री-पुरुष श्रावण की मल्हारों को झूम-झूम कर गाते हैं
कोकिल कंठी महिलाओं की तो बात ही क्या ? वे प्रति दिन संध्या के समय घर के आँगन में हिंडोले ,घर बाहर नीम के वृक्ष पर झूलती हुई सखी सहेलियों के संग मल्हार गाती देखी जा सकती हैं।
एरी बहना के चल रेशम डोर,
झूला तौ डारै हरियल बाग में,
संग की सहेली हिल मिली चलो,
एरी बहना के लै आओ रेशम डोर
झूला तो डारै बाग में।
श्रावण के गीतों में विशेष रूप से दो प्रकार के गीत सुनने को मिलते हैं । एक वे जिनका सम्बन्ध भावात्मक विषय वस्तु से है। मल्हारों में ऋतु की शोभा, राधाकृष्ण अथवा भैया बहिन के स्नेह भरे गीत गाए जाते हैं। भावात्मक गीत अधिकतर अपने आप में किसी-न-किसी कथा को समेटे हुए हैं । ये कथानक लघुवृत्त भी हैं और और दीर्घवृत्त भी हैं।
लघुवृत्त वाले गीतों में पनिहारी, मनरा, विजैरानी, लहरिया, मोरा, चंदना जैसे गीत गाए जाते हैं
जैसे मोरा गीत को ही ले दुख भरा है एक महिला मोर को अत्यधिक प्रेम करती है पर पति नहीं चाहते कि उस की पत्नी उस से अतिरिक्त किसी को भी प्रेम करे। बस इतनी ईर्ष्या की मोर को मार कर उसे पकाने के लिए कहता है ।बेचारी महिला रोती रोती ये कार्य करती है उस दौर की स्त्री विवशता को ये गीत बयाँ करता है।
भर भादो की मोरा रैन अंधेरी ,
तो राजा की रानी पानी निकरी जी
काहे की गागरी मोरा कहे कि लेज़ु
,कहे जड़ाऊ धन की इन्डूरीजी
जोई जोई खींचू मोरा देय लुढ़काय,
पंख पसारे मोरा जल पिये जी
हट हट हट रे मोरा भरन दे नीर
,मो घर सास रिसाईये जी।

चंद्रावली एक ऐसी ब्रज लालना की करुण कथा है जो परिस्थिति वश मुगल या तुर्क आताताई के चुंगल में फंस जाती है और जब उसके परिवार के भी उसकी मुक्ति में सफल नहीं होते हैं तो वह अपनी उड़ती हुई चील से अपने पिता ससुर और भाई के पास संदेश भेजती हैं ।वह उसके धन हाथी घोड़ा लेकर छुड़ाने आते हैं लेकिन मुक्त करने में सफल नहीं होते हैं तब वह अपने परिवार की रक्षा को करते हुए स्वयं की भी रक्षा करती है और मुगल के गंदी नीयत को पूर्ण नहीं होने देती।

जाओ ससुर घर आपने राखूँ पगड़ी की लाज
जाओ बाबुल घर आपने राख़ू दोनों कुल की लाज
जाओ सजन घर आपने रखूँ फेरन की लाज
खानौ न खाऊं पठान कौ भूखी मर जाऊं
सेज ना सोऊं पठान की औघन मर जाऊं
मुगलाने फेरी रे पीठ चंद्रा दे लइ तम्बुआन आग
ठाड़ी तो जरै चंद्रावली जाके माई न बाप।
ऐसे गीतों में भारतीय नारी की वीरता और अपनी मर्यादा आन बान और शान के लिए मर मिटने का बड़ा ही अदभुद भाव देखने को मिलता है।
वही पति से अद्भुत प्रेम का विश्लेषण करता गीत मनरा गीत है बहुत से लोकगीत अंतर जनपदीय यात्रा कर के ब्रज भूमि में पहुंचे है। बंजारों द्वारा ये गीत एक स्थान से दूसरे क्षेत्रों तक गए और वहां की संस्कृति ने मधुरता के कारण उनको आत्मसात कर लिये ऐसा ही गीत है मनरा अर्थात चूड़ियां बेचने वाला मनिहार

गलिन गलिन मनरा फिरे,
बीबी मनरायै दीजौं बुलवाय
चूडो तो मेरी जान चूड़ों तो हाथी दांत को
हरी बंगा री रे मनरा नाय पहरू,
मनरा हरे मेरे राजा जी के बाग
धौरी बांगा री रे मनरा नाय पहरू,
धौरे मेरे राजा की के वसन

इन गीतों में ढोला मारू, भरथरी,गोपीचंद आल्हा ऊदल जैसी कथाएं भी गाई जाती है ।राम की कथा महिलाएं गाती है

मेरी बहना राम दियो वनवास, केकैंई तो बैरन है गई
जब से, दोउ सुत बन को गए ,
अरि बहना अजुध्या तो है गई उदास
केकैई तो बैरन है गई

आल्हा ऊदल संबंधी गीतों में उनके जीवन की विविध घटनाओं द्वारा दोनों वीरों के अदभुद भ्रातृ प्रेम को दर्शाया है। उनकी बहन चंद्रावली को माता समझा रही है

• अरी बेटी बैरी बसत चाहू ओर झूला तो झूलौ महल में
आल्हा और ऊदल बेटी घर नहीं,
,एरी बेटी ब्रह्मा तो भयो है कठोर
मांन कहन मेरी लाडली,
अरी बेटी दिल्ली को राजा खाय रहियो जोर।

वही ब्रज में नाथ संप्रदाय के प्रभाव को भी ये लोक गीत दर्शाते है। राजा गोपीचंद जोगी हो गए उन्होंने गुरु गोरखनाथ से दीक्षा ले ली। उनकी पत्नी उनको समझती है और आंगन में ही धुनी रमा ने की कहती है
सेज बिरानी सैयाँ मेरी मत करो जी,
एजी कोई जोग लियो तन धार
धुनी रमाय लियो घर के चौक मे जी,
राजा कोई समझाऊँ हर बार।

नरसी का भात भी मल्हार गीतों का करुणा से भरा गीत है
जन्म भिखारी सो बाबुल मेरी बाप है जी
एजी कोई कौन पे मांगू भात
भैया भतीजों कोई है नहीं जी
एरी मेरे घर केउ न पूँछे मेरी बात

वही निहाल दे भी स्त्री स्वाभिमान की रक्षा की कहानी है।बहुत प्रसिद्ध गीत है उस की धुन पर बना ये गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ ।
झूला तो पड़ गए अमुवा की डार पै जी
एजी कोई राधा कूँ गोपाल बिन राधा कु झुलावै झुला कौन
धीरज धर ले मन समझाय लै जी
एजी अब के सावन में झूलेंगे मिली संग
झूला तो पड़ गए अमुवा की डार पै जी

सावन के लगते ही बहन भाई के आने की प्रतीक्षा करती है
चंदा के ढिंग की वीरा तारई , अरे वीरा जगत उजारौ होय
सामान ऋतु आइए
कसी के तौ घोड़ा वीरा चल दिए
अरे वीरा पहुंचे बहनिया के देस
सामान ऋतु आईये।
कैसे तो वीरा मेरे अनमने,कैसे तिहारौ मैंलौ भेसु
धूपों ये बहना वीरा अनमने,गर्द उड़त मैंलौ भेसु
सामान ऋतु आईये।

पर बहन तू कैसे दुखी दिख रही है? वह भाई को बताती है सास प्रतिदिन लड़ती है। सास चुनरी के लिए लड़ती है और ननद साड़ियों के लिए भैया भतीजों को कोसती है
तब वह बहन के सम्मान हेतु कहता है
चुंदरी तो ले दऊ बहना डेढ़ सौ
एरी बहना साड़ीन की ओर न छोर ।

वही ये गीत पर्यावरण को बचाने का संदेश भी देते है पन्ना मारु इसी प्रकार का गीत है
नीमारियाँ के छोटे छोटे पात
पन्ना मारूँ किन्ने सताई हरियल नीम री जी महाराज
देवरिया ने तोड़ी वाकी डार
।पन्ना मारु ननद सताई हरियल नीम री जी महाराज।

ब्रज के सावन गीत मन की मलिनता को हरने वाले है इस लिए ही उनके मलहार अर्थात मन का मैल समाप्त करनेवाले मल्हार गीत कहे जाते है।इनके स्वर गाते समय ऊंची नीचे झोटो के समान प्रतीत होते है। इनमें दोलन की अधिकता होती है जो झूले पर झूलते समय की स्थिति को दर्शाते है। वही कजरी चैती जैसे उपशास्त्रीय गायन की तरह ब्रज में भी सुंदर सावन गीत है
कारी कमरिया कान्हा दियो न उढ़ाय
कारे बदरा ने घेरी है आय
अंग को भीजै कान्हा सलुआरा
कामर बूंद परै झर जाए ।

इस प्रकार समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं, इतिहास सावन गीतों के रूप में हमारे मध्य बिखरी हुई है आज आवश्यकता है उनको संजोने और संरक्षित करने की।आओ सब मिल कर बचाए अपनी विरासत।

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