24/04/2026
बीजिंग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के दीक्षांत समारोह में एक ऐसी घटना हुई, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा और 'शिक्षक' शब्द की परिभाषा को नए मायने दिए।
वाकया क्या था?
एक छात्रा स्टेज पर अपना विदाई भाषण दे रही थी। अचानक हल्की बारिश शुरू हो गई। तभी पास में बैठे एक प्रोफेसर अपनी कुर्सी से उठे, दौड़कर गए और उस छात्रा के सिर पर छाता तानकर खड़े हो गए। जब तक भाषण खत्म नहीं हुआ, वे बिना हिले वहीं डटे रहे।
हैरानी की बात तो ये थी कि वे कोई साधारण कर्मचारी नहीं, बल्कि विभागाध्यक्ष (HOD) और शिक्षकों के बड़े लीडर थे। उनके पास पद था, रुतबा था, लेकिन अहंकार का नामोनिशान नहीं था।
क्या हम अपने देश के विश्वविद्यालयों में ऐसी सादगी की कल्पना कर सकते हैं? अक्सर हमारे यहाँ 'अहंकार' पद के साथ मुफ्त में आता है। कई शिक्षक सोचते हैं— "मैं इतना बड़ा ऑफिसर/प्रोफेसर होकर एक छात्र के लिए छाता क्यों पकड़ूँ?"
शिक्षक सिर्फ वह नहीं जो किताबी ज्ञान दे, बल्कि वह है जो अपने आचरण से नैतिकता और उदारता सिखाए।
जहाँ यूरोप और अमेरिका में छात्र-शिक्षक संबंध दोस्ती और सम्मान पर टिके हैं, वहीं हमारे यहाँ यह महज एक व्यावसायिक रिश्ता बनता जा रहा है।
महानता डिग्री में नहीं, बल्कि आपके हृदय की विशालता में होती है।
आपका इस बारे में क्या सोचना है? क्या भारत में भी ऐसे गुरुओं की मिसालें मौजूद हैं? कमेंट में बताएं। 👇