24/05/2026
गरीबी की मार इंसान को भीतर तक तोड़ देती है, लेकिन जब बात एक माँ की हो, तो वही गरीबी उसे एक ऐसे सांचे में ढाल देती है जहाँ भावनाएं पत्थर बन जाती हैं और ममता सिर्फ जिंदा रहने की जद्दोजहद। सुमित्रा की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। रामनगर की एक तंग और बदबूदार गली के आखिरी कोने में उसकी एक छोटी सी झोपड़ी थी, जिसकी छत हर बरसात में रोती थी और दीवारें ठंड में कांपती थीं। सुमित्रा के पति की मौत एक सड़क हादसे में तब हो गई थी जब उसका बेटा, गोलू, सिर्फ तीन साल का था। उस दिन के बाद से सुमित्रा की जिंदगी का एक ही मकसद था—गोलू को पालना और उसे इस दलदल से बाहर निकालना।
शुरुआती दिनों में सुमित्रा के भीतर एक आम माँ जैसी कोमलता थी। वह गोलू को गोद में लेकर लोरियां गाती थी, उसके गालों को चूमती थी और छोटी-मोटी ख्वाहिशें पूरी करने की कोशिश करती थी। लेकिन वक्त बीतने के साथ गरीबी ने अपना असली रूप दिखाना शुरू कर दिया। राशन की दुकान के चक्कर, मकान मालिक की गालियां और कर्जदारों के ताने ने सुमित्रा के भीतर की कोमल महिला को धीरे-धीरे मारना शुरू कर दिया। पेट की भूख जब चौखट पर आकर चिल्लाती है, तो इंसान के पास रोने का वक्त भी नहीं बचता। गरीबी ने सुमित्रा को एक मशीन बना दिया था, जो सुबह चार बजे उठती और रात के बारह बजे तक बिना रुके चलती रहती थी।
वह सुबह उठकर सबसे पहले चार घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन साफ करने जाती। वहाँ से जो रूखा-सूखा मिलता, उसे लेकर वह सीधे एक कंस्ट्रक्शन साइट पर पहुँचती, जहाँ दोपहर की कड़कती धूप में उसे अपने सिर पर सीमेंट और ईंटों के तसले ढोने होते थे। धूप से उसकी चमड़ी झुलस चुकी थी, चेहरे की झुर्रियां वक्त से बीस साल पहले ही उभर आई थीं और जिन हाथों से वह कभी गोलू को सहलाती थी, वे अब ईंटें उठा-उठाकर इतने सख्त हो चुके थे कि जैसे कोई पत्थर हों। गरीबी ने उसकी कोमलता छीनकर उसे एक 'मजदूर' बना दिया था।
एक दिन की बात है, गोलू स्कूल से लौटा तो उसे तेज बुखार था। वह झोपड़ी के कोने में फटे कंबल में लिपटा कांप रहा था। सुमित्रा जब शाम को काम से लौटी, तो उसने गोलू के माथे पर हाथ रखा। उसका बदन तवे की तरह जल रहा था। गोलू ने रोते हुए कहा, "माँ, बहुत दर्द हो रहा है, मुझे डॉक्टर के पास ले चलो।" सुमित्रा की जेब में उस वक्त सिर्फ बीस रुपये थे। डॉक्टर की फीस और दवाई के लिए कम से कम दो सौ रुपयों की जरूरत थी। सुमित्रा ने उस वक्त रोने या अपनी किस्मत को कोसने में एक सेकंड भी बर्बाद नहीं किया। गरीबी ने उसे इतना व्यावहारिक और सख्त बना दिया था कि उसकी आँखों के आँसू भी जैसे सूख चुके थे।
वह तुरंत ठेकेदार के घर भागी और घुटने टेककर अडवांस पैसे मांगने लगी। ठेकेदार ने मना कर दिया और उसे भगा दिया। सुमित्रा हारी नहीं, वह उस रईस के घर गई जहाँ वह बर्तन मांजती थी। मालकिन ने पैसे देने के बदले में शर्त रखी कि उसे अगले एक महीने तक बिना एक भी छुट्टी किए, दुगना काम करना होगा। सुमित्रा ने बिना सोचे-समझे हाँ कह दिया। उसने स्वाभिमान, थकान और अपनी बीमारी को एक तरफ रख दिया। गरीबी ने उसके आत्मसम्मान को कुचलकर उसे सिर्फ एक 'याचक' बना दिया था, जो अपने बच्चे की जान के लिए किसी के भी सामने हाथ फैला सकती थी।
पैसा लेकर वह डॉक्टर के पास गई और दवाइयाँ खरीदीं। रात को जब वह गोलू को दवा खिला रही थी, तो गोलू ने उसका हाथ पकड़ लिया। गोलू ने देखा कि माँ की उंगलियों से खून बह रहा था, शायद कंस्ट्रक्शन साइट पर कोई नुकीली ईंट लग गई थी। गोलू की आँखों में आँसू आ गए, उसने कहा, "माँ, तुम्हें दर्द नहीं होता क्या? तुम कभी रोती क्यों नहीं हो?" सुमित्रा ने एक सूखी मुस्कान के साथ उसका सिर सहलाया। वह गोलू को कैसे बताती कि गरीबी ने उसके आंसुओं की कीमत इतनी सस्ती कर दी थी कि अब रोने से उसका पेट नहीं भरता था। गरीबी ने उसे एक ऐसी 'चट्टान' बना दिया था, जिस पर दुखों की कितनी भी बौछार हो, वह टूटती नहीं थी।
वक्त गुजरता गया और गोलू बड़ा होने लगा। वह देखता था कि उसकी माँ कभी त्योहारों पर नए कपड़े नहीं पहनती थी, कभी अच्छी साड़ी की मांग नहीं करती थी और खाने के नाम पर हमेशा वही बचा-कुचा खाती थी जो अमीर घरों से मिलता था। कई बार तो सुमित्रा सिर्फ पानी पीकर सो जाती थी और गोलू से कहती थी कि उसका पेट खराब है। गरीबी ने माँ को एक 'झूठा' भी बना दिया था—एक ऐसा झूठा जो हर रोज अपने बच्चे के सामने मुस्कुराकर कहता था, "मैं ठीक हूँ, मुझे भूख नहीं है।" यह झूठ दुनिया के हर सच से ज्यादा पवित्र था।
गरीबी ने सुमित्रा से उसकी हंसी छीन ली, उसकी जवानी छीन ली, उसकी ख्वाहिशें छीन लीं और उसकी कोमलता छीन ली। उसने सुमित्रा को एक सख्त, बेजान और दिन-रात काम करने वाली कटपुतली जैसा बना दिया, जिसके चेहरे पर कभी कोई शिकन या डर नहीं दिखता था। लेकिन इस सब के बावजूद, गरीबी एक चीज को कभी नहीं छू सकी—और वह थी सुमित्रा के भीतर की 'ममता'। गरीबी ने माँ को बाहर से भले ही एक पत्थर की मूरत बना दिया हो, लेकिन उस पत्थर के भीतर जो दिल धड़कता था, वह विशुद्ध सोने का था। माँ ने गरीबी के सामने घुटने नहीं टेके, बल्कि अपनी ममता की ढाल बनाकर गरीबी को हर रोज हराया।