Kavya Chaupal

Kavya Chaupal Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Kavya Chaupal, Arts and entertainment, Lucknow.
(3)

✨ काव्य चौपाल ✨
🎙️ कविता | 🎶 गीत | 💫 ग़ज़ल | 😄 मनोरंजन
📚 यहाँ मिलेगी साहित्य की मिठास और 🎼 संगीत का रंग

👉 कला और मनोरंजन का अनोखा संगम 🎉

Join Us On Our Watsapp Channel👇

https://whatsapp.com/channel/0029VaAnCTEAu3aZ1W1us02H

भावपूर्ण श्रद्धांजलि : 24 मई, 2000 ई०-----------------------हमारे बाद   अब   महफ़िल में  अफ़्साने बयाँ होंगेबहारें   हम ...
24/05/2026

भावपूर्ण श्रद्धांजलि : 24 मई, 2000 ई०
-----------------------

हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे

इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम गाएगी दुनिया
मोहब्बत फिर हसीं होगी नज़ारे फिर जवाँ होंगे

न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी
हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे

-- मजरूह सुल्तानपुरी
---------

.             भावपूर्ण श्रद्धांजलि : 24 मई, 2000 ई०                                --------------जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आर...
24/05/2026

. भावपूर्ण श्रद्धांजलि : 24 मई, 2000 ई०
--------------

जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया
सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया

रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन
धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र-ए-हर-ख़ास-ओ-आम
यूँ तो जो आया वही पीर - ए - मुग़ाँ बनता गया

जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला-पायान-ए-शौक़
ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया

शरह-ए-ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर
लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया

दहर में 'मजरूह' कोई जावेदाँ मज़मूँ कहाँ
मैं जिसे छूता गया वो जावेदाँ बनता गया

-- मजरूह सुल्तानपुरी
---------

#काव्य_चौपाल #काव्यचौपाल

रास्ते  में   मौसमों  का   हर  हुनर  अच्छा लगा;आप मेरे साथ जब तक थे, सफ़र अच्छा लगा।          मैं ग़ज़लग़ो तो नहीं  लेकि...
24/05/2026

रास्ते में मौसमों का हर हुनर अच्छा लगा;
आप मेरे साथ जब तक थे, सफ़र अच्छा लगा।

मैं ग़ज़लग़ो तो नहीं लेकिन किसी भी शेर ने;
आसमां में फड़फड़ाए जब भी पर,अच्छा लगा।

रोज़ इक सूना सफ़र कमरों से बाहर गेट तक;
छुट्टियों में आ गये बच्चे तो घर अच्छा लगा।

देख कर दिल्ली में वो संसद भवन कहने लगे;
ये अक़ीदों का नया नीलामघर अच्छा लगा।

आपने आकाश से नज़रें मिला कर बात की;
आपका अभिमान हमको मित्रवर अच्छा लगा।

-- रामबाबू रस्तोगी
----------

#काव्य_चौपाल #काव्यचौपाल

धर गए मेंहदी रचे दो हाथ जल में दीपजन्म-जन्मों ताल-सा हिलता रहा मनबाँचते हम रह गएअंतर्कथास्वर्णकेशा गीत वधुओंकी व्यथाले ग...
24/05/2026

धर गए मेंहदी रचे दो हाथ जल में दीप
जन्म-जन्मों ताल-सा हिलता रहा मन

बाँचते हम रह गए
अंतर्कथा
स्वर्णकेशा गीत वधुओं
की व्यथा

ले गया चुनकर कमल कोई हठी युवराज
देर तक शैवाल-सा हिलता रहा मन।

जंगलों का दुख
तटों की त्रासदी
भूल सुख से सो गई
कोई नदी

थक गई लड़ती हवाओं से अभागी नाव
और झीने पाल-सा हिलता रहा मन।

तुम गए क्या जग हुआ
अंधा कुँआ
रेल छूटी रह गया
केवल धुँआ

गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात
हाथ के रूमाल-सा हिलता रहा मन।

-- किशन सरोज
--------

#काव्य_चौपाल #काव्यचौपाल

जन्मदिन विशेष : 24 मई 1951 ई०-------------------मन तो   मेरा भी   करता है झूमूँ ,  नाचूँ, गाऊँ मैंआजादी की  स्वर्ण-जयंती...
24/05/2026

जन्मदिन विशेष : 24 मई 1951 ई०
-------------------

मन तो मेरा भी करता है झूमूँ , नाचूँ, गाऊँ मैं
आजादी की स्वर्ण-जयंती वाले गीत सुनाऊँ मैं
लेकिन सरगम वाला वातावरण कहाँ से लाऊँ मैं
मेघ-मल्हारों वाला अन्तयकरण कहाँ से लाऊँ मैं
मैं दामन में दर्द तुम्हारे, अपने लेकर बैठा हूँ
आजादी के टूटे-फूटे सपने लेकर बैठा हूँ।

घाव जिन्होंने भारत माता को गहरे दे रक्खे हैं
उन लोगों को जैड सुरक्षा के पहरे दे रक्खे हैं
जो भारत को बरबादी की हद तक लाने वाले हैं
वे ही स्वर्ण-जयंती का पैगाम सुनाने वाले हैं

आज़ादी लाने वालों का तिरस्कार तड़पाता है
बलिदानी-गाथा पर थूका, बार-बार तड़पाता है
क्रांतिकारियों की बलिवेदी जिससे गौरव पाती है
आज़ादी में उस शेखर को भी गाली दी जाती है
राजमहल के अन्दर ऐरे- गैरे तनकर बैठे हैं
बुद्धिमान सब गाँधी जी के बन्दर बनकर बैठे हैं

मै दिनकर की परम्परा का चारण हूँ
भूषण की शैली का नया उदहारण हूँ
इसीलिए मैं अभिनंदन के गीत नहीं गा सकता हूँ ।
मैं पीड़ा की चीखों में संगीत नहीं ला सकता हूँ ।।

इससे बढ़कर और शर्म की बात नहीं हो सकती थी
आजादी के परवानों पर घात नहीं हो सकती थी
कोई बलिदानी शेखर को आतंकी कह जाता है
पत्थर पर से नाम हटाकर कुर्सी पर रह जाता है
गाली की भी कोई सीमा है कोई मर्यादा है
ये घटना तो देश-द्रोह की परिभाषा से ज्यादा है

सारे वतन-पुरोधा चुप हैं कोई कहीं नहीं बोला
लेकिन कोई ये ना समझे कोई खून नहीं खौला
मेरी आँखों में पानी है सीने में चिंगारी है
राजनीति ने कुर्बानी के दिल पर ठोकर मारी है
सुनकर बलिदानी बेटों का धीरज डोल गया होगा
मंगल पांडे फिर शोणित की भाषा बोल गया होगा

सुनकर हिंद - महासागर की लहरें तड़प गई होंगी
शायद बिस्मिल की गजलों की बहरें तड़प गई होंगी
नीलगगन में कोई पुच्छल तारा टूट गया होगा
अशफाकउल्ला की आँखों में लावा फूट गया होगा
मातृभूमि पर मिटने वाला टोला भी रोया होगा
इन्कलाब का गीत बसंती चोला भी रोया होगा

चुपके-चुपके रोया होगा संगम - तीरथ का पानी
आँसू - आँसू रोयी होगी धरती की चूनर धानी
एक समंदर रोयी होगी भगतसिंह की कुर्बानी
क्या ये ही सुनने की खातिर फाँसी झूले सेनानी
जहाँ मरे आजाद पार्क के पत्ते खड़क गये होंगे
कहीं स्वर्ग में शेखर जी के बाजू फड़क गये होंगे
शायद पल दो पल को उनकी निद्रा भाग गयी होगी
फिर पिस्तौल उठा लेने की इच्छा जाग गयी होगी

केवल सिंहासन का भाट नहीं हूँ मैं
विरुदावलियाँ वाली हाट नहीं हूँ मैं
मैं सूरज का बेटा तम के गीत नहीं गा सकता हूँ ।
मैं पीड़ा की चीखों में संगीत नहीं ला सकता हूँ ।।

शेखर महायज्ञ का नायक गौरव भारत भू का है
जिसका भारत की जनता से रिश्ता आज लहू का है
जिसके जीवन के दर्शन ने हिम्मत को परिभाषा दी
जिसने पिस्टल की गोली से इन्कलाब को भाषा दी
जिसकी यशगाथा भारत के घर-घर में नभचुम्बी है
जिसकी बेहद अल्प आयु भी कई युगों से लम्बी है

जिसके कारण त्याग अलौकिक माता के आँगन में था
जो इकलौता बेटा होकर आजादी के रण में था
जिसको ख़ूनी मेहंदी से भी देह रचना आता था
आजादी का योद्धा केवल चना-चबेना खाता था
अब तो नेता सड़कें, पर्वत, शहरों को खा जाते हैं
पुल के शिलान्यास के बदले नहरों को खा जाते हैं

जब तक भारत की नदियों में कल-कल बहता पानी है
क्रांति ज्वाल के इतिहासों में शेखर अमर कहानी है
आजादी के कारण जोन गोरों से बहुत लड़ी है जी
शेखर की पिस्तौल किसी तीरथ से बहुत बड़ी है जी
स्वर्ण जयंती वाला जो ये मंदिर खड़ा हुआ होगा
शेखर इसकी बुनियादों के नीचे गड़ा हुआ होगा

मैं साहित्य नहीं चोटों का चित्रण हूँ
आजादी के अवमूल्यन का वर्णन हूँ
मैं दर्पण हूँ दागी चेहरों को कैसे भा सकता हूँ।
मैं पीड़ा की चीखों में संगीत नहीं ला सकता हूँ।।

जो भारत-माता की जय के नारे गाने वाले हैं
राष्ट्रवाद की गरिमा, गौरव-ज्ञान सिखाने वाले हैं
जो नैतिकता के अवमूल्यन का ग़म करते रहते हैं
देश-धर्म की रक्षा करने का दम भरते रहते हैं
जो छोटी-छोटी बातों पर संसद में अड़ जाते हैं
और रामजी के मंदिर पर सड़कों पर लड़ जाते हैं

स्वर्ण-जयंती रथ लेकर जो साठ दिनों तक घूमे थे
आजादी की यादों के पत्थर पूजे थे, चूमे थे
इस घटना पर चुप बैठे थे सब के मुहँ पर ताले थे
तब गठबंधन तोड़ा होता जो वे हिम्मत वाले थे
सच्चाई के संकल्पों की कलम सदा ही बोलेगी
समय-तुला तो वर्तमान के अपराधों को तोलेगी

वरना तुम साहस करके दो टूक डांट भी सकते थे
जो शहीदों पर थूक गई वो जीभ काट भी सकते थे
जलियांवाले बाग़ में जो निर्दोषों का हत्यारा था
ऊधमसिंह ने उस डायर को लन्दन जाकर मारा था
जो अतीत को तिरस्कार के चांटे देती आयी है
वर्तमान को जातिवाद के काँ टे देती आयी है

जो भारत में पेरियार को पैगम्बर दर्शाती है
वातावरण विषैला करके मन ही मन हर्षाती है
जिसने चित्रकूट नगरी का नाम बदल कर डाल दिया
तुलसी की रामायण का सम्मान कुचल कर डाल दिया
जो कल तिलक, गोखले को गद्दार बताने वाली है
खुद को ही आजादी का हक़दार बताने वाली है

उससे गठबंधन जारी है ये कैसी लाचारी है
शायद कुर्सी और शहीदों में अब कुर्सी प्यारी है
जो सीने पर गोली खाने को आगे बढ़ जाते थे
भारत माता की जय कहकर फाँसी पर चढ़ जाते थे
जिन बेटों ने धरती माता पर कुर्बानी दे डाली
आजादी के हवन-कुंड के लिये जवानी दे डाली

दूर गगन के तारे उनके नाम दिखाई देते हैं
उनके स्मारक भी चारों धाम दिखाई देते हैं
वे देवों की लोकसभा के अंग बने बैठे होंगे
वे सतरंगे इंद्रधनुष के रंग बने बैठे होंगे
उन बेटों की याद भुलाने की नादानी करते हो
इंद्रधनुष के रंग चुराने की नादानी करते हो

जिनके कारण ये भारत आजाद दिखाई देता है
अमर तिरंगा उन बेटों की याद दिखाई देता है
उनका नाम जुबाँ पर लेकर पलकों को झपका लेना
उनकी यादों के पत्थर पर दो आँसू टपका देना

जो धरती में मस्तक बोकर चले गये
दाग़ गुलामी वाला धोकर चले गये
मैं उनकी पूजा की खातिर जीवन भर गा सकता हूँ ।
मैं पीड़ा की चीखों में संगीत नहीं ला सकता हूँ ।।

-- डॉ० हरिओम पँवार
-----------

#काव्य_चौपाल #काव्यचौपाल

जन्मदिन विशेष : 24 मई, 1951 ई०-------------------इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगेकोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन काकोई...
24/05/2026

जन्मदिन विशेष : 24 मई, 1951 ई०
-------------------

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

गाँधी के सपनों का सारा भारत टूटे लेता है
यहाँ चमन का माली खुद ही कलियाँ लुटे लेता है
निंदिया के आँचल में जब ये सारा जग सोता होगा
राजघाट में चुपके -चुपके तब गाँधी रोता होगा

हर चौराहे से आवाजें आती हैं संत्रासों की
पूरा देश नजर आता है मंडी ताज़ा लाशों की
सिंहासन को चला रहे हैं नैतिकता के नारों से
मदिरा की बदबू आती है संसद की दीवारों से

जन-गण-मन ये पूछ रहा है दिल्ली की दीवारों से
कब तक हम गोली खायें सरकारी पहरेदारों से
सिंहासन खुद ही शामिल है अब तो गुंडागर्दी में
संविधान के हत्यारे हैं अब सरकारी वर्दी में

जब तक लाशें पड़ी रहेंगी फुटपाथों की सर्दी में
तब तक हम अपनी कविता के अंगारे दहकायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई भी निष्पक्ष नहीं है सब सत्ता के पण्डे हैं
आज पुलिस के हाथों में भी अत्याचारी डंडे हैं
संसद के सीने पर ख़ूनी दाग दिखाई देता है
पूरा भारत जलियांवाला बाग़ दिखाई देता है

इस आलम पर मौन लेखनी दिल को बहुत जलाती है
क्यों कवियों की खुद्दारी भी सत्ता से डर जाती है
उस कवि का मर जाना ही अच्छा है जो खुद्दार नहीं
देश जले कवि कुछ न बोले क्या वो कवि गद्दार नहीं

कलमकार का फर्ज रहा है अंधियारों से लड़ने का
राजभवन के राजमुकुट के आगे तनकर अड़ने का
लेकिन कलम लुटेरों को अब कहती है गाँधीवादी
और डाकुओं को सत्ता ने दी है ऐसी आजादी

राजमुकुट पहने बैठे हैं बर्बरता के अपराधी
हम ऐसे ताजों को अपनी ठोकर से ठुकरायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

बुद्धिजीवियों को ये भाषा अखबारी लग सकती है
मेरी शैली काव्य-शास्त्र की हत्यारी लग सकती है
पर जब संसद गूंगी शासन बहरा होने लगता है
और कलम की आजादी पर पहरा होने लगता है

तो अंतर आ ही जाता है शब्दों की परिभाषा में
कवि को चिल्लाना पड़ता है अंगारों की भाषा में
जब छालों की पीड़ा गाने की मजबूरी होती है
तो कविता में कला-व्यंजना ग़ैर जरुरी होती है

झोपड़ियों की चीखों का क्या कहीं आचरण होता है
मासूमो के आँसू का क्या कहीं व्याकरण होता है
वे उनके दिल के छालों की पीड़ा और बढ़ाते हैं
जो भूखे पेटों को भाषा का व्याकरण पढ़ाते हैं

जिन शब्दों की अय्याशी को पंडित गीत बताते हैं
हम ऐसे गीतों की भाषा कभी नहीं अपनाएंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

जब पूरा जीवन पीड़ा के दामन में ढल जाता है
तो सारा व्याकरण पेट की अगनी में जल जाता है
जिस दिन भूख बगावत वाली सीमा पर आ जाती है
उस दिन भूखी जनता सिंहासन को भी खा जाती है

मेरी पीढ़ी वालो जागो तरुणाई नीलाम न हो
इतिहासों के शिलालेख पर कल यौवन बदनाम न हो
अपने लोहू में नाखून डुबोने को तैयार रहो
अपने सीने पर कातिल लिखवाने को तैयार रहो

हम गाँधी की राहों से हटते हैं तो हट जाने दो
अब दो-चार भ्रष्ट नेता कटते हैं तो कट जाने दो
हम समझौतों की चादर को और नहीं अब ओढेंगे
जो माँ के आँचल को फाड़े हम वो बाजू तोड़ेंगे

अपने घर में कोई भी जयचंद नहीं अब छोड़ेंगे
हम गद्दारों को चुनकर दीवारों में चिन्वायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे।

-- डॉ० हरिओम पँवार
---------

#काव्य_चौपाल #काव्यचौपाल

वो पास क्या  ज़रा सा  मुस्कुरा के  बैठ गयामैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया     जब उस की बज़्म में दार-ओ-रसन की बात...
23/05/2026

वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया
मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया

जब उस की बज़्म में दार-ओ-रसन की बात चली
मैं झट से उठ गया और आगे आ के बैठ गया

दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा
तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया

तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर
ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया

जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था
वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया

फिर उस के बा'द कई लोग उठ के जाने लगे
मैं उठ के जाने का नुस्ख़ा बता के बैठ गया

-- ज़ुबेर अली ताबिश
-----------

#काव्य_चौपाल #काव्यचौपाल

परिंदे   सहमे - सहमे   उड़ रहे हैंबराबर   में    फ़रिश्ते   उड़ रहे हैं        ख़ुशी से कब ये तिनके उड़ रहे हैं        ह...
23/05/2026

परिंदे सहमे - सहमे उड़ रहे हैं
बराबर में फ़रिश्ते उड़ रहे हैं

ख़ुशी से कब ये तिनके उड़ रहे हैं
हवा के डर के मारे उड़ रहे हैं

कहीं कोई कमाँ ताने हुए है
कबूतर आड़े - तिरछे उड़ रहे हैं

तुम्हारा ख़त हवा में उड़ रहा है
तआ'क़ुब में लिफ़ाफ़े उड़ रहे हैं

बहुत कहती रही आँधी से चिड़िया
कि पहली बार बच्चे उड़ रहे हैं

शजर के सब्ज़ पत्तों की हवा से
फ़ज़ा में ख़ुश्क पत्ते उड़ रहे हैं

-- फ़हमी बदायूनी
--------

#काव्य_चौपाल #काव्यचौपाल

सफर तबील था,कितने ही इम्तहान मिले।  सुलगती रेत पे दरिया के भी निशान मिले।  अभी चट्टान  के  सीने में  ख़्वाब  ज़िंदा है,  ब...
23/05/2026

सफर तबील था,कितने ही इम्तहान मिले।
सुलगती रेत पे दरिया के भी निशान मिले।
अभी चट्टान के सीने में ख़्वाब ज़िंदा है,
बस इंतज़ार है पत्थर को भी ज़ुबान मिले।

-- कृष्ण कुमार 'बेदिल'
----------

#काव्य_चौपाल #काव्यचौपाल

जब न सूरज  से  डरे  फिर  ये   सितारा  क्या है,हम भँवर वालों  की  नज़रों में  किनारा  क्या है।हमको एहसास की बस्ती से भी ब...
23/05/2026

जब न सूरज से डरे फिर ये सितारा क्या है,
हम भँवर वालों की नज़रों में किनारा क्या है।

हमको एहसास की बस्ती से भी बे-दख़्ल किया,
सब तुम्हारा है तो दुनिया में हमारा क्या है।

प्यास दरिया से बुझेगी किसी सागर से नहीं,
इसके पानी से अधिक और भी खारा क्या है।

इश्क में सोच सकें, वक़्त कहाँ मिलता है,
इश्क वालों के लिए ज़ह्र क्या पारा क्या है।

जीत अपने लिए रस्ते भी बना लेती है,
आदमी इश्क में ख़ुद के सिवा हारा क्या है।

-- रामबाबू रस्तोगी
---------

#काव्य_चौपाल #साहित्यिक_संध्या #काव्यचौपाल

23/05/2026

नयी नस्लें बग़ावत जानती हैं 🔥
अक्स समस्तीपुरी ने सिस्टम को हिला दिया इस नज़्म से, हर युवा की आवाज़ 💪

#काव्यचौपाल #काव्य_चौपाल
Flipkart

Address

Lucknow

Website

https://whatsapp.com/channel/0029VaAnCTEAu3aZ1W1us02H

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Kavya Chaupal posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share