26/03/2026
26 साल की सुरेखा, जिसका बदन गदराया हुआ और रंग एकदम निखरा हुआ था, अपने पति के छोटे भाई यानी अपने देवर दीपक के साथ गाँव की पगडंडी पर चल रही थी। दीपक अभी कॉलेज से छुट्टियाँ बिताने घर आया था और सुरेखा को उसे बस स्टैंड तक छोड़ने जाना था क्योंकि घर के मर्द खेत पर थे।
सुरेखा ने आज लाल रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जो उसके सुडौल शरीर पर इस तरह लिपटी थी कि उसकी खूबसूरती और भी निखर कर आ रही थी। साड़ी का पल्लू हवा के झोंकों से बार-बार सरक रहा था, जिसे वह अपनी कोमल उंगलियों से सहेजने की कोशिश करती पर दीपक की नजरें वहीं ठहर जातीं।
दीपक शहर में रहकर पढ़ाई करता था, पर अपनी इस भाभी की चंचलता और उनके भरे हुए बदन की कशिश उसे हमेशा गाँव खींच लाती थी। सुरेखा भी यह बात जानती थी और वह जानबूझकर दीपक के सामने अपनी साड़ी ठीक करती या अपनी चूड़ियों को खनकाती, जिससे दीपक का मन डोलने लगता था।
रास्ते में सरसों के पीले फूलों वाले खेत लहलहा रहे थे और पक्षियों का शोर सुनाई दे रहा था, पर उन दोनों के बीच एक गहरा सन्नाटा था। सुरेखा ने शरारत से पूछा कि क्यों देवर जी, शहर की मेमसाहबों के बीच अपनी इस अनपढ़ भाभी को तो भूल ही गए होगे न?
दीपक ने एक गहरी सांस ली और सुरेखा की आँखों में देखते हुए कहा कि भाभी, शहर में चमक-धमक तो बहुत है, पर जो सुकून आपकी इन आँखों और आपकी बातों में है, वो वहाँ कहीं नहीं मिलता। सुरेखा ने अपनी पलकें झुका लीं और उसके चेहरे पर गुलाबी रंग की एक हल्की सी चमक छा गई।
अचानक पगडंडी पर एक कीचड़ वाला हिस्सा आ गया, जहाँ सुरेखा का पैर फिसलने लगा और उसने घबराहट में दीपक का हाथ कसकर पकड़ लिया। दीपक ने मौका देखकर सुरेखा की कमर में अपना हाथ डाला ताकि वह गिर न जाए, और उस पल सुरेखा का पूरा भार दीपक की बाहों में आ गया।
सुरेखा की रेशमी साड़ी की छुअन और उसके बदन की गर्माहट ने दीपक के तन-मन में एक अजीब सी लहर पैदा कर दी, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। सुरेखा ने भी खुद को दीपक से अलग करने में थोड़ी देर कर दी, जैसे वह भी उस स्पर्श का आनंद लेना चाहती हो।
दोनों की नजरें एक-दूसरे से मिलीं और उस पल में बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह दिया गया, जैसे उन खेतों के बीच एक नया रिश्ता जन्म ले रहा हो। सुरेखा ने धीरे से दीपक की पकड़ से खुद को आजाद किया, पर उसकी मुस्कुराहट बता रही थी कि उसे यह सब बुरा नहीं लगा।
धूप अब तेज होने लगी थी और सुरेखा के माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं, जो उसके रूप को और भी ज्यादा आकर्षक बना रही थीं। दीपक ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और हिचकिचाते हुए सुरेखा की ओर बढ़ाया, जिसे सुरेखा ने एक तिरछी नजर के साथ स्वीकार कर लिया।
बस स्टैंड पहुँचते-पहुँचते शाम होने लगी थी और सूरज की लालिमा पूरे आसमान पर फैल गई थी, जो उनके मन की उमंगों जैसा ही रंग लिए हुए थी। दीपक का दिल अब गाँव छोड़कर जाने को नहीं कर रहा था, क्योंकि उसे अपनी भाभी के अंदर एक ऐसी सहेली मिल गई थी जो उसे समझती थी।
सुरेखा ने दीपक को बस में बैठाते समय उसके कान के पास झुककर कहा कि जल्दी वापस आना, घर का आँगन तुम्हारे बिना सूना रहता है। दीपक ने बस की खिड़की से हाथ हिलाया और सुरेखा के गदराये बदन को तब तक देखता रहा जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गई।
घर लौटते समय सुरेखा का मन भी भारी था, वह हर उस पल को याद कर रही थी जो उसने अभी-अभी दीपक के साथ बिताया था। उसे महसूस हुआ कि रिश्तों की इस डोर में प्यार और चाहत का एक ऐसा कोना भी होता है जो सिर्फ अहसासों से भरा होता है।
गाँव की ठंडी हवा अब सुरेखा के चेहरे को सहला रही थी और उसके मन में एक अजीब सी संतुष्टि थी, जैसे उसे अपनी खूबसूरती का असली पारखी मिल गया हो। उसने अपनी साड़ी को एक बार फिर ठीक किया और अपने घर की ओर बढ़ गई, जहाँ उसका पति उसका इंतजार कर रहा था।
अगले कई दिनों तक सुरेखा के कानों में दीपक की वो बातें गूँजती रहीं, जिसने उसे फिर से जवान होने का अहसास दिला दिया था। वह अब रोज आईने के सामने खड़ी होकर खुद को निहारती और सोचती कि वाकई वह किसी का दिल जीतने की ताकत रखती है।
दीपक ने भी शहर पहुँचकर सुरेखा को फोन किया और दोनों के बीच घंटों लंबी बातें होने लगीं, जिनमें शरारत भी थी और एक अनकही प्यास भी। सुरेखा के लिए यह सब नया था, पर वह इस रोमांच को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना चुकी थी और खुश रहने लगी थी।
रिश्तों की इस गहराई में अब कोई पर्दा नहीं रहा था, बस एक-दूसरे के प्रति सम्मान और एक मीठी सी चाहत थी जो बढ़ती जा रही थी। सुरेखा ने महसूस किया कि कभी-कभी अपनों के बीच भी ऐसे रिश्ते पनपते हैं जो रूह को सुकून देते हैं और जीने की नई वजह देते हैं।
कहानी का यह सफर अब एक ऐसे मोड़ पर था जहाँ सुरेखा और दीपक एक-दूसरे के बिना अधूरे महसूस करने लगे थे, भले ही वे एक-दूसरे से दूर थे। पर वह गाँव की पगडंडी और सरसों के खेत आज भी उनकी उस पहली अनकही मुलाकात के गवाह बनकर खड़े थे।
सुरेखा की आँखों में अब एक नया सपना था और दिल में एक नई उमंग, जिसने उसे अपने रूखे-सूखे जीवन से बाहर निकाल लिया था। वह अब सिर्फ एक बहू या पत्नी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी महिला थी जिसे पता था कि उसे प्यार और ध्यान कहाँ से मिल सकता है।
समय बीतता गया और सुरेखा की खूबसूरती में एक नया निखार आता गया, जिसे देखकर उसका पति भी हैरान था पर उसे असलियत का अंदाजा नहीं था। दीपक के आने की खबर जब भी मिलती, सुरेखा का दिल फिर से उसी तरह धड़कने लगता जैसे उस दिन पगडंडी पर धड़का था।
अंत में, यह कहानी हमें बताती है कि भावनाएँ किसी भी उम्र या रिश्ते की मोहताज नहीं होतीं, वे बस बहती हैं और जहाँ जगह मिलती है, वहीं अपना घर बना लेती हैं। सुरेखा और दीपक की यह कहानी आज भी उस गाँव की हवाओं में एक मीठी याद की तरह जिंदा है।