23/07/2025
वो गहनों, कपड़ों के संग, दो चार किताबें लाई थी,
भूल गई है बक्सों में रख, कहीं किसी तहखाने में।
उसको इतना वक्त कहां था, अपने सपने देखे वो,
उसने खुद के ख्वाब जलाए, चूल्हे रोज जलाने में।
समझौता कर लेती वो भी, बातें झूठी होती तो,
उसकी जंग रही है केवल , सच को सच मनवाने में।
साथ बैठते कभी अगर तुम, तो तुमने देखा होता
उसका हाथ जला था उस दिन, खाना गर्म खिलाने में।
खुल कर लड़ लेती वो भी, दुश्मन बाहर के होते तो,
उसकी सारी शक्ति लगी है, अपनों को समझाने में।
मिलते अवसर उसे अगर भूगोल बदल सकती थी वो,
जिसकी सारी उम्र चली गई रोटी गोल बनाने में।
मृत्यु से लड़ नियति-पत्र पर, लिखती जो नित नवजीवन,
उसको कितना वक्त लगा है, खुद को लिखने गाने मे।
: Swarika Kirti ✍️