Daksh Talent Hunt

Daksh Talent Hunt इस पेज का मुख्य उद्देश्य उभरते स्थानीय उत्तराखंडी कलाकारों को डिजिटल मंच प्रदान करना है

देवभूमि उत्तराखंड के प्रसिद्ध गीतकार जन कवि स्वर्गीय गिरीश चन्द्र जी 'गिर्दा' की पुण्यतिथि पर शत-शत नमन
22/08/2026

देवभूमि उत्तराखंड के प्रसिद्ध गीतकार जन कवि स्वर्गीय गिरीश चन्द्र जी 'गिर्दा' की पुण्यतिथि पर शत-शत नमन

आप सभी को देवभूमि उत्तराखंड के लोकपर्व  #सातू_आठू की हार्दिक शुभकामनाएं सातू-आठू: उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, आस्था और पार...
20/08/2026

आप सभी को देवभूमि उत्तराखंड के लोकपर्व #सातू_आठू की हार्दिक शुभकामनाएं

सातू-आठू: उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, आस्था और पारिवारिक रिश्तों का अनूठा पर्व
उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल की समृद्ध लोकसंस्कृति में सातू-आठू, जिसे कई स्थानों पर सातूं-आठूं, गौरा-महेश या गमरा पर्व भी कहा जाता है, एक अत्यंत महत्वपूर्ण पारंपरिक लोकपर्व है। यह पर्व विशेष रूप से कुमाऊँ के पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर, अल्मोड़ा तथा नेपाल सीमा से लगे क्षेत्रों में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

🌿 बिरुड़ पंचमी से होती है शुरुआत
सातू-आठू पर्व की शुरुआत भाद्रपद शुक्ल पंचमी, जिसे बिरुड़ पंचमी कहा जाता है, से मानी जाती है। इस दिन परंपरागत रूप से विभिन्न प्रकार के अनाजों को भिगोया जाता है। स्थानीय परंपराओं में मक्का, गेहूं, गहत, चना, मटर आदि सप्तधान्य का प्रयोग मिलता है। इन अंकुरित अनाजों को शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

गौरा और महेश की पूजा
इस पर्व का मुख्य धार्मिक केंद्र भगवान शिव और माता पार्वती हैं। लोकमान्यता में माता पार्वती को गौरा और भगवान शिव को महेश कहा जाता है। सप्तमी और अष्टमी के अवसर पर गौरा-महेश की प्रतिमाएं तैयार कर उनका विधि-विधान से पूजन और श्रृंगार किया जाता है। कई क्षेत्रों में प्रतिमाएं स्थानीय घास और अनाज की बालियों से बनाई जाती हैं।

इस पर्व की सबसे सुंदर विशेषताओं में से एक यह है कि यहां शिव-पार्वती को केवल देवी-देवता के रूप में ही नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्तों के माध्यम से भी आत्मीयता से पूजा जाता है। कई कुमाऊँनी परंपराओं में गौरा को दीदी और महेश को जीजा के रूप में संबोधित करने की परंपरा मिलती है। लोककथा के अनुसार गौरा के मायके आने और महेश के उन्हें वापस ले जाने की भावनात्मक कथा इस पर्व से जुड़ी हुई है।

लोकगीत और लोकनृत्य
सातू-आठू केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं है, बल्कि यह कुमाऊँ की लोककला और सामुदायिक जीवन का उत्सव भी है। इस दौरान महिलाएं और पुरुष पारंपरिक लोकगीत गाते हैं तथा झोड़ा, चांचरी, न्योली, चैफला और मंडाण जैसे लोकनृत्य एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। गीतों में शिव-पार्वती की कथा के साथ रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक आख्यानों का भी वर्णन किया जाता है।

महिलाओं की विशेष भूमिका
इस पर्व में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है। वे गौरा-महेश की पूजा, प्रतिमाओं के श्रृंगार, पारंपरिक गीतों और धार्मिक अनुष्ठानों में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं। पर्व परिवार, रिश्तों, दांपत्य प्रेम और मायके-ससुराल के भावनात्मक संबंधों को भी अभिव्यक्त करता है।

प्रकृति और कृषि से संबंध
उत्तराखंड के पर्वतीय समाज का जीवन सदियों से प्रकृति और कृषि पर निर्भर रहा है। इसलिए सातू-आठू में अनाज, घास, दूब, फूल और प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग इस पर्व को प्रकृति से भी जोड़ता है। इस दृष्टि से यह पर्व केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि पर्वतीय जीवन और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का प्रतीक भी है।

लोकसंस्कृति को जीवित रखने वाला पर्व
आधुनिक समय में जब जीवनशैली तेजी से बदल रही है, सातू-आठू जैसे लोकपर्व उत्तराखंड की पारंपरिक पहचान को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके माध्यम से नई पीढ़ी को कुमाऊँनी लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक रीति-रिवाज, स्थानीय भाषा और सामुदायिक जीवन से जुड़ने का अवसर मिलता है।
सातू-आठू वास्तव में आस्था, प्रेम, प्रकृति, परिवार और लोकसंस्कृति का ऐसा संगम है, जिसमें देवभूमि उत्तराखंड की सदियों पुरानी सांस्कृतिक आत्मा दिखाई देती है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों, अपनी परंपराओं और अपने सामूहिक जीवन-मूल्यों को संजोकर रखने का संदेश देता है।

नोट :- यदि इस लेख में किसी तरह की जानकारी गलत पाई जाती है तो आपसे अनुरोध है कि कमेंट बॉक्स में उसे सुधारने का प्रयास करें।

निवेदन - यदि आपको यह पोस्ट पसंद आई हो तो इसको शेयर करें।

10/08/2026

चमोली जिले में नीति मलारी मार्ग पर तमक नाले के पास अचानक बादल फटने के बाद मची अफरा तफरी, कई गांव का संपर्क टूटा। राहत बचाव के कार्य जारी।
हे बद्री विशाल रक्षा करना।

चंडिका घाट मंदिर, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।
10/08/2026

चंडिका घाट मंदिर, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।

08/08/2026

देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा निवासी, युवा इनोवेटर श्री रवि टम्टा जी को 'HAPIDA SKYNEX' ड्रोन प्रोटोटाइप के सफल उड़ान परीक्षण पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
साथ ही हमारा उत्तराखंड सरकार और माननीय मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी से यह निवेदन है कि रवि टम्टा जी को अधिक से अधिक सरकारी फंडिंग मिले ताकि वह अपने प्रोटोटाइप ड्रोन को पूर्णतया विकसित का व्यवसायिक इस्तेमाल के योग्य बना सके।
पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के दुर्गम क्षेत्रों में इस तरह के इन्नोवेटिव आविष्कार मानव जाति के लिए बहुत अधिक लाभकारी साबित हो सकते हैं। हमारा प्रदेश उत्तराखंड पर्वतीय राज्य होने के कारण समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होता रहता है, दुर्गम स्थान होने के कारण प्राकृतिक आपदाओं का शिकार कई लोगों को समय पर चिकित्सीय सहायता न मिलने पर अपने प्राण गंवाने पड़ते हैं, यदि इस तरह के सरल सुलभ एवं सस्ते परिवहन साधन हमारे पास मौजूद रहेंगे तो इससे बहुत अधिक सहायता मिलेगी, इसके साथ ही उत्तराखंड राज्य दो देशों से अपनी अंतर्राष्ट्रीय सीमा साझा करता है जिस कारण यह राज्य सामरिक दृष्टि से अति संवेदनशील है, ऐसे में इस तरह के ड्रोन यदि हमारे सैन्य बल के पास मौजूद हो तो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की निगरानी करना और आसान हो जाएगा। बल्कि केंद्रीय रक्षा मंत्रालय और भारत सरकार को इसका संज्ञान लेना चाहिए और इस पर काम करना चाहिए।
रवि टम्टा जी को Daksh Talent Hunt की ओर से बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

आप सभी से निवेदन है कि इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें। ताकि देवभूमि के इस टैलेंट को देश और दुनिया में पहचान मिले।

कृपया इस संबंध में अपनी प्रतिक्रियाएं कमेंट बॉक्स में जरुर लिखें

05/08/2026

हर की पौड़ी हरिद्वार मे शिवभक्त काँवरियों पर हुई भव्य पुष्पवर्षा

उत्तराखंड के नानकमत्ता निवासी (मूल निवासी पिथौरागढ़) मार्शल आर्ट खिलाड़ी कंचन बसेड़ा ने कजाकिस्तान के अल्माटी शहर में आयो...
26/07/2026

उत्तराखंड के नानकमत्ता निवासी (मूल निवासी पिथौरागढ़) मार्शल आर्ट खिलाड़ी कंचन बसेड़ा ने कजाकिस्तान के अल्माटी शहर में आयोजित 10वी जुजित्सु एशियन चैंपियनशिप में -45 KG वेट कैटेगरी में रजत पदक (सिल्वर मेडल) प्राप्त कर देश और उत्तराखंड का नाम रोशन किया।
कंचन बसेड़ा ने 15 जुलाई से 21 जुलाई 2026 तक अल्माटी कजाकिस्तान में 10वी जुजित्सु एशियन चैंपियनशिप में भारतीय टीम में शामिल होकर भारत का प्रतिनिधित्व किया।
इस अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता की इस वेट कैटेगरी में भारत की ओर से रजत पदक प्राप्त करने वाली कंचन बसेड़ा पहली भारतीय खिलाड़ी हैं।
मूल रूप से पिथौरागढ़ जनपद के ग्राम रोड़ी पाली कंचन बसेड़ा वर्तमान में उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जनपद अंतर्गत नानकमत्ता क्षेत्र के ग्राम सुनखड़ी की निवासी है। मार्शल आर्ट में ब्लैक बेल्ट कंचन बसेड़ा के नाम तीन बार लगातार उत्तराखंड की ओर से राष्ट्रीय जुजित्सु चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल प्राप्त करने का रिकॉर्ड है। इसके साथ ही साल 2019 में अंडर 21 आयु वर्ग में कराटे की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाली उत्तराखंड की पहली महिला खिलाड़ी होने का भी रिकॉर्ड है।
कंचन बसेड़ा नानकमत्ता स्थित दक्ष स्पोर्ट्स अकादमी में पिछले कई वर्षों से राष्ट्रीय मार्शल आर्ट कोच किशोर डांगी के नेतृत्व में मार्शियल आर्ट में गहन प्रशिक्षण ले रही है। कंचन बसेड़ा का लक्ष्य आगामी एशियन गेम्स में भारत को स्वर्ण पदक दिलाना है।
देवभूमि उत्तराखंड की बिटिया के लिए एक लाइक तो बनता है।
कृपया इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

कारगिल विजय दिवस के अवसर पर मातृभूमि की रक्षा के लिए बलिदान होने वाले भारत के सभी वीर सैनिकों को शत-शत नमन।
26/07/2026

कारगिल विजय दिवस के अवसर पर मातृभूमि की रक्षा के लिए बलिदान होने वाले भारत के सभी वीर सैनिकों को शत-शत नमन।

श्री पूर्णागिरि माता की जयश्री पूर्णागिरि माता मंदिर उत्तराखंड के चंपावत जनपद के टनकपुर के निकट स्थित भारत के प्रमुख शक्...
19/07/2026

श्री पूर्णागिरि माता की जय
श्री पूर्णागिरि माता मंदिर उत्तराखंड के चंपावत जनपद के टनकपुर के निकट स्थित भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 1,650 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा हुआ है। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु माता पूर्णागिरि के दर्शन के लिए यहाँ पहुँचते हैं और अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण होने की कामना करते हैं।
पौराणिक महत्व
👉 हिंदू मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अनेक भाग किए। जिन स्थानों पर माता सती के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए। माना जाता है कि पूर्णागिरि में माता सती की नाभि गिरी थी, इसलिए यह स्थान अत्यंत पवित्र और सिद्ध शक्तिपीठ माना जाता है।
👉 धार्मिक महत्व
पूर्णागिरि माता को शक्ति, समृद्धि और मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालु यहाँ नारियल, चुनरी, ध्वजा और प्रसाद अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना माता अवश्य स्वीकार करती हैं।
👉 पूर्णागिरि मेला
हर वर्ष चैत्र नवरात्र के अवसर पर यहाँ विशाल पूर्णागिरि मेला आयोजित होता है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान सहित देश के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु इस मेले में भाग लेते हैं। यह मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और पर्यटन को भी बढ़ावा देता है।
👉 प्राकृतिक सौंदर्य
मंदिर तक पहुँचने का मार्ग पर्वतीय घाटियों, घने जंगलों और शारदा नदी के मनोरम दृश्यों से होकर गुजरता है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को प्रकृति की अनुपम छटा देखने का अवसर मिलता है। ऊँचाई से दिखाई देने वाले हिमालयी क्षेत्र और हरियाली यात्रियों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराते हैं।
👉 यात्रा मार्ग
पूर्णागिरि मंदिर का निकटतम नगर टनकपुर है, जो सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। टनकपुर से मंदिर तक सड़क मार्ग और पैदल यात्रा के माध्यम से पहुँचा जा सकता है। यात्रा मार्ग में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए भोजन, आवास और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएँ उपलब्ध रहती हैं।

श्री पूर्णागिरि माता मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत केंद्र है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, पौराणिक महत्व और भक्तिमय वातावरण हर श्रद्धालु के मन को गहरे तक स्पर्श करता है। यदि आप उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अनुभव करना चाहते हैं, तो श्री पूर्णागिरि माता मंदिर की यात्रा जीवन में एक बार अवश्य करनी चाहिए।
जय माँ पूर्णागिरि! 🙏🚩

हरेला - उत्तराखंड का पारंपरिक लोकपर्वप्रकृति, संस्कृति और समृद्धि का महापर्व👉 हरेला उत्तराखंड का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय...
16/07/2026

हरेला - उत्तराखंड का पारंपरिक लोकपर्व
प्रकृति, संस्कृति और समृद्धि का महापर्व

👉 हरेला उत्तराखंड का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय पारंपरिक पर्व माना जाता है। यह पर्व हरियाली, नई फसल, प्रकृति संरक्षण, सुख-समृद्धि और पर्यावरण के प्रति लोगों की जिम्मेदारी का प्रतीक है। "हरेला" शब्द का अर्थ ही है हरियाली। यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के अटूट संबंध को दर्शाता है तथा लोगों को वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।
हरेला पर्व कब मनाया जाता है?

👉 हरेला पर्व मुख्य रूप से श्रावण मास की संक्रांति (कर्क संक्रांति) के दिन मनाया जाता है, जो सामान्यतः 16 जुलाई के आसपास पड़ती है। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड के कुछ क्षेत्रों में इसे चैत्र और आश्विन नवरात्र के अवसर पर भी मनाने की परंपरा है।
श्रावण संक्रांति पर मनाया जाने वाला हरेला सबसे अधिक लोकप्रिय है क्योंकि इसी समय वर्षा ऋतु प्रारंभ होती है और खेती-किसानी का नया चक्र शुरू होता है। किसान इस पर्व के माध्यम से अच्छी वर्षा, भरपूर फसल और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
हरेला पर्व क्यों मनाया जाता है?

👉 हरेला पर्व मनाने के पीछे अनेक धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कारण हैं।
सबसे पहले यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि श्रावण मास भगवान शिव का प्रिय महीना है और इसी अवसर पर शिव-पार्वती की पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है।

दूसरा, यह पर्व कृषि प्रधान समाज के लिए नई फसल और नए कृषि सत्र के शुभारंभ का प्रतीक है। किसान अच्छी वर्षा और भरपूर उत्पादन की कामना करते हैं।

तीसरा, यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। वृक्ष, जल, भूमि और हरियाली के बिना जीवन संभव नहीं है। इसलिए हरेला प्रकृति के संरक्षण का संदेश देता है।

👉 हरेला बनाने की पारंपरिक विधि -
हरेला पर्व की तैयारी लगभग दस दिन पहले शुरू हो जाती है।
एक छोटी टोकरी, मिट्टी के पात्र या लकड़ी के बर्तन में साफ मिट्टी भरकर उसमें सात या पाँच प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। सामान्यतः इनमें गेहूं, जौ, धान, मक्का, उड़द, सरसों और तिल शामिल होते हैं।
बीज बोने के बाद प्रतिदिन उन पर हल्का जल छिड़का जाता है। लगभग नौ या दस दिनों में इन बीजों से सुंदर हरी-हरी पौध निकल आती है। यही अंकुरित पौधे हरेला कहलाते हैं।
संक्रांति के दिन इन हरे पौधों को काटकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। इसके बाद परिवार के बड़े सदस्य हरेला को सभी सदस्यों के सिर, कान और कंधों पर रखते हुए आशीर्वाद देते हैं और उनके सुख, समृद्धि तथा दीर्घायु की कामना करते हैं।

👉 हरेला पर्व मनाने की परंपराएँ -
हरेला के दिन पूरे उत्तराखंड में विशेष उत्साह दिखाई देता है।
भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है।
घरों में विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं।
परिवार के बुजुर्ग छोटे सदस्यों को हरेला लगाकर आशीर्वाद देते हैं।
लोग एक-दूसरे को हरेला पर्व की शुभकामनाएँ देते हैं।
अनेक स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और सरकारी विभागों द्वारा वृक्षारोपण अभियान चलाए जाते हैं।
हरेला पर्व का उद्देश्य
हरेला पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि इसके पीछे अनेक महत्वपूर्ण उद्देश्य छिपे हुए हैं।
1. प्रकृति का सम्मान करना
मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखना इस पर्व का प्रमुख उद्देश्य है।
2. पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना
लोगों को अधिक से अधिक पेड़ लगाने और उनकी देखभाल के लिए प्रेरित किया जाता है।
3. कृषि संस्कृति को मजबूत बनाना
यह पर्व किसानों के जीवन और कृषि परंपरा को सम्मान देता है।
4. परिवार और समाज में एकता
हरेला परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ जोड़ने वाला पर्व है।
5. आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति का महत्व समझाना
बच्चों को पौधों, जंगलों और पर्यावरण के संरक्षण की शिक्षा दी जाती है।

👉 पर्यावरण संरक्षण में हरेला पर्व का महत्व
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण और वनों की कटाई जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है। ऐसे समय में हरेला पर्व का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
हरेला हमें यह संदेश देता है कि यदि धरती को हरा-भरा रखना है तो प्रत्येक व्यक्ति को वृक्ष लगाना और उनकी रक्षा करना आवश्यक है।
पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, वर्षा लाते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, भूजल स्तर बनाए रखते हैं और अनेक जीव-जंतुओं का आश्रय बनते हैं। इसलिए हरेला केवल एक त्योहार नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण का जनआंदोलन है।
आज उत्तराखंड सरकार, वन विभाग, विद्यालय, महाविद्यालय, स्वयंसेवी संस्थाएँ तथा सामाजिक संगठन हरेला पर्व के अवसर पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाते हैं। लाखों पौधे लगाए जाते हैं और लोगों को प्रकृति संरक्षण की शपथ दिलाई जाती है।

👉 वर्तमान समय में हरेला की प्रासंगिकता
आधुनिक जीवनशैली और बढ़ते प्रदूषण के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। जंगल कम हो रहे हैं, तापमान बढ़ रहा है और जल संकट गहराता जा रहा है।
ऐसे समय में हरेला पर्व हमें याद दिलाता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति हर वर्ष कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है।
हरेला से मिलने वाली सीख
हरेला पर्व हमें अनेक महत्वपूर्ण संदेश देता है—
प्रकृति हमारी सबसे बड़ी धरोहर है।
प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम एक पौधा अवश्य लगाना चाहिए।
जल, जंगल और जमीन का संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
पर्यावरण संरक्षण से ही मानव जीवन सुरक्षित रहेगा।
हरियाली ही खुशहाली का आधार है।
प्रकृति का सम्मान ही सच्ची पूजा है।

हरेला उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कृषि परंपरा और प्रकृति प्रेम का अनुपम प्रतीक है। यह पर्व हमें केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है। वर्तमान समय में जब पर्यावरणीय संकट लगातार बढ़ रहे हैं, तब हरेला जैसे लोकपर्व पूरे समाज को प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरित करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं।
आइए, हरेला के इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि "एक व्यक्ति – एक पौधा" का अभियान अपनाएँगे, लगाए गए पौधों की देखभाल करेंगे और अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, हरित और समृद्ध पृथ्वी का उपहार देंगे।
"हरेला का संदेश – हर घर हरियाली, हर मन खुशहाली और हर हाथ एक पौधा।"

यदि आपको यह जानकारी पसंद आई हो तो इस पोस्ट को शेयर करें

हरेला पर्व के संदर्भ में यदि कोई जानकारी आप हमसे शेयर करना चाहते हैं तो कृपया कमेंट बॉक्स में लिखे या DM करें।

Address

Vill/Sunkhari
Khatima
262311

Telephone

+916397937442

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Daksh Talent Hunt posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Establishment

Send a message to Daksh Talent Hunt:

Shortcuts

Share

Category