16/07/2026
हरेला - उत्तराखंड का पारंपरिक लोकपर्व
प्रकृति, संस्कृति और समृद्धि का महापर्व
👉 हरेला उत्तराखंड का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय पारंपरिक पर्व माना जाता है। यह पर्व हरियाली, नई फसल, प्रकृति संरक्षण, सुख-समृद्धि और पर्यावरण के प्रति लोगों की जिम्मेदारी का प्रतीक है। "हरेला" शब्द का अर्थ ही है हरियाली। यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के अटूट संबंध को दर्शाता है तथा लोगों को वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।
हरेला पर्व कब मनाया जाता है?
👉 हरेला पर्व मुख्य रूप से श्रावण मास की संक्रांति (कर्क संक्रांति) के दिन मनाया जाता है, जो सामान्यतः 16 जुलाई के आसपास पड़ती है। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड के कुछ क्षेत्रों में इसे चैत्र और आश्विन नवरात्र के अवसर पर भी मनाने की परंपरा है।
श्रावण संक्रांति पर मनाया जाने वाला हरेला सबसे अधिक लोकप्रिय है क्योंकि इसी समय वर्षा ऋतु प्रारंभ होती है और खेती-किसानी का नया चक्र शुरू होता है। किसान इस पर्व के माध्यम से अच्छी वर्षा, भरपूर फसल और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
हरेला पर्व क्यों मनाया जाता है?
👉 हरेला पर्व मनाने के पीछे अनेक धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कारण हैं।
सबसे पहले यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि श्रावण मास भगवान शिव का प्रिय महीना है और इसी अवसर पर शिव-पार्वती की पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
दूसरा, यह पर्व कृषि प्रधान समाज के लिए नई फसल और नए कृषि सत्र के शुभारंभ का प्रतीक है। किसान अच्छी वर्षा और भरपूर उत्पादन की कामना करते हैं।
तीसरा, यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। वृक्ष, जल, भूमि और हरियाली के बिना जीवन संभव नहीं है। इसलिए हरेला प्रकृति के संरक्षण का संदेश देता है।
👉 हरेला बनाने की पारंपरिक विधि -
हरेला पर्व की तैयारी लगभग दस दिन पहले शुरू हो जाती है।
एक छोटी टोकरी, मिट्टी के पात्र या लकड़ी के बर्तन में साफ मिट्टी भरकर उसमें सात या पाँच प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। सामान्यतः इनमें गेहूं, जौ, धान, मक्का, उड़द, सरसों और तिल शामिल होते हैं।
बीज बोने के बाद प्रतिदिन उन पर हल्का जल छिड़का जाता है। लगभग नौ या दस दिनों में इन बीजों से सुंदर हरी-हरी पौध निकल आती है। यही अंकुरित पौधे हरेला कहलाते हैं।
संक्रांति के दिन इन हरे पौधों को काटकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। इसके बाद परिवार के बड़े सदस्य हरेला को सभी सदस्यों के सिर, कान और कंधों पर रखते हुए आशीर्वाद देते हैं और उनके सुख, समृद्धि तथा दीर्घायु की कामना करते हैं।
👉 हरेला पर्व मनाने की परंपराएँ -
हरेला के दिन पूरे उत्तराखंड में विशेष उत्साह दिखाई देता है।
भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है।
घरों में विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं।
परिवार के बुजुर्ग छोटे सदस्यों को हरेला लगाकर आशीर्वाद देते हैं।
लोग एक-दूसरे को हरेला पर्व की शुभकामनाएँ देते हैं।
अनेक स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और सरकारी विभागों द्वारा वृक्षारोपण अभियान चलाए जाते हैं।
हरेला पर्व का उद्देश्य
हरेला पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि इसके पीछे अनेक महत्वपूर्ण उद्देश्य छिपे हुए हैं।
1. प्रकृति का सम्मान करना
मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखना इस पर्व का प्रमुख उद्देश्य है।
2. पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना
लोगों को अधिक से अधिक पेड़ लगाने और उनकी देखभाल के लिए प्रेरित किया जाता है।
3. कृषि संस्कृति को मजबूत बनाना
यह पर्व किसानों के जीवन और कृषि परंपरा को सम्मान देता है।
4. परिवार और समाज में एकता
हरेला परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ जोड़ने वाला पर्व है।
5. आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति का महत्व समझाना
बच्चों को पौधों, जंगलों और पर्यावरण के संरक्षण की शिक्षा दी जाती है।
👉 पर्यावरण संरक्षण में हरेला पर्व का महत्व
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण और वनों की कटाई जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है। ऐसे समय में हरेला पर्व का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
हरेला हमें यह संदेश देता है कि यदि धरती को हरा-भरा रखना है तो प्रत्येक व्यक्ति को वृक्ष लगाना और उनकी रक्षा करना आवश्यक है।
पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, वर्षा लाते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, भूजल स्तर बनाए रखते हैं और अनेक जीव-जंतुओं का आश्रय बनते हैं। इसलिए हरेला केवल एक त्योहार नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण का जनआंदोलन है।
आज उत्तराखंड सरकार, वन विभाग, विद्यालय, महाविद्यालय, स्वयंसेवी संस्थाएँ तथा सामाजिक संगठन हरेला पर्व के अवसर पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाते हैं। लाखों पौधे लगाए जाते हैं और लोगों को प्रकृति संरक्षण की शपथ दिलाई जाती है।
👉 वर्तमान समय में हरेला की प्रासंगिकता
आधुनिक जीवनशैली और बढ़ते प्रदूषण के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। जंगल कम हो रहे हैं, तापमान बढ़ रहा है और जल संकट गहराता जा रहा है।
ऐसे समय में हरेला पर्व हमें याद दिलाता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति हर वर्ष कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है।
हरेला से मिलने वाली सीख
हरेला पर्व हमें अनेक महत्वपूर्ण संदेश देता है—
प्रकृति हमारी सबसे बड़ी धरोहर है।
प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम एक पौधा अवश्य लगाना चाहिए।
जल, जंगल और जमीन का संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
पर्यावरण संरक्षण से ही मानव जीवन सुरक्षित रहेगा।
हरियाली ही खुशहाली का आधार है।
प्रकृति का सम्मान ही सच्ची पूजा है।
हरेला उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कृषि परंपरा और प्रकृति प्रेम का अनुपम प्रतीक है। यह पर्व हमें केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है। वर्तमान समय में जब पर्यावरणीय संकट लगातार बढ़ रहे हैं, तब हरेला जैसे लोकपर्व पूरे समाज को प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरित करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं।
आइए, हरेला के इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि "एक व्यक्ति – एक पौधा" का अभियान अपनाएँगे, लगाए गए पौधों की देखभाल करेंगे और अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, हरित और समृद्ध पृथ्वी का उपहार देंगे।
"हरेला का संदेश – हर घर हरियाली, हर मन खुशहाली और हर हाथ एक पौधा।"
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