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वो जोड़ते रहे तमाम उम्र शोहरत की ईट मगरसच है की एक ईंट पर भी न उनका नाम था।चिलचिलाती इस धूप में तपता वो रहा,सच है की उसे...
02/05/2024

वो जोड़ते रहे तमाम उम्र शोहरत की ईट मगर
सच है की एक ईंट पर भी न उनका नाम था।
चिलचिलाती इस धूप में तपता वो रहा,
सच है की उसे कभी न एक पल आराम था।

क्या करूं? कहां जाऊं? कुछ समझ आता नहीं।।चला आया हूं दूर बहुत यूंही चलते – चलते,तुम साथ होकर भी। क्यों? साथ चलते नहीं।।मि...
29/02/2024

क्या करूं? कहां जाऊं? कुछ समझ आता नहीं।।
चला आया हूं दूर बहुत यूंही चलते – चलते,
तुम साथ होकर भी। क्यों? साथ चलते नहीं।।
मिलते हैं हर रोज मगर अजनबी की तरह,
सच है। कभी खुलके मिलते नहीं।।

बड़ा रंगीन है जहां तेरा जिसे तुमने बनाया है,
लहू के लाल रंगों से क्या खूब सजाया है।
सहेजा सबने ही जिसके हिस्से जो मिला,
मैं उदास हूं फिर भी। क्यों? मेरे हिस्से में तुम नहीं।।

क्या करूं? कहां जाऊं? कुछ समझ आता नहीं।।
गर, ईश्क है तुम्हें भी मुझसे। कभी तो नजर मिले,
छू लूं तुम्हें जी भर के छूने का असर मिले।
मैं दरिया हुं। ईश्क हुं ।बहता रहता हुं,
सच है। तुम ईश्क हो। समंदर हो ।बहते तुम नहीं।।

एक हां की तुम्हारी सच है, जरूरत है।
तुम हो की हां भी कहते नहीं।
यूं तो बादलों की ओट मुझको बुलाती हैं बिजलियां भी मगर,
मैं परवाना हुं तुम्हारा चिंगारियों पे मरता नहीं।।
क्या करूं? कहां जाऊं? समझ कुछ आता नहीं।
तुम हो की कभी कुछ कहते नहीं।
आदि,,,,,,,,,,

सोचता हुं मन की हर बात तुमसे कह दूं। डरता हुं। तुम समझ न पाए तो फिर करूंगा मैं क्या?अपनी उलझनों से कभी हारा नही मैं तुमन...
16/02/2024

सोचता हुं मन की हर बात तुमसे कह दूं।
डरता हुं।
तुम समझ न पाए तो फिर
करूंगा मैं क्या?
अपनी उलझनों से कभी हारा नही मैं
तुमने किया जो रुसवा तो जाऊंगा मैं कहां।
तेरे दर पे हर रोज सर झुकाते हैं लोग सभी
क्यों खामोश हो कुछ कहते तुम नही।।
तन्हाई में गुंज है और सन्नाटा है शहर में,
इस तरह कैसे शहर तेरा बसा।।
कई चेहरे उदास और लाचार से दिखे,
बेबसी के बाजार में क्या –क्या न बिका।।
उठती है एक पीर जो पैबस्त है जिस्म में,
देखा ईमान को जब कोने में था पड़ा।।
हर शक्स परेशान हैं तेरे अंजुमन में,
अंजुमन का ताना बाना बुनते नही हो क्या?
लिबास बेशकीमती पर शर्तों पर मिलेगा।
ऐसे भला कब तलक इंशानियत इन्सान को छलेगा।।
मैं बेगैरत नही जो तेरे झांसे में आ जाऊं
मुझको प्यारा है जमीर मेरा

बेशकीमती इस लिबास का भला
करुंगा मैं क्या?
मुझको अपने धुन की धूनी रमाने दो
जैसा भी हुं तेरा हुं।
मुझको तुझमें खो जाने दो।
बहुत कोशिश के बाद मुझको आज आराम लगा है,
अपने हाकिम से पूछो मुझको सोना है कहां।।

यह जीवन सफर है! तुम चलते ही जाना ।थम जो गया वो विस्मृत हुआ है,क्या खोया? क्या पाया? वो जाना कहां है।दृढ़ संकल्पित मन हो ...
09/12/2023

यह जीवन सफर है! तुम चलते ही जाना ।
थम जो गया वो विस्मृत हुआ है,
क्या खोया? क्या पाया? वो जाना कहां है।
दृढ़ संकल्पित मन हो सदा मुस्कुराना,
यह जीवन सफर है! तुम चलते ही जाना।
कभी परेशानियां तुम्हें! घेर ले जो,
कभी जिन्दगी में निराशा दिखे तो।
मुख पे उदासी न तन पे थकन हो,
सहजता, सरलता से तुम पार पाना।
यह जीवन सफर है! तुम चलते ही जाना।
सहज है जो जग में वो पर्वत हुआ है,
हुई नदियां सहज तो सागर मिला है।
सागर की गहराई से तुम पार जाना,
यह जीवन सफर है, तुम चलते ही जाना।
कभी विवशता! पग में फंदा लगाए,
संबंधों की किट –किट तुम्हें जो सताए।
तुम रहना समादार न उदासीन होना।
संबंधों में जिरह सदा से रहा है,
मुख–बधीर को देखो! स्वर यहीं तो मिला है।
विष भरकर भुजंग क्या ही है पाता,
किट—पतंगों से क्षुधा है मिटाता।
चंदा है शीतल तो कितना भला है,
तानो के तारे न तुम तोड़ लाना।
नव चेतन की शाखा से फिर तुम मिलोगे,
बुद्धि की फिर तुम समीक्षा करोगे।
मौसम की तरह है संबंधी की बातें,
विवशता स्वयं में पलभर की रातें।
प्रभात उमंगों को फिर लायेगा,
मुस्कुराकर फिर तुम हृदय से लगाना।
यह जीवन सफर है, तुम चलते ही जाना।
दंभी हुआ जो पाया है किसको?
तृष्णा में खोकर न खुदको जलाना।
यह जीवन सफर है,तुम चलते ही जाना।
न हो कोई घृणा, न द्वेष समाए,
न लोभ के बादल तुम्हें घेर पाए।
चमकता सदा से चंदा गगन में,
निर्मल हो मन तो सदा गुनगुनाए।
तन -मन से निर्मल हो तुम जीत जाना।
यह जीवन सफर है तुम चलते ही जाना।
भला हो भला कर भलाई जगत है,
भला हो भलाई का भलमानस मिला है।
भलाई की चादर! तुम ओढ़ आना।
यह जीवन सफर है, तुम चलते ही जाना।
यह जीवन सफर है, सीख की डगर है।
तुम चलते ही जाना। तुम चलते ही जाना।

आदि 🙏

व्यंग्य कहो या कहो कविता  सर्वथा सत्य ही बोलता हूं।सत्य सदा से परिभाषित है,स्वयं को सत्य में घोलता हूं।सर्वथा सत्य ही बो...
23/11/2023

व्यंग्य कहो या कहो कविता सर्वथा सत्य ही बोलता हूं।
सत्य सदा से परिभाषित है,
स्वयं को सत्य में घोलता हूं।
सर्वथा सत्य ही बोलता हूं।।
सूर्य प्रकाश को कर्म मानकर,
तपिश में उनके सृजन जानकर नितदीन शीश झुकाता हूं।
सत्य सदा से परिभाषित है,
सर्वथा सत्य ही बोलता हूं।
व्यंग्य कहो या कहो कविता ।
स्वयं को सत्य में घोलता हूं।।

अजर अमर न जग में कोई,
न जगत सदा विद्दमान रहा।
काम, क्रोध , मद, लोभ सदा नटवर का ही भेद रहा।।
नटवर शिव या शिवा हुई हैं?
कहां समझ मैं पाता हूं।
आत्ममुग्ध मैं वन -वन भटकूं,
पग -पग आह! भरता हूं।।
व्यंग्य कहो या कहो कविता,
सर्वथा सत्य ही बोलता हूं।
सत्य सदा से परिभाषित है, स्वयं को सत्य में घोलता हूं।।

प्रकृति का शोषण करना धर्म प्रवर्तक लगता है।
करे विलाप चाहे नदियां जितनी,
सब मनमोहक लगता है।।
मैं तो अपने धुन में रमता दंभ सदा ही भरता हूं।।
सर्वथा सत्य ही बोलता हूं।।
तन कलुषित और मन भी काला,
वस्त्र नवीन पहनता हूं।।
सत्य सदा से परिभाषित है।
सर्वथा सत्य ही बोलता हूं।।

व्यंग्य कहो या कहो कविता सत्य सर्वथा ही बोलता हूं।।

पंच प्राण एक मन मेरा, दस इन्द्रिय मुझमें काफी है।
एक चित्त ! एक बुद्धि मेरी । कहो कैसी उदासी है?
शोधन होता जब जीव का जग में स्वतः समझ वह पाता है।
बिन गुरु के ज्ञान मिले ना,
गुरुचरण में शीश झुकाता हूं।।
सर्वथा सत्य ही बोलता हूं।।
व्यंग्य कहो या कहो कविता ।
स्वयं को सत्य में घोलता हूं।।

शोधन होता जब जीव का जग में स्वतः समझ वह पाता है।
सियाराम की शरण को तज कर क्या खोता क्या पाता है।।
पंच प्राण एक मन मेरा दस इन्द्रिय मुझमें काफी है।
एक बुद्धि, एक चित्त मेरी! कहो कैसी उदासी है?

विलंब नहीं अब मिल जाऊंगा धरा- धाम की धूलि में,
रहना जग में तुम विस्मृत यूं ही
मैं अरविंद प्रेम को जाता हूं।।
सत्य सदा से परिभाषित है।
सर्वथा सत्य ही बोलता हूं।।
व्यंग्य कहो या कहो कविता
सत्य में स्वयं को घोलता हूं।।
सर्वत्र सत्य ही बोलता हूं।।

मन मेरा।चाहत नही मुझको जग सेकुछ खो कर कुछ पाने की।अपने जिद में दिगंबरी हुं जिद है खुद को पाने की।न मैं काशी का विद्वान क...
27/10/2023

मन मेरा।

चाहत नही मुझको जग से
कुछ खो कर कुछ पाने की।
अपने जिद में दिगंबरी हुं जिद है खुद को पाने की।
न मैं काशी का विद्वान कोई
न हरीद्वार का हरी हुआ
जग कहता है पागल है जो जग से विपरीत गया।
न मैं पागल न अज्ञानी हुं ! न विश्वस्त प्रेम में शामिल हुं।
चंचल हूं मैं पवन वेग सा जिद है वेग के जाने की।।

भटका हूं मैं वन - वन यूं भी
जिद है, अब थम जाने की।।
कभी गरल मिला। कभी सुधा मिली।
कभी निर्जल और उपवास मिला।।
मिली कभी तृष्णा मुझसे ।
कभी क्रोध का आभास हुआ।
मिला नहीं जो तृप्ति देता जिद है उसको पाने की।।

क्या सुसंस्कृत कभी बन पाऊंगा?
क्या स्वरक्षित मैं हो पाऊंगा।
क्या ऊष्मा है? तरल हुआ क्या?
क्या कभी खुद को बतलाऊंगा?
हां हां मैं यह कर जाऊंगा।
उत्कृष्ठ प्रेम को फिर पाऊंगा।।।।।।
जिद है खुद में खो जाने की।

आदि 🙏

Ye मेरा जुनियर बाते बनाता है।
15/09/2023

Ye मेरा जुनियर बाते बनाता है।

एक दिल तो दूजा जान है।।।।कृपा है श्रीराम का मां जानकी का वरदान है।देखता हूं जो तुम्हें तो गम भूल जाता हूंदर्द में भी आरा...
15/09/2023

एक दिल तो दूजा जान है।।।।
कृपा है श्रीराम का मां जानकी का वरदान है।
देखता हूं जो तुम्हें तो गम भूल जाता हूं
दर्द में भी आराम है सोचकर मुस्कुराता हूं।,
मायूस करती है जब उलझनों के पर्वत।
सच है तेरे मासूम सी बातों का बनाकर,
हथौड़ा उलझनों के पर्वत को तोड़ कर निकलता हूं।

Milti nhi jahan me yah malkiyat usool banana Padta hai....Hawa ho beshak apke kilaf Jo jindadil rahna hai to mushkurana ...
15/09/2023

Milti nhi jahan me yah malkiyat usool banana Padta hai....
Hawa ho beshak apke kilaf
Jo jindadil rahna hai to mushkurana Padta hai ...

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