26/02/2025
*आयाम संस्था के अभिनेतागण के नाम संवाद*
आयाम संस्था के मेरे सभी प्यारे साथियों, मेरे विद्यार्थियों। आज आपसे मैंने, दिल की बात कहने का निश्चय किया है। इसकी वजह है अभी कल ही हमारे एक बहुत अच्छे साथी ने, धीरे से और सकुचाते हुए, किसी का हवाला देते हुए ,(बिना उसका नाम लिए) मुझसे कहा कि आजकल मैं पहले की तरह एंटरटेनिंग और जानदार विषयों पर नाटक नहीं करता। शायद उसने शब्द कुछ और इस्तेमाल किए होंगे लेकिन मन्तव्य लगभग यही था कि आजकल मैं देशभक्ति और संदेशों से जुड़े हुए नाटक ज्यादा करता हूं, जो आपको शायद उतने रोचक नहीं लगते। उसने यह नहीं बताया कि यह किसने कहा. मैंने भी अनुमान लगाने का प्रयास नहीं किया क्योंकि किसने कहा यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना जो कहा गया। इसने मुझे सोचने पर, विचार करने पर मजबूर कर दिया कि मैं आत्मचिंतन करूँ कि क्या मैं ऐसे नाटक करके गलती कर रहा हूं? क्या मैं गलत रास्ते पर चल रहा हूं?
सबसे पहले मैं आपको बताऊं कि मैं खुद दिल से एक विशुद्ध एंटरटेनर था। आप यह तो मानोगे कि हमारे नाटक कुछ भी हों, दुखांत नहीं होते। मुझे खुद ऐसा लगता था कि हमारे नाटकों को मनोरंजन करना ही चाहिए। एक लंबे अरसे तक मैंने हाई वोल्टेज कॉमेडी नाटकों के माध्यम से इस क्राफ्ट को सीखा और खूब सारे कॉमेडी नाटक किये। आप सब उनमें से बहुतों का हिस्सा रहे हैं और इसके अलावा भी हमने आषाढ़ का एक दिन, कोर्ट मार्शल, जूलियस सीजर, मटियाबुर्ज जैसे गंभीर रस निष्पत्ति करने वाले नाटक भी किए हैं और जयपुर की जनता आज भी उन्हें बहुत अच्छे से याद करती है। पहले-पहल तो हम लोग ऐसे नाटकों के कई-कई शो भी किया करते थे- जवाहर कला केंद्र, रवीद्र मंच, राणाप्रताप इत्यादि पर।
लेकिन अब हम अक्सर दूसरा या तीसरा शो भी नहीं कर रहे हैं। इसका कारण क्या है? नाटकों के प्रति मेरी सोच क्यों बदली है? यह जानना बहुत जरूरी है। सबसे पहले यह जानें कि आयाम संस्था की शुरुआत मैंने नहीं की थी। यह मेरे कुछ विद्यार्थियों ने मुझे करवाई थी जिन्होंने मेरे भीतर के अच्छे टीचर को पहचाना; मैं तो किसी और के यहां चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम करके खुश था। तब इन्हीं मेरे आरंभिक विद्यार्थियों ने मुझे पहचाना, मुझे प्रेरित किया कि हम फीस इकट्ठी करेंगे और अपना ग्रुप बनाएंगे। और यूं आयाम की शुरुआत हुई। तब हम एक सेल्फ प्रोपेल्ड ग्रुप थे। विद्यार्थी ही खर्च जुटाते थे और जो फीस प्राप्त होती थी उससे हम अपने नाटकों का खर्चा चलाया करते थे। शुरुआत में धन जुटाना आवश्यकता भी थी और चूँकि उन विद्यार्थियों का धन इसमें लगा था इसलिए बहुत उत्साह के साथ यह नाटक हुआ करते थे। शुरू में ₹500/-/प्रति माह फी से यह शुरुआत हुई । आज से लगभग 13-14 साल पहले जब आयाम की 2011 में शुरुआत हुई ₹500/- की रकम एक अच्छी रकम हुआ करती थी लेकिन तब भी विद्यार्थियों ने यह राशि दी और चूंकि वह अपना कॉन्ट्रिब्यूशन करते थे इसलिए नाटकों के प्रति उनकी रुचि बराबर बनी हुई थी तो जब भी नाटक होता था वह उसके साथ बड़े जोश खरोश के साथ जुड़ जाते थे। तब सीमित संसाधनों में हमने बहुत अच्छे नाटक किए।
इस बीच एक दो जगह से ग्रांट मिली तो आयाम ने आषाढ़ का एक दिन और जूलियस सीजर जैसे ग्रैंड नाटक भी किए। तब चूंकि हमारा ग्रुप फीस बेस्ड हुआ करता था तो मेरा यह यह सिद्धांत था कि जितने बच्चे एक वर्कशॉप में आ जाए उतने पात्रों का नाटक होना ही चाहिए यानी कि हर बच्चा, जो कंट्रीब्यूट कर रहा है वह उसमें पार्टिसिपेट करे। मेरे दिल्ली वाले जमाने की तरह नहीं कि हम फीस भी देते थे, हर महीने देते थे और उसके बावजूद भी कई बार हमें टिकट चेकर की भूमिका में या टिकट सेलर की भूमिका में या केवल प्रचार सामग्री इधर-उधर चिपकाने-बांटने की भूमिका में भटकते रहना पड़ता था।
तो इस तरह से तब आयाम संस्था और उसके नाटक शुरू में चले। लेकिन एक्टर्स, पिछले एक दशक के दौरान, आपको यह जानकर अफसोस होगा कि अब कंट्रीब्यूट करने वाले लोग नहीं रहे। आयाम के मैनेजिंग डाइरेक्टर ने नाटक करना इतना आसान बना दिया है कि ज्यादातर लोग बिना कंट्रीब्यूशन किए नाटक करना चाहते हैं और इसमें भी उनकी चाहना है कि हम तरह-तरह के डेशिंग नाटक करें। तो ऐसा कैसे हो सकता है ?
दूसरी ओर इन वर्षों में संस्था की सोच परिपक्व हुई है। जब आप खूब सारे नाटक कर लेते हैं, लिखने लगते हैं, लिखने के लिए खूब सतसाहित्य पढ़ लेते हैं तब आपके मन में परिपक्वता आने लगती है और एक उम्र होने के बाद जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है यह भी आप को समझ में आने लगता हैं। और विश्वास कीजिये आज जो साथी ऐसा सोच रहे हैं कि हम अब पहले की तरह डेशिंग नाटक नहीं करते जब वह अपने जीवन में परिपक्व हो जाएंगे तब उन्हें भी एहसास होगा कि नाटक और जीवन दोनों में, और कुछ हो न हो, सद-उद्देश्य अवश्य होना चाहिए, कला केवल कला के लिए, या धनोपार्जन के लिए नहीं है। यह सोद्देश्य होनी ही चाहिए।
अच्छा, पहले जब हम एंटरटेनर थे तब दर्शकों का क्या हाल था? हमारे उन एंटरटेनर्स के लिए दर्शक टिकट लेकर नाटक देखने के लिए तैयार थे? नहीं। बुला बुला के भी हॉल भरना मुश्किल था। हमारे एक्टर्स भी फ्री के दर्शक भी जुटाने के लिए तैयार नहीं थे। इधर हम दर्शकों के लिए नाटक कर रहे थे, इंटरटेन कर रहे हैं और दर्शक हमारे नाटकों के लिए मौजूद नहीं थे। तो हम एक भांड के अतिरिक्त और क्या थे? और वह भी ऐसे भांड जो जेब से पैसा लगाकर दूसरों की मर्जी का नाटक कर रहा है लेकिन हासिल कुछ भी नहीं कर रहा है।
इस बीच मैं श्रीमदभगवतगीता से और ऐसे संगठनों से जुड़ा जो धर्म और राष्ट्रहित का कार्य कर रहे हैं। मैंने भरत मुनि के बारे में, हमारे ग्रेट नाट्यशास्त्र के बारे में भी जाना और तब मुझे एहसास हुआ कि नाटक का उद्देश्य केवल मनोरंजन या रस निष्पत्ति नहीं है, वह उद्देश्य परक होना ही चाहिए। वह समाज को बदलने वाला ना हो सके तो भी अच्छे संदेश देने वाला तो होना ही चाहिए, वह समाज को निर्मल आनंद तो दे ही सके। जो लोग इस देश और समाज को अच्छा संदेश देने के लिए अपना जीवन होम कर गए उनके गीत हमें गाने आने चाहिए। यदि हम उनकी प्रशस्ति गाकर नई पीढ़ी को प्रेरित नहीं कर सकते तो हमने ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा का उपयोग क्या किया? हम मानते नहीं लेकिन हम बहुत बिरले हैं, कलाकार हैं। भगवान ने इस पूरी दुनिया में बहुत थोड़े लोगों में कला के संस्कार और अवसर डाले हैं, और हम उनमें से हैं।
और इसीलिए आप देखिए कि विशुद्ध मनोरंजक नाटकों से चहलकदमी करते हुए हमने खेजड़ली का बलिदान, विडंबना नारी जीवन की, अहिल्याबाई होल्कर, खुदीराम बोस, इस तरह के नाटक किए। हमने वृद्ध आश्रम के लिए भी नाटक किया और रस निष्पत्ति वहां पर भी हुई। ऑडियंस का जो भर भर के रिस्पांस हमें मिलता है वह अतुलनीय है। ऑडियंस यदि रो भी दे तो भी कहती है कि आनंद आ गया क्योंकि रस की निष्पत्ति हुई. हमारे भावों ने कथा के मर्म को छुआ और हमारे माध्यम से लोगों ने यदि उसे मर्म को जाना तो उसमें क्या बुरा है?
अच्छा जो देशभक्ति, देशप्रेम या ईश्वरभक्ति के नाटक हम करते हैं उनके माध्यम से क्या हम किसी धर्म परिवर्तन करने की, किसी का गला काटने की या किसी की जेब काटने की शिक्षा दे रहे हैं? क्या हम किसी के जीवन में दुख की रोपाई कर रहे हैं। नहीं, हम उन्हें संदेश के साथ साथ निर्मल आनंद दे रहे हैं। हम गीता क्लास के नाटक करने जाते हैं कितने अच्छे लोग हमें वहां पर मिलते हैं। कितना स्नेह बड़े बड़े विद्वानों द्वारा हम पर लुटाया जाता है। कितना भाव विभोर होकर वह नाटक को न केवल देखते हैं बल्कि उसकी भर भर के प्रशंसा करते हैं। भारी संख्या में एकत्रित होते हैं, हमें बुलाते हैं और जो कहानियाँ उन्होने सैंकड़ों बार पढ़ी सुनी हैं देखकर खूब प्रसन्न होते हैं। हमें और क्या चाहिए। हमें नाटक के माध्यम से अपना क्राफ्ट माँजने का अवसर मिल रहा है और साथ ही बिना प्रयास शहर के बेहतरीन दर्शक भी।
और यही भक्ति परक नाटक करवाने वाले लोग हैं जो हमें थोड़ी बहुत राशि भी देते हैं। इसी राशि से हम अपने बहुत से खर्चों को बहुत अच्छे से चलाते हैं। आज हमारी क्लास का खर्च इससे निकलता है। हम नाश्ता पानी भी कर लेते हैं। कुछ सीनियर कलाकार, जो हमारे साथ जुड़ते हैं उन्हें भी कुछ पत्रम-पुष्पम दे पाते हैं। और अगर कोई बड़ा बजट मिल जाता है तो हमारे नए-नवेले कलाकार को भी सप्रेम कुछ देते हैं। जबकि थियेटर में यह नियम है कि किसी भी कलाकार को पहले एक दो साल तो फीस देकर भी फ्री में काम करना होता है। लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं है। हम लोग फीस तो नहीं ही ले रहे वरन अपने नाश्ते पानी, कॉस्टयूम, प्रोप्स, मेकअप पर अच्छा खर्चा करते हैं।
हम बेहतरीन कॉस्ट्यूम का इस्तेमाल करते हैं, हमारे पास बेस्ट मेकअप मैन की सेवाएँ हैं। जयपुर और इतर शहरों के अच्छे अच्छे ऑडिटोरियम में जाकर शोज करते हैं, नितीश भारद्वाज जी जैसी दिव्य, कल्पनातीत हस्तियों के साथ प्रत्यक्ष रूबरू होते हैं। किसी चीज में कोई कंजूसी नहीं होती और इसके साथ-साथ मैं आपके साथ यह भी शेयर कर दूं कि इस सारी आमदनी से मैं कोई हिस्सा नहीं लेता। आयाम संस्था को मैनेज करने के लिए जो आने-जाने का किराया है वह भी नहीं क्योंकि जो थोड़ा बहुत, अगर बचता है वह आयाम संस्था में जमा कर दिया जाता है। ताकि जब हम कोई वर्कशॉप प्लान करते हैं, जब हम ऐसे नाटक करते हैं जिनके लिए हमें केवल मंच ही मिलता है (थैंक्यू सर्विस में भी नाटक करने पड़ते हैं) तो उन खर्चों को हम निकाल लेते हैं।
सार यही है कि हम रेगुलर नाटक कर रहे हैं, साथ ही अच्छे और विविध विषय के नाटक कर रहे हैं। और इनमें कोई यह नहीं कह सकता कि एक्टिंग के लिए कोई स्कोप नहीं है - सब अलग-अलग जोनर के नाटक होते हैं. मैं आपसे निर्देशक-ट्रेनर के रूप में उच्च कोटी के अभिनय की अपेक्षा करता हूं, सुधार हेतु बार बातें दोहराता हूँ। यह बात अलग है कि बहुत से लोग उन डिमांड्स को नहीं समझ कर उसे हर बार सामान्य तरीके से ही करते हैं। बार-बार स्पीच पर, भावों पर ध्यान दिलाये जाने के बावजूद वह उसे वैसा ही करते हैं। लेकिन फिर भी मैं उनके साथ धैर्य नहीं खोता। मैं अपना कार्य करता रहता हूं, नाटक को जितना समय मैं दे सकता हूं उसमें आपके साथ काम करता हूं और आपसे आपका बेहतरीन निकालने का प्रयास करता हूं।
और इस सब के पीछे उद्देश्य क्या है? कि नौजवान पीढ़ी को अच्छा संस्कार मिले। हमारे ग्रुप से युवा ज्यादा दिन तक जुड़े नहीं रह पाते हैं इसका एक बहुत बड़ा कारण हमारे ही एक साथी ने मुझे बताया था कि यहां पर वह मौज मस्ती नहीं है। बोरिंग सा लगाने वाला सनातनी डिसिप्लिन है जो नौजवानों को ज्यादा दिन तक पचता नहीं है। उन्हें एक्टिंग क्लास के अलावा भी ‘कुछ और’ चाहिए। और यही वजह है कि चाह कर भी हम नाटकों के ज़्यादा शोज नहीं कर पाते।
अधिक दिनों की बात नहीं है मेरी उम्र में आने के बाद आप खुद इस बात को महसूस करेंगे कि थिएटर इन सब चीजों के लिए नहीं है। यह बड़ी पवित्र धरोहर की तरह जतन करने की चीज़ है। यह बहुत से लोगों को, जीवन में उद्देश्य, कोन्फ़िडेंस और आवाज़ देने का मंच है इसलिए वह संस्कारों के साथ ही चलनी चाहिए। वह दर्शकों के साथ युवा पीढ़ी को संस्कार देने का माध्यम है और यह संस्कार, आज आपको बुरे लग रहे होंगे लेकिन आप यकीन मानिए यही शाश्वत हैं। आज से कुछ साल बाद आप इस अनुशासन पर बेहद गर्व करेंगे।
हम भले ही अब पहले की तरह डैशिंग नाटक नहीं करते लेकिन इतना जरूर है कि हम बहुत वैरायटी के नाटक करते हैं। पिछले साल हमने वृद्ध-आश्रम के लिए नाटक किया, हमने हंसोड़ कंजूस किया, हमने 17 वीं सदी की महान महिला ‘पुण्यशलोक अहिल्याबाई’ के अतुलनीय कृतित्व के गीत गाए, हमने 'विडंबना : नारी जीवन की' के माध्यम से स्त्री जीवन के संघर्षों को जाना। उससे पहले हमने पर्यावरण से प्रेरित ‘खेजड़ली का बलिदान’ किया; इस सबके लिए आपको ऑडियो-रिकॉर्डिंग का अनुभव भी मिला, मंचन के लिए हम बाहर के शहरों में भी गए। हमने बहुत से लोगों को जोड़ा। कितना सारा अनुभव हमने लिया, कितने व्यक्तित्वों को हमने जाना और दिया क्या शाम के कुछ घंटे; सौदा बुरा नहीं रहा।
यह ठीक है कि बस हमारे अनुशासन और संस्कार के चलते हम ज्यादा दिनों तक लोगों को जोड़ नहीं पाते हैं लेकिन एक बात निश्चित है कि हम शाम को 6:00 से 8:30 उन्हीं दो ढाई घंटे में काम करते हैं जब कि लोग रील्स देखने के अलावा और कोई काम नहीं करते। इस दो ढाई घंटे में जो मेहनत हम करते हैं उसका परिणाम है कि आज पूरे जयपुर शहर के बहुत से अच्छे लोगों के बीच में, हम सभी की, सात्विक अभिनेताओं के तौर पर पहचान है। हमारे नाटक हो सकता है बहुत हाई स्टैंडर्ड ना हो लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि उनमें कोई तत्व नहीं है, कोई सब्सटेंस नहीं है, वह कोरे एंटरटेनर हैं, वह रस निष्पत्ति नहीं करते।
मुझे इसका पूरा विश्वास है कि हम अच्छा काम कर रहे हैं। मुझे यह भी मालूम है कि मैं बहुत क्रिएटिव डायरेक्टर नहीं हूं लेकिन उसकी एक वजह यह भी है कि मेरे पास क्रियेटिव होने का स्कोप नहीं है. हमारे बहुत से अभिनेता, केवल कोरे अभिनेता हैं। वह आते हैं, अभिनय करते हैं और चले जाते हैं। उन्हें इस बात की फिक्र नहीं होती है कि कॉस्टयूम कहां से आता है? सेट्स-डिजाइन को लेकर हम क्या मदद कर सकते हैं? मेकअप को लेकर हम क्या रिसर्च कर सकते हैं? प्रॉपर्टीज में हम अपना क्या योगदान दे सकते हैं। वह देर से आते हैं, रिहर्सल करते हैं और चले जाते हैं और यह केवल पुरानों के साथ ही नहीं नयों के साथ भी है। एक प्रकाश जी को छोड़ दें और एक दो और हमारे साथ के साथी, उनका हम कंट्रीब्यूशन छोड़ दे तो कोई नाटक की व्यवस्था के बारे में सोचता ही नहीं है। बहुत सारे साथियों के पास तो थिएटर को देने के लिए पूरा टाइम तक नहीं है क्योंकि अपनी-2 व्यवस्तताएँ हैं, अपने-अपने टाइम-पास हैं जिनको समय देना ज्यादा जरूरी है।
हमारे यहां पर फोकस और केमरा एक्टिंग पर जितना काम हम करते हैं यदि उसे बहुत ध्यान से समझ लिया जाए तो आज से 5 साल बाद आपको इस चीज़ की महत्ता समझ में आ जाएगी। यह सीखा हुआ क्राफ्ट फल देने लगेगा। आपको ज्ञान होगा कि आप अन्य अभिनेताओं से कई मायनों में बहुत आगे हैं, गंभीरता से गुनकर और भी आगे हो सकते थे। हालांकि तब शायद किसी के लिए बहुत देरी हो चुकी हो। फिर भी यह निश्चित है कि आपको यह पता चल जाएगा कि ‘आयाम संस्था’ में हमारे साथ बहुत ही ईमानदारी के साथ काम हो रहा था हम शायद उसे ग्रहण करने में कहीं चूक गए।
तो यही बातें थी मित्रों मुझे जो आपके साथ करनी थीं। मैं भी कभी-कभी निराश हो जाता हूं लेकिन फिर मैं यही सोचता हूं कि नहीं... नाटक केवल युवा पीढ़ी को एक मंच देने का स्थान नहीं है, वह एक संस्कार देने का भी मंच है और आयाम संस्था के साथ, उनके जीवन को भी सोद्देश्य बनाना बहुत आवश्यक है इसलिए इस तरह का थिएटर हमें करते रहना है, करते जाना है। कम से कम मैं तो करूंगा। आप जुड़े रहेंगे, कंट्रीब्यूट करेंगे या नहीं, पुराने लोगों की तरह थियेटर को एक मूवमेंट मानकर चलेंगे या नहीं, यह आप पर निर्भर है।
एक बात और.... आप नए नए नाटक भी करना चाहते हैं। लेकिन खुदीराम बोस, राजा दाहिर और अहिल्याबाई जैसे नाटकों के रिपीट शो करके आप जल्दी बोर हो जाते हैं। लेकिन सोचिए अगर हम महान हस्तियों/ महिलाओं की प्रशस्ति नहीं गा सकते तो भविष्य में लोग समाज के लिए त्यागपूर्ण जीवन क्यों जीना चाहेंगे? और ऐसे लोग नहीं होंगे तो यह समाज कैसा बन जाएगा? इसलिए उनके गीत गाना यह हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है।
एक बात और है कि किसी नाटक के हम बहुत अधिक शोज नहीं कर पाते, हम ज्यादा दूसरे शहरों में नहीं जाते हैं क्योंकि हमारे पास वह कंटीन्यूअस लगकर काम करने वाली फोर्स नहीं है। हमारे साथी परीक्षाओं के, शादी ब्याहों के, दूसरे ग्रुप में काम करने की वजहें लेकर नाटकों के रिपीट शोज में काम नहीं करते। तो कैसे किसी को हमारे नाटक करवाने के प्रस्ताव भेजे जाएँ? क्योंकि रिपीट शो पहले से बेहतर होने चाहिए. लेकिन होता यही है कि हर बार नए अभिनेता जुटाने पड़ते हैं, उन के पीछे भागना पड़ता है। उनको लेकर फिर जीरो से शुरुआत करनी पड़ती है. इससे आपकी क्वालिटी गिरती चली जाती है और परिणामत: आपका अपने ऊपर से विश्वास उठने लगता है। आप कमर्शियली नाटक कर ही नहीं पाते हैं क्योंकि दो-तीन शोज़ में तो वह इतना तैयार होता है कि उसके बाद आप किसी बड़ी जगह अप्लाई कर सके। जहां से आपको कुछ धनराशि मिल सके लेकिन उससे पहले ही हमारे साथी अपने कामों में व्यस्त हो चुके होते हैं। इस युग में मोबाइल आने के बाद से भटकाव यूं भी बहुत बढ़ा है।
साथियों, आप लोगों को इस बात का एहसास कुछ दिनों बाद होगा लेकिन यह एक बात बड़ा सच है - अब हम लोग एक साथ कई जगह व्यस्त होना चाहते हैं और इससे, थिएटर कहें या जीवन के प्रति कहें, हमारा नजरिया बहुत बदल गया है। हम थोड़ा कम ईमानदार हो गए हैं।
किन्तु सच यही है कि ईश्वर के प्रति, देश के प्रति या सामाजिक उद्देश्यों के प्रति संदेश देने के जो नाटक हम करते हैं असल में वही हमारी कमाई है और एक उम्र आने के बाद आप सभी इस सत्य को बिनाशक जान लेंगे और तब ‘आयाम’ को धन्यवाद देंगे कि हमने सिर्फ नाटक करने के लिए नाटक नहीं किए, हम एक उद्देश्य को लेकर जिए। इसी के साथ में अपनी इस बात को विराम देता हूं। आशा है कि सभी मेरी बात को समझेंगे। नाटक केवल मनोरंजन नहीं है; नाटक और हमारे जीवन, दोनों का उद्देश्य होना ही चाहिए। यही आयाम के पीछे की ड्राइविंग फोर्स है। और ईश्वर करे यह बनी रहे। जय हिन्द, वंदे मातरम !!