AyAm Sanstha

AyAm Sanstha Ayam is a Regd. and a not-for-profit organization that has been promoting meaningful & entertaining t

12/05/2026
13/03/2026

'आशावाद और अभिनय'

दुनिया में शायद सबसे ज़्यादा आशावादी और कल्पनाशील व्यक्ति अगर कोई होता है तो वह अभिनेता होता है। और जयपुर जैसे शहरों में भी वह बड़ी तादाद में पाया जाता है। उसका एक ही सपना होता है—उसे बड़ा अभिनेता बनना है।

जिसे ग्लैमर आकर्षित करता है, जिसे पढ़ाई में मन नहीं लगता, उसे अक्सर लगता है कि अभिनय सबसे आसान काम है। एक बार इसमें घुस जाओ तो जल्दी ही करोड़ों रुपये कमाए जा सकते हैं—जैसे शाहरुख़ ख़ान ने कमाए।

उसी उम्मीद में वह अभिनय की दुनिया की ओर आता है। सबसे पहले उसे सलाह दी जाती है—थिएटर करो। वह थिएटर पहुँचता है। महीने भर तक समय पर आता है, समय पर जाता है। निर्देशक उसे सिखाता है—कहाँ हँसना है, कितनी साँस लेनी है, कैसे चलना है, आवाज़ में उतार-चढ़ाव कैसे लाना है, संवाद में भाव कैसे भरना है। डेढ़ महीने की मेहनत के बाद एक शो होता है।

शो अच्छा चला जाता है। तालियाँ बजती हैं। घरवाले आते हैं, दोस्त आते हैं, शायद प्रेमिका भी आती है। सब उसकी तारीफ़ करते हैं। बस, उसी रात उसे लगता है—अब वह तैयार है।

वह मंदिर जाता है, मुहूर्त निकलता है, माता-पिता से आशीर्वाद लेता है, जेब में जितना पैसा मिल सके रखता है और आरामनगर के किसी दोस्त का पता लेकर मुंबई की ट्रेन पकड़ लेता है।

मुंबई पहुँचकर असली कहानी शुरू होती है।
हर सुबह वह पता करता है कि कहाँ-कहाँ ऑडिशन हो रहे हैं। वहाँ पहुँचता है, लंबी लाइनों में खड़ा होता है। कभी-कभी घंटों इंतज़ार के बाद उसका नंबर आता है। उसे दो-चार लाइनें दी जाती हैं। वह उन्हें बुझी आँखों और सूखी आवाज़ में दोहरा देता है।

ऑडिशन लेने वाला कोई सातवें-आठवें नंबर का असिस्टेंट डायरेक्टर उससे हाथ मिलाकर कहता है—“बहुत बढ़िया!” दरअसल “बहुत बढ़िया” का अर्थ होता है—अब जल्दी बाहर निकलो, औरों का भी लेना है। लेकिन उसे लगता है—कल सुबह ही अच्छी खबर आएगी।

उस रात उसे अपना पुराना निर्देशक याद आता है, जो बार-बार कहता था—
“डायलॉग याद किया कर…
खूब पढ़ाकर....
चलना सीख…
भाव लाना सीख…
आवाज़ पर काम कर…”
उसे लगता है—कैसा खड़ूस आदमी था, बेकार ही परेशान करता था। फ्री में एक्टर मिला हुआ था तो मुझे चिपकाए रखना चाहता था।

अगली सुबह वह फोन देखता है—कोई कॉल नहीं।
फिर भी वह हिम्मत नहीं हारता। फिर निकल पड़ता है—स्टूडियो दर स्टूडियो।

धीरे-धीरे उसे नया ज्ञान मिलता है—यहाँ काम टैलेंट से नहीं, कॉन्टैक्ट से मिलता है। (उच्चारण- कोन-टेएक्ट)
वह एक डायरी बनाता है। उसे हमेशा सीने से लगाए रखता है। उसमें हर आदमी के नंबर, यहाँ तक कि गेटकीपर के भी, लिखता है। कुछ लोग उससे पैसे भी ऐंठ लेते हैं। कुछ उसे महीनों चक्कर कटवाते हैं। वह धैर्य से उनकी जी-हुज़ूरी करता रहता है।

जो पैसे साथ लाया था, वह दोस्तों पर खुलकर खर्च करता है। क्योंकि उसे पूरा विश्वास होता है—यह स्ट्रगल (उच्चारण - इश-ट्रगल) ज़्यादा दिन का नहीं है। कल सुबह फोन आएगा, परसों वह शूट पर जाएगा, और वहाँ पहुँचते ही हिट हो जाएगा। फिल्म भले ही छह महीने में बने—वह अपने सपनों में छह दिन में हिट हो जाता है।

ऐसे ही आठ-दस महीने बीत जाते हैं।फिर मुंबई में बारिश का मौसम आता है। मुंबई में वैसे तो दो ही मौसम होते हैं—एक उमस भरी सड़ी गर्मी का और दूसरा बारिश का । दस महीने की उमस भरी गर्मी काटने के बाद वह निष्कर्ष निकालता है—“मुंबई में काम सिर्फ जान-पहचान से मिलता है। यहाँ टैलेंट की कोई क़दर नहीं।”

अब वह यह बात सिर्फ अपने आप से नहीं कहता, दूसरों को भी बताता है। घरवालों से कहता है—“अभी बारिश में शूटिंग बंद है, इसलिए मैं कुछ दिनों के लिए घर आ रहा हूँ।”
उसे यह पता नहीं होता कि आजकल शूटिंग मुंबई में कम और आउटडोर ज़्यादा होती है। जहाँ बारिश नहीं हो रही होती, वहाँ बड़े-बड़े सेट लगे होते हैं, बड़े स्टूडियो चल रहे होते हैं।
दरअसल मुंबई में भी शूट कभी बंद नहीं होते। बस उसके लिए वह कभी शुरू ही नहीं हुए होती । कोनटेक्ट कल्चर और बारिश को कोसता वह वापसी की ट्रेन पकड़ लेता है। लेकिन वह अपने आप से यह सवाल नहीं पूछता—
जहाँ पूरे देश में हजारों फिल्में, सीरियल और ओटीटी कार्यक्रम बन रहे हैं, वहाँ उसे एक छोटा-सा रोल भी क्यों नहीं मिला?

वह एक और बात कहता है—
“मैं वन-डे-टुडे नहीं करता। (जैसे वन-डे-टुडे काम उसके पीछे साइनिंग अमाउंट ले कर भाग रहे हों) मैं छोटा काम नहीं करूंगा। मैं बड़ा काम करूंगा।” वह बड़ा काम उसे मिलता नहीं।और एक बरसात के मौसम में वह वापस लौट आता है।
यही उसके सपनों का अंत होता है।
और इस सपने को सच करने की कोशिश में वह अपने माता-पिता के बहुत से पैसे और करियर बनाने का बहुमूल्य समय खर्च कर चुका होता है।

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अब यह कहानी मैं इसलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि ऐसे नौजवानों के साथ काम करते हुए मुझे लगभग पंद्रह साल हो गए हैं। मेरे साथ के कितने ही निर्देशक ऐसे सपने देखने वाले युवकों के साथ मेरी तरह ही आज भी काम कर रहे हैं।

वे थिएटर में आते हैं और मन में यह विश्वास लेकर आते हैं कि अभिनय वह पेशा है जहाँ बिना मेहनत के भी कुछ हासिल हो सकता है। और सच तो यह है कि अभिनय सीखने के लिए उनके पास समय भी बहुत कम होता है। जयपुर में रहते हुए ग्रेजुएशन तो वह मां बाप को धोखा देने के लिए कर रहे होते हैं। उन्हें अपने मोबाइल से बहुत-सी रील्स बनानी होती हैं, बड़े अभिनेताओं की नकल करते हुए छोटे-छोटे अभिनय के टुकड़े रिकॉर्ड करने होते हैं। हर दिन कुछ नया बना कर सोशल मीडिया को मोनिटाइज़ करने का इनका पेशन होता है।

इन सब कामों के बीच जो थोड़ा-सा समय बच जाता है तो वे बड़े उदार भाव से थिएटर को दे देते हैं—और यह मान लेते हैं कि उन्होंने अभिनय सीखने के लिए पर्याप्त समय दे दिया है। आखिर अभिनय दुनिया की सबसे आसान चीज़ जो ठहरी। अच्छा थियेटर भी इसलिए करना होता है क्योंकि किसी उचित एक्टिंग स्कूल में जाने लायक पैसे देने की तैयारी नहीं होती।

अजीब बात यह है कि वे तीन साल का ग्रेजुएशन करने के लिए तैयार होते हैं, लेकिन अभिनय सीखने के लिए तीन साल देने को तैयार नहीं होते—जबकि एक अच्छे अभिनेता से पूछिए तो तीन साल तो उसे केवल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का कोर्स करने में लग जाते हैं। उसके बाद वह रेपर्टरी करता है, सालों थिएटर करता है, FTII करता है, संघर्ष करता है—तब कहीं जाकर वह ओमपुरी, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी या मनोज बाजपेयी बनता है।
और तब भी अक्सर वह चालीस की उम्र के आसपास जाकर पहचाना जाता है। वह भी कोई बिरला ही। लेकिन हमारे नौजवान पहली ही बारिश में वापस लौट आते हैं।और लौटते हुए कहते हैं—“यहाँ कॉन्टैक्ट चलता है…नेपोटिज़्म है (उच्चारण - नेपोटीजम) है…टैलेंट की कोई क़दर नहीं।”
असल में .....यह टैलेंट की कमी का सवाल नहीं होता। यह जज़्बे की, ज़िद की कमी का सवाल होता है।

मैंने कई प्रतिभाशाली लड़कों को देखा है—यदि वे थोड़ा धैर्य रखते, थोड़ा अभ्यास करते, तो टिक सकते थे।
लेकिन वे दिन भर गुटखा खाकर गाल गलाने में जितना पैसा खर्च करते हैं, या गौरव टॉवर की चाय-कॉफी में जितना उड़ा देते हैं, उतना भी यदि अभिनय सीखने में लगा दें—छह महीने सीखें, तीन-चार साल थिएटर करें—तो वे सचमुच कहीं से कहीं पहुँच सकते हैं।
फिर वे उस आत्मविश्वास के साथ इस उद्योग में खड़े हो सकते हैं कि पाँच-छह साल तक छोटे-मोटे काम करते हुए भी बड़े अवसर का इंतज़ार कर सकें।

किसी भी क्षेत्र में सफलता का यही नियम है।
आप इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर निकलते ही ई. श्रीधरन नहीं बन जाते।
आपको वर्षों छोटे-छोटे प्रोजेक्ट पर काम करना पड़ता है।आप राजनीति में उतरते ही नरेंद्र मोदी नहीं बन जाते। उसी तरह अभिनय में भी कोई सीधे बिग बी, नाना पाटेकर, मनोज बाजपेयी या नवाज़ुद्दीन नहीं बनता।

इसके लिए साधना चाहिए, धैर्य चाहिए, और सबसे बढ़कर अपने भीतर के मनुष्य को मजबूत करना पड़ता है।

इसलिए मैं उन सभी युवाओं से बस इतना कहना चाहता हूँ—
अभिनय करना आसान है, लेकिन अभिनेता बनना आसान नहीं है।

यदि सचमुच इस रास्ते पर चलना है तो इसे एक व्यवस्थित साधना की तरह सीखिए। समय लगाइए, धैर्य रखिए, थोड़ा निवेश कीजिए—समय का भी, परिश्रम का भी, और ज़िद का भी।

तभी आप केवल अभिनय ही नहीं, जीवन के किसी भी क्षेत्र में कुछ सार्थक कर सकेंगे।🤓

03/01/2026

आयाम संस्था के सभी सदस्यों का हम हृदय की गहराइयों से धन्यवाद करते हैं। हमने आप सभी से केवल **एक बार** रिव्यू देने का आग्रह किया था, और जिस सकारात्मकता, अपनत्व और विश्वास के साथ आपने प्रतिक्रिया दी, वह हमारे लिए अत्यंत प्रेरणादायी है। विशेष रूप से हमारी एलुमनी प्रियंका अग्रवाल का आभार, जिनके सकारात्मक शब्दों ने हमारे प्रयासों को और मजबूती दी। आप सभी का सहयोग और स्नेह ही आयाम संस्था की वास्तविक शक्ति है
"Maine Aayam Sansthaan join kiya tha aur 3–4 saal tak judi rahi. Aayam mere liye sirf ek acting institute nahi, balki ek life shaping experience raha.

Sandeep sir har student ko bahut personal attention dete hain. Woh har kisi ki strengths aur weaknesses ko gehrai se samajhte hain aur un par sincerely kaam karte hain. Yahan har din kuch naya seekhne ko milta hai, aur har student ko har role explore karne ka fair mauka diya jaata hai.

Roz ki exercises ne mujhe on the spot sochna, feel karna aur react karna sikhaya, skills jo main aaj bhi apni personal aur professional life mein use karti hoon.

Itni sincerity aur dedication ke saath kaam karte hue maine kahin aur nahi dekha. Aayam mein jo foundation banti hai, woh sirf acting ke liye nahi, balki poori zindagi ke liye strong hoti hai."

—दिल से धन्यवाद।

संस्कार भारती, जयपुर प्रांत आयाम संस्था के संयुक्त तत्वावधान में प्रस्तुत कर रही है 15 दिवसीय वाइस और अभिनय कार्यशाला1 न...
27/10/2025

संस्कार भारती, जयपुर प्रांत
आयाम संस्था के संयुक्त तत्वावधान में
प्रस्तुत कर रही है
15 दिवसीय वाइस और अभिनय कार्यशाला
1 नवम्बर से 15 नवंबर
मालवीय नगर
समय 6 से 8.30 सायं
*अभिनय की आत्मा है — स्वर।
किन्तु अभिनय–प्रस्तुति के इसी मूल अंग की सर्वाधिक उपेक्षा की जाती है।
दुर्बल या अप्रशिक्षित स्वर, अशुद्ध उच्चारण, स्वर–तंत्र का अनावश्यक तनाव और श्रवण–संवेदना की उपेक्षा — कलाकार, प्रस्तोता या अध्यापक की प्रभावशीलता को क्षीण कर देते हैं।
संस्कार भारती का यह प्रयास है कि भारतीय भाषिक सौंदर्य और शुद्ध उच्चारण की परंपरा पुनः प्रतिष्ठित हो।
इसी उद्देश्य से यह विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की जा रही है, जिसमें अभिनय के अभिन्न अंग ‘स्वर–अभिव्यक्ति’ और ‘उच्चारण की बारीकियों’ पर गहन मार्गदर्शन दिया जाएगा।
आपसे निवेदन है कि अपने सभी साथियों तक यह सूचना पहुँचाएँ और इस सांस्कृतिक–साधना समान कार्यशाला का लाभ अवश्य ग्रहण करें।
🎵 “स्वर में संस्कार, अभिव्यक्ति में भारतीयता” — यही हमारी साधना है।*

Register for a new workshop, followed by various productions, aato appraise your newly gained knowledge. Do not let this...
06/07/2025

Register for a new workshop, followed by various productions,
aato appraise your newly gained knowledge. Do not let this chance slip away.

Friends of AyAm are requested to share this for information among interested and needy youngsters.

A new Workshop is under progress.  Everyone who is willing to develop his  personalit yand learn the art of acting is we...
23/04/2025

A new Workshop is under progress. Everyone who is willing to develop his personalit yand learn the art of acting is welcome.
Participate in a drama also.
Fees only 1500/-.
Learn from the experienced Acting Coach.

26/02/2025

*आयाम संस्था के अभिनेतागण के नाम संवाद*
आयाम संस्था के मेरे सभी प्यारे साथियों, मेरे विद्यार्थियों। आज आपसे मैंने, दिल की बात कहने का निश्चय किया है। इसकी वजह है अभी कल ही हमारे एक बहुत अच्छे साथी ने, धीरे से और सकुचाते हुए, किसी का हवाला देते हुए ,(बिना उसका नाम लिए) मुझसे कहा कि आजकल मैं पहले की तरह एंटरटेनिंग और जानदार विषयों पर नाटक नहीं करता। शायद उसने शब्द कुछ और इस्तेमाल किए होंगे लेकिन मन्तव्य लगभग यही था कि आजकल मैं देशभक्ति और संदेशों से जुड़े हुए नाटक ज्यादा करता हूं, जो आपको शायद उतने रोचक नहीं लगते। उसने यह नहीं बताया कि यह किसने कहा. मैंने भी अनुमान लगाने का प्रयास नहीं किया क्योंकि किसने कहा यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना जो कहा गया। इसने मुझे सोचने पर, विचार करने पर मजबूर कर दिया कि मैं आत्मचिंतन करूँ कि क्या मैं ऐसे नाटक करके गलती कर रहा हूं? क्या मैं गलत रास्ते पर चल रहा हूं?
सबसे पहले मैं आपको बताऊं कि मैं खुद दिल से एक विशुद्ध एंटरटेनर था। आप यह तो मानोगे कि हमारे नाटक कुछ भी हों, दुखांत नहीं होते। मुझे खुद ऐसा लगता था कि हमारे नाटकों को मनोरंजन करना ही चाहिए। एक लंबे अरसे तक मैंने हाई वोल्टेज कॉमेडी नाटकों के माध्यम से इस क्राफ्ट को सीखा और खूब सारे कॉमेडी नाटक किये। आप सब उनमें से बहुतों का हिस्सा रहे हैं और इसके अलावा भी हमने आषाढ़ का एक दिन, कोर्ट मार्शल, जूलियस सीजर, मटियाबुर्ज जैसे गंभीर रस निष्पत्ति करने वाले नाटक भी किए हैं और जयपुर की जनता आज भी उन्हें बहुत अच्छे से याद करती है। पहले-पहल तो हम लोग ऐसे नाटकों के कई-कई शो भी किया करते थे- जवाहर कला केंद्र, रवीद्र मंच, राणाप्रताप इत्यादि पर।
लेकिन अब हम अक्सर दूसरा या तीसरा शो भी नहीं कर रहे हैं। इसका कारण क्या है? नाटकों के प्रति मेरी सोच क्यों बदली है? यह जानना बहुत जरूरी है। सबसे पहले यह जानें कि आयाम संस्था की शुरुआत मैंने नहीं की थी। यह मेरे कुछ विद्यार्थियों ने मुझे करवाई थी जिन्होंने मेरे भीतर के अच्छे टीचर को पहचाना; मैं तो किसी और के यहां चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम करके खुश था। तब इन्हीं मेरे आरंभिक विद्यार्थियों ने मुझे पहचाना, मुझे प्रेरित किया कि हम फीस इकट्ठी करेंगे और अपना ग्रुप बनाएंगे। और यूं आयाम की शुरुआत हुई। तब हम एक सेल्फ प्रोपेल्ड ग्रुप थे। विद्यार्थी ही खर्च जुटाते थे और जो फीस प्राप्त होती थी उससे हम अपने नाटकों का खर्चा चलाया करते थे। शुरुआत में धन जुटाना आवश्यकता भी थी और चूँकि उन विद्यार्थियों का धन इसमें लगा था इसलिए बहुत उत्साह के साथ यह नाटक हुआ करते थे। शुरू में ₹500/-/प्रति माह फी से यह शुरुआत हुई । आज से लगभग 13-14 साल पहले जब आयाम की 2011 में शुरुआत हुई ₹500/- की रकम एक अच्छी रकम हुआ करती थी लेकिन तब भी विद्यार्थियों ने यह राशि दी और चूंकि वह अपना कॉन्ट्रिब्यूशन करते थे इसलिए नाटकों के प्रति उनकी रुचि बराबर बनी हुई थी तो जब भी नाटक होता था वह उसके साथ बड़े जोश खरोश के साथ जुड़ जाते थे। तब सीमित संसाधनों में हमने बहुत अच्छे नाटक किए।
इस बीच एक दो जगह से ग्रांट मिली तो आयाम ने आषाढ़ का एक दिन और जूलियस सीजर जैसे ग्रैंड नाटक भी किए। तब चूंकि हमारा ग्रुप फीस बेस्ड हुआ करता था तो मेरा यह यह सिद्धांत था कि जितने बच्चे एक वर्कशॉप में आ जाए उतने पात्रों का नाटक होना ही चाहिए यानी कि हर बच्चा, जो कंट्रीब्यूट कर रहा है वह उसमें पार्टिसिपेट करे। मेरे दिल्ली वाले जमाने की तरह नहीं कि हम फीस भी देते थे, हर महीने देते थे और उसके बावजूद भी कई बार हमें टिकट चेकर की भूमिका में या टिकट सेलर की भूमिका में या केवल प्रचार सामग्री इधर-उधर चिपकाने-बांटने की भूमिका में भटकते रहना पड़ता था।
तो इस तरह से तब आयाम संस्था और उसके नाटक शुरू में चले। लेकिन एक्टर्स, पिछले एक दशक के दौरान, आपको यह जानकर अफसोस होगा कि अब कंट्रीब्यूट करने वाले लोग नहीं रहे। आयाम के मैनेजिंग डाइरेक्टर ने नाटक करना इतना आसान बना दिया है कि ज्यादातर लोग बिना कंट्रीब्यूशन किए नाटक करना चाहते हैं और इसमें भी उनकी चाहना है कि हम तरह-तरह के डेशिंग नाटक करें। तो ऐसा कैसे हो सकता है ?
दूसरी ओर इन वर्षों में संस्था की सोच परिपक्व हुई है। जब आप खूब सारे नाटक कर लेते हैं, लिखने लगते हैं, लिखने के लिए खूब सतसाहित्य पढ़ लेते हैं तब आपके मन में परिपक्वता आने लगती है और एक उम्र होने के बाद जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है यह भी आप को समझ में आने लगता हैं। और विश्वास कीजिये आज जो साथी ऐसा सोच रहे हैं कि हम अब पहले की तरह डेशिंग नाटक नहीं करते जब वह अपने जीवन में परिपक्व हो जाएंगे तब उन्हें भी एहसास होगा कि नाटक और जीवन दोनों में, और कुछ हो न हो, सद-उद्देश्य अवश्य होना चाहिए, कला केवल कला के लिए, या धनोपार्जन के लिए नहीं है। यह सोद्देश्य होनी ही चाहिए।
अच्छा, पहले जब हम एंटरटेनर थे तब दर्शकों का क्या हाल था? हमारे उन एंटरटेनर्स के लिए दर्शक टिकट लेकर नाटक देखने के लिए तैयार थे? नहीं। बुला बुला के भी हॉल भरना मुश्किल था। हमारे एक्टर्स भी फ्री के दर्शक भी जुटाने के लिए तैयार नहीं थे। इधर हम दर्शकों के लिए नाटक कर रहे थे, इंटरटेन कर रहे हैं और दर्शक हमारे नाटकों के लिए मौजूद नहीं थे। तो हम एक भांड के अतिरिक्त और क्या थे? और वह भी ऐसे भांड जो जेब से पैसा लगाकर दूसरों की मर्जी का नाटक कर रहा है लेकिन हासिल कुछ भी नहीं कर रहा है।
इस बीच मैं श्रीमदभगवतगीता से और ऐसे संगठनों से जुड़ा जो धर्म और राष्ट्रहित का कार्य कर रहे हैं। मैंने भरत मुनि के बारे में, हमारे ग्रेट नाट्यशास्त्र के बारे में भी जाना और तब मुझे एहसास हुआ कि नाटक का उद्देश्य केवल मनोरंजन या रस निष्पत्ति नहीं है, वह उद्देश्य परक होना ही चाहिए। वह समाज को बदलने वाला ना हो सके तो भी अच्छे संदेश देने वाला तो होना ही चाहिए, वह समाज को निर्मल आनंद तो दे ही सके। जो लोग इस देश और समाज को अच्छा संदेश देने के लिए अपना जीवन होम कर गए उनके गीत हमें गाने आने चाहिए। यदि हम उनकी प्रशस्ति गाकर नई पीढ़ी को प्रेरित नहीं कर सकते तो हमने ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा का उपयोग क्या किया? हम मानते नहीं लेकिन हम बहुत बिरले हैं, कलाकार हैं। भगवान ने इस पूरी दुनिया में बहुत थोड़े लोगों में कला के संस्कार और अवसर डाले हैं, और हम उनमें से हैं।
और इसीलिए आप देखिए कि विशुद्ध मनोरंजक नाटकों से चहलकदमी करते हुए हमने खेजड़ली का बलिदान, विडंबना नारी जीवन की, अहिल्याबाई होल्कर, खुदीराम बोस, इस तरह के नाटक किए। हमने वृद्ध आश्रम के लिए भी नाटक किया और रस निष्पत्ति वहां पर भी हुई। ऑडियंस का जो भर भर के रिस्पांस हमें मिलता है वह अतुलनीय है। ऑडियंस यदि रो भी दे तो भी कहती है कि आनंद आ गया क्योंकि रस की निष्पत्ति हुई. हमारे भावों ने कथा के मर्म को छुआ और हमारे माध्यम से लोगों ने यदि उसे मर्म को जाना तो उसमें क्या बुरा है?
अच्छा जो देशभक्ति, देशप्रेम या ईश्वरभक्ति के नाटक हम करते हैं उनके माध्यम से क्या हम किसी धर्म परिवर्तन करने की, किसी का गला काटने की या किसी की जेब काटने की शिक्षा दे रहे हैं? क्या हम किसी के जीवन में दुख की रोपाई कर रहे हैं। नहीं, हम उन्हें संदेश के साथ साथ निर्मल आनंद दे रहे हैं। हम गीता क्लास के नाटक करने जाते हैं कितने अच्छे लोग हमें वहां पर मिलते हैं। कितना स्नेह बड़े बड़े विद्वानों द्वारा हम पर लुटाया जाता है। कितना भाव विभोर होकर वह नाटक को न केवल देखते हैं बल्कि उसकी भर भर के प्रशंसा करते हैं। भारी संख्या में एकत्रित होते हैं, हमें बुलाते हैं और जो कहानियाँ उन्होने सैंकड़ों बार पढ़ी सुनी हैं देखकर खूब प्रसन्न होते हैं। हमें और क्या चाहिए। हमें नाटक के माध्यम से अपना क्राफ्ट माँजने का अवसर मिल रहा है और साथ ही बिना प्रयास शहर के बेहतरीन दर्शक भी।
और यही भक्ति परक नाटक करवाने वाले लोग हैं जो हमें थोड़ी बहुत राशि भी देते हैं। इसी राशि से हम अपने बहुत से खर्चों को बहुत अच्छे से चलाते हैं। आज हमारी क्लास का खर्च इससे निकलता है। हम नाश्ता पानी भी कर लेते हैं। कुछ सीनियर कलाकार, जो हमारे साथ जुड़ते हैं उन्हें भी कुछ पत्रम-पुष्पम दे पाते हैं। और अगर कोई बड़ा बजट मिल जाता है तो हमारे नए-नवेले कलाकार को भी सप्रेम कुछ देते हैं। जबकि थियेटर में यह नियम है कि किसी भी कलाकार को पहले एक दो साल तो फीस देकर भी फ्री में काम करना होता है। लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं है। हम लोग फीस तो नहीं ही ले रहे वरन अपने नाश्ते पानी, कॉस्टयूम, प्रोप्स, मेकअप पर अच्छा खर्चा करते हैं।
हम बेहतरीन कॉस्ट्यूम का इस्तेमाल करते हैं, हमारे पास बेस्ट मेकअप मैन की सेवाएँ हैं। जयपुर और इतर शहरों के अच्छे अच्छे ऑडिटोरियम में जाकर शोज करते हैं, नितीश भारद्वाज जी जैसी दिव्य, कल्पनातीत हस्तियों के साथ प्रत्यक्ष रूबरू होते हैं। किसी चीज में कोई कंजूसी नहीं होती और इसके साथ-साथ मैं आपके साथ यह भी शेयर कर दूं कि इस सारी आमदनी से मैं कोई हिस्सा नहीं लेता। आयाम संस्था को मैनेज करने के लिए जो आने-जाने का किराया है वह भी नहीं क्योंकि जो थोड़ा बहुत, अगर बचता है वह आयाम संस्था में जमा कर दिया जाता है। ताकि जब हम कोई वर्कशॉप प्लान करते हैं, जब हम ऐसे नाटक करते हैं जिनके लिए हमें केवल मंच ही मिलता है (थैंक्यू सर्विस में भी नाटक करने पड़ते हैं) तो उन खर्चों को हम निकाल लेते हैं।

सार यही है कि हम रेगुलर नाटक कर रहे हैं, साथ ही अच्छे और विविध विषय के नाटक कर रहे हैं। और इनमें कोई यह नहीं कह सकता कि एक्टिंग के लिए कोई स्कोप नहीं है - सब अलग-अलग जोनर के नाटक होते हैं. मैं आपसे निर्देशक-ट्रेनर के रूप में उच्च कोटी के अभिनय की अपेक्षा करता हूं, सुधार हेतु बार बातें दोहराता हूँ। यह बात अलग है कि बहुत से लोग उन डिमांड्स को नहीं समझ कर उसे हर बार सामान्य तरीके से ही करते हैं। बार-बार स्पीच पर, भावों पर ध्यान दिलाये जाने के बावजूद वह उसे वैसा ही करते हैं। लेकिन फिर भी मैं उनके साथ धैर्य नहीं खोता। मैं अपना कार्य करता रहता हूं, नाटक को जितना समय मैं दे सकता हूं उसमें आपके साथ काम करता हूं और आपसे आपका बेहतरीन निकालने का प्रयास करता हूं।

और इस सब के पीछे उद्देश्य क्या है? कि नौजवान पीढ़ी को अच्छा संस्कार मिले। हमारे ग्रुप से युवा ज्यादा दिन तक जुड़े नहीं रह पाते हैं इसका एक बहुत बड़ा कारण हमारे ही एक साथी ने मुझे बताया था कि यहां पर वह मौज मस्ती नहीं है। बोरिंग सा लगाने वाला सनातनी डिसिप्लिन है जो नौजवानों को ज्यादा दिन तक पचता नहीं है। उन्हें एक्टिंग क्लास के अलावा भी ‘कुछ और’ चाहिए। और यही वजह है कि चाह कर भी हम नाटकों के ज़्यादा शोज नहीं कर पाते।

अधिक दिनों की बात नहीं है मेरी उम्र में आने के बाद आप खुद इस बात को महसूस करेंगे कि थिएटर इन सब चीजों के लिए नहीं है। यह बड़ी पवित्र धरोहर की तरह जतन करने की चीज़ है। यह बहुत से लोगों को, जीवन में उद्देश्य, कोन्फ़िडेंस और आवाज़ देने का मंच है इसलिए वह संस्कारों के साथ ही चलनी चाहिए। वह दर्शकों के साथ युवा पीढ़ी को संस्कार देने का माध्यम है और यह संस्कार, आज आपको बुरे लग रहे होंगे लेकिन आप यकीन मानिए यही शाश्वत हैं। आज से कुछ साल बाद आप इस अनुशासन पर बेहद गर्व करेंगे।
हम भले ही अब पहले की तरह डैशिंग नाटक नहीं करते लेकिन इतना जरूर है कि हम बहुत वैरायटी के नाटक करते हैं। पिछले साल हमने वृद्ध-आश्रम के लिए नाटक किया, हमने हंसोड़ कंजूस किया, हमने 17 वीं सदी की महान महिला ‘पुण्यशलोक अहिल्याबाई’ के अतुलनीय कृतित्व के गीत गाए, हमने 'विडंबना : नारी जीवन की' के माध्यम से स्त्री जीवन के संघर्षों को जाना। उससे पहले हमने पर्यावरण से प्रेरित ‘खेजड़ली का बलिदान’ किया; इस सबके लिए आपको ऑडियो-रिकॉर्डिंग का अनुभव भी मिला, मंचन के लिए हम बाहर के शहरों में भी गए। हमने बहुत से लोगों को जोड़ा। कितना सारा अनुभव हमने लिया, कितने व्यक्तित्वों को हमने जाना और दिया क्या शाम के कुछ घंटे; सौदा बुरा नहीं रहा।

यह ठीक है कि बस हमारे अनुशासन और संस्कार के चलते हम ज्यादा दिनों तक लोगों को जोड़ नहीं पाते हैं लेकिन एक बात निश्चित है कि हम शाम को 6:00 से 8:30 उन्हीं दो ढाई घंटे में काम करते हैं जब कि लोग रील्स देखने के अलावा और कोई काम नहीं करते। इस दो ढाई घंटे में जो मेहनत हम करते हैं उसका परिणाम है कि आज पूरे जयपुर शहर के बहुत से अच्छे लोगों के बीच में, हम सभी की, सात्विक अभिनेताओं के तौर पर पहचान है। हमारे नाटक हो सकता है बहुत हाई स्टैंडर्ड ना हो लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि उनमें कोई तत्व नहीं है, कोई सब्सटेंस नहीं है, वह कोरे एंटरटेनर हैं, वह रस निष्पत्ति नहीं करते।

मुझे इसका पूरा विश्वास है कि हम अच्छा काम कर रहे हैं। मुझे यह भी मालूम है कि मैं बहुत क्रिएटिव डायरेक्टर नहीं हूं लेकिन उसकी एक वजह यह भी है कि मेरे पास क्रियेटिव होने का स्कोप नहीं है. हमारे बहुत से अभिनेता, केवल कोरे अभिनेता हैं। वह आते हैं, अभिनय करते हैं और चले जाते हैं। उन्हें इस बात की फिक्र नहीं होती है कि कॉस्टयूम कहां से आता है? सेट्स-डिजाइन को लेकर हम क्या मदद कर सकते हैं? मेकअप को लेकर हम क्या रिसर्च कर सकते हैं? प्रॉपर्टीज में हम अपना क्या योगदान दे सकते हैं। वह देर से आते हैं, रिहर्सल करते हैं और चले जाते हैं और यह केवल पुरानों के साथ ही नहीं नयों के साथ भी है। एक प्रकाश जी को छोड़ दें और एक दो और हमारे साथ के साथी, उनका हम कंट्रीब्यूशन छोड़ दे तो कोई नाटक की व्यवस्था के बारे में सोचता ही नहीं है। बहुत सारे साथियों के पास तो थिएटर को देने के लिए पूरा टाइम तक नहीं है क्योंकि अपनी-2 व्यवस्तताएँ हैं, अपने-अपने टाइम-पास हैं जिनको समय देना ज्यादा जरूरी है।

हमारे यहां पर फोकस और केमरा एक्टिंग पर जितना काम हम करते हैं यदि उसे बहुत ध्यान से समझ लिया जाए तो आज से 5 साल बाद आपको इस चीज़ की महत्ता समझ में आ जाएगी। यह सीखा हुआ क्राफ्ट फल देने लगेगा। आपको ज्ञान होगा कि आप अन्य अभिनेताओं से कई मायनों में बहुत आगे हैं, गंभीरता से गुनकर और भी आगे हो सकते थे। हालांकि तब शायद किसी के लिए बहुत देरी हो चुकी हो। फिर भी यह निश्चित है कि आपको यह पता चल जाएगा कि ‘आयाम संस्था’ में हमारे साथ बहुत ही ईमानदारी के साथ काम हो रहा था हम शायद उसे ग्रहण करने में कहीं चूक गए।

तो यही बातें थी मित्रों मुझे जो आपके साथ करनी थीं। मैं भी कभी-कभी निराश हो जाता हूं लेकिन फिर मैं यही सोचता हूं कि नहीं... नाटक केवल युवा पीढ़ी को एक मंच देने का स्थान नहीं है, वह एक संस्कार देने का भी मंच है और आयाम संस्था के साथ, उनके जीवन को भी सोद्देश्य बनाना बहुत आवश्यक है इसलिए इस तरह का थिएटर हमें करते रहना है, करते जाना है। कम से कम मैं तो करूंगा। आप जुड़े रहेंगे, कंट्रीब्यूट करेंगे या नहीं, पुराने लोगों की तरह थियेटर को एक मूवमेंट मानकर चलेंगे या नहीं, यह आप पर निर्भर है।
एक बात और.... आप नए नए नाटक भी करना चाहते हैं। लेकिन खुदीराम बोस, राजा दाहिर और अहिल्याबाई जैसे नाटकों के रिपीट शो करके आप जल्दी बोर हो जाते हैं। लेकिन सोचिए अगर हम महान हस्तियों/ महिलाओं की प्रशस्ति नहीं गा सकते तो भविष्य में लोग समाज के लिए त्यागपूर्ण जीवन क्यों जीना चाहेंगे? और ऐसे लोग नहीं होंगे तो यह समाज कैसा बन जाएगा? इसलिए उनके गीत गाना यह हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है।

एक बात और है कि किसी नाटक के हम बहुत अधिक शोज नहीं कर पाते, हम ज्यादा दूसरे शहरों में नहीं जाते हैं क्योंकि हमारे पास वह कंटीन्यूअस लगकर काम करने वाली फोर्स नहीं है। हमारे साथी परीक्षाओं के, शादी ब्याहों के, दूसरे ग्रुप में काम करने की वजहें लेकर नाटकों के रिपीट शोज में काम नहीं करते। तो कैसे किसी को हमारे नाटक करवाने के प्रस्ताव भेजे जाएँ? क्योंकि रिपीट शो पहले से बेहतर होने चाहिए. लेकिन होता यही है कि हर बार नए अभिनेता जुटाने पड़ते हैं, उन के पीछे भागना पड़ता है। उनको लेकर फिर जीरो से शुरुआत करनी पड़ती है. इससे आपकी क्वालिटी गिरती चली जाती है और परिणामत: आपका अपने ऊपर से विश्वास उठने लगता है। आप कमर्शियली नाटक कर ही नहीं पाते हैं क्योंकि दो-तीन शोज़ में तो वह इतना तैयार होता है कि उसके बाद आप किसी बड़ी जगह अप्लाई कर सके। जहां से आपको कुछ धनराशि मिल सके लेकिन उससे पहले ही हमारे साथी अपने कामों में व्यस्त हो चुके होते हैं। इस युग में मोबाइल आने के बाद से भटकाव यूं भी बहुत बढ़ा है।

साथियों, आप लोगों को इस बात का एहसास कुछ दिनों बाद होगा लेकिन यह एक बात बड़ा सच है - अब हम लोग एक साथ कई जगह व्यस्त होना चाहते हैं और इससे, थिएटर कहें या जीवन के प्रति कहें, हमारा नजरिया बहुत बदल गया है। हम थोड़ा कम ईमानदार हो गए हैं।

किन्तु सच यही है कि ईश्वर के प्रति, देश के प्रति या सामाजिक उद्देश्यों के प्रति संदेश देने के जो नाटक हम करते हैं असल में वही हमारी कमाई है और एक उम्र आने के बाद आप सभी इस सत्य को बिनाशक जान लेंगे और तब ‘आयाम’ को धन्यवाद देंगे कि हमने सिर्फ नाटक करने के लिए नाटक नहीं किए, हम एक उद्देश्य को लेकर जिए। इसी के साथ में अपनी इस बात को विराम देता हूं। आशा है कि सभी मेरी बात को समझेंगे। नाटक केवल मनोरंजन नहीं है; नाटक और हमारे जीवन, दोनों का उद्देश्य होना ही चाहिए। यही आयाम के पीछे की ड्राइविंग फोर्स है। और ईश्वर करे यह बनी रहे। जय हिन्द, वंदे मातरम !!

इसी साल एक साथी रंगकर्मी ने टांग खींचते हुए कहा था कि 'हे हे हे.....भाईसाहब यह रोज़ नए नाटक करने की हमें ज़रूरत नहीं है। ह...
29/12/2024

इसी साल एक साथी रंगकर्मी ने टांग खींचते हुए कहा था कि 'हे हे हे.....भाईसाहब यह रोज़ नए नाटक करने की हमें ज़रूरत नहीं है। हमारा तो एक नाटक ही 2008 से चल रहा है। (उनसे प्रसंगवश इतना ही पूछा था कि 'इन दिनों कौन सा नया नाटक कर रहे हैं? ) और उनका दावा वाकई सच भी था -उनके 16 साल पहले तैयार एक नाटक का इस साल 60वां मंचन था।

और हमारा आयाम का हाल....?
आयाम संस्था वर्ष 2011 में अस्तित्व में आई। इसका उद्देश्य नव प्रतिभाओं को तैयार कर उन्हें हर genre का रंगानुभव देना था। लेकिन हमने किसी नाटक के 4 से अधिक शो नहीं किए क्योंकि सभी genre में जो करना था। सिर्फ 'बड़े भाईसाहब' और 'कंजूस' ने ही 8 + शो किए। और शेष नाटकों के 1, या 2, या 3, ज्यादा से ज्यादा 4 शो और नयी वर्कशाप और नए शो की तैयारी....यही आयाम का ट्रेंड रहा।

तो आयाम संस्था का जो सफर वर्ष 2011 से शुरू हुआ इस दौरान लगभग 140 से अधिक नव प्रतिभाओं ने इसमें प्रशिक्षण प्राप्त किया अपने जीवन का पहला नाटक और अनेकों नाटक किए और इन 13 वर्षों में संस्था ने 43 नाटकों के 92 शो सफलतापूर्वक मंचित कर डाले। और यह सब जयपुर(के लगभग सभी सभागृहों में), दिल्ली, प्रयागराज, भीलवाडा, उदयपुर, जोधपुर, शेखावाटी, अजमेर, नरौरा आदि जगहों पर।

इस साल की शुरुआत भी 'खेजडली का बलिदान' (Bhilwada) से हुई। फिर फरवरी में 'पिता का प्यार', अप्रेल में 'कंजूस', अगस्त में 'विडम्बना -नारी जीवन की'(Delhi) , सितंबर में 'दीनबंधु के बंधु महान्ति', अक्तूबर में 'पुण्यश्लोक अहिल्या', और नवंबर में भी फिर से इसका दूसरा शो। यानि आयाम ने अकेले 7 मंचन किए। और यह सब हुआ आयाम के साथियों के दृढ़ निश्चय के कारण जो इस दौरान आयाम का झण्डा ऊंचा किए रहे। और ईश्वर की इच्छा भी बनी रही....और क्या ।

अब अपनी चीज़ स्वभावतः ज़्यादा प्यारी लगती है। सो एक ही नाटक के 60 मंचन की तुलना में मुझे अपने 43 नाटकों के 92 शो ज़्यादा प्यारे लग रहे हैं। आपका क्या ख्याल है? 😀

इस गर्मी की छुट्टियों में आयाम संस्था फिर लेकर आ रहा है पर्सनेलिटी डेवलपमेंट के लिए एक अभिनय शिविर.....जानिए थियेटर के ब...
25/05/2024

इस गर्मी की छुट्टियों में आयाम संस्था फिर लेकर आ रहा है पर्सनेलिटी डेवलपमेंट के लिए एक अभिनय शिविर.....
जानिए
थियेटर के बारे में
अभिनय की बारीकियों...
शुद्ध उच्चारण....
बहुत सी मज़ेदार कहानियों के साथ ....

"मैं खुली लड़ाई में अरबों से लड़ने जा रहाहूँ। अगर मैं उन्हें कुचल देता हूँ तो मेरा सिंध सुदृढ़ हो जाएगा। किन्तु यदि मैं सम्...
20/06/2023

"मैं खुली लड़ाई में अरबों से लड़ने जा रहा
हूँ। अगर मैं उन्हें कुचल देता हूँ तो मेरा सिंध
सुदृढ़ हो जाएगा। किन्तु यदि मैं सम्मानपूर्वक मारा
जाता हूँ तो कहा जाएगा कि सिंध के राजा दहिर
ने देश के लिए अपने क़ीमती जीवन का बलिदान
दिया..." - राजा दाहिर

अगले सोमवार (26.06.2023) देखना ना भूलें.....
उदय शंकर भट्ट की महान नाट्य रचना .......
संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से ...
आयाम संस्था की बेहतरीन नाट्य प्रस्तुति.....
"राजा दाहिर"
निर्देशक : संदीप लेले
स्थान : रंगायन, जवाहर कला केंद्र, जयपुर
समय : सायं 6:15
दिनांक: 26.06.2023

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