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26/02/2026

Manish Rathore rishto ke rukavat ke liye aana

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:“जिसने हर नमाज़ के बाद सूरह इख़लास 10 बार पढ़ी, अल्लाह उसके लिए जन्नत में एक महल बनाएगा।”हवाला: ...
21/02/2026

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जिसने हर नमाज़ के बाद सूरह इख़लास 10 बार पढ़ी, अल्लाह उसके लिए जन्नत में एक महल बनाएगा।”
हवाला: Musnad Ahmad, हदीस नंबर: 15610
इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने सूरह इख़लास की अज़ीम फ़ज़ीलत को बयान फ़रमाया है कि जो शख़्स हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद दस मर्तबा इस सूरत की तिलावत करता है अल्लाह तआला उसके लिए जन्नत में एक महल तैयार फ़रमाता है, क्योंकि सूरह इख़लास में तौहीद-ए-ख़ालिस का बयान है और यह सूरत अल्लाह तआला की वहदानियत और बेनियाज़ी को वाज़ेह करती है, इससे यह सबक मिलता है कि मोमिन को चाहिए कि वह अपनी नमाज़ों के बाद अज़कार और तिलावत का एहतिमाम करे ताकि वह अज़ीम अज्र हासिल कर सके, मिसाल के तौर पर अगर कोई शख़्स पाँचों नमाज़ों के बाद चंद लम्हे निकाल कर सूरह इख़लास दस मर्तबा पढ़ ले तो यह उसके लिए जन्नत में घर बनने का ज़रिया बन सकता है, यह हदीस हमें यह यक़ीन दिलाती है कि छोटे मगर मुसलसल आमाल अल्लाह के हाँ बहुत बड़ी जज़ा और दाइमी कामयाबी का सबब बनते हैं।

नौ तलवारें टूटीं, हौसला नहीं टूटा – सैफुल्लाह खालिद बिन वलीद का आख़िरी पैग़ाम वो कुरैश का बाज़ू था जिसपर मक्का फ़ख्र करता...
21/02/2026

नौ तलवारें टूटीं, हौसला नहीं टूटा – सैफुल्लाह खालिद बिन वलीद का आख़िरी पैग़ाम

वो कुरैश का बाज़ू था जिसपर मक्का फ़ख्र करता था वो जब पैदा हुआ तो उसके कानों में लोरिया नहीं घोड़ों के टापो की आवाज़ गूंजती थी

फिर मेरे नबी सल्लल्लाहों अलैहि वसल्लम की ज़ुबान से एक जुमला निकला ये तो सैफुल्लाह अल्लाह की तलवार है

हज़रत खालिद बिन वलीद बा ज़ुबान कहते है मै खालिद हु वलीद बिन मुगीरा का बेटा जिसपर मक्का नाज़ करता था मै तलवारों के साय में जवान हुआ मै जब पैदा हुआ मेरे कानो में लोरिया नहीं घोड़ों के टापो की आवाज़ गूंजा करती थी जब आंख खुलती थी सामने तीर नेज़े तलवारे लटकी हुआ करती थी

मेरे बाप कहा करता था के खालिद जंग तुम्हारी पहचान है और अरब की इज़्ज़त तुम्हारी तलवार के दम पर है मैने जंग को फन बनाया और मौत को महबूब बनाया मै उन्नीस बरस की उम्र तक कुफ्र में रहा मेरे अल्लाह ने मुझे जिंदा रखा

क्योंकि मैं इस्लाम लाकर कैसर और किसरा के एवान हिलाने वाला था मुझे गज़वा ए ओहद याद है क्योंकि वो मेरी जिंदगी का सबसे बोझ और पछतावे का दिन है मेरी जंगी हिक्मत ए अमली की वजह से मेरे नबी का चेहरा मुबारक लहू लुहान हुआ फिर मेरे नबी के लबों से वो जुमला निकला जिसने आसमान हिला दिया

अल्लाह उस क़ौम को हिदायत कैसे देगा जिसने अपने नबी का चेहरा लहू से रंग दिया फिर रब की रहमत नाज़िल हुई अल्लाह ताला ने सूरह आले इमरान की आयत नंबर 128 नाजिल की और फरमाया "ए नबी इस मामले में आपको कोई अख्तियार नहीं अल्लाह जिसे चाहे तौबा की तौफीक दे और जिसे चाहे अज़ाब दे" ये आयात मेरे लिए सबसे बड़ी उम्मीद बन गई मेरा रब मुझे पुकार रहा था

वो मुझे हिदायत देकर मुझे माफ करना चाहता था जब मैं मुसलमान हुआ तो मक्का के सरदारों ने ताने दिए खालिद तुमने वो दीन कुबूल कर लिया जिसकी किताब में तुम्हारे बाप के बारे में सख्त आयात नाजिल हुई अब तुम उन आयात को कैसे पढ़ोगे लेकिन मेरे रब ने मुझे मुशरिकिन ए मक्का से उठाया और रूमी और ईरानियों के एवानो पर दे मारा गज़वा ए मौत में मेरे हाथों से नौ तलवारे टूटी लेकिन मेरा हौसला नहीं टूटा मेरे नबी ने मुझे सैफुल्लाह का खिताब अता कर दिया दमिश्क की यार्मुक और हिम्स की जमीनें गवाह है

मैने कभी पीठ नहीं दिखाई जब सैयदना उमर फारूक रज़ीo ने मुझे माजूल कर दिया तो लोगों ने कहा खालिद अब बगावत करेगा मैने कहा मै उमर के लिए नहीं उमर के रब के लिए लड़ता हु मैने सिपाह सालारी की कबह उतरी और एक आम सिपाही बनकर लड़ने लगा आज मैं हिम्स में बिस्तर ए मर्ज पर हु मेरी सांसे उखाड़ रही है

मेरे जिस्म पर देखो कोई एक बालिस्त जगह ऐसी नहीं जहां तीर नेज़े और तलवारों के ज़ख्म के निशान ना हो मैने हर मैदान ए जंग में शहादत मांगी मगर अल्लाह की तलवार मैदान ए जंग में ना टूट सकी आज मैं बिस्तर पर मौत का इंतजार कर रहा हु मगर मेरी रूह मुतमइन आज खालिद अपने आका ए नामदार जनाब ए मुहम्मदुर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहों अलैहि वसल्लम से मिलने जा रहा है

मैने गज़वा ए ओहद का दाग मिटा दिया मैने बाप की मोहब्बत पर अल्लाह के कलाम और ईमान को तरजीह दी ए लोगों याद रखना इज़्ज़त ओहदों में नहीं अल्लाह और अल्लाह के रसूल की इताआत में है

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रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:“सहरी खा कर अपने दिन के रोज़े पर मदद हासिल करो और दोपहर को सो कर (क़ैलूलह कर के) रात के क़ियाम प...
21/02/2026

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“सहरी खा कर अपने दिन के रोज़े पर मदद हासिल करो और दोपहर को सो कर (क़ैलूलह कर के) रात के क़ियाम पर मदद हासिल करो।”
हवाला: Sunan Ibn Majah, हदीस नंबर: 1693
इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने इबादत में एतदाल और हिकमत की तालीम दी है कि सहरी करना दिन भर के रोज़े के लिए जिस्मानी ताक़त और रूहानी बरकत का ज़रिया बनता है, और दोपहर के वक़्त थोड़ा आराम (क़ैलूलह) करना रात की इबादत और क़ियामुल्लैल के लिए मददगार साबित होता है, इससे यह सबक मिलता है कि मोमिन को अपनी इबादात को बेहतर तरीक़े से अदा करने के लिए मुनासिब तदबीर और तवाज़ुन इख़्तियार करना चाहिए, मिसाल के तौर पर अगर कोई शख़्स सहरी का एहतिमाम करे और दिन में कुछ देर आराम कर ले तो वह ज़्यादा ख़ुशू और तवानाई के साथ रात की नमाज़ अदा कर सकता है, यह हदीस हमें यह यक़ीन दिलाती है कि इस्लाम इंसान की फ़ितरत और ज़रूरतों का ख़याल रखते हुए इबादत का मुकम्मल और मुतवाज़िन निज़ाम पेश करता है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:“रमज़ान सब्र का महीना है और सब्र का सवाब जन्नत है।”हवाला: Mishkat al-Masabih, हदीस नंबर: 1965इस ...
21/02/2026

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“रमज़ान सब्र का महीना है और सब्र का सवाब जन्नत है।”
हवाला: Mishkat al-Masabih, हदीस नंबर: 1965
इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने रमज़ान मुबारक को सब्र का महीना क़रार दिया है क्योंकि इसमें मोमिन भूख, प्यास और ख़्वाहिशात पर क़ाबू रखता है और अपनी इबादात में साबित क़दम रहता है, इसी तरह सब्र की हक़ीक़त यह है कि इंसान अल्लाह की रज़ा के लिए अपने नफ़्स को रोके और मुश्किलात में साबित क़दम रहे, और सब्र करने वालों के लिए अल्लाह तआला ने अज़ीम इनाम यानी जन्नत का वादा फ़रमाया है, इससे यह सबक मिलता है कि मोमिन को रमज़ान में सिर्फ रोज़ा ही नहीं बल्कि हर मामले में सब्र इख़्तियार करना चाहिए, जैसे ग़ुस्सा, ज़बान की हिफ़ाज़त, इबादत की पाबंदी और नेकीयों पर क़ायम रहना, मिसाल के तौर पर अगर कोई शख़्स रोज़े की हालत में किसी तकलीफ़ या आज़माइश का सामना करे और वह शिकवा करने के बजाय सब्र करे और अल्लाह से अज्र की उम्मीद रखे तो यह सब्र उसके लिए जन्नत के रास्ते को आसान बना देता है, यह हदीस हमें यह यक़ीन दिलाती है कि रमज़ान का असल मक़सद नफ़्स की तर्बियत और सब्र की आदत पैदा करना है और यही सब्र आख़िरत में कामयाबी का ज़रिया बनता है।













रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:“रमज़ान ऐसा महीना है जिसका पहला हिस्सा रहमत, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत और आख़िरी हिस्सा जहन्नम की...
21/02/2026

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“रमज़ान ऐसा महीना है जिसका पहला हिस्सा रहमत, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत और आख़िरी हिस्सा जहन्नम की आग से आज़ादी है।”
हवाला: Sahih Ibn Khuzaymah, हदीस नंबर: 1887
इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने रमज़ान मुबारक के तीनों अशरों की ख़ुसूसियात को बयान फ़रमाया है कि उसके इब्तिदाई दिन अल्लाह की रहमत से भरपूर होते हैं, दरमियानी अय्याम में मग़फ़िरत की कसरत होती है और आख़िरी अशरा जहन्नम की आग से निजात का ज़रिया बनता है, इससे यह सबक मिलता है कि मोमिन को रमज़ान के हर हिस्से की क़दर करनी चाहिए और इब्तिदा से ही इबादत, तौबा और इस्तिग़फ़ार का एहतिमाम करना चाहिए ताकि वह रहमत, मग़फ़िरत और निजात तीनों हासिल कर सके, मिसाल के तौर पर अगर कोई शख़्स रमज़ान के पहले अशरे में अल्लाह की रहमत का तालिब बने, दूसरे अशरे में कसरत से इस्तिग़फ़ार करे और आख़िरी अशरे में इबादत और शब-बेदारी का ख़ास एहतिमाम करे तो वह इस महीने की मुकम्मल बरकतों को पा सकता है, यह हदीस हमें यह यक़ीन दिलाती है कि रमज़ान का हर लम्हा क़ीमती है और उसका हर हिस्सा अल्लाह की ख़ास नेमतों और इनामात से भरपूर है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:“जन्नत में एक दरवाज़ा है जिसे ‘रैय्यान’ कहा जाता है, उसमें क़यामत के दिन सिर्फ रोज़ेदार दाख़िल ह...
15/02/2026

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जन्नत में एक दरवाज़ा है जिसे ‘रैय्यान’ कहा जाता है, उसमें क़यामत के दिन सिर्फ रोज़ेदार दाख़िल होंगे।”

📖 हवाला: Sahih al-Bukhari, हदीस 1896
और Sahih Muslim, हदीस 1152

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि जन्नत में एक खास दरवाज़ा है जिसे “रैय्यान” कहा जाता है, और क़यामत के दिन उसमें सिर्फ रोज़ेदार दाख़िल होंगे।
इस हदीस में रोज़े की अज़ीम शान और उसका खास इनाम बयान किया गया है। “रैय्यान” का मतलब है बहुत ज़्यादा सैराब करने वाला, यानी ऐसा दरवाज़ा जो प्यास बुझाने और राहत देने से जुड़ा हुआ है। दुनिया में रोज़ेदार अल्लाह की रज़ा के लिए भूख और प्यास सहता है, इसलिए आखिरत में उसे ऐसी जगह से दाख़िला मिलेगा जहाँ उसे हमेशा की राहत और ताज़गी हासिल होगी।
यह दरवाज़ा रोज़ेदारों के लिए इज़्ज़त और शरफ़ की निशानी है। इसका मतलब यह नहीं कि बाकी लोग जन्नत में नहीं जाएँगे, बल्कि यह रोज़ा रखने वालों के लिए एक खास सम्मान और इनाम है। जब रोज़ेदार उस दरवाज़े से दाख़िल हो जाएँगे, तो वह दरवाज़ा बंद कर दिया जाएगा — ताकि यह इनाम सिर्फ उन्हीं के लिए खास रहे।
इस हदीस से हमें यह सबक मिलता है कि रोज़ा सिर्फ एक फ़र्ज़ इबादत नहीं, बल्कि अल्लाह के नज़दीक बहुत मक़बूल अमल है। जो शख़्स सच्चे दिल, सब्र और तक़वा के साथ रोज़ा रखता है, अल्लाह उसके लिए आखिरत में खास इनाम तैयार रखता है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:“रोज़ेदार के लिए दो खुशियाँ हैं: एक खुशी इफ्तार के वक़्त और दूसरी खुशी जब वह अपने रब से मिलेगा।”...
15/02/2026

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“रोज़ेदार के लिए दो खुशियाँ हैं: एक खुशी इफ्तार के वक़्त और दूसरी खुशी जब वह अपने रब से मिलेगा।”

📖 हवाला: Sahih al-Bukhari, हदीस 1904
और Sahih Muslim, हदीस 1151

इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने रोज़ेदार की दो खास खुशियों का ज़िक्र फ़रमाया है।
पहली खुशी इफ्तार के वक़्त होती है। जब रोज़ेदार पूरा दिन अल्लाह की ख़ातिर भूख और प्यास बर्दाश्त करता है और मग़रिब के वक़्त रोज़ा खोलता है, तो उसके दिल में सुकून, राहत और अल्लाह की इताअत पूरी करने की खुशी होती है। यह सिर्फ खाने-पीने की खुशी नहीं, बल्कि इबादत मुकम्मल होने की रूहानी खुशी है।
दूसरी और सबसे बड़ी खुशी उस वक़्त होगी जब वह अपने रब से मिलेगा। क़यामत के दिन जब अल्लाह रोज़े का अज्र अता फरमाएगा, अपनी रहमत से नवाज़ेगा और अपने खास इनाम से सरफ़राज़ करेगा, तो वह खुशी दुनिया की हर खुशी से बढ़कर होगी।
यह हदीस हमें सिखाती है कि रोज़ा सब्र, यक़ीन और अल्लाह की मोहब्बत का अमल है, जिसका सिला दुनिया में भी सुकून की शक्ल में मिलता है और आखिरत में हमेशा की कामयाबी की शक्ल में।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:“रोज़ा (गुनाहों और जहन्नम से बचाने वाली) ढाल है।”📖 हवाला: Sahih al-Bukhari, हदीस 1894और Sahih Mu...
15/02/2026

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“रोज़ा (गुनाहों और जहन्नम से बचाने वाली) ढाल है।”
📖 हवाला: Sahih al-Bukhari, हदीस 1894
और Sahih Muslim, हदीस 1151

इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने रोज़े को “ढाल” क़रार दिया है। ढाल वह चीज़ होती है जो इंसान को हमले से बचाती है। जिस तरह जंग में ढाल तलवार और तीर से हिफ़ाज़त करती है, उसी तरह रोज़ा इंसान को गुनाहों से और आखिरत में जहन्नम की आग से बचाने का ज़रिया बनता है।
रोज़ा सिर्फ भूखा और प्यासा रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपनी ख्वाहिशात, ग़ुस्से, बुरी बातों और गलत कामों पर क़ाबू पाने की मश्क़ है। जब इंसान रोज़े की हालत में होता है, तो वह झूठ, ग़ीबत, लड़ाई-झगड़े और हर बुराई से बचने की कोशिश करता है। यही परहेज़गारी (तक़वा) उसकी असली ढाल बन जाती है।
इस हदीस से हमें यह सबक मिलता है कि अगर हम रोज़े की हक़ीक़त को समझकर उसे सही तरीके से रखें, तो यह हमारी दुनियावी ज़िंदगी को भी सुधारता है और आखिरत में भी हमारी हिफ़ाज़त का सबब बनता है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:“तुम्हारे पास रमज़ान का महीना आ गया है। यह एक बरकत वाला महीना है। अल्लाह ने इस महीने के रोज़े तुम...
15/02/2026

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
“तुम्हारे पास रमज़ान का महीना आ गया है। यह एक बरकत वाला महीना है। अल्लाह ने इस महीने के रोज़े तुम पर फ़र्ज़ कर दिए हैं।”

Sunan an-Nasa'i की हदीस (2106)

यह हदीस हमें याद दिलाती है कि रमज़ान सिर्फ़ एक और महीना नहीं है — यह अल्लाह की तरफ़ से एक खास तोहफ़ा है, जो बरकत, रहमत और बदलाव के मौकों से भरा हुआ है। अल्लाह ने रोज़ा इसलिए फ़र्ज़ नहीं किया कि हम पर बोझ डाले, बल्कि इसलिए कि हमारे दिलों को तरबियत दे — हमें सब्र सिखाए, शुक्रगुज़ारी सिखाए, अपने नफ़्स पर क़ाबू पाना सिखाए और हमें अपने रब के और करीब करे। रमज़ान एक रूहानी नई शुरुआत (स्पिरिचुअल रीसेट) है — अपने मक़सद से दोबारा जुड़ने का मौका।
इसे ऐसे समझिए जैसे कोई अहम ट्रेनिंग का दौर हो। जिस तरह एक खिलाड़ी बड़ी मुक़ाबले से पहले सख़्त तैयारी करता है — जल्दी उठता है, खाने-पीने का ख़याल रखता है, ध्यान और फ़ोकस बनाए रखता है — उसी तरह रमज़ान हमारा रूहानी ट्रेनिंग कैंप है। हम सहरी के लिए उठते हैं, अपनी ख्वाहिशात पर क़ाबू रखते हैं, नमाज़ बढ़ाते हैं, क़ुरआन पढ़ते हैं, सदक़ा देते हैं और अपनी ज़ुबान की हिफ़ाज़त करते हैं। महीने के आखिर तक हमें रूहानी तौर पर ज्यादा मज़बूत, ज्यादा होशमंद और अल्लाह के और करीब होकर निकलना चाहिए।
रमज़ान सिर्फ़ भूखा रहने का नाम नहीं है —
बल्कि यह रूह को ग़िज़ा देने का महीना है।

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:“जिस शख़्स ने चोसरा (लूडो) खेली, तो गोया उसने अपने हाथों को सूअर के ख़ून और गोश्त से रंग लिया।”📖 ह...
10/02/2026

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
“जिस शख़्स ने चोसरा (लूडो) खेली, तो गोया उसने अपने हाथों को सूअर के ख़ून और गोश्त से रंग लिया।”
📖 हवाला:
सहीह मुस्लिम, हदीस नंबर: 2260
📝 इस हदीस का खुलासा (व्याख्या)
इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने चोसरा (लूडो जैसे पासों वाले खेल) की सख़्त नापसंदीदगी बयान फ़रमाई है। हदीस में जो तश्बीह (उपमा) दी गई है—सूअर के ख़ून और गोश्त से हाथ रंगने की—वह इस अमल की शिद्दत-ए-हरामियत और नापाकी को समझाने के लिए है।
इसका मतलब यह नहीं कि खेलने वाला सचमुच नापाक हो जाता है, बल्कि यह बताना मक़सूद है कि:
यह खेल गुनाह का काम है
इसमें क़िस्मत/जुए का पहलू पाया जाता है
यह इंसान को अल्लाह की याद, नमाज़ और ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल करता है
इस्लाम में ऐसे तमाम खेल जिनमें जुआ, पासा, या महज़ क़िस्मत पर दारोमदार हो, उन्हें नापसंद किया गया है, क्योंकि वे इंसान के अख़लाक़ और दीन दोनों को नुक़सान पहुँचाते हैं।
👉 इस हदीस से हमें यह सबक़ मिलता है कि मोमिन को चाहिए कि वह:
अपने वक़्त को नेकी और फ़ायदे वाले कामों में लगाए
ऐसे मशग़लों से बचे जो गुनाह की तरफ़ ले जाएँ
खेल भी वही चुने जो जिस्मानी या ज़हनी फ़ायदा दें और दीन से न टकराएँ

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:“जो शख़्स रमज़ान के रोज़े रखे, नमाज़ क़ायम करे और हज अदा करे, अल्लाह तआला पर हक़ है कि वह उसे बख़्...
09/02/2026

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
“जो शख़्स रमज़ान के रोज़े रखे, नमाज़ क़ायम करे और हज अदा करे, अल्लाह तआला पर हक़ है कि वह उसे बख़्श दे, चाहे वह अल्लाह की राह में हिजरत करे या अपने वतन ही में मुक़ीम रहे।”
📖 हवाला:
जामेअ तिरमिज़ी, हदीस नंबर: 2530
यह हदीस इस्लाम के बुनियादी अरकान—रमज़ान के रोज़े, बाक़ायदा नमाज़ और हज—की अदायगी पर अल्लाह तआला की अज़ीम बख़्शिश और अज्र को वाज़ेह करती है। यह इस बात की दलील है कि ख़ालिस नियत और सच्ची इताअत के साथ अल्लाह के अहकाम पर अमल करने वाला बंदा, चाहे वह कहीं भी हो, अल्लाह की रहमत और मग़फिरत का मुस्तहक़ बन जाता है।
एक मोमिन जो इख़लास के साथ रमज़ान के रोज़े रखता है, पाबंदी से नमाज़ अदा करता है और हज मुकम्मल करता है, अल्लाह तआला उसके पिछले गुनाह माफ़ फ़रमा देता है, जो अल्लाह की बे-पनाह रहमत और अज्र के वादे की रौशन मिसाल है।Islam
























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